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प्राचीन यूनानी राजनीतिक चिन्तन, दर्शन की मूलभूत विशेषताए ।

प्राचीन यूनानी राजनीतिक चिन्तन, दर्शन की मूलभूत विशेषताए । 

राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में यूनानियों का सर्वोत्कृष्ट योगदान था। कुछ पाश्चात्य एंव विदेशी विद्वानों ने यहाँ तक लिखा है कि राजनीतिक चिन्तन का जन्मदाता यूनान अथवा ग्रीक था. यहीं से बौद्धिक अथवा सोफिस्ट विचार धारा द्वारा राजनीतिक चिन्तन का आरम्भ होता है। यूनानी राजनीतिक चिन्तकों में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु विशेष उल्लेखनीय हैं। वास्तव में सुकरात से ही यूनानी राजनीतिक चिन्तन परम्परा का प्रारंभ होता है, सुकरात के समस्त विचार भाषा शैली में हैं जिसको उनके प्रिय शिष्य प्लेटो ने संकलित किया है। सुकरात के बाद प्लेटो का नाम आता है जिसने अपने चिन्तन द्वारा राजनीतिक दर्शन को एक अलग विचार घारा दी। इसके बाद अरस्तू का नाम आता है जिसे राजनीतिक चिन्तन का जनक कहा जाता है। जिसने अपने चिन्तन द्वारा राजनीतिक चिन्तन को एक नई ऊँचाई प्रदान की। इसी चिन्तन परम्परा का अनुसरण कर आज भी राजनीतिक चिन्तन अपने प्रगति पथ पर अग्रसर है। प्राचीन ग्रीक राजनीतिक दर्शन का इतिहास लगभग ढाई हजार वर्ष पुराना है, प्रो० बार्कर के शब्दों में राज दर्शन का प्रारम्भ विन्दु यूनान अथवा ग्रीक है पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तक और विद्वान् इसी विचारधारा के समर्थक है। पाश्चात्य राज्य दर्शन का उदगम् यूनान की रम्य स्थली रही है। यूनान में राजदर्शन के उद्भव के कई कारक उत्तरदायी थे जिनमे प्रथमतःयूनानियों का जीवन के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण था। वे जीवन के सफलता सुख समृद्धि और भौतिक साधनों की उपलब्धि में विश्वास करते थे। जीव और ब्रह्म के सूक्ष्म सम्बन्धों का विवेचन करने की अपेक्षा यूनानी राजनीतिक चिन्तन इस धरती के जीव को ही अपना अध्ययन केन्द्र मानने में आस्था रखते थे। उसके इस मानववादी दृष्टिकोण ने उसे मानव और उसके परिवेश को सोचने की प्रेरणा थी। मानव के निकट और सर्वाधिक महत्त्व का परिवेश ठसका राजनैतिक समाज होता है। फलतः इस दृष्टिकोण ने राज्य के विषय में सोचने का मार्ग प्रशस्त किया। दूसरे यूनानियों की जिज्ञासा को प्रकृति ने उन्हे राज्य, राजनीति समाज,व्यक्ति और राज्य के पारस्परिक संबंधों इत्यादि के सन्दर्भ में सोचने की प्रेरणा दी तीसरे यूनान के भौगोलिक दृष्टि से परिवेश में भी राजदर्शन के उद्भव का मार्ग प्रशस्त किया। भौगोलिक दृष्टि से यूनान अनेक छोटे-छोटे नगर राज्यों में बंटा हुआ था। इन राज्यों की अपनी अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्था थी। इस प्रकार विविध रूपी राजनीतिक संस्थाओं के अस्तित्व ने राजनीतिक चिन्तन का पथ प्रशस्त किया ये नगर राज्य समय-समय पर अनेक प्रकार के राजनीतिक उतार-चढ़ाव का अवलोकन करते रहे,अतः उनकी इस गतिशीलता ने भी राजनीतिक दर्शन में योग दिया अन्ततः नगर राज्यों में अधिक संख्या में लोकतांत्रिक व्यवस्था विद्यमान थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था ने राजदर्शन के अनुकूल वातावरण उत्पन्न किया। इन कारणों के मिले-जुले प्रभाव ने राजदर्शन की टत्पत्त में योग दिया। अत: यूनानियों की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने राजनीतिक चिन्तन का आविष्कार किया। यूनान में राजनीतिक चिन्तन का सर्वोत्तम रूप में चौथी शताब्दी ई० पूर्व के एथेन्स में अरस्तु की रचनाओं में मिलता है। यूनान की सभ्यता से पूर्व क्रीट मित्र, बेबीलोन,असीरिया आदि की अनेक सभ्यताएं विकसित हो चुकी थी, अनेक राज्यों और साम्राज्यों का उत्थान एवं पतन हो चुका था। इनमे राजनीतिक चिन्तन का ऐसा क्रमवद्ध विकास क्यों नहीं हुआ? दसके यूनान में ही प्रादुर्भूत और एथेन्स में विकसित होने के कुछ विशेष कारण थे। इनको समझे विना यूनान के राज्य सम्बन्धी विचारों को अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता।

यूनान में राजनीतिक चिन्तन के प्रादुर्भाव के कारण एवं विशेषताएँ

(क) उन्मुक्त जिज्ञासा वृत्ति 1200 ई० पू० के लगभग और भाषा भाषी फिरन्दर जंगली यूनानी जातियों ने बाल्कान पर्वतमाला के उत्तर से तथा कृष्ण सागर से ईजियन सागर के विभिन्न प्रदेशों-वर्तमान यूनान, कीट और लघु एशिया (टी) पर आक्रमण करके शनैः-शैनैः इन्हे जीतना शुरू किया था। 500 ई० पूर्व तक ये इस प्रदेश के स्वामी बन गये और इन्होंने अनेक छोटे-छोटे नगर-राज्यों की स्थापना की। इन आक्रान्ताओं का कोई अपना सुनिश्चित धर्म संस्कृति और परम्परा नहीं थी। इनमें कोई बड़े राजा पुरोहित और पुजारी नहीं थे, विचारों को नियंत्रित करने वाली पुरानी धार्मिक या राजनीतिक परम्परायें नहीं थीं। इसके साथ ही इनमें अदम्य जित्तासाप्त्ति थी क्रीट और
मिस्र की पुरानी अत्युत्रत सभ्याताओं के साथ सम्पर्क में आने से इनमे नई वस्तुओं को जानने का कौतूहल तथा अदम्य जिज्ञासा वृत्ति जागृत हुई। अरस्तु ने कहा था-"सब मनुष्य जानना चाहते हैं। आश्चर्य की भावना उन्हे दार्शनिक बनाती है, दर्शन का एकमात्र स्रोत यही है।" यूनानी इस भावना से प्रेरित होकर सत्यान्वेषण करने वाले थे। इसी लिए थेल्स एनेक्सीमेण्डर, पिथागोरस, हिराक्टिस, ने विश्व के प्रार्दुभाव की समस्याओं पर चिन्तन किया था। हीरोडोटस ने अनेक देशों में भ्रमण करके अपने सुप्रसिद्ध इतिहास का प्रणयन किया और प्लेटो तथा अरस्तु ने राज्यविषयक प्रश्नों की मीमांसा की।

(ख) बुद्धिवाद-अदम्य जिज्ञासा के अतिरिक्त यूनानियों में प्रथम बुद्धिवाद था। प्राय:धर्म मनुष्य की बुद्धि को कुण्ठित कर देता है यूनानी इस दृष्टि से सौभाग्यशाली थे कि उनके स्वतंत्र चिन्तन को अवरुद्ध करने वाले कोई धार्मिक विचार और विश्वास नहीं घे। उन्हे बुद्धि एवं तर्क में बहुत श्रद्धा थी। उनकी यह आस्था थी कि विश्व की व्यवस्था का तथा समाज का संचालन कुछ नियमों के अनुसार होता है, मनुष्य का यह कर्त्तव्य है कि वह इनका अन्वेषण करे। राज्य सम्बन्धी नियमों के अनुसंधान से वहाँ राज्यशास्त्र का प्रादुर्भाव हुआ। इसके साथ ही आलोचना तथा सामूहिक वाद-विवाद और विचार गोष्ठियों को यूनानी बहुत महत्त्व देते थे। जीवन की समस्याओं के सम्बन्ध में निरन्तर निरीक्षण विचार और मीमांसा करना उन्हे बहुत प्रिय था। वे प्रमाणवाद में विश्वास नहीं रखते थे। प्रत्येक वस्तु को संदेह की दृष्टि से देखते हुए उसे सम्यक् रीति से जाचने और तर्क की कसौटी पर कसने के बाद ग्रहण करते थे। वे मनुष्य को मननशील मानते थे और प्रत्येक शब्द का यथार्थ लक्षण और स्वरूप जानना चाहते थे। सुकरात आजीवन सामान्य लोकव्यवहार में प्रयुक्त होने वाले न्याय आदि प्रसिद्ध शब्दों के चिन्तन में लगा रहा। विचारगोष्ठियों में स्वतंत्रापूर्वक किये जाने वाले वाद-विवादों को यूनानी बड़ा महत्त्व देते थे। पेरोक्लीज ने कहा था, किसी देश की जनता के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि वह वाणी के स्वतंत्रा के अधिकार से वंचित कर दी जाए।"अरस्तू का यह मत था कि, वैयक्तिक चिन्तन की अपेक्षा सामूहिक विचार-कई मनुष्यों का मिलकर किसी प्रश्न को मीमांसा करना अधिक लाभदायक होता है।" सुकरात को इस प्रकार के विवाद बहुत प्रिय थे प्लेटों की सभी रचनाये संवादशैली में लिखो गई हैं। संवादों के माध्यम से राजनीतिक प्रश्नों का तत्व चिन्तन किया गया है। सत्यान्वेषण का अनुराग, बुद्धिवाद,तर्क, विचारों की स्पष्टता और आलोचक वृत्ति ने यूनानियों में उच्च कोटि के चिन्तन की क्षमता उत्पन्न की। बिक्री के कथनानुसार यूनान में राजनीतिक चिन्तन का प्रार्दुभाव यूनानी मन के शान्त और स्पष्ट बुद्धिवाद के कारण हुआ।

(ग) मानवीयता और व्यष्टिवाद-यूनान में राजशास्त्र के विकसित होने का एक बड़ा कारण यूनानियों में इन दोनों विशेषताओं का होना था यूनानियों में विचार का मुख्य विषय मानव था पहले यह बताया जा चुका है कि उनमें धर्म का विशेष महत्व नहीं था, अत: उनका चिन्तन धर्म मूलक नहीं था वे इतने मानव वादी थे कि उन्होन देवताओं की कल्पना भी मनुष्यों के रूप में की। होमर के समय से उनके काव्य का मुख्य विषय मनुष्य था। दर्शन में उनकी मुख्य समस्या विश्व की व्यवस्था में मानव का स्थान था। सुकरात का कहना था कि 'सर्वश्रेष्ठ अनुसंधान इस विषय का अध्यपन करना है कि मनुष्य को क्या बनना चाहिए और उसे किन वात्तां का अनुसरण करना चाहिए। महाभारत में कहा गया है कि इस सृष्टि में मनुष्य से बढ़कर कोई दूसरी वस्तु नहीं है। यूनानी कवि सोफोक्लीज का कहना था, "मनुष्य कितना आश्चर्यजनक है उससे अधिक विस्मयजनक कोई दूसरी वस्तु नहीं हैं। अतः: मनुष्य के अध्ययन का सर्वोतम विषय मनुष्य ही है। राज्य मानवीय संगठन है, अतः वह उनके अध्ययन का विशेष विषय है। मनुष्य के अध्ययन में इतना गहरा अनुराग रखने के कारण यह सर्वथा स्वभाविक था कि वे उसके अधिकारों का प्रबल समर्थन करने वाली व्यष्टिवादी हों वे यह समझते थे कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता पूर्वक सोचने का सामूहिक रूप से इन विचारों को प्रगट करने का अपने अन्तःकरण के अनुसार कार्य करने का अधिकार होना चाहिए, वशर्ते कि यह अधिकार, दूसरे व्यक्तियों के अधिकार को हानि पहुँचाने वाला न हो। इसका एकमात्र बड़ा अपवाद सुकरात का विषपान है किन्तु सुकरात का 70 वर्ष की आयु तक स्वतंत्रापूर्वक विचारों का अभिव्यक्त करना उनके व्यष्टिवाद का प्रवल प्रमाण है। यूनान के राज्य स्वशासन समुदाय थे, इनमे प्रत्येक व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक सम्मलित होने वाला स्वतंत्र नागरिक था और अपना पृथक महत्त्व रखता था यूनानी इस बात पर गर्व करते थे कि उनके राज्यों में व्यक्ति का महत्व उसकी योग्यता के अनुरूप होता है, वह सामुदायिक जीवन पर अपना प्रभाव डालता है, किन्तु पूर्वी राज्यों और साम्राज्यों में केवल निरंकुश राजा का महत्त्व होता है, उसके हित के लिए सारी प्रजा के अधिकारों की बलि दे दी जाती है। राजा और प्रजा में स्वामी सेवक का सम्बन्ध होता है उनमे किसी प्रकार के हितों की समानता नहीं होती, व्यक्तियों के कोई अधिकार नहीं होते। यूनान में राज्य स्वतंत्रता और समानता के आधार पर एकत्र होकर संगठन बनाने वाले व्यक्तियों के समुदाय थे, अतः इनमें व्यक्ति का स्थान बड़ा महत्त्वपूर्ण था। किन्तु व्यष्टिवादी होते हुए यूनानी राज्य एवं समाज को बहुत गौरवपूर्ण एवं महत्वपूर्ण स्थान देते थे। उनका यह विश्वास था कि राज्य में ही व्यक्तित्व का पूर्ण विकास हो सकता है राज्य व्यक्ति के लिए अति आवश्यक है व्यक्ति को राज्य के पुराने नियमों का पालन करना चाहिए। व्यक्ति की महत्ता पर बल देते हुए भी वे राज्य को सजीव संगठन मानते थे।

(घ) पोलिस या नगर राज्य-यूनानियों के राजनीतिक चिन्तन पर सबसे अधिक प्रभाव पोलिस का था। प्रायः इसका अनुवाद नगर-राज्य किया जाता है किन्तु अगले वर्णन से यह स्पष्ट हो जायेगा कि यह वर्तमान नगर और राज्य दोनो से कई महत्वपूर्ण भेद रखता है। हिन्दी में इसका शुद्ध अनुवाद पुर:संगठन ही प्रतीत होता है। यह उनका सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संगठन था। इसके प्रादुर्भाव और विकास की कथा से इसकी मुख्य विशेषलायें स्पष्ट हो जायेगी। एक पोलिस में एक छोटी-सी वस्तु और उसके आस-पास कृषि-कार्य के लिए आवश्यक भूमि होती थी। शहर और उसके पास का देहाती प्रदेश मिलकर पोलिस कहलाता था। जनसंख्या और क्षेत्रफल की दृष्टि से ये वर्तमान काल में छोटे-से-छोटे राज्यों की अपेक्षा अधिक छोटे थे। यूनानी दार्शनिक और शासक इन नगर-राज्यों की बस्ती जानबूझ कर छोटी रखना चाहते थे। उनके मतानुसार एक राज्य के सब निवासियों में एकता, निष्ठा और आत्मीयता होनी चाहिए, संख्या वृद्धि के साथ यह घनिष्ठता संभव नहीं है। प्लेटो ने 'रिपब्लिक' में लिखा था कि राज्य की उसी हद तक बढ़ने देना चाहिए, जहाँ तक उसकी एकता बनी रहे। उसने लाज में राज्य के निवासियों की संख्या 5040 निश्चित की है। अरस्तू का कहना था कि पोलिस के लिए दस की संख्या बहुत कम है और 1 लाख की संख्या बहुत अधिक है। बड़ी संख्या में नियन्त्रण रखना असंभव हो जाता है। यूनानी शासक यह समझते थे कि जनसंख्या बढ़ने से राज्य में एकता नहीं रहेगी, प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र का संचालन असम्भव हो जाएगा। अतः वे आबादी को घटाने के अनेक प्रयत्न करते थे। बच्चों को जंगलों में छोड़ देने को बुरा नहीं समझते थे। अरस्तू के कथनानुसार क्रीट के कुछ राज्यों में जनसंख्या कम बनाये रखने के लिए समलिंगी संबन्धों की प्रथा भी प्रचलित थी। इस प्रकार उनके नगर-राज्य का यह आदर्श था कि यह जनसंख्या इतनी कम भी न हो कि सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन असंभव हो जाय और इतनी अधिक भी न हो कि नागरिक शासन में भाग न ले सकें। सामान्य रूप से यूनानी नगर-राज्यों की आवादी भारत के वर्तमान कस्वां जितनी और क्षेत्रफल परगनों तथा तहसीलों जितना होता था। नगर राज्य की आबादी और क्षेत्रफल कम होने का एक बड़ा परिणाम यह था कि यह बड़ा सुदृढ़ और प्रगाढ़ संगठन था, इसका नागरिकों पर गहरा प्रभाव पडता था। नगर में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र को व्यवस्था होने से प्रत्येक नागरिक असेम्बली का सदस्य होता था, लाटरी द्वारा वह कभी भी जज
या सेनापति चुना जा सकता था, राज्य के प्रत्येक कार्य में दिलचस्पी लेना अपना कर्तव्य समझता था। उसमें सच्चे अर्थों में सामुदायिक जीवन था। अरस्तू ने इनमें सामुदायिक जीवन की भावना को बढ़ाने के लिए यह कहा कि इनमें न केवल खानपान और शिक्षा की व्यवस्था, किन्तु भगवान् की पूजा की व्यवस्था भी सामुदायिक होनी चाहिए और इसका व्यय राज्य की ओर से वहन किया जाना चाहिए। पोलिस उनके जीवन में इतना महत्वपूर्ण था कि व्यक्ति के जीवन का विकास इसी में संभव था, इसीलिए अरस्तू ने मनुष्य को पोलिस में जीवन व्यातीत करने वाला प्राणी माना था। राज्य को आजकल राजनीतिक संगठन माना जाता है। यूनानियों की दृष्टि में पोलिस मुख्य रूप से नैतिक संगठन था। अरस्तू के राज्य का संविधान केवल राजकीय पदों की व्यवस्था नहीं था, किन्तु यह एक जीवन पद्धति भी थी। राज्य केवल कानूनी रचना ही नहीं, किन्तु नैतिक भावना भी है, इसका लक्ष्य मनुष्यों के जीवन को पूर्ण बनाना है अत: राज्य का चिन्तन करते हुए एक नैतिक दृष्टिकोण से विचार करना चाहिए, यह सोचना चाहिए कि राज्य का लक्ष्य क्या होना चाहिए इसे प्राप्त करने तथा ठीक जीवन पद्धति को विताने के लिए किन साधनों को प्रयोग करना चाहिए। राजनीति शास्त्र वास्तु: समूचे समाज का नीतिशास्त्र है, उसे समाज के हित का तथा इसे प्राप्त करने के साधनों का चिन्तन करना चाहिए। राजनीतिशास्त्र मनुष्य के अन्य मनुष्यों के तथा समाज के प्रति दायित्वों और कर्तव्यों का विवेचन करने वाला शास्त्र है।

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