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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

प्लेटो के न्याय सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

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 प्लेटो के न्याय सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण


प्लेटो ने अपने ग्रन्थ रिपब्लिक में न्याय को बहुत अधिक महत्त्व दिया है। जिस न्याय पद्धति (प्रणाली) की प्लेटो ने परिकल्पना की थी, उसमें ही अपमे प्यारे एयेन्स को नष्ट होने से बचाने का साधन था। प्लेटो को तत्कालीन समय की शासन प्रणाली में सबसे घृणास्पद बात यह लगी कि अयोग्य, अनुभवहीन तथा स्वार्थी व्यक्ति राज्य के प्रशासन में हस्तक्षेप करते थे। प्लेटो ने समस्त व्यक्तियों को तीन भागों में वर्गीकृत किया है प्रथम वर्ग के अन्तर्गत शासक को रखा है, द्वितीय वर्ग के अन्तर्गत सैनिक आते हैं, तृतीय एवं अन्तिम वर्ग के अन्तर्गत उत्पादक वर्ग को रखा है। प्लेटो के अनुसार वास्तविक न्याय इसी व्यवस्था में है कि समाज का प्रत्येक वर्ग अपने निश्चित क्षेत्र का कार्य करे तथा स्वार्थ का परित्याग करके राज्य के प्रति वफादार बना रहे। प्लेटो की न्याय सम्बन्धी अवधारणा उसके चिन्तन प्रणाली का आधार स्तम्भ है। उसके द्वारा लिखी गई पुस्तक 'रिपब्लिक' में उसने जितने विचारों का संकलन किया है उन सवका आधार स्तम्म उसकी न्याय सम्बन्धी अवधारणा ही है। प्लेटो द्वारा प्रदत्त समस्त विचार उसके न्याय सिद्धान्त से प्रभावित हैं। प्लेटो के न्याय सिद्धान्त का यह अर्थ नहीं जो हम सामान्य भाषा में समझते हैं, प्लेटो के न्याय का अर्थ व्यापक है। रिपब्लिक प्लेटों की सर्वोत्तम कृति है। प्रत्येक व्यक्ति द्वारा सन्तोष पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करना ही न्याय है। न्याय की इस व्याख्या के सम्बन्य में अरस्तू का कथन है कि, "न्याय वह सद्गुण है जो हम एक दूसरे के साथ अपने व्यवहार में प्रदर्शित करते हैं।" प्लेटो के न्याय सम्बन्धी परिभाषा यह है कि "समाज में प्रत्येक व्यक्ति को वह उपलभ्य हो, जो उसे प्राप्त है।" प्लेटो का विचार है कि व्यक्ति में यह भावना होनी चाहिए कि उसे जो कार्य सौंपा जाय वह उसे पूर्ण ईमानदारी एवं निष्ठा के साथ निर्वहन करे। प्रसिद्ध विद्वान् बार्कर ने उसकी न्याय सम्बन्धी अवधारणा को प्लेटो के 'रिपब्लिक में प्रतिपादित विचारों का मूल आधार माना है। इस अर्थ में वह सचमुच ही मूल आधार है उसने न्याय को अपने आदर्श राज्य के केन्द्र-बिन्दु के रूप में पतिष्ठापित किया है। रिपब्लिक का प्रारंभ इस प्रश्न से होता है कि न्याय क्या है? इस प्रश्न का सही उत्तर प्राप्त करने से पूर्व प्लेटो अपने युग में प्रचलित न्याय सम्बन्धी विभिन्न सिद्धान्तों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करता है और उन्हें अनुपयुक्त सिद्ध करके अपने दृष्टिकोण के अनुसार न्याय की व्याख्या देता है। उसके द्वारा जिस तीन प्रमुख सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण किया गया है वे निम्नलिखित हैं- परम्परावादी, उग्रवादी, तथा व्यवहारवादी प्लेटो ने उपरोक्त तीनों सिद्धान्त को गलत साबित किया है तब फिर प्रश्न उठता है कि उसके अनुसार न्याय क्या है? प्लेटो के चार सिद्धान्त को दो भागों में बाँट सकते हैं-

1. आदर्श राज्य की स्थापना

2. उसमें न्याय की स्थिति प्लेटो आदर्श राज्य की भूमिका में 'न्याय' को खोजता है। वह एथेन्स की दुरावस्था से भली-भांति परिचित था। वह राज्य को मानव का विस्तृत रूप मानता है। प्लेटों के अनुसार,
"राज्य किसी ग्रीक वृक्ष से या चट्टान से नहीं किन्तु उसमें निवास करने वाले व्यक्तियों के चरित्र से बनते हैं।"

प्लेटो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में तीन गुण या भावनायें होती है-

 (1)क्षमा(2) साहस (3) विवेक उपरोक्त तीन तत्त्व तीन प्रकार की प्रवृत्तियों को प्रकट करते हैं। ये तीनों प्रवृत्तियाँ सभी व्यक्तियों में समान नहीं होती। जिस मनुष्य में जो वृत्ति अधिक मात्रा में होती हैं, उसे उसी वृत्ति से जाना जाता है। इन तीनों तत्त्वों को यथा स्थान रखना चाहिए तथा एक-दूसरे से हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। व्यक्ति जीवन का यही सिद्धांत वैयक्तिक न्याय है। जिस प्रकार मानवीय आत्मा के उपरोक्त तीन गुण है उसी प्रकार राज्य में भी तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के तीन तत्त्व आवश्यक है (अ) आर्थिक (व) सैनिक (स) दार्शनिक आर्थिक तत्त्व मनुष्य की क्षुधा वृत्ति से प्रेरित कार्यों से सम्बन्धित है। जबकि सैनिक तत्त्व मनुष्य की साहसी प्रवृत्ति के अनुसार है। राज्य का तीसरा तत्त्व दार्शनिक है। इसका सम्बन्ध मनुष्य की तीसरी प्रवृत्ति विवेक से है। ज्ञान, प्रेम, शत्रु, मित्र का सही ज्ञान विवेक से ही होता है। प्लेटो के अनुसार,"आत्मा के ये तीनों तत्व अपने-अपने कार्य-क्षेत्र की सीमा में रहते हुए अपना कार्य सम्पादन करते है और मानव-आत्मा में एकता की स्थापना करते हैं। यदि इन तत्वों का एक व्यक्ति की आत्मा में समन्वय किया जा सके तब वह व्यक्ति न्यायी बन जायेगा। जिन व्यक्तियों में ज्ञान की प्रधानता होती है, वे शासन कार्य कुशलतापूर्वक कर सकते हैं।"

प्लेटो ने मनुष्य के तीन गुणों एवं राज्य के तीन तत्वों के आधार पर समाज को तीन वर्गों में बाँटा है, जो इस प्रकार से हैं-

(1) उत्पादक वर्ग (2) सैनिक वर्ग (3) शासक वर्ग,

उत्पादक वर्ग जो क्षुघवृत्ति पर आधारित है, यह राज्य के आर्थिक तत्त्व की पूर्ति करता है। इसका मुख्य कार्य श्रम, खेती और व्यापार है।

दूसरा वर्ग सैनिक वर्ग है, जो साहस की प्रकृति पर आधारित है। वह राज्य के सैनिक तत्व की पूर्ति करता है।

तीसरा वर्ग शासक वर्ग है, जो विवेक प्रकृति पर आधारित है और दार्शनिक तत्त्व की पूर्ति करता है। प्लेटो की मान्यता है कि जब उत्पादक, सैनिक एवं शासक वर्ग ये तीनों ही सुचारू रूप से अपना अलग कार्य करते रहेंगे और एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे तभी सम्पूर्ण समाज में न्याय की स्थापना होगी।

प्लेटो के न्याय सिद्धान्त की विशेषताएँ प्लेटो की न्याय संबंधी अवधारणा की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं- 

(1) विशेषीकरण के सिद्धान्त पर आधारित-प्लेटो का 'न्याय' सिद्धान्त विशेषीकरण के सिद्धान्त पर आधारित है। इसके अनुसार व्यक्ति को समाज में कार्य अथवा कर्त्तव्य मिलना चाहिए जो उसे प्राकृतिक गुण के अनुकूल हो। उसके अनुकूल निर्धारित कर्तव्य से ही समाज में शान्ति एवं व्यवस्था की स्थिति रहती है प्लेटो, एधन्स की लोकतंत्रीय व्यवस्था की विफलता के लिए इस सिद्धान्त की उपेक्षा को दोषी मानता था। उसके अनुसार अयोग्य एवं अक्षम शासकों के कारण ही समाज में अराजकता, अव्यवस्था एवं भ्रष्टाचार की स्थिति रहती है। विशेषीकरण के आधार पर निर्धारित कर्तव्य पालन से इसका अन्त हो सकता है।

(2)न्याय की धारणा की वैधानिकता की सीमा से बाहर करना-सामान्यत: न्याय की धारणा वैधानिक है। अर्थात् विधान और संविधान के उल्लंघन के दोषारोपण की स्थिति में व्यक्ति को न्यायालय द्वारा दोषी पाये जाने पर उसे दण्डित करना ही सामान्यतः न्याय माना जाता है। प्लेटो ने इसी सामान्य तथा अपने समय में प्रचलित अन्य धारणाओं के विपरीत जाकर अपनी नयी अवधारणा का प्रतिपादन किया। उसने न्याय की घारणा को वैधानिकता की सीमा से बाहर कर उसे व्यापक बनाया। विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि उसकी यह धारणा नैतिक है।

(3) निर्धारित कर्तव्यों का पालन-प्लेटो 'न्याय को बाह्य वस्तु नहीं मानता है। वह प्रत्येक व्यक्ति के मन को इसका निवास स्थान मानता है, उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के मन में इस भावना का होना ही न्याय' है कि उसे समाज में अपने प्रकृतस्थ गुणों के अनुकूल निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

(4) प्राकृतिक गुणों के आधार पर समाज का वर्गीकरण-'न्याय' सम्बन्धी सिद्धान्त के प्रतिपादन के पूर्व प्लेटो' समाज का व्यक्तियों के प्राकृतिक गुणों के आधार पर वर्गीकरण करता है। इन वर्गीकरण से वह स्पष्ट कर देता है कि सभी व्यक्ति सभी कार्यों के उपयुक्त नहीं होते हैं। शासन कार्य में अयोग्य तथा अक्षम व्यक्ति का प्रवेश वर्जित करने के लिए ही उसमें प्रकृतस्थ गुणों के आधार पर समाज के वर्गीकरण की योजना प्रस्तुत की।

(5) अनावश्यक प्रतियोगिता का विरोध-यह धारणा व्यक्तियों में आत्मसंयम तथा मनोयोग की भावना पैदा करती है। इतना ही नहीं, यह समाज में समंजस्य एवं व्यवस्था स्थापित करती तथा अनावश्यक प्रतियोगिता पर रोक लगाती है। अनावश्यक प्रतियोगिता से समाज में स्वार्थ और लोभ को बढ़ावा मिलता है जिसके परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार, अराजकता, अशान्ति एवं अव्यवस्था को बल मिलता है।

(6) आत्मत्यागी-यह धारणा व्यक्ति में कर्तव्य बोध की भावना पैदा करती तथा उसे नि:स्वार्थी और आत्मत्यागी बनाती हैं। यह व्यक्तिवाद पर रोक लगाती तथा व्यक्ति को समाज का अंग मानती है।

(7) वशीकरण तथा सावयवीवाद पर बल-यह लोकतन्त्र विरोधी है। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि एथेन्स की लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त अव्यवस्था, अराजकता एवं भ्रष्टाचार आदि के निराकरण के लिए ही प्लेटो ने इसका प्रतिपादन किया। लोकतन्त्र व्यक्तिवाद और सामान्यीकरण पर बल देता है, जबकि प्लेटो' ने अपने नियम के सिद्धान्त में विशेषीकरण और सावयवीवाद पर बल दिया।

(8) नैतिकता और सदाचार-यह नैतिकता और सदाचार की स्थापना करता है। कर्तव्य बोध की भावना व्यक्ति में नैतिकता की भावना पैदा करती है तथा वह सदाचारी बनता है। आलोचना-प्लेटो ने न्याय' की जो नैतिक कारण प्रस्तुत की है, उसकी निम्नलिखित दृष्टियों से आलोचना की जाती है

(1) सामान्य: न्याय से उसके वैधानिक स्वरूप का ही वोध होता है कानूनों के पालन अथवा उल्लंघन के सम्बन्ध में न्यायालय का निर्णय हो न्याय माना जाता है। इसे व्यापक अर्थ में लिया जाता है। किसी विवाद में उचित अथवा अनुचित का निर्धारण भी न्याय माना जाता है। किसी भी रूप में यह कर्तव्य पालन का द्योतक नहीं है। प्लेटो' ने समाज में कर्तव्य पालन के अर्थ में इसका प्रयोग कर इसे व्यापक बना दिया है।

(2) अपने इस सिद्धान्त के आधार पर उसने शासक वर्ग अर्थात् दार्शनिक राजाओं को असीमित एवं निरंकुश शक्ति प्रदान को है। यह सही है कि उसने संपत्ति पर परिवार विषयक साम्यवाद व्यवस्था के माध्यम से शासकों को नि:स्वार्थी और त्यागी बनाने की योजना प्रस्तुत की है। परन्तु उसने उन पर किसी भी सीमा का प्रावधान नहीं किया है। यह योजना राज्य तथा शासन को सर्वाधिकारवादी वनाती है।

(3) न्याय सम्बन्धी धारणा विशेषीकरण तथा व्यक्तित्व के किसी एक पक्ष के विकास पर ही वल देती है। ऐसा कर वह व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास अवरूढ़ करती है।

(4) ठसकी इस बात के लिए भी आलोचना की जाती है कि उसने गुणों के निर्धारण का कोई ठोस और सुनिश्चित आधार नहीं प्रस्तुत किया है। यह सही है कि उसने 'जन्म को नहीं अपितु 'गुण को कर्तव्य निर्धारण का आधार बनाया है।

(5) प्लेटो का न्याय सम्बन्धी सिद्धान्त लोकतन्त्र विरोधी है। अपनी समस्त रोटियों के बावजूद लोकतंत्र एक सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है। निश्चित ही उसकी कुछ त्रुटियाँ हैं जिन्हें दूर करना है।

(6) आज के विशाल राज्यों में न्याय सम्बन्धी यह सिद्धान्त किसी भी प्रकार व्यवहारिक नहीं हो सकता है।

(7) यह वर्गीय विशेषाधिकारों पर बल देता है। आज के लोकतांत्रिक युग में इस प्रकार की व्यवस्था उचित नहीं कही जा सकती है।

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