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पश्चिमी एशिया के कृषि संसाधन

पश्चिमी एशिया के कृषि संसाधन 

पश्चिमी एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः पेट्रोलियम के खनन एवं निर्यात तथा कृषि एवं पशुपालन पर आधारित है। फारस की खाड़ी तटीय देशों की अर्थव्यवस्था का मूलाधार पेट्रोलियम का खनन तथा उसका निर्यात व्यापार है जबकि तुर्की, ईरान, अफगानिस्तान, तथा भूमध्यसागरीय देशों की अर्थव्यवस्था में कृषि पशुपालन का प्रमुख स्थान है। कुछ खाड़ी तटीय देशों तथा भूमध्यसागर के तटीय देशों में तेल शोधन सम्बंधी उद्योग भी विकसित हैं। इस प्रकार पश्चिमी एशियाई देशों की आर्थिक स्थिति का विवरण अग्रांकित है। पेट्रोलियम की भूमिका पश्चिमी एशिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था में खनिज तेल के उत्पादन तथा निर्यात का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात पेट्रोलियम के खनन में हुई वृद्धि तथा उसके निर्यात से प्राप्त विदेशी मुद्रा ने इन देशों के आर्थिक भूदृश्य तथा सामाजिक सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। खाड़ी तटीय देशों में रेगिस्तानी शुष्क जलवायु के कारण अन्य आर्थिक संसाधनों का लगभग अभाव है और पेट्रोलियम का निर्यात ही राष्ट्रीय आय का प्रमुख स्रोत है। खनिज तेल से अधिक आय होने के कारण ही अन्य साधन विहीन होते हुए भी खाड़ी तटीय देशों की प्रति व्यक्ति आय विश्व में सर्वाधिक है। यहाँ उत्पादित तेल अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा अन्य देशों के साथ राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक है। पेट्रोलियम के निर्यात से धनी बने कई देशों के सामाजिक-आर्थिक पर्यावरण में पिछले 50 वर्षों में बहुत अधिक परिवर्तन हुए हैं। विश्व के सर्वाधिक उच्च स्तरीय रहन-सहन वाले परिवार इस प्रदेश में रहते हैं। तेल से होने वाली उच्च आय से इस प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन तथा आवासीय सुविधा सुलभ हैं । पश्चिमी एशिया में सऊदी अरब, ईरान,कुवैत, ईराक, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन,ओमान, यमन आदि पेट्रोलियम के प्रमुख उत्पादक देश हैं। इनमें अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था पेट्रोलियम के निर्यात पर ही आधारित है। कुवैत, यमन, बहरीन आदि कई देशों का शत-प्रतिशत निर्यात केवल पेट्रोलियम का ही होता है।

 कृषि एवं पशुपालन-

भूमध्य सागर तटीय देशों तथा तुर्की के अतिरिक्त पश्चिमी एशिया की अधिकांश भूमि शुष्क रेगिस्तानी है जहाँ जल एवं आर्द्रता के अभाव में कृषि कार्य सम्भव नहीं है। यत्र-तत्र पाये जाने वाले मरूद्यानों में ही कुछ खेती हो पाती है जहाँ खजूर, गेहूँ, जौ, मक्का, सब्जियाँ आदि उगाई जाती है। ईरान, तथा टर्की की नदी बेसिनों तथा पहाड़ियों की निचली घाटियों में सिंचाई के द्वारा अनेक प्रकार की उपयोगी फसलों का उत्पादन किया जाता है। संपूर्ण पश्चिमी एशिया में दजला एवं फरात नदियों का दोआब सबसे विस्तृत कृषि भूमि है जहाँ इन नदियों से निकाली गयी नहरों के जल से सिंचाई के द्वारा अनेक प्रकार की उपयोगी फसलों का उत्पादन किया जाता है। सम्पूर्ण पश्चिमी एशिया में दजला एवं फरात नदियों का दोआब सबसे विस्तृत कृषि भूमि है जहाँ इन नदियों से निकाली गयी नहरों के जल से सिंचाई करके उल्लेखनीय मात्रा में गेहूँ, जौ मक्का, दलों, गन्ना आदि की फसलें उगाई जाती हैं। ईरान के उत्तरी भाग में पर्वतवादों तथा उनके निकटवर्ती भूमि पर कनात सिंचाई का प्रचलन है। मेसोपोटामिया (दजला-फरात दोआब) तथा अनातोलिया के पठारी भाग में कपास भी पैदा की जाती है। भूमध्य सागरीय क्षेत्रों में जहाँ वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है किन्तु ग्रीष्म ऋतु शुष्क रहती है, वहाँ मुख्यताः फलों तथा सब्जियों की खेती की जाती है। पश्चिमी एशिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्वपूर्ण स्थान है। पहाड़ी एवं पठारी भागों शुष्क रेगिस्तानी प्रदेशों में अनेक आदिम जातियाँ रहती हैं जो मुख्यतः पशुपालक हैं और घुमक्कड़ (nomadic) जीवन बिताती हैं। इनमें कुछ समुदाय स्थायी कृषि भी करते हैं और कुछ अपने पशुओं के साथ पर्वत और घाटियों के मध्य मौसमी प्रवास (transhumance) भी करते हैं। इस प्रकार भ्रमणशील पशु चारण पश्चिमी एशिया के निवासियों का प्रमुख व्यवसाय है। विस्तृत मरूस्थलीय प्रदेशों में कृषि तथा अन्य व्यवसायों के अभाव में पशुचारण ही प्रमुख व्यवसाय है। चरवाहे जलाशय तथा चारागाह की खोज में अपने परिवार तथा पशुओं के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए स्थानान्तरण करते रहते हैं। घुमक्कड़ जीवन के कारण इनका स्थायी निवास नहीं होता है। ये घमुक्कड़ लोग तम्बुओं में रहते हैं। इन्हें जहाँ कुछ दिन ठहरना होता है वहाँ तम्बुओं का शिविर बना लेते हैं और प्रस्थान के समय तम्बुओं को पशुओं पर लाद कर चलते हैं। अलग-अलग प्रदेशों में भिन्न नामों वाली आदिम जातियाँ पायी जाती हैं जो अपने पशुओं के साथ घुमक्कड़ जीवन बिताती हैं। इनमें विशिष्ट जीवन-शैली के लिए अरब मरुस्थल के बदू प्रसिद्ध हैं। बदू लोग ऊँट, भेड़ बकरियाँ, घोड़े, खच्चर आदि पालते हैं और अपने पशुओं को बेच कर मरूद्दानों के कृषकों से गेहूँ, जौ, मक्का आदि अन्न तथा वस्त्र, तम्बाकू आदि आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करते हैं।

उद्योग-धन्धे पश्चिमी एशियाई देशों में तेल शोधन शालाओं के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण उद्योगों का लगभग अभाव है। फारस की खाड़ी तथा भूमध्यसागर के तटीय भागों में तेल शोधक कारखाने श्रृंखलाबद्ध रूप में मिलते हैं जो खाड़ी तटीय क्षेत्रों से पेट्रोलियम की आपूर्ति पर आधारित हैं। फारस की खाड़ी के पश्चिमी तट पर मीना-अल-अहमदी, मीना अबदुल्ला (कुवैत), जुबैल, रासतनूरा (सउदी अरब), बहरीन तथा आबूधाबी (संयुक्त अरब अमीरात) में तेलशोधक कारखाने हैं। ईरान में अबादान तथा ईराक में बसरा में तेलशोधक कारखाने कार्यरत हैं। भूमध्य सागर के तट पर त्रिपोली, बेरूत, हैफा (लेबलान), तेल अबीब (इजराइल) में अपेक्षाकृत लघु तेलशोधक कारखाने हैं जहाँ खाड़ी तटीय पेट्रेलियम उत्पादक क्षेत्रों से पाइप लाइन द्वारा पेट्रेलियम (अशोधित तेल) पहुँचाया जाता है। टार्की की राजधानी अंकारा और इस्तांबुल, तथा इजमित में रसायन तथा वस्त्र निर्माण के कारखाने हैं। ईरान और तुर्की के कुछ स्थानों पर लोहा इस्पात के भी लघु कारखाने हैं।

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