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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

पर्यावरण क्या है मानव जीवन पर पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव

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पर्यावरण का अर्थ एवं मानव जीवन पर पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव 

 पर्यावरण का अर्थ-सामान्य अर्थों में पर्यावरण दो शब्दों "परि आवरण' से मिलकर बना है। यहाँ "परि' से तात्पर्य है "चारों ओर' तथा आवरण का तात्पर्य है "टॅका हुआ'। इससे यह स्पष्ट होता कि पर्यावरण का तात्पर्य उन सभी प्राकृतिक और सामाजिक दशाओं से है जो एक प्राणी के जीवन को चारों ओर से घेरे रहती है। उदाहरण के लिए, जल, वायु, भूमि की बनावट, तापमान, तुएँ खनिज पदार्थ, आर्द्रता, विभिन्न जीव, चारों ओर की ध्वनि, उद्योग-धन्धे उपयोग में लायी जाने वाली विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ तथा हमारा सम्पूर्ण सामाजिक जीवन आदि वे दशाएँ हैं जिनसे मानव का जीवन चारों और से घिरा रहता है। इस प्रकार इन सभी दशाओं की संयुक्तता को हम मानव का पर्यावरण कहते हैं। स आधार पर रॉस ने लिखा है,"पर्यावरण कोई भी वह बाहरी शक्ति है जो हमें प्रभावित करती है।"

गस्वर्ट के अनुसार, "पर्यावरण का तात्पर्य प्रत्येक उस दशा से है जो किसी तथ्य (वस्तु अथवा मनुष्य) की चारों ओर से घेरे रहती है तथा उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। पर्यावरण के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए मैकाइवर का कथन है कि, "पर्यावरण जीवन के आरम्भ से ही, यहाँ तक कि उत्पादक को के समय से ही मानव को प्रभावित करने लगता है।" इसका तात्पर्य है कि एक बच्चा जब गर्भ में है, उसी समय से उसका पर्यावरण अथवा चारों ओर की दशाएँ उसके जीवन को प्रभावित करना आर कर देती है।

पर्यावरण यद्यपि एक व्यापक अवधारणा है लेकिन पर्यावरण प्रदूषण के सन्दर्भ में इसका मन सम्बन्ध हमारे वातावरण (atmosphere) से है। वातावरण के जिस हिस्से में मिट्टी,चदा। तथा रेत आदि हैं, उसे हम स्थलमण्डल (lithosphere) कहते हैं। दूसरा हिस्सा वह है जो जल-क्षेत्रों अथवा समुद्र के रूप में है, जलमंडल (hydrosphere) कहा जाता है। स्थलमण्डल और जलमण्डल के ऊपर लगभग 300 किलोमीटर की ऊंचाई तक एक गैसीय वातावरण होता है जिसे हम वायुमण्डल (atmosphere) कहते हैं। समुद्र की सतह से लगभग 10 किलोमीटर ऊपर तक तथा लगभग इतने ही नीचे तक के हिस्से को जीवमण्डल कहा जाता है क्योंकि यही वह हिस्सा है जिसमें मनुष्य और विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु रहते हैं। मानव समुदाय का लगभग 90 प्रतिशत भाग समुद्र की सतह से 15 किलोमीटर ऊँचाई तक की भूमि पर ही निवास करता है। स्वाभाविक है कि मानव जीवन को स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल का लगभग 2 किलोमीटर ऊँचाई तक का भाग सबसे अधिक प्रभावित करता है व्यावहारिक रूप से इसी को हम मनुष्य का पर्यावरण कहते हैं।

पर्यावरण का मानव जीवन पर प्रभाव-पर्यावरण के मानव जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं, जैसे 

(1) घातक बीमारियों में वृद्धि-अनेक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि पर्यावरण प्रदूषण से अनेक घातक बीमारियों में वृद्धि होती है। इनमें से अधिकांश बीमारियों का सम्बन्ध हृदय, पेट, आँख और त्वचा से है। रक्तविकार, दमे और साँस की बीमारियाँ, सर दर्द, अपच, तपेदिक, डायरिया, मानसिक विकार, अनिद्रा तथा एलर्जी आदि पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली कुछ प्रमुख बीमारियाँ हैं।

(2) अनिद्रा तथा मानसिक रोग-ध्वनि प्रदूषण के कारण औद्योगिक नगरों में मशीनों के बीच काम करने वाले लाखों श्रमिकों में अनिद्रा और विभिन्न प्रकार के मानसिक रोग उत्पन्न हो जाने हैं। शोर के कारण निरन्तर मानसिक तनाव बने रहने से धीरे-धीरे ऐसे लोगों का वैयक्तिक विघटन होने की सम्भावना बढ़ जाती है। यही वैयक्तिक विघटन बाद में परिवार को विघटित करने लगता है।

(3) तापमान में वृद्धि-भौगोलिक नदियों का कथन है कि पृथ्वी के तापक्रम में होने वाला कोई भी परिवर्तन सामाजिक अनुकूलन की नयी समस्याएँ उत्पन्न करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी से लगभग 3,000 किलोमीटर ऊपर ओजोन गैस की परत सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों को पूथ्व पर आने से रोकती है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण ओजोन गैस की इस परत में बड़े-बड़े छेद हो जाने के कारण पृथ्वी पर सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों की मात्रा बढ़ गयी। इसी के फलस्वरूप पृथ्वी के तापमान भी बढ़ने लगा। यदि शीघ्र ही इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो इसका न केवल सम्पून्न मानव जाति की कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा बल्कि अनेक नयी बीमारियाँ भी उत्पन्न हो जायेंगी।

(4) वनस्पतियों में कमी-वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा मृदा प्रदूषण के फलस्वरूप पृष्ठ पर वनस्पतियों की निरन्तर कमी होती जा रही है। बढ़ते हुए प्रदूषण से उन वनस्पतियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है जो मानव जीवन के लिए बहुत उपयोगी है।

(5) वन्य जीवों का हस- पर्यावरण प्रदूषण का एक प्रमुख प्रभाव वन्य जीवों की घटती हुई संख्या के रूप में देखने को मिलता है। वास्तव में, विभिन्न प्रकार के वन्य जीव जंगलों की स्वच्छता के बनाये रखकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाने का काम करते हैं। जंगल में होकर बहने वाली नदियों और नालों का पानी प्रदूषित हो जाने तथा वनों का चुरी तरह कटान होने से जंगली जीव-जन्तुओं की संख्य कम होने लगती है। अंततः इससे भी प्रदूषण में वृद्धि होती है।

(6) अपराधों में वृद्धि- मनोवैज्ञानिकों तथा समाजशास्त्रियों ने विभिन्न सर्वेक्षण से यह साद किया है कि ध्वनि प्रदूषण अपराध में वृद्धि करने वाला एक प्रमुख कारण है। जो व्यक्ति बहुत ,अधिक शोर के बीच रहते हैं, उनमें मानसिक तनाव इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि वे सरलता से अपराध बढ़ने लगते हैं। इसका प्रमाण देते हुए एल्बर्ट ने लिखा है कि गाँवों की अपेक्षा नगरों में तथा नगर की बाहरी बस्तियों की तुलना में कारखानों के आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में अपराध की दर अधिक पायी जाती है।

(7) प्रदूषित फसलों का उत्पादन-मृदा प्रदूषण का एक घातक प्रभाव विषाणुओं से युक्त फसलों का उत्पादन होना है जिसने मानव जीवन को बहुत प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया। विभिन्न प्रकार की रासायनिक खादें तथा कीटनाशक दवाइयाँ मिट्टी के अन्दर रहने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं को ही नष्ट नहीं करतीं बल्कि इनके अधिक उपयोग से कृषि उपज में भी विषाणुओं का समावेश हो जाता है। महात्मा गांधी की अंग्रेज शिष्या सरला बहन ने लिखा है, "विकास के लिए आज रासायनिक खादों और कीटनाशी दवाइयों के उपयोग को बहुत प्रोत्साहन दिया जाता है। अधिक उपज के लिए इनाम और उपाधियाँ भी मिलती हैं। इस लालच से एक किसान ने अपने खेतों में खूब रासायनिक खाद डाली। वह बराबर अपनी फसल में कीटनाशी फुहार करता रहा। उसकी फसल भी इनाम पाने के लायक हुई। पहले दिन जब रसोई में खाना पका तो माँ ने खुशी से अपने छोटे प्यारे बच्चे को भात खिलाया भात खाते ही उसके प्राण निकल गये। बचे हुए भात को कुत्ते ने खाया तो वह भी मर गया। इस तरह वह सुन्दर फसल मौत की वाहक बन गयी। सारा का सारा अनाज दफनाना पड़ा।" स्पष्ट है कि मृदा प्रदूषण अनेक प्रकार से मानव जीवन के लिए अत्यधिक घातक हो सकता है।

(8) पारिवारिक विघटन-पर्यावरण प्रदूषण अप्रत्यक्ष रूप से हमारे पारिवारिक जीवन को भी विघटित करने वाला एक प्रमुख स्रोत है जैसे-जैसे पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है, व्यक्ति की कार्यक्षमता तथा उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। इससे परिवार में आर्थिक समस्याएँ ही उत्पन्न नहीं होती बल्कि आजीविका उपार्जित करने वाले सदस्यों में मानसिक तनाव भी बढ़ जाने से सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्धों की मधुरता कम होने लगती है। धीरे-धीरे परिवार में बढ़ते हए तनाव पारिवारिक विघटन की दशा उत्पन्न कर देते हैं।

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