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बुधवार, 8 जुलाई 2020

परिस्थितिकी Ecology क्या है

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परिस्थितिकी Ecology क्या है

परिस्थितिशास्त्र को प्राणिशास्त्र से समाजशास्त्र में लाने का श्रेय आर. ई. पाक्क्स और ई.
डब्ल्यू, बर्ड्स को प्राप्त हुआ है। प्राणिशास्त्र के अन्तर्गत परिस्थितिशास्त्र में इस बात की खोज की गयी कि किसी विशेष क्षेत्र में वृक्षों तथा पशुओं की अनेक जातियों के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध पाया जाता है। इन सम्बन्धों को Symbiosis कहा जाता है जिसका अर्थ दो भिन्न जीवधारियों का साथ-साथ रहना है। समाजशास्त्रियों ने अपने पर्यवेक्षण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि वनस्पति परिस्थितिशास्त्र का पशुओं और वृक्षों पर लागू होने वाला "सिम्बियोसिस' का सिद्धान्त मनुष्यों के समुदायों पर भी लागू किया जा सकता है। इस प्रकार एक नवीन विज्ञान "मानव परिस्थितिशास्त्र'का जन्म हुआ। आर. एम.मैकाइवर के अनुसार, "मानव परिस्थितिशास्त्र विशेषतया विभिन्न नागरिक क्षेत्रों से सम्बन्धित सांस्कृतिक और असामाजिक घटनाओं का अध्ययन करता है।" उदाहरण के लिए पारिवारिक संगठन से लेकर विचारात्मक घटनाओं तक में यह मान लिया जाता है कि मानव परिस्थितिशास्त्र किसी क्षेत्र विशेष की विशिष्ट परिस्थितियाँ तथा उन परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के व्यवस्थित होने की प्रकृति का उद्घाटन करता है।

आर. डी. मैकेन्जी ने मानव जीवन को प्रभावित करने वाले परिस्थितिशास्त्र सम्बन्धी प्रमुत तत्वों को निम्न भागों में विभाजित किया है

1.भौगोलिक तत्व-जैसे जलवायु, नदियाँ, पहाड़, जंगल और भौगोलिक स्थिति।

2. आर्थिक तत्व-जैसे विनिमय पद्धति, व्यावसायिक वितरण, रहन-सहन का स्तर, स्थानीय उद्योग का संगठन इत्यादि।

3. सांस्कृतिक तथा यांत्रिक तत्व-जैसे समुदाय के अन्तर्गत प्रचलित जनरीतियाँ, प्राथमिक रूढ़ियाँ, नैतिकता, संस्था, धर्म, रेलगाड़ी, मोटर गाड़ी,टेलीफोन, विभिन्न प्रकार की उत्पादन सम्बन्धी मशीन।

वस्तु: परिस्थिति शास्त्र के अन्तर्गत सामान्यतया विभिन्न प्रकार के जीवों एवं पौधों का उनके पर्यावरण से सम्बन्ध का अध्ययन किया जाता है किस जीवधारी को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए किस प्रकार की परिस्थिति विशेष की आवश्यकता है, इसी का अध्ययन मुख्यता परिस्थितिशास्त्र के अन्तर्गत होता है। चूंकि परिस्थिति शास्त्र का प्रयोग सर्वप्रथम प्राणिशास्त्र में ही किया गया, अत: इसे प्राणिशास्त्र की ही एक शाखा माना जाता है, किन्तु मानव भी तो एक जीवधारी है, अत: उसका भी अपने पर्यावरण से सामंजस्य का अध्ययन किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में श्री हावले का मत उल्लेखनीय है कि, "किसी जीवधारी का जीवन केवल बाह्य रूप में उसके पर्यावरण की दशाओं जैसे भूमि की बनावट, जलवायु, नाली की व्यवस्था से ही प्रभावित नहीं होता वरन् वह अन्य जीवधारियों तथा उनके क्रियाकलापों से भी प्रभावित होता है।"

इस दृष्टि या सिद्धान्त के आधार पर नगरीय समाजशास्त्र के अन्तर्गत भी परिस्थितिशास्त्र का विकास हुआ। मानव भी निरन्तर न केवल अपने पर्यावरण की भौतिक एवं भौगोलिक दशाओं से बल्कि विभिन्न जीवधारियों से सामंजस्य पाता रहता है और इस प्रकार मनुष्य भी पूर्ण तरह से अन्य मनुष्यों पर आश्रित रहता है ताकि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। अनेक समाजशास्त्रियों ने मानव पारिस्थितिकी शास्त्र के चार सामान्य पहलुओं का उल्लेख किया है। यथा-

1. लोगों का एक समूह या जनसंख्या।

2. पर्यावरण से अनुकूलन करना।

3. प्रौद्योगिकी से अनुकूलन करना।

4. एक सामाजिक संगठन है।

पारिस्थितिकीय संतुलन हेतु सुझाव पारिस्थितिकीय संतुलन हेतु अग्रांकित सुझाव दिये जा सकते हैं

1. सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग अधिक किया जाना चाहिए।

2. भूमि की क्षति को रोका जाना चाहिए।

3. वायु तथा जल वृद्धि की ओर प्रयास किये जाने चाहिए।

4. पशु शक्ति, मानव शक्ति, पवन ऊर्जा, जल शक्ति, सौर ऊर्जा के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

5.कारखाना कानून का पालन होना चाहिए।

6.जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण लगाया जाना चाहिए।

7.शिक्षा का विकास किया जाना चाहिए।

8. वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए

9. पर्यावरण शिक्षा का विस्तार किया जाना चाहिए।

10 .जलाऊ लकड़ी का कम प्रयोग किया जाना चाहिए।

11. आर्थिक नियोजन करते समय पर्यावरण संरक्षण को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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