सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पारिस्थितिकी का क्या महत्व है

पारिस्थितिकी का क्या महत्व है

किसी जीवधारी को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए किस प्रकार की परिस्थिति विशेष की आवश्यकता है, इसी का अध्ययन मुख्यता परिस्थितिशास्त्र के अन्तर्गत होता है। चूँकि परिस्थितिशास्त्र का प्रयोग सर्वप्रथम प्राणिशास्त्र में ही किया गया, अत: इसे प्राणिशास्त्र की ही एक शाखा माना जात है किन्तु मानव भी तो एक जीवधारी है, अत: उसका भी अपने पर्यावरण से सामंजस्य का अध्ययन किय जा सकता है। इस सम्बन्ध में श्री चावल का मत उल्लेखनीय है कि, "किसी जीवधारी का जीवन केवत ब्रह्म रूप उसके पर्यावरण का दशांश भूमि का बनावट, जलवायु,नाली की व्यवस्था से ही प्रभाविः नहीं होता वरन् वह अन्य जीवधारियों तथा उनके क्रियाकलापों से भी प्रभावित होता है।'

इस दृष्टि या सिद्धान्त के आधार पर नगरीय समाजशास्त्र के अन्तर्गत भी परिस्थितिशाह का विकास हुआ। मानव भी निरन्तर न केवल अपने पर्यावरण की भौतिक एवं भौगोलिक दशाओं से बल्कि विभिन्न जीवधारियों से सामजस्य पाता रहता है और इस प्रकार मनुष्य भी पूर्ण तरह से अन्य मनुष्य पर आश्रित रहता है ताकि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। अनेक समाजशास्त्रियों ने मानव पारिस्थितिकी शास्त्र के चार सामान्य पहलुओं का उल्लेख किया है। यथा-

1. लोगों का एक समूह या जनसंख्या,

2. पर्यावरण से अनुकूलन करना,

3. प्रौद्योगिकी से अनुकूलन करना,

4. एक सामाजिक संगठन है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam 1857 के महान विद्रोह (1857 के भारतीय विद्रोह, 1857 के महान विद्रोह, महान विद्रोह, भारतीय सेप्पी विद्रोह) को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। 1857 आंदोलन एक राष्ट्रीय उभर रहा था, जो भारतीयों के दिल में एक मजबूत आग्रह से प्रेरित था, जिससे देश मुक्त हो गया। यह ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय एकल घटना थी। यह भारत में सदी के पुराने ब्रिटिश शासन का नतीजा था। भारतीयों के पिछले विद्रोहों की तुलना में, 1857 का महान विद्रोह एक बड़ा आयाम था और यह समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी के साथ लगभग अखिल भारतीय चरित्र ग्रहण करता था। यह विद्रोह कंपनी के सिपाही द्वारा शुरू किया गया था। इसलिए इसे आमतौर पर 'सेप्पी विद्रोह' कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ सिपाही का विद्रोह नहीं था। इतिहासकारों ने महसूस किया है कि यह एक महान विद्रोह था और इसे सिर्फ एक सिपाही विद्रोह कहने के लिए अनुचित होगा। हमारे इतिहासकार अब इसे विभिन्न ना

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने