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नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था

नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था

उत्तर-महाद्वीप व्यवस्था इंग्लैण्ड के विरुद्ध व्यापारिक युद्ध था-टिलसिट की संधि के बाद नेपोलियन की शक्ति सर्वोच्च शिखर पर पहुँच गयी थी। वह बड़ा महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। उसने यूरोप के सभी सम्राटों को युद्ध में परास्त कर दिया था। केवल इंग्लैण्ड ही ऐसा रह गया था जिसे हराना उसकी शक्ति के बाहर था, क्योंकि सन् 1805 ई० में ट्राफलगार के युद्ध में इंग्लैण्ड ने फ्रांस और स्पेन के जहाजी बेड़े को बुरी तरह नष्ट कर दिया था। वह जानता था कि इंग्लैण्ड को युद्ध में परास्त करना अति दुर्गम कार्य है, क्योंकि उसकी सामुद्रिक शक्ति इंग्लैण्ड की सामुद्रिक शक्ति की अपेक्षा बहुत निर्बल थी। समुद्र पर इंग्लैण्ड का पूर्णतया अधिकार था और वह इंग्लैण्ड पर आक्रमण करने में असमर्थ था। नेपोलियन का विश्वास था कि इंग्लैण्ड की आर्थिक कुशलता उसके व्यापार पर निर्भर है। अत: उसके व्यापार को नष्ट कर दिया जाये तो इंग्लैण्ड अपने आप ही फ्रांस की अधीनता स्वीकार कर लेगा। मान्टगेल्ड के अनुसार, “यदि इंग्लैंड से यूरोप, एशिया तथा अमेरिका से प्राप्त लाभ छीनना है तो उसके वाणिज्य पर आक्रमण करना चाहिये, इससे वह सदैव के लिये हथियार डाल देगा, संघर्ष को छोड़ देगा। इंग्लैण्ड के वाणिज्य पर आक्रमण उसके हृदय पर सीधा आघात होगा। इसलिये नेपोलियन ने इंग्लैण्ड को पराजित करने के लिये अन्य उपाय की शरण ली। उसने उसे व्यापारिक हानि पहुँचाकर परास्त करना चाहा। व्यापार बहिष्कार नियम का विचार न तो नया ही था और न कोई नई प्रथा ही थी। 1786 से पूर्व इंग्लैण्ड और फ्रांस में व्यापारिक युद्ध चला आ रहा था और 1793 में 1799 तक फ्रांस की व्यवस्थापिका सभा ने अंग्रेजी माल पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिये थे। उधर इंग्लैण्ड ने भी फ्रांस के व्यापार को नष्ट करने के लिये प्रयत्न किये थे। 1799 के पश्चात् यह नीति और भी दृढ़ हो गयी।

नेपोलियन के महाद्वीपीय- व्यवस्था के उद्देश्य

(1) इंग्लैण्ड की आर्थिक समृद्धि को हानि पहुँचाना।

(2) यूरोपीय देशों का एक संघ अपने नेतृत्त्व में स्थापित करना।

(3) फ्रांसीसी व्यापार तथा उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहन देना।

(4) नेपोलियन, महाद्वीप के वाणिज्यिक हितों की रक्षा का संरक्षक कहला सकता था। महाद्वीप व्यवस्था का प्रभाव/परिणाम नेपोलियन बोनापार्ट ने महाद्वीप व्यवस्था को सफल बनाने का पूर्ण प्रयत्न किया। उसने 1806 में प्रजा को इस नियम का पालन करने के लिए बाध्य किया।

 1807 में रूस के जार को इससे मानने के लिये बाध्य किया। अपनी योजना की सफलता के लिये उसने 1807 में डेनमार्क के जहाजी बेड़े को प्राप्त करने का प्रयत्न किया और इसी योजना के कारण उसने 1807 में स्वीडन तथा पुर्तगाल से दुश्मनी मोल ली। 1809 में आस्ट्रिया को इसे मानने के लिये विवश किया और सौदागरों के विरोध करने पर भी हालैंड पर अपना प्रभुत्त्व स्थापित कर लिया। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने 1810 में जर्मनी का उत्तरी पश्चिमी तट अपने साम्राज्य में मिला लिया परंतु इस प्रयत्न के बावजूद वह अपनी महाद्वीप व्यवस्था को सफल न बना सका। इस नियम के प्रभाव विशेष रूप से राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र पर पड़े।

1.राजनीतिक प्रभाव-नेपोलियन बोनापार्ट ने व्यापार बहिष्कार नियम लागू करके इंग्लैण्ड के साथ व्यापारिक युद्ध आरम्भ किया, जो सन् 1807 से 1814 तक निरन्तर चलता रहा, जिसके कारण फ्रांस भी नेपोलियन के युद्धों से ऊब गया और अन्त में युद्धों के कारण ही उसका पतन हो गया। नेपोलियन के इस नियम के कारण अंग्रेजों को भी बहुत हानि उठानी पड़ी, परन्तु समुद्री शक्ति होने के कारण उन्होंने विदेशों में अपना माल बलपूर्वक भेजना चाहा तथा डेनमार्क पर भीषण गोला बारी की गई। सन् 1807 में डेनमार्क की राजधानी पर बम फेंककर उसके जहाजी बेड़े को पूर्णतया नष्ट कर डाला गया। इसका परिणाम स्वयं अंग्रेजों के लिये हानि-कारक सिद्ध हुआ, क्योंकि डेनमार्क अंग्रेजों को छोड़कर नेपोलियन का मित्र बन गया। अंग्रेजों का संयुक्त राज्य अमरीका (U.S.A) से नेपोलियन के इसी नियम के कारण मन-मुटाव उत्पन्न हुआ, क्योंकि नेपोलियन की उद्घोषणा से उत्साहित होकर उन्होंने अपने देश का बना हुआ माल यूरोपीय देशों में लाना शुरू कर दिया, जिसके कारण इंग्लैण्ड व अमेरिका में 1812 में भयंकर युद्ध हुआ। अंग्रेजों के अतिरिक्त नेपोलियन को भी इस नियम के दुष्परिणाम भोगने पड़े। जब उसके मना करने पर उसके आधीन देशों ने गुप्त रूप से इंग्लैण्ड का बना माल मंगवाना आरम्भ कर दिया तो नेपोलियन ने कठोरता की नीति का पालन किया, जिसके कारण उसे अनेक युद्धों में फंसा रहना पड़ा। स्पेन, पुर्तगाल, पोप तथा रूस के साथ युद्ध करने के कारण नेपोलियन को बहुत अधिक धन तथा जन की हानि उठानी पड़ी। उसका राजकोष खाली हो गया और उसकी बनायी हुई विशाल सेना नष्ट हो गयी। अन्त में पराजित होकर उसको अपने जीवन के अन्तिम दिवस बड़ी कठिनाईयों से व्यतीत करने पड़े। वास्तव में नेपोलियन के पतन का प्रमुख कारण उसका "व्यापार बहिष्कार नियम" ही बना, क्योंकि इस नियम को लागू के बाद उसकी नीति भी इस नियम के आधीन हो गई। उसको जहाँ भी युद्ध करने पड़े, वह इस नियम को भंग करने के कारण ही। यहाँ तक कि उसके काल में फ्रांस में भ्रष्टाचार और घूस फैल गई, जिसको रोकना उसकी शक्ति से बाहर था। उसके मित्र रूस ने भी उसके साथ विश्वासघात करके उसके सुनहरे स्वप्नों को तोड़ दिया। नेपोलियन ने इंग्लैण्ड को हानि पहुँचाने के लिये जाल तैयार किया था, परन्तु उसमें वह स्वयं ही फंस गया और उसने अपना विनाश कर लिया। अन्त में उसे अपनी जीवन के शेष दिन एक साधारण मनुष्य के समान सेन्ट हेलेना द्वीप में व्यतीत करने पड़े। एक प्रसिद्ध इतिहासकार के अनुसार, "महाद्वीप व्यवस्था ने गोले का कार्य किया और अपने फेंकने वाले का ही नाश कर दिया।"

2. आर्थिक प्रभाव-नेपोलियन ने व्यापार बहिष्कार नियम लागू करके इंग्लैण्ड व फ्रांस के बीच एक आर्थिक युद्ध आरम्भ किया. जो उसके पतन का मुख्य कारण बना। यदि यूरोप के सब देश नेपोलियन का साथ देते तो वह किसी सीमा तक अपने उद्देश्य में सफल हो सकता था पर यूरोपीय देश ने उसका साथ न दिया। अत: वह इंग्लैण्ड का कुछ भी नहीं बिगाड़ सका। कुछ समुद्र पर इंग्लैण्ड का पूर्ण अधिकार था अतः उसके व्यापारिक जहाज विश्व के अन्य देशों से निरन्तर व्यापार करते रहे. परन्त यूरोप महाद्वीप में बहुत-सी विदेशी वस्तुय आना बंद हो गई हैं।यूरोपीय देशों का व्यापार चौपट हो गया क्योंकि समुद्र से तो वे लोग व्यापार कर ही नहीं सकते थे। वहाँ पर अंग्रेज लोग उनके जहाजों को बुरी तरह लूट लेते थे। वस्तुओं की कमी वस्तुओं के मूल्य बहुत ऊंचे चढ़ गये तथा जनता को दैनिक आवश्यकताओं की वस्तु मिलनी बंद हो गई जिसके कारण जनता के कामों में तति होती चली गई तथा नेपोलियन की लोकप्रियता भी कम होने लगी। समय के साथ-साथ उनके आधीन देश व मित्र असन्त् होकर उसके शासन से घृणा करने लगे और इस नियम के पालन में ढील छोड़नी आरम्भ दी। अत: दैनिक उपभोग की आवश्यक वस्तुयें गुप्त रूप से इंग्लैण्ड से इन देशों में आने लगी तथा नेपोलियन की योजना असफल रही। व्यापार बहिष्कार नियम की असफलता के कारण -व्यापार बहिष्कार नियम की असफलता का प्रमुख कारण इंग्लैण्ड की अजेय समुद्री शक्ति थी। वास्तव में यह नियम नेपोलियन के मस्तिष्क की नवीन खोज थी और यदि वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाता तो वह विश्व इतिहास में अमर हो जाता परन्तु भाग्य में कुछ और ही लिखा था जिसने नेपोलियन की जीती हुई बाजी को पलट दिया क्योंकि जल मार्गों पर उसका पूरा अधिकार था और अन्य किसी मार्ग से व्यापार होना अस्भव था। वस्तुओं के अभाव के कारण जनता को अनेक कष्ट सहन करने पड़े और वह नेपोलियन से क्रुद्ध हो गयी। नेपोलियन को इस नियम को लागू करने से पूर्व ही जनता की दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं का कोई न कोई प्रबन्ध कर लेना चाहिये था। इसके अतिरिक्त नेपोलियन ने उस सभी शासकों का कठोरतापूर्वक दमन करके, जिन्होंने इस नियम के पालन में ढिलाई की, उन्हें अपना शत्रु बना लिया। इससे सभी स्थानों पर राष्ट्रीय आन्दोलन शुरू हो गये जिसके तूफान में नेपोलियन की आकांक्षायें भी बह गई। यहाँ तक कि उसके भाइयों ने भी उसका विरोध करना आरम्भ कर दिया। सबसे पहले हालैंड के राजा ने इसे विनाशकारी समझ वचन भंग कर दिया। नेपोलियन ने इंग्लैंड के राजा को हटाकर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया। इसी प्रकार स्वीडन ने नेपोलियन के नियम का विरोध किया। नेपोलियन ने वहाँ के शासक को गद्दी से उतार कर अपने मार्शल बर्नडोट को वहाँ का शासक बना दिया परन्तु रूस के विरोध ने नेपोलयिन की आशाओं पर बिल्कुल पानी फेर दिया। इस बीच प्रजा में पुनरुत्थान हुआ और अन्त में इन सब देशों का सामना करने के लिए नेपोलियन को आत्मसमर्पण करना पड़ा। वह नेपोलियन जिसने एक समय में अपने महान कार्यों द्वारा सम्पूर्ण यूरोप को प्रभावित कर दिया था, एक साधारण मनुष्य के समान अपना जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य किया गया और उसका कारण था उसका बनाया

हुआ व्यापार बहिष्कार नियम। नेपोलियन अपनी इस योजना को पूर्ण करने में असफल रहा। इसके पश्चात् उसको पोप, रूस और पुर्तगाल आदि से भी इसी विषय में युद्ध करने पड़े। नेपोलियन के पतन में महाद्वीपीय व्यवस्था का योगदान -नेपोलियन के पतन में सबसे बड़ा और महान् हाथ उसकी महाद्वीपीय व्यवस्था का था। यह व्यवस्था उसकी भयंकर भूल थी। उसने इस व्यवस्था को कठोरता-पूर्वक यूरोपीय देशों पर लागू करके समस्त यूरोप को अपना शत्रु बना लिया। इस नियम के लागू हो जाने से यूरोप महाद्वीप के समस्त बन्दरगाहों पर अंग्रेजी जहाजों का आना-जाना बन्द हो गया। नेपोलियन इंग्लैण्ड को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता था और उसको नीचा दिखाने के लिये सदा प्रयत्न करता रहता था। उसके विचार में इंग्लैण्ड की उन्नति उसके व्यापार पर निर्भर थी, इसलिये उसने उसे व्यापार को चौपट करने के लिये यह व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था से समस्त यूरोपीय देशों का व्यापार चौपट हो गया। वस्तुओं के मूल्य बहुत अधिक बढ़ गये और जनता को दैनिक आवश्यकताओं की वस्तु मिलना बन्द हो गई। इन सभी देशों के शासक उससे घृणा करने लगे। उसने इस नियम का पालन करने के लिये बड़ी कठोरता से काम लिया, जिससे ये सभी देश उसके शत्रु बन गये। यह नीति स्वयं नेपोलियन के लिये अत्यन्त हानिकारक सिद्ध हुई। उसने मजबूर होकर इंग्लैण्ड से व्यापार करने के लिये कुछ व्यक्तियों को परमिट दिये। उसका पुर्तगाल पर आक्रमण, स्पेन व रूस के विरुद्ध युद्ध करना तथा पोप के साथ दुर्व्यवहार करना इसी नीति का परिणाम था। इन युद्धों से उसको बहुत हानि हुई और इन्हीं युद्धों के कारण उसका पतन अनिवार्य हो गया। नेपोलियन इस व्यवस्था को लागू करने से पूर्णतया असमर्थ रहा, यद्यपि उसने इसको सफल बनाने के लिये बड़ा प्रयत्न किया। नेपोलियन की "महाद्वीपीय व्यवस्था" ने एक उल्टी तोप का कार्य करके इस व्यवस्था के निर्माता को ही नष्ट कर दिया। लौज के शब्दों में, "महाद्वीपीय व्यवस्था नेपोलियन की राजनीतिक योग्यता का सबसे बड़ा प्रतीक है।"

इतिहासकार मरखम के अनुसार, "महाद्वीपीय व्यवस्था द्वारा नेपोलियन ने अपने साम्राज्य के विरुद्ध केवल यूरोप की जनता को ही नहीं भड़काया अपितु उसने फ्रांस के मध्यम वर्ग का भी विश्वास खो दिया। इस वर्ग में वे लोग थे जो क्रान्ति के प्रमुख प्रवक्ता थे और जिन्होंने उसे सत्तारूढ़ किया था। 1810-15 तक फ्रांस के आर्थिक संकट निरन्तर बना रहा, उसका कारण महाद्वीपीय व्यवस्था को बताया गया।"

"इसमें कोई सन्देह नहीं कि नेपोलियन द्वारा 'महाद्वीपीय व्यवस्था को लागू करने के प्रयत्न में फ्रांस के आर्थिक साधन नष्ट हो गये और वह अनेक देशों की सहानुभूति खो बैठा। पर ब्रिटेन इतना दुखी हो गया कि वह कुछ भी करने के लिये तैयार था। 'महाद्वीपीय व्यवस्था' एक महान् आर्थिक सहिष्णुता की परीक्षा थी और ब्रिटेन इसमें सफल हुआ।'

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