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नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) का अर्थ, लक्षण, अवधारणा

नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) का अर्थ,  लक्षण, अवधारणा

वर्तमान परिवेश में 19वीं शताब्दी के अन्तर्गत द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व में नये नये राज्यों का उदय हुआ जिन्हें विश्व राजनीति में विकासशील देशों के रूप में जाना जाता है जिनमें प्रमुख रूप से भारत-पाकिस्तान तथा कई अन्य छोटे देश आते हैं। इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की भाषा में राष्ट्र-राज्य के नाम से जाना जाता है। आज इन राष्ट्र राज्यों के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। जिनमें मूलतः भूमंडलीकरण और नागरिक समाज का उदय (इमरजेन्स ऑफ सिविल सोसाइटी) हैं। यहाँ पर हम नागरिक समाज का विवेचन कर रहे हैं। जहाँ तक सिविल सोसाइटी अथवा नागरिक समाज की अवधारणा का आशय है यह भी अपने विकास के शुरूआती चरण में हैं। यह एक विचार एक अवधारणा के रूप में विकास की दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। इस अवधारणा का मूल लक्ष्य विश्वशान्ति, वसुधैव कुटुम्कम् की भावना एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार विश्व सरकार की स्थापना का प्रयास कर रहा है।

सिविल सोसाइटी (नागरिक समाज) के प्रमुख लक्षण नागरिक समाज की अवधारणा कोई निश्चित विचारधारा नहीं है और न ही आज तक अन्तर्राष्ट्रीय कानून या व्यवस्था का कोई स्पष्ट एवं लिखित रूप विकसित हो सका है, फिर भी सामान्यतया प्रचलित विचारों के आधार पर नागरिक समाज की अवधारणा के प्रमुख रूप से निम्नलिखित लक्षण कहे जा सकते हैं:

1 ) नागरिक समाज की अवधारणा सामान्यतया सभी युद्धों और विशेषतया विश्वयुद्ध का विरोधी है-नागरिक समाज की अवधारणा का सर्वप्रमुख उद्देश्य विश्वयुद्ध की समभावनाओं का अन्त कर, 'विश्व युद्ध' जैसे घृणित शब्द को सदैव के लिए शब्दकोश से बहिष्कृत कर देना है। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में मानव जाति दो विश्वयुद्धों की विभीषिका का सामना कर चुकी है और यदि तीसरा विश्वयुद्ध हुआ, तो अणु और परमाणु वमों के प्रयोग से मानवीय सभ्यता एवं संस्कृति का ही विनाश हो जाएगा।

(2) नागरिक समाज की अवधारणा विश्वशान्ति की समर्थक है-नागरिक समाज की अवधारणा विश्व के सभी नागरिकों और देशों को इस बात के लिए प्रेरित करती है कि वे तच्छ एवं क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर सम्पूर्ण वसुधा को अपना कुटुम्ब समझें और विश्वशान्ति स्थापित करने का प्रयत्न करें।

(3) नागरिक समाज की अवधारणा एक विश्व सरकार की सथापना करना चाहती है-नागरिक समाज की अवधारणा युद्ध का सदैव के लिए अन्त कर विश्व-बन्धुत्त्व तथा विश्व मैत्री की स्थापना करना चाहती है और स्थायी रूप से विश्वशान्ति बनाए रखने के लिए व्यावहारिक राजनीति के क्षेत्र में विश्व सरकार की स्थापना करना चाहती है।

(4)नागरिक समाज की अवधारणा विश्ववाद नहीं है-नागरिक समाज की अवघाणा धर्म,समाज, संस्कृति तथा आर्थिक जीवन, आदि सभी क्षेत्रों में राष्ट्रीय विभिन्नताओं को बनाए रखने के पक्ष में है और चाहती है कि इन विभिन्नताओं के बावजूद विश्व-प्रेम की भावना इतनी प्रवल हो जाए कि वे एकता की भावना का अनुभव कर सकें। इस प्रकार नागरिक समाज की अवधारणा विश्व संघ की स्थापना करना है, लेकिन एकात्मकता की नहीं।

(5) नागरिक समाज की अवधारणा राष्ट्रवाद की विरोधी है-राष्ट्रवाद, नागरिक समाज की अवधारणा की विरोधी नहीं वरन नागरिक समाज की अवधारणा के लक्ष्य को प्राप्त करने की एक आवश्यक सीढ़ी है। लेकिन राष्ट्रवाद नागरिक समाज की अवधारणा के विकास का कार्य उसी समय कर सकता है, जबकि मानव-जाति के द्वारा राष्ट्रीयता के विचार को उसके उदार और व्यापक अर्थों में ग्रहण किया जाए। हमारे द्वारा अपने देश को महान् बनाने हेतु प्रयत्न किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही हमारे द्वारा दूसरे देशों के विकास में भी प्रसन्नता का अनुभव की जानी चाहिए। लेकिन यदि राष्ट्रवाद का विचार संकुचित और ठग्रूप धारण कर अपने राष्ट्र के विकास को ही चरम साध्य समझ लेता है, तो वह उग्र राष्ट्रवाद नागरिक समाज की अवधारणा के मार्ग की एक बहुत बड़ी वाघा बन जाता है।

(6)नागरिक समाज की अवधारणा सहयोग, सद्भावना तथा मैत्री की प्रतिपादक है-नागरिक समाज की अवधारणा एक ऐसी मानवीय विचारधारा है जो यह मानती है कि सम्पूर्ण मानवता के हित में विभिन्न राष्ट्रों के मध्य घृणा, ईर्ष्या, द्वेष तथा असहयोग की भावनाओं का त्याग कर दिया जाना चाहिए।

जब तक पारस्परिक विश्वास तथा भय के स्थान पर राष्ट्रों में सद्भावना तथा सहयोग की भावना नहीं होगी, तब तक एक शान्तिपूर्ण वातावरण का विकास नहीं हो सकेगा, जिसे नागरिक समाज की अवधारणा के विकास की प्रथम आवश्यकता कहा जा सकता है। अतः नागरिक समाज की अवधारणा राष्ट्रीय घृणा तथा द्वेष के स्थान पर पारस्परिक सहयोग तथा मैत्री की प्रबल प्रतिपादक है। नागरिक समाज की अवधारणा के विकास में बाधाएँ

प्रमुख रूप से निम्नलिखित तत्वों को नागरिक समाज की अवधारणा के मार्ग की बाधाएँ बतया जा सकता है:

(1) उग्र राष्ट्रवाद व सैन्यवाद दोनों घातक-उग्र राष्ट्रवाद अपने देश के अतिरिक्त अन्य किसी देश में कोई गुण नहीं देता और अपने राष्ट्र की शक्ति का विस्तार करने के लिये युद्ध और संघर्ष के हिंसात्मक उपायों को ग्रहण कर लेता है। उग्र राष्ट्रवाद ही उस सैन्यवाद को भी जन्म देता है जिसका विश्वास है कि राज्यों के पारस्परिक विवादों का अन्तिम निर्णय न्याय तथा औचित्य के द्वारा नहीं अपितु शक्ति प्रयोग द्वारा ही हो सकता है। प्रथम व द्वितीय विश्व-युद्ध उग्र राष्ट्रवाद और सैन्यवाद की इस मनोवृत्ति के ही परिणाम थे।

(2) साम्राज्यवादी भावना-नागरिक समाज की अवधारणा के विकास में दूसरी बड़ी याघा समृद्धशाली राष्ट्रों की साम्राज्यवादी भावना है जिसका एक रूप उपनिवेशवाद कहा जा सकता है। साम्राज्यवाद राजनीतिक और आर्थिक शोषण का एक ऐसा यन्त्र है जो असभ्य और पिछड़े हुए देशों को विकसित नहीं होने देता।

(3) राष्ट्रवाद की प्रवृत्ति-नागरिक समाज की अवधारणा के मार्ग में एक बाधा क्षेत्र वाद है जिसे पारस्परिक विश्वास का ही परिणाम कहा जा सकता है। अमरीका और रूस ने विश्व के बहुत से देशों को क्षेत्रीय समझौते के आधार पर दो व्यापक गुटों में बाँट दिया है।

(4) राज्यों की सम्प्रभुता का अन्त-नागरिक समाज की अवधारणा के मार्ग की एक बहुत बड़ी वाचा राज्यों की सम्प्रभुता है। सम्प्रभुता प्रत्येक प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त राज्य की सत्ता को कहते हैं। वर्तमान समय के इन सम्प्रभुताधारी राज्यों को किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय संधि तथा समझौते को मानने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता और राज्यों के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में मनमाने तरीके से आचरण किया जाता है। उपर्युक्त बाधाओं के कारण ही नागरिक समाज की अवधारणा का विचार ग्रहण कर सका है।

क्रियात्मक रूप नागरिक समाज की अवधारणा के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के उपाय नागरिक समाज की अवधारणा के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं-

(1) उदारवादी राष्ट्रीयता का प्रचार-प्रसार-नागरिक समाज की अवधारणा के विकास के लिए राष्ट्रीयता के ऐसे रूप को स्वीकार किया जाना चाहिए जो अपने राष्ट्रीय स्वार्थों को ही सब कुछ न समझकर सम्पूर्ण मानवता के हित में कार्य कर सके और जिसके द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में 'जीओ और जीने दो के विचार को अपनाया जा सके। राष्ट्रीयता का यह उदारवादी रूप ही नागरिक समाज की अवधारणा के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक सिद्ध हो सकता है।

(2) अन्तर्राष्ट्रीय विधि का सम्यक विकास वर्तमान समय में विभिन्न राज्यों के पारस्परिक व्यवहार के सम्बन्ध में किन्हीं निश्चित अन्तर्राष्ट्रीय विधियों का अभाव है और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में सर्वसम्मत नियमों का अभाव होने के कारण विभिन्न राष्ट्रोंद्वारा आने वाले स्वार्थ को पूरा करने के लिए मनमाने तरीके से अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सहारा ले लिया जाता है।

(3) राज्यों की बाह्य सम्प्रभुता का अन्त-अन्तर्राष्ट्रीय विधि का विकास कर लेने से ही लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती, आवश्यकता इस बात की है कि राज्यों की बाहरी सम्प्रभुता का अन्त किया जाए। जिस प्रकार एक राज्य में रहनेवाले व्यक्ति आवश्यक रूप से राज्य के कानूनों का पालन करते हैं उसी प्रकार से अन्तर्राष्ट्रीय कानून का पालन किया जाना चाहिए।

(4) साम्राज्यवादी प्रवृत्ति की समाप्ति-नागरिक समाज की अवधारणा के विचार को मानवमात्र की आधारभूत समानता के आधार पर ही अपनाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में शोषण की प्रवृत्ति पर आधारित साम्राज्यवाद का अन्त कर दिया जाना चाहिए। साम्राज्यवाद की मूल प्रवृत्ति (एक देश द्वारा दूसरे देश का शोषण करने की प्रवृत्ति) का पूर्णतया अन्तु होने पर ही एशिया और अफ्रीका के देश अमरीका और यूरोप के देशों के साथ सहयोग कर सकते हैं।

(5) सांस्कृतिक आदान-प्रदान-सांस्कृतिक आदान-प्रदान हृदयों की एकता स्थापित करने का कार्य किया करता है और उदय की एकता राष्ट्रीयता की सीमा को लांघकर मानवमात्र के प्रति सद्भावना को जन्म देती है जो नागरिक समाज की अवधारणा का मूलाधार है।

(6) स्वस्थ और सशक्त अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना-नागरिक समाज की अवधारणा की भावना को क्रियात्मक रूप देने के लिये सबसे अधिक आवश्यक कार्य स्वस्थ और सशक्त अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना करना है। यह अन्तर्राष्ट्रीय संगठन विश्व के सभी राष्ट्रों की आधारभूत समानता पर आधारित होना चाहिए और इसमें विश्व के सभी राष्ट्रों की जनसंख्या एवं क्षेत्र के आधार पर उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त होना चाहिए। यदि उपर्युक्त बातों को आत्मसात् किया जाए तो अन्तर्राष्ट्रीय तनाव बहुत कुछ सीमा तक दूर करके नागरिक समाज की अवधारणा की भावना का विकास हो सकता है। 20वीं शताब्दी के लिए नागरिक समाज की अवधारणा एक उदात्त कल्पना ही नहीं, वरन् युद्धों से प्रस्त मानवता के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। वर्तमान विश्व के सम्मुख केवल दो ही मार्ग है, एक नागरिक समाज की अवधारणा तथा दूसरा विश्वयुद्ध द्वारा आत्म संचार । एक मानवोचित वृद्धि तथा प्रेम का मार्ग, दूसरा पाशविक व हिंसक राक्षसों का। उचित यही है कि हम प्रथम मार्ग को अपनाकर सम्पूर्ण सभ्यता तथा मानवता को विनाश के गर्त में जाने से बचा लें।

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