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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांतों की व्याख्या

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मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांतों की व्याख्या 

कार्ल मार्क्स के समाजवादी सिद्धान्त की रूपरेखा साम्यवादी घोषणा पत्र (कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो) में मिलती है वह सन् 1884 में प्रकाशित हुआ था सन् 1887 ई० में मार्क्स ने दास कैपिटल' का प्रणयन किया। इस पुस्तक में भी मार्क्स के समाजवाद की पूर्ण झलक परिलक्षित होता है। मार्क्स समाज जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर भी अपनी लेखनी चलाने वाला प्रथम लेखक था। जिसमें पुरातन विचारों को विस्तार तथा क्रमबद्धता का रूप देकर उन्हे अधिक प्रभावी अथवा महत्त्वपूर्ण बनाया तत्कालीन समाज में श्रमिक वर्ग को पूंजीपति वर्ग के विरुद्ध एक जुट होने का सन्देश सर्वप्रथम मार्क्स ने ही दिया था तथा उन्हें संगठित होकर राजनैतिक कार्यवाही करने का मार्ग प्रशस्त किया। यही मार्क्सवाद की मौलिकता है। सारांशः माक्स द्वारा प्रतिपादित मार्क्सवाद अथवा साम्यवाद पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध एक मानवीय संवेदनात्मक विद्रोह है। मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धान्त (तत्व अथवा विशेषताएं) मार्क्स ने अपने सिद्धांत को वैज्ञानिक समाजवाद' नाम दिया है उसके मुख्य सिद्धान्त या तत्त्व निम्नलिखित है

1. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद

2. इतिहास की वस्तुवादी व्याख्या

3. वर्ग संघर्ष

4. अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत

5. साम्यवादी दल संगठन तथा कार्यक्रम

6. क्रान्ति का सिद्धान्त

7. सर्वहारा वर्ग की अधिनायकता

8. राज्य विषयक सिद्धान्त

1.द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद दो शब्दों का मिश्रण है भौतिकवाद तथा द्वन्द्वात्मक। प्रकृति को मूल मानने वाले सिद्धान्त को भौतिकवाद कहते हैं। मार्क्स के अनुसार इस दृष्टि का एक मूल मंत्र मूल तत्त्व जड़ प्रकृति या पदार्थ है। उसका कहना है कि चूँकि हुम आत्मा, परमात्मा, अध्यात्म का अनुभव नहीं कर सकते अत: इसका मनुष्य के लिये कोई भी अस्तित्व नहीं है। उसने दृष्टिगोचर जगत् को ही मूल तत्त्व माना है माक्र्स के अनुसार यही दृष्टिगोचर होने वाला संसार प्रकृति स्वरूप भौतिकवाद है। द्वन्द्वात्मक अंग्रेजी शब्द डायलेक्टिक का हिन्दी रूपान्तर है जो कि यूनानी शब्द 'डाइलेगों से बना है जिसका अर्थ है तर्क-वितर्क करना। यूनानी विचारकों का मत था कि सत्य की खोज तर्क-वितकों से कर सकते हैं। तर्क-वितर्क से विचार-विमर्श होता है, विचार-विमर्श के द्वन्द्व से जो परिणाम सामने आते हैं वे न्याय पर आधारित होते हैं। मार्क्स के द्वन्द्वात्मक विचारधारा पर हीगेल का प्रभाव पड़ा था। हीगेल के अनुसार सत्य दो विरोधी तत्त्वों के संघर्ष से उत्पन्न होने वाली वस्तु है। मार्क्स ने इसकी इस धारणा को डृदयंगम कर लिया और इस पद्धति को सामाजिक क्षेत्र में प्रयुक्त किया।"मार्क्स भौतिकवादी था। उसके अनुसार सामाजिक विकास की प्रेरक शक्तियाँ आर्थिक तत्त्व हैं।

2. इतिहास की वस्तुवादी व्याख्या-मार्क्स के अनुसार सभी परिवर्तन आर्थिक तत्वों के परिणाम होते हैं। ध्यानपूर्वक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि यही आर्थिक तत्व लगभग सभी राजनैतिक प्रयुतियों को निर्धारित करते हैं। उसके अनुसार इतिहास आर्थिक तत्या की क्रिया एवं प्रतिक्रिया से प्रभावित होता है। समाज में मनुष्य की एक आर्थिक स्थिति होती है। यह आर्थिक स्थिति उसके आचरण पर प्रभाव डालती है। उसी के शब्दों में, मनुष्यों की चेतना सत्ता को निश्चित करती है अपितु उसके विपरीत उनके सामाजिक चेतना उनकी चेतना को निर्धारित करती है। यह इतिहास का एक तार्किक एवं क्रमबद्ध विकास का परिणाम मानता है।सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तन जीवन का भौतिक अवस्थाओं के कारण होते हैं। उसने इतिहास के पाँच भागों में बाँटा है- 1.आदिम साम्यवादी युग,2.दास युग,3.सामन्तवादी युग,4.पूँजीवादी युग, 5. साम्यवादी युग।

3.वर्ग-संघर्ष-मार्क्स के अनुसार मानव जाति का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास प्रत्येक युग में आजीविका साजन के विविध उपाय मनुष्य को एक वर्ग बना देने की भूमिका अदा करते हैं इन लोगों के आर्थिक हित समाज होते हैं तथा इनकी सामुदायिक चेतना वर्ग संघर्ष को जन्म देती है। संघर्ष का अर्थ केवल लड़ाई ही नहीं बल्कि उसका व्यापक अर्थ असन्तोष, रोष और असहयोग भी है। मार्क्स के अनुसार सम्पूर्ण मनुष्य समाज दो वर्गों में विभाजित है। एक वर्ग उत्पादन के साधनों का स्वामी है तो दूसरा वह श्रमजीवियों का वर्ग है तो वास्तविक उत्पादन करता है। इन दोनों वर्गों के हित एक-दूसरे के विरोधी होते हैं तथा दोनों वर्गों में आपसी संघर्ष होता रहता है। साम्यवादी घोषणा-पत्र में वर्ग-संघर्ष को स्पष्ट करते हुए लिखा है-"अभी तक के सम्पूर्ण समाज का इतिहास वर्ग- संघर्ष का इतिहास है। स्वामी तथा दास, कुलीन घराने के तथा सामान्य लोग मिल का स्वामी तथा उसमें कार्य करने वाला मजदूर व शिल्पी अर्थात् शोषक तथा शोषित एक-दूसरे ने विरोध में खड़े कभी प्रत्यक्ष कभी अप्रत्यक्ष युद्ध कर रहे हैं।

4. अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत-एन्जिल के अनुसार अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त मार्क्सवाद का मुख्य आधार है। इस सिद्धान्त के दो पहलू हैं एक उपयोगिता तथा दूसरा विनिमय जो वस्तु मनुष्य के लिए अच्छी है वह उपयोगी और जो इच्छा पूर्ति न कर सके वह अनुपयोगी उदाहरणस्वरूप रेगिस्तान में प्यासे व्यक्ति के लिये पानी उपयोगी है तथा सोना कम उपयोगी। इसका दूसरा पहलू विनिमय होता है। विनिमय का मतलब है वस्तुओं का आदान-प्रदान अनुपात के आधार पर होता है। मार्क्स का कहना है कि पूँजीपति मजदूर को श्रम के बदले पैसा देता है लेकिन यह वेतन इतना कम होता है कि यह इस धनराशि के बराबर श्रम तो दो चार घण्टे में कर सकता है। मिल मालिक मजदूरों से अधिक काम कराता है तथा इस समय में उत्पादन किये गये माल का जो मूल्य मिल मालिक वर्ष हड़प जाता है, वह अतिरिक्त मूल्य कहलाता है। यह अतिरिक्त मूल्य मिल मालिक को न मिल कर मजदूरों को मिलना चाहिये। जैसा एक मजदूर आठ घण्टे कार्य करने पर 16 रू० का उत्पादन करता है और उसे केवल आठ रुपये मजदूरी मिलती है तो यह आठ रूपये को श्रम की चोरी हुई तथा मजदूर को शोषण हुआ।

5. साम्यवादी दल क्या उसके कार्य-मार्क्स ने लिखा है कि पूँजीवादी व्यवस्था शीघ्र ही समाप्त होगी और साम्यवादी युग आयेगा साम्यवादी युग साम्यवादी विचारों के प्रचार से तथा साम्यवादी दल को सुई संगठित करने में तथा उसके कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने से आयेगा। साम्यवादी दल में मजदूरों के नेतृत्व में निर्धनों एवं शापित व्यक्तियों का एक संगठन बनाया जाए, बच्चों को साम्यवाद की शिक्षा दी जाए.

उन्हें क्रान्ति के लिए उत्साहित किया जाए तभी समाज का हित होगा तथा समाजवादी समाज की स्थापना होगी। मार्क्स ने निम्नलिखित साम्यवादी दल के कार्य बताये- 1. व्यक्तिगत सम्पत्ति की व्यवस्था का अन्त किया जाये। 2. प्रत्येक व्यक्ति को कार्य करना अनिवार्य है। 3. उत्तराधिकारी की प्रचा समाप्त की जाये। 4.शिक्षा औद्योगिक उत्पादन के अनुसार दी जाये।

6. क्रान्ति का सिद्धांत-मार्क्स का विचार है कि पूँजीवाद शान्तिपूर्ण तथा वैज्ञानिक तरीकों से समाप्त नहीं होगा। वह क्रान्ति में विश्वास करता है। उसने लिखा है कि-"नूतन समाजरूपी शिशु के गर्भ में धारण करने वाले प्रत्येक प्राचीन समाज में जनन शक्ति होती है। उसके अनुसार साम्यवादी रूपी बच्चे को पैदा करने के लिए समाज को हिंसा रूपी सभी प्रसव की पीड़ा सहनी पड़ेगी। मजदूरों को संगठित होकर पूंजीवाद के विरोध के लिए क्रान्ति कर हो देना चाहिए, क्योंकि शासक वर्ण बिना संघर्ष के अपने स्वामित्त्व को छोड़ने को तैयार नहीं होगा। साम्यवादी घोषणा-पत्र में मजदूरों को सम्बोधित करते हुये लिखा है कि "तम्हारे पास खोने के लिए सियाय जंजीरों के कुछ नहीं है और पाने के लिये सारा संसारा दुनिया के मजदूरों तुम क्रान्ति करने के लिए तैयार हो जाओ।"

7. सर्वहारा वर्ग की अधिनायकता-मार्क्स के अनुसार साम्यवादी क्रान्ति होने के बाद तथा साम्यवादी समाज स्थापित होने के मध्य अल्पकालीन के लिए संक्रमण कालीन अवस्था होगी। इस अवस्था में शासन सत्ता मजदूरों के हाथ में होगी जो कि कठोर निर्मम तथा हिंसापूर्ण रहेगी। मार्क्स ने इसी को सर्वहारा वर्ग की अधिनायकता कहा कि क्रान्ति से पूंजीपतियों से शक्ति छीनी जायेगी तथा समूची शक्ति मजदूरों को सौंपी जायेगी, उत्पादन बढ़ाया जायेगा तथा क्रान्ति के विरोधियों का दमन किया जायेगा। इसलिये श्रमिक वर्ग का अधिनायकतन्त्र आवश्यक है।

8. राज्य विषयक सिद्धान्त-मार्क्स के अनुसार राज्य की आवश्यकता तभी तक है जब तक समाज में वर्ग-संघर्ष है। साम्यवादी क्रान्ति के पश्चात् राज्य की आवश्यकता समाप्त हो जायेगी। उसने राज्य को पूँजीपतियों का संगठन माना है। राज्य समाप्त हो जाने पर सभी व्यक्ति समानता के आधार पर एक-दूसरे के सहयोगी तथा मित्र हो जायेंगे और ऐसी स्थिति में राज्य स्वयं विलुप्त हो जायेगा तथा एक वर्गविहीन, राज्यविहीन समाज की स्थापना होगी। यही कार्ल मार्क्स का साम्यवाद है।

मार्क्सवाद का आलोचनात्मक मूल्यांकन मार्क्स की आलोचना निम्न आयातों पर की जाती है

1. मार्क्सवाद केवल भौतिक तत्वों पर बल देता है जबकि संसार के भौतिक तत्वों के अलावा भी अन्य जैसे आध्यात्मिक तत्व,मानसिक प्रेरणा तथा राजनीतिक आकांक्षायें विद्यमान रहती हैं। इस प्रकार का मार्क्स का सिद्धान्त एक पक्षीय दृष्टिकोण पर आधारित है।

2. वर्ष के राज्यविहीन तथा समाज विहीन समाज की स्थापना की धारणा गलत है। मार्क्स राज्य के शोषण का सावन मानता है तथा राज्यविहीन समाज विहीन समाज की स्थापना करता है।

3. मार्क्स का सिद्धान्त अस्पष्ट है। एक ओर मार्क्सवाद क्रान्ति में विश्वास करता है दूसरी ओर विकासवादी स्वरूप पर जोर देता है। परिवर्तन के मार्ग दोनों के मित्र हैं। क्रान्ति के पश्चात् भावी समाज का क्या स्वरूप होगा? इसके सम्बन्ध में मार्क्स ने कोई जिक्र नहीं किया।

4. मार्क्स का सिद्धान्त हिंसा और क्रान्ति पर आधारित है जो सर्वथा अमान्य है।

5. मार्क्स की अतिरिक्त मूल्य की धारणा गलत है। सत्य यह है कि वस्तुओं का मूल्य श्रम के साथ अन्य कारणों से भी निर्धारित होता है। उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद भी मार्क्स का महत्त्व कम नहीं है। मार्क्स इस सिद्धान्त के आधार पर मजदूरों का मनोबल ऊँचा हुआ है। ग्रे (Grey) ने लिखा है कि अनेक कमियों के होते हुए भी यह वाद निर्विवाद है। मार्क्स 19वीं शताब्दी का अधिकतम प्रभावशाली व्यक्ति है।"

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