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बुधवार, 22 जुलाई 2020

माओ के राजनीतिक विचार

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माओ के राजनीतिक विचार

माओवादी राजनीतिक चिंतन के सन्दर्भ में विद्वानों में दो मत है। प्रथम मत के अनुसार माओवाद में मार्स, लेनिन और स्टालिन के विचारों का मिश्रण हैं जयकि दूसरे मत के अनुसार माओवाद का का अस्तित्त्व एक स्वतंत्र और मौलिक विचारधारा है राष्ट्रीयता का संवेग ठसके व्यक्तित्व अभिन्न अंग बना रहा। उसके विचारों का निर्माण चीनी संस्कृति के बीच हुआ।

माओ के प्रमुख राजनीतिक विचार निम्न हैं-

1. असंगति अथवा अन्तर्विरोध का सिद्धांत-चीन के सामाजिक विकास को स्पष्ट करते हुए माओ ने 'ऑन काण्ट्राडिक्शन' में असंगति के सिद्धान्त का विस्तार से प्रतिपादन किया है। माओ के अनुसार, "असंगतियाँ भित्र-भिन्न प्रकार की हैं और प्रत्येक प्रकार की असंगीत को हल करना साम्यवादी का कार्य है।" माओ के अनुसार, "गुणात्मक रूप से भिन्न असंगतियों का केवल गुणात्मक रूप से भित्र साधनों के द्वारा ही हल किया जा सकता है- पूँजीपति वर्ग और सर्वहारा वर्ग के बीच की संगत को समाजवादी क्रान्ति के तरीके से हल किया जाता है, सामान्ती व्यवस्था और आम जनता के बीच की असंगति राष्ट्रीय क्रान्तिकारी युद्धों से हल होती है, समाजवादी समाज में किसानों और मजदूरों के बीच की असंगति कृषि के समूहीकरण और यन्त्रीकरण के तरीके से हल होती है।"

माओ ने चीनी समाज को अन्तर्विरोधों से युक्त समाज बताया- उसने बार-बार कहा हैं कि संसार में सर्वत्र अन्तर्विरोध पाया जाता है, अगर अन्तर्विरोध न हो तो संसार ही नहीं होता। माओं के अनुसार अन्तर्विरोध मनुष्य और प्रकृति के बीच में ही नहीं समाजवादी समाज में भी पाये जाते हैं। माओ के अनुसार पूर्ण साम्यवाद स्थापित हो जाने के पश्चात् भी विरोध बना रहता हैं।

2. 'जनयुद्ध' का सिद्धान्त- 'जनयुद्ध' की संकल्पना मार्क्सवादी-लेनिनवादी दर्शन में एक नई संकल्पना है जिसके विकास का श्रेय माओ को ही प्राप्त है। माओ ने संघर्ष में सेना और हथियारों से भी अधिक महत्त्व जनता को दिया है। इसी कारण माओ ने अधिक से अधिक व्यापक आधार पर जनयुद्ध की कल्पना की। उसने अपने सभी आन्दोलनों और कार्यक्रमों में देश के अधिक से अधिक लोगों को झोंकने एवं सक्रिय करने का प्रयत्न किया। उसका स्पष्ट मत था कि रूस की भाँति सर्वहारा की तानाशाही और दलील व्यवस्था से चीन की आवश्यकताएँ पूरी नहीं होंगी। चीन जैसे विशाल समाज में राजनीतिक और प्रशासनिक आन्दोलन एवं क्रिया की सफलता अधिक से अधिक जनता की सक्रिय हिस्सेदारी पर निर्भर है।

3. नवीन लोकतन्त्र- माओ के अनुसार साम्यवादी क्रान्ति के तुरन्त बाद 'साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना नहीं हो सकती। 'साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त মृष्ठभूमि तैयार करनी पड़ेगी और एक संक्रमण कालीन व्यवस्था की स्थापना से गुजरना पड़ेगा। यह संक्रमण कालीन व्यवस्था ही माओ के अनुसार 'नवीन लोकतंत्र है। इसमें पूँजीवादी और समाजवादी व्यवस्था का मिश्रित रूप होगा तथा अनेक लोकतान्त्रिक वर्ग मिल-जुलकर कार्य करेंगे। नवीन लोकतंत्र में मजदूर, कृषक, लघु बुर्जुआ और राष्ट्रीय बुर्जुआ मिलकर कार्य करेंगे। यह व्यवस्था पूंजीवाद को प्रोत्साहन देगी, साम्यवाद का न्यूनतम कार्यक्रम चलायेगी और इसका लक्ष्य धीरे-धीरे अधिकतम साम्यवादी कार्यक्रम द्वारा भविष्य में "साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना होगा। नवीन लोकतंत्र की विशेषता साम्यवादी दल का नेतृत्त्व, सभी वर्गों से मिलकर एक संयुक्त मोर्चा तथा मिश्रित अर्थव्यवस्था होगी।"

4. क्रांति के साधन: कृषि- माओ ने चीनी क्रांति का आधार श्रमिकों से अधिक कृषकों के राजनीतिक संगठन को बनाया। माओं पहला साम्यवादी नेता था जिसने यह घोषणा की कि किसानों में क्रान्तिकारी कार्यवाही करने की क्षमता स्वतंत्र रूप से थी। 1924 से माओ हुनान में कृषकों को संगठित करने लगा। 1926-27 के बीच वह इस निर्णय पर पहुंचा कि क्रान्ति कृषकों पर आधारित होनी चाहिए। क्रान्ति में लेनिन ने कृषकों के महत्त्व को स्वीकार किया था, किन्तु माओ की क्रान्ति पूरो तरह से कृषकों पर आधारित हो गई।

माओ का विचार था कि चीन के ग्रामीण क्षेत्रों में क्रान्तिकारी अड़े स्थापित करके बड़े नगरों को उनके चारों ओर के देहाती क्षेत्र से घेर लिया जाया उनका यह भी विचार था कि अर्द्ध उपनिवेश चीन में क्रान्ति को सफल बनाने के लिए श्रमजीवियों की तुलना में कृषकों की प्रभावी भूमिका होगी। कृषकों के संगठन तथा उनके परिणामस्वरूप प्राप्त सफलताओं ने उसके इस विश्वास को दृढ़ बना दिया कि कृषक वर्ग अग्रगामी ही नहीं वस्तुतः एकमात्र शक्ति है। रूस में स्टालिन चीनी क्रान्ति के पूर्णत: कृषक स्वरूप पर छींक रहा था।

5. जनसाधारण की भूमिका- माओ का विचार था कि क्रान्ति लाने में जनसाधारण अथवा जन सामान्य का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। माओ जनसाधारण के उत्साह और उनकी रचनात्मक भूमिका में अगाध विश्वास रखता था। उसकी मान्यता थी कि नौकरशाही ढंग के साधनों में एक बड़ी कमी यह है कि वे नेतृत्त्व को जनता के साथ जोड़ने में सफल नहीं हो पाते। उसका स्पष्ट मत था कि "जब तक देश की जनता जागृत् होकर क्रान्ति में भाग लेने के लिए तत्पर नहीं हो जाती तब तक वे सभी काम जिनमें उसका भाग लेना आवश्यक है, खोखली औपचारिकता मात्र बनकर रह जायेंगे और उसका अन्त असफलता में होगा।"

उसने अपने एक भाषण में बुद्धिजीवियों को सलाह दी कि जनता से अलग रखने की आदत से वे अपने आपको मुक्त करें। उसने कहा, “जनसाधारण के विचारों को समझो, उन्हें एक व्यवस्थित रूप में ढालो, उन पर अपना ध्यान केन्द्रित करो, तव उन विचारों को लेकर जनसाधारण के पास जाओ और तब तक उनका प्रचार करते रहो जब तक जनसाधारण उन्हें स्वयं अपना विचार मानकर स्वीकार न कर ले, उसके बाद उन पर दृढ़ता से जमे रहो और उन्हें कार्यरूप में परिणित करो।"

माओ ने लोकयुद्ध की नीति पर जोर दिया- लोकयुद्ध के अनिवार्य सिद्धान्त में सबसे महत्त्वपूर्ण है जनसेवा का संगठन। लाल सेना के प्रारम्भिक दिनों से ही माओत्से तुंग ने इसे क्रान्ति की एक राजनीतिक भुजा माना जिसकी कार्यवाहियाँ लड़ने तक सीमित नहीं थीं। माओ के अनुसार जनसेवा को राजनीति चालित संगठन होना चाहिए।

6. युद्ध की अनिवार्यता का सिद्धान्त-माओ सैद्धान्तिक आधार पर युद्ध की अनिवार्यता में विश्वास करता है- उसके अनुसार साम्राज्यवाद में अन्तर्विरोध है और यह अपने अन्तर्विरोधों के कारण विस्फोट करेगा और एक वर्गविहीन विश्व का निर्माण करेगा। युद्ध अन्तर्विरोध को हल करने के लिए किये जाने वाले संघर्ष का सर्वोच्च रूप हेै और जब राष्ट्रों अथवा राजनीतिक समूहों के बीच के ये अन्तर्विरो.ध विकसित होकर एक निश्चित मंजिल पर पहुँच जाते हैं. युद्ध प्रारम्भ होता है।

अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में माओ सहयोग, सहअस्तित्त्व का विरोधी है- उसके अनसार जब तक शोषण है तब तक युद्ध रहेंगे। उसके अनुसार तीसरा विश्वयुद्ध साम्राज्यवादी शिविर तथा समूचे पूँजीवाद का समूल उन्मूलन करने वाला होगा।

7. शक्ति का दर्शन- माओ शक्ति का पुजारी है- उसने चीनी राष्ट्र के लिए शक्ति,
सैनिक भावना, शारीरिक शिक्षा तथा इन्हें प्राप्त करने के लिए नवीन प्रेरणा की आवश्यकता पर बल दिया। राजनीतिक शक्ति के वर्चस्व और प्रयोग में उसका अटूट विश्वास है- उसके अनुसार राजनीतिक शक्ति के द्वारा मनुष्य के मन को बदलकर सामाजिक शक्तियों का नियंत्रण किया जा सकता है। राजनीतिक शक्ति में विचारों का प्रमुख स्थान है। विचारों के बाद सैनिक शक्ति को महत्त्व देता है।

यह सैनिक और राजनीतिक शक्ति में अभिन्न संबंध मानता है- उसके अनुसार, राजनीतिक शक्ति बन्दूक की नोंक में से पैदा होती है मजदूर वर्ग और श्रमिक जनता बन्दूक की शक्ति के बिना सशस्त्र पूंजीपतियों और जमींदारों को पराजित नहीं कर सकती केवल बन्दूक की शक्ति के द्वारा ही विश्व को एक नये साँचे में डाला जा सकता है।" उसका स्पष्ट मत था कि "केवल हिंसा के द्वारा ही एक वर्ग दूसरे वर्ग के अधिकारों को समाप्त कर सकता है।

8. विश्व का दो विरोधी गुटों में विभाजन- माओ विश्व को दो विरोधी शिविरों (गुटों)में विभाजित मानता था- एक समाजवादी शिविर अथवा गुट - में पूर्वी यूरोप सहित सभी साम्यवादी देश शामिल थे। दूसरा साम्राज्यवादी शिविर अथवा गुट-में अमेरिका सहित अन्य पूंजीवादी देश शामिल हैं। उसने यह स्पष्ट घोषणा की कि इन दो शिविरों से अलग रहने याले तटस्थ (निर्गुट) राष्ट्रों की कोई सत्ता नहीं है।

9. गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध)- माओ के अनुसार 'छापामार युद्ध' एक ऐसा हथियार है जिसने अस्त्र-शस्त्रों ओर सैनिक साज-सामानों की दृष्टि से कमजोर राष्ट्र अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली हमलावर देश के खिलाफ संघर्ष कर सकता है। माओ ने छापामार या गुरिल्ला युद्ध तकनीक द्वारा चीन जैसे अविकसित देश में समाजवाद स्थापित करने का प्रयत्न किया।

10.सांस्कृतिक क्रान्ति- सन् 1966 में चीन में सांस्कृतिक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ- और यह क्रान्ति माओ की मृत्यु तक (1976) चलती रही। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान सर्वत्र 'माओवाद का बोलबाला था। उनके विचारों को संग्रह करके उन्हें एक छोटी सी पुस्तक का रूप दे दिया गया जो लाल किताब' (Red Book) के नाम से विख्यात थी। पुस्तक का खास सन्देश था 'राजनीतिक शक्ति बन्दूक की गोली से हासिल की जाती है। लेखकों को मार्क्सवाद तथा माओवाद के प्रचार की अनुमति- सांस्कृतिक क्रान्ति की शुरूआत ही इस मुद्दे को लेकर हुई कि लेखकों को इस बात की आजादी नहीं दी जा सकती कि वे मनचाहे विषयों पर अपनी कलम चलायें। बुद्धिजीवियों और लेखकों का कर्त्तव्य है कि वे अपनी रचनाओं द्वारा केवल मार्क्सवाद व माओवाद का ही प्रचार करें। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया गया कि पार्टी के सदस्य और सेना के पदाधिकारी शान-शौकत के जीवन को तिलांजलि देकर आम लोगों की तरह से रहें। स्कूल और कॉलेज की परिक्षाएँ स्थगित कर दी गई तथा विद्यार्थीयों के लिए 'शारीरिक परिश्रम अनिवार्य कर दिया गया। छात्र-छात्राओं को खेतों में ले जाकर उनसे काम लिया जाता था। विद्यार्थियों की टोलियां को गाँव में भेजा गया ताकि वे वहाँ माओ के विचारों का प्रचार प्रसार करें और किसानों को खेती-बड़ी व मवेशियों को पालने की नई व वैज्ञानिक विधियाँ समझायें।

लाल रक्षकों का संगठन - अप्रैल 1966 में माओ ने एक बड़े पैमाने पर युवकों का संगठन खड़ा किया जो लाल रक्षकों के नाम से जाना जाता था। 12-13 वर्ष की आयु से लेकर 25 वर्ष की आयु तक के 10 लाख से भी ज्यादा किशोर व नौजवान 'लाल सेना में भर्ती हुए। इन्हें बाल क्रान्तिकारी सेनानी' कहा जाता था। माओ की सांस्कृतिक क्रान्ति की अवधारणा केवल 'संस्कृति' तक ही सीमित नहीं थी। माओ ने शिक्षा के क्षेत्र में सिद्धान्त को व्यवहार से जोड़ने की बात कही। सांस्कृतिक क्रान्ति को आर्थिक विकास से भी जोड़ा गया। सांस्कृतिक क्रान्ति के नेताओं का यह प्रयास था कि प्रत्येक क्षेत्र जहाँ तक हो सके कृषि और पर्याप्त जोर दिया गया। और औद्योगिक दृष्टि से स्वावलम्बी बने। ग्रामीण क्षेत्र के विकास पर

11. माओ के निरंतर क्रान्ति सम्बन्धी विचार-माओ ने क्रान्ति के स्वरूप की विस्तृत चर्चा की है और इस दिशा में मार्क्सवादी चिन्तन को आगे बढ़ाया है। सिद्धान्त और व्यवहार की तुलना करते हुए उसने व्यवहार को पूर्णता दी है। व्यवहार सत्य की सर्वोच्च कसौटी है। अतः समस्त सिद्धान्त को प्रयोग की कसौटी पर कसना चाहिए और जहाँ वह खरा न उतरे, उसे अस्वीकार कर देना चाहिए। व्यवहार के धरातल पर त्रुटि अवश्यंभावी है। माओ ने बोल्शेविकों के इस मताग्रही तर्क का खंडन किया है कि भूलों से बचा जा सकता है। माओ का कहना है कि यह एक मार्क्सवाद विरोधी दृष्टिकोण है, क्योंकि यह 'परस्पर विरोधी त्वों की एकता के नियम के विरुद्ध है। मार्क्स और एंगेल्स का विश्वास था कि 'सर्वहारा का अधिनायक तंत्र' एक अल्पस्थायी व्यवस्था होगी, क्योंकि इसकी स्थापना के बाद राज्य के लुप्त होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। परन्तु माओ ने यह तर्क दिया कि जब सर्वहारा वर्ग सत्ता संभाल लेगा, तब भी 'अंतर्विरोध का नियम सक्रिय रहेगा जिस पर मनुष्य का वश नहीं होगा अतः समाजवाद के दौर में भी वर्ग संघर्ष का अंत नहीं हो जायेगा, केवल उसका रूप बदल जाएगा। माओ के अनुसार, आर्थिक मोर्चे पर साम्यवादी क्रान्ति हो जाने के वाद समाजवादी व्यवस्था अपने आप सुदृढ़ नहीं हो जाएगी, इसके लिए राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और विचारधारात्मक मोर्चों पर समाजवाद को बढ़ावा देना जरूरी होगा, जिसमें लंबा समय लगेगा। इसके लिए कुछ दशक पर्याप्त नहीं होंगे, वल्कि इसमें कई शताब्दियाँ लग जाएगी। लेनिन और स्टालिन से मतभेद प्रकट करते हुए माओ ने यह मत प्रकट किया कि समाजवादी व्यवस्था में भी सर्वहारा और बुर्जुवा वर्गों का संघर्ष लगातार चलता रहेगा। यह लम्बा चलने वाला, वार-बार पैदा होने वाले, दारुण और जटिल कभी कुछ शांत हो जाता है। क्रान्ति' की प्रक्रिया है जिसमें कभी कोई ढील नहीं दी जा सकती।

क्रान्ति का स्वरूप- माओ के अनुसार क्रान्ति का अर्थ केवल आर्थिक प्रणाली को नया रूप देना नहीं है। समाजवाद यह मांग करता है कि हम वस्तुओं के अलावा अपने आप को भी क्रान्ति का विषय बनाएं। परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि चेतना में परिवर्तन लाने के लिए भौतिक परिवर्तन जरूरी है। दूसरी ओर, केवल उत्पादन की वृद्धि पर घ्यान देकर कोई क्रान्ति पूर्ण नहीं हो सकती। जहाँ राजनीति और अर्थव्यवस्था में संघर्ष पैदा हो जाए, वहाँ राजनीति को प्रधानता मिलनी चाहिए। इसी तरह सांस्कृतिक क्रान्ति ठतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितनी कि औद्योगिक क्रांति, क्योंकि वह ज्ञान की नई प्रणाली का सृजन करती है जो जनसाधारण को उद्योगीकरण मूल्यवत्ता का अनुभव कराती है। क्रान्ति का ध्येय सहकारिता के सिद्धांत पर आधारित समुदाय भावना को साकार करना है। यह सदस्यों के बीच ऊँच-नीच के भेदभाव को खत्म कर देती है माओ के अनुसार, विचाराधारात्मक दृष्टि से शारीरिक श्रम की तुलना में बौद्धिक श्रम गौण है अत: उसे धीरे-धीरे समाप्त कर देना चाहिए। कृपक प्रधान समाज राजनीतिक नियोजन के लिए सर्वथा उपयुक्त है। भारी उद्योग वांछनीय तो है, परन्तु बलपूर्वक औद्योगीकरण न तो समझदारी है और न वह द्वन्द्वात्मक दृष्टि से संभव है।

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