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मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

 सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर-

(1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया।

(2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने पैरों और पूँछ की सहायता से ही कार्य करने पड़ते हैं।

(3) बोलने की क्षमता-बोलने की क्षमता मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता है। मनुष्य में स्पष्ट रूप से उच्चारण करने की क्षमता का सम्बन्ध विकसित मस्तिष्क से भी है। लेकिन उसके सन्तुलित जबड़े, पतली जीभ और सन्तुलित कपाल उसे किसी भी शब्द का स्पष्ट रूप से उच्चारण करने में सहायता देते हैं। इसके विपरीत, पशुओं का जबड़ा फैला हुआ होता है और जीभ इतनी मोटी होती है कि उसे आवश्यकतानुसार घुमाया नहीं जा सकता। इसी कारण पशु किसी शब्द का सष्ट रूप से उच्चारण नहीं कर पाते।

(4) हाथ का लचीला होना-मानव के हाथ लचके अंगुलियाँ पतली और इतनी लम्बी होती है कि उनसे छोटी से छोटी वस्तु को भी पकड़ा जा सकता है। पशुओं के हाथों अथवा पैरों की बनावट गोल और मोटी होने के कारण उसमें अधिक कुशलता नहीं आ पाती। इस विशेषता से स्पष्ट हो जाता है कि केवल मनुष्य ही भौतिक संस्कृति के क्षेत्र में प्रगति कर सकता है।

(5) अन्य विशेषताएँ-मनुष्य एवं पशु में निम्नलिखित अन्य विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती है। यथा-(क) मनुष्य की नाक की बनावट,बारका निकल हुए कान, केन्द्रित की जा सकने वाली तीक्ष्ण दृष्टि और चौड़ा माया उसके व्यवहार का पशु आस आधा कुशल बना देते है। (ख) पशुओं की अपेक्षा मानव के दांत छोटे होने के कारण उसे कृत्रिम साधनो परनिर्भर रहना आवश्यक होता है। यही आवश्कता बाद में सैकड़ों आविष्कारों की जननी बन जाती है। (ग) पशुओं की अपेक्षा मनुष्य के शरीर पर बहुत कम बाल होने के कारण वह किसी भी कार्य को अधिक फुर्ती और सावधानी से कर सकता है। सामाजिक-सांस्कृतिक अन्तर

(1) सांस्कृतिक सीख में अन्तर-सांस्कृतिक सीख में मानव एवं पशु में निम्नलिखित अन्तर दिखाई देते हैं, यथा

(अ) संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग लेखन प्रणाली है। मनुष्य लेखन-प्रणाली की सहायकता से अपने ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचा सकता है तथा इस प्रकार अपनी संस्कृति को विकसित कर सकता है। पशु समाज इस विशेषता से बिल्कुल वंचित है। उसमें अपने किसी अनुभव को समूह के दूसरे सदस्यों तक पहुँचाने की क्षमता नहीं होती। (ब) मानव समाज की एक महत्वपूर्ण विशेषता किसी भी कार्य को करते समय समूह के निर्णय को ध्यान में रखना और सामाजिक नियमों के अनुसार व्यवहार करना है। पशु केवल अपनी ही बुद्धि से कार्य करते हैं, उनके व्यवहारों पर दूसरों की इच्छाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस प्रकार पशुओं का जीवन अनियन्त्रित और एकाकी होता है। (स) मानव समाज को एक प्रमुख विशेषता यह है कि व्यक्ति को अपनी सम्पूर्ण संस्कृति को सीखने की आवश्यकता नहीं होती। वह श्रम-विभाजन के द्वारा केवल एक विशेष कार्य में कुशलता प्राप्त करके अपनी सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। इसके विपरीत, पशु को अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुएँ स्वयं ही प्राप्त करनी होती हैं और उसके सामने जो विपत्तियाँ आती है, उनका सामना भी उसे अकेले अपनी शक्ति से करना होता है। यही कारण है कि "अस्तित्व के संघर्ष में पशुओं को अपनी निजी शक्ति पर निर्भर रहना पड़ता है।

(2) भाषा में अन्तर-सांस्कृतिक विशेषताओं में भाषा का सर्वप्रमुख स्थान है। इसकी सहायता से व्यक्ति वर्तमान पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि वह भविष्य में आने वाली परिस्थितियों और उसके लिए एक उचित व्यवहार का भी अनुमान लगा सकता है। इसके परिणामस्वरूप मानव समाज में सभी सदस्य अतीत के अनुभवों से लाभ उठाते हैं और भविष्य का अनुमान करके अपने समाज को व्यवस्थित बनाते हैं। पशुओं में भाषा का अभाव होने के कारण वे अधिक-से-अधिक अपने चेहरे के भाव या विशेष प्रकार की आवाजों के द्वारा ही अपनी बात एक-दूसरे को समझाने का प्रयत्न करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी पशु दूसरे की इच्छाओं को नहीं समझा पाता। उदाहरण के लिए, पशु किसी दूसरे पशु के चेहरे को देखकर ही उसी क्रिया का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन मानव ने यदि जीवन भर एक जहाज न देखा हो तो भी भाषा और प्रतीकों की सहायता से वह जहाज को बिल्कुल उसी रूप में समझाया जा सकता है जैसा कि वह वास्तव में होता है। इसका तात्पर्य है कि मानव समाज में प्रतीकात्मक संचार की विशेषता पायी जाती है जबकि पशुओं को पूरी तरह अपने निजी और प्रत्यक्ष अनुभवों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

(3) सामाजिक सीख में अन्तर-मनुष्य के व्यवहारों को यदि सामाजिक सीख के आधार पर देखा जाय, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ये पशुओं से कितने भिन्न हैं। परन्तु आम-तौर इनमें सामाजिक आधार की तुलना आवश्यक नहीं प्रतीत होती हैं। मनुष्य के जीवन में सामाजिक सीख का महत्व सबसे अधिक है। वह प्रयल तथा त्रुटि के द्वारा बड़े-से-बड़े कार्य में भी सफलता प्राप्त कर सकता है और इस तरह अपनी संस्कृति को प्रगतिशील बना सकता है। पशुओं के सभी व्यवहार जन्मजात होते हैं। इसका तात्पर्य है कि पशु केवल उन्हीं कार्यों को कर पाते हैं जिनको करने की क्षमता उन्हें जन्मजात गुणों द्वारा प्राप्त होती है। यही कारण है कि पशुओं के व्यवहार में बहुत कठिनता से ही कोई परिवर्तन किया जा सकता है। पशुओं की शारीरिक बनावट भी लोचपूर्ण न होने के कारण उनके व्यवहारों में परिवर्तन होना कठिन हो जाता है। इसके विपरीत मनुष्य अपने समय एवं परिस्थिति के अनुसार स्वयं के व्यवहारों में कोई भी परिवर्तन ला सकता है।

 (4) नैतिकता में अंतर-समाज में दो प्रकार की विशेषताएँ दिखाई पड़ती है। (1) कुछ तथ्य एवं (2) इन तथ्यों के प्रति सदस्यों की मनोवृत्तियाँ। उदाहरणस्वरूप, यौन सम्बन्ध एक तथ्य है, परन्तु यौन सम्बन्ध आवश्यक हैया ऐच्छिक, उचित है अथवा अनुचित, इसकी पूर्ति वैध रूप से हो रही है अथवा अवैध रूप से,ये सभी तथ्य से सम्बन्धित मनोवृत्तियाँ हैं। मानव समाज में सदस्यों की ये मनोवृत्तियाँ कभी मनमानी नहीं होती बल्कि अपने समा की नैतिकता और सामाजिक नियमों से बंधी रहती है। इस आधार पर मानव तथा पशु समाज में अन्त यह है कि पशु समाज में कंवल तथ्य ही होते हैं, उनके प्रति कोई मनोभाव नहीं होते। उदाहरण के लिये पशु यौन सम्बन्धों की स्थापना तो करेंगे, लेकिन यह नहीं देखेंगे कि यह सम्बन्ध किस प्रकार तथा किन परिस्थितियों में स्थापित होना चाहिए। इसके विपरीत,मानव-समाज में तथ्यों का महत्व अपेक्षाकृत कम है,जबकि इनमें सम्बन्धित मनोवृत्तियों और नियमों का महत्व कहीं अधिक होता है। व्यक्ति के प्रत्येका काम में नैतिकता सामने आकर खड़ी हो जाती है। उसे "क्या करना चाहिए और "क्या नहीं करना चाहिए यह सभी भावनायें व्यक्तियों के व्यवहार को प्रभावित करती हैं यही भावना मानव समाज को नियमित और व्यवस्थित बनाये रखती है।

(5) स्थायित्व एवं संगठन में अंतर-समाज में स्थायित्व की दृष्टि से भी मानव एवं पशु मैं अन्तर पाया जाता है। इसका पहला कारण यह है कि मनुष्य की जीवन-अवधि लम्बी होती है। दूसरे, वह भाषा व लेखन प्रणाली के द्वारा अपने विचारों और अनुभवों को आगामी पीढ़ियों के लिए हस्तान्तरित भी कर सकता है। इसके फलस्वरूप उसके सामाजिक संगठन में स्थायित्व बना रहता है। दूसरी ओर, पशुओं की जीवन-अवधि बहुत छोटी होती है और साथ ही उनका ज्ञान भी केवल ठतना ही होता है जिसे वे अपने निजी अनुभवों से प्राप्त करते हैं। इस कारण उनके समाज में स्थायित्व तो बहुत कम होता ही है, साथ ही उनका जीवन भी अधिक संगठित नहीं रह पाता।

(6) सामाजिक शक्ति में अंतर-सामाजिक शक्ति के आधार पर भी मनुष्य एवं पशु में अन्तर स्पष्ट किया जा सकता है। इनमें मानव समाज का अस्तित्व किसी एक व्यक्ति की शक्ति अथवा योग्यता पर निर्भर नहीं होता बल्कि सम्पूर्ण समाज की संस्कृति से प्रभावित होता है। जिस समूह की संस्कृति जितनी अधिक विकसित होती है, वह समूह उतना ही अधिक शक्तिशाली बन जाता है। ऐसी दशा में व्यक्ति की कुशलता ठसकी शारीरिक शक्ति से निर्धारित नहीं होती बल्कि एक व्यक्ति अपनी संस्कृति को प्रगतिशील बनाने में जितना अधिक योगदान देता है, उसे टतना हो अधिक शक्तिशाली समझा जाता है। सामाजिक नियन्त्रण के कारण मानव समाज में कभी-कभी तो शारीरिक शक्ति का विल्कुल भी महत्व नहीं रह जाता। इसके बिल्कुल विपरीत, पशु-समाज में प्रत्येक प्राणी का अस्तित्व"मत्स्य-ज्याय' पर आधारित है अर्थात् जो पशु शारीरिक रूप से जितना अधिक शक्तिशाली होता है वह अपने समह को उतना ही अधिक शक्तिशाली बना लेता है। इस प्रकार जहाँ पशु समाज में शारीरिक शक्ति पर आधारित होता है वही मानव समाज में सामाजिक शक्ति का प्रमुख आधार सांस्कृतिक विकास है।

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