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सोमवार, 6 जुलाई 2020

महान् आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि तथा उसके प्रभाव

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महान् आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि तथा उसके प्रभाव 


प्रथम विश्व युद्ध से उत्पन्न कठिनाइयों पर यूरोप के साथ-साथ अन्य देशों ने भी 1929 ई० तक काफी हद तक विजय प्राप्त कर चुका था लेकिन 1929 ई० में परिस्थितियाँ अचानक बदल गई। न्यूयार्क के शेयर बाजार वाल स्ट्रीट में अचानक ही जबरदस्त मन्दी छा गई। शेयरों का मूल्य 50 अरब डॉलर गिर गया। इस महान मन्दी के विषय में आर्थरलूई ने लिखा है"1929 ई० में जो अवसाद इतिहास में अपने दीर्घ विस्तार आरम्भ हुआ वह कोई साधारण मन्दी नहीं थी, बल्कि आधुनिक और कठोरता सब दृष्टि से भयावह मन्दी थी 1932 में बेरोजगारों की संख्या तीन करोड़ पहुँच गई। अब यह विश्व के सभी देशों में फैल गई। इसीलिए इसे विश्वव्यापी मन्दी अथवा महान् मन्दी के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी महाजनों द्वारा धन अपने देश में लगाये जाने से उन्होंने यूरोप को धन देना बन्द कर दिया जिससे यूरोपीय व्यवस्था डगमगाई तथा आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया। बैंक फेल हो गये मालों की खरीदने वाला कोई नहीं था। ब्रिटेन ने स्वर्णमान का परित्याग कर दिया। इसी का अनुसरण भारत नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड रोडेशिया, आस्ट्रिया जापान, पुर्तगाल रूमानिया, चीन यूनान, स्याम फारस आदि देशों ने भी किया। विश्व के कई देशों ने निर्वाध व्यापार नीति को छोड़कर परम्परागत आर्थिक नीति अपनाई। अमेरिका ने भी प्रेरणा ले कर नई नीति अपनाई। सभी देशों के सरकारी बजट में घाटा पड़ने लगा और संसार का व्यापार आधा रह गया। आर्थिक मन्दी के कारण-इसके निम्नलिखित कारण थे।

1.व्यापार चक्र का प्रभाव-लिप्सन की मान्यता है कि आर्थिक शिथिलता का चक्र का एक अजीब नियम के अनुसार चलता है 1620-24 में इंगलैण्ड में व्यापार-मन्दी आयी थी तब एक शाही कमीशन नियुक्त हुआ जिसने शिथिलता के वे ही कारण बतलाये थे जो 1929-32 को शिथिलता के बताये गये।

2. प्रथम विश्व युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियाँ-प्रायः युद्ध के समय ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती है जिससे आर्थिक संकट उत्पन्न होता है। युद्ध की समाप्ति के बाद कुछ समय तक यह अभिवृद्धि बनी रहती है, किन्तु उसके बाद मन्दी आ जाती है प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भी यही घटना-चक्र चला और संपूर्ण संसार इस मन्दी की चपेट में आ गया। 3. कृषि-उपज व औद्योगिक वस्तुओं का अति उत्पादन-युद्धकाल की अतिरिक्त मांग की पूर्ति के लिए कृषि एवं औद्योगिक उत्पादन बढ़ाया गया था, साथ ही इन वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि हुई थी। युद्ध के बाद कुछ समय तक तो इनकी मांग बनी रहती है, किन्तु धीरे-धीरे वस्तुओं की मांग तथा लोगों को क्रय शक्ति कम होने लगती है।

4. सोने का विषम विभाजन-प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् संसार का बहुत अधिक सोना अमेरिका और फ्रांस में एकत्र होने लगा। अन्य देशों में सोने की कमी हो गयी। सोना मुद्रा स्फीति का आधार होता है, अत: जब सोने की कमी हो गयी तो सिक्के की कीमत बढ़ गयी और वस्तुओं की कीमतें गिर गई।

5. संकुचित आर्थिक राष्ट्रीयता-एशिया में स्वदेशी आन्दोलन, रूस में बोल्शेविक क्रान्ति तथा युद्ध के फलस्वरूप यूरोप के नये स्थापित राज्यों की संरक्षण नीति से पश्चिमी यूरोप

के हाथ में एक बहुत बड़ा बाजार निकल गया। इस प्रकार संकुचित राष्ट्रीयता की भावना की वजह से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और अधिक संकुचित हो गया। इसका प्रभाव युद्ध ऋण अथवा । क्षतिपूर्ति का भुगतान करने वाले देशों के लिए अहितकर धा।

6. सट्टेबाजी की बढ़ती हुई प्रवृत्ति-अक्टूबर 1929 के मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी का तीघ्र दौर आया। अब अमेरिकी उद्योगपतियों ने यूरोप के देशों को ऋण देने के बजाए अपने

ही देश अमेरिका में पूंजी लगाना शुरू किया प्रारंभिक वर्षों में पूंजीपतियों को लाभ हुआ।

-अमेरिकी लोगों को यह लगा कि देश में कभी न समाप्त होने वाली समृद्धि आ गई है परन्त.

ऐसा था नहीं। 29 अक्टूबर 1929 के बाद शेयर बाजार में गिरावट आरम्भ हो गई और यूरोपीय अर्थव्यवस्था चरमरा गयी।

7. यूरोपीय आर्थिक व्यवस्था की निर्भरता- अब यांत्रिक उत्पादन में यूरोप का एकाधिकार नहीं रहा था। युद्ध काल की कठिनाइयों के कारण भारत तथा ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के देशों ने फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड आदि देशों से माल खरीदने के स्थान पर स्वयं अपनी आवश्यकता की वस्तुएं बनाना आरंभ कर दिया था। इस समय कनाडा, रूस आदि देश दतना सस्ता अन्न उत्पन्न कर रहे थे कि यूरोप के कृषि-प्रधान देश मूल्यों में उनकी बराबरी नहीं कर सकते थे।

৪. उपभोग में कमी-राष्ट्रीय आय में अनुमानत: 4 गुना वृद्धि हुई थी, किन्तु राष्ट्रीय आय में इस असाधारण वृद्धि के फलस्वरूप जनता की क्रय शक्ति में कोई तोब्र वृद्धि नहीं हुई पी। क्रय शक्ति में वृद्धि के अभाव में उपभोग में भी सन्तोषजनक वृद्धि नहीं हुई। अत: आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ।

9.यंत्र निक बेरोजगारी-विश्व युद्ध के बाद उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्र में नये-नये यंत्रों उपयोग की होड़ सी लग गयी। इस प्रकार यांत्रिक उन्नति ने बेकारों की संख्या को बहुत अधिक बढ़ा दिया।

10. अधिक आपूर्ति-कुछ लोग इस आर्थिक संकट का एक कारण अधिक आपूर्ति और उसकी वजह से पटी हुई चांदी की कीमतों को बतलाते हैं। आर्थिक मन्दी के निवारण के लिए किए गए उपचार आर्थिक संकट से मुक्ति पाने के लिए विभिन्न देश तेजी से प्रयास करने लगे। कुछ मुख्य ये थे  (1) कुडा मुद्रा नियंत्रण एवं विनिमय दर पर अंकुश (2) क्षेत्रीय प्रबन्यारा) लोसाने सम्मेलन द्वारा क्षतिपूर्ति की अंतिम श्तों को पूरा करना और राष्ट्रसंघ से एक विश्व सम्मेलन बुलाने का अनुरोध किया जाना। और 1932 में जर्मनी के चांसलर द्वारा क्षतिपूर्ति की किश्त अदा नहीं कर सकने की घोषणा। यूरोपीय संघ की योजना-स्थित को सम्हालने के लिए आस्ट्रिया व फ्रांस ने भी प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हुए। राष्ट्रसंप सचिवालय-इसने समस्या का विश्लेषण किया और पाया कि आर्थिक संकट के कारण गहरे और स्पष्ट थे। लन्दन सम्मेलन-1934 में लन्दन में ही देशों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें मुद्रा में स्थिरता लाने और परस्पर सहयोग की नीति अपनाने की बात हुई पर इस पर कोई समझौता न हो पाया। अमेरिका ने अमरीकी मुद्रा को भी स्वर्ण अधिकार से हटा दिया और मीरे- धीरे-यूरोप में मन्दी संकट के बादल छंटने लगे। आर्थिक संकट का प्रभाव

1.जर्मनी पर प्रभाव-जर्मनी में बेरोजगारों की संख्या बढ़ गई तत्कालीन वाइमर गणराज्य उत्पन्न संकट में पड़ गया। इस स्थिति का फायदा हिटलर ने ठठाया और उसने अपने नाजी शासन की नींव डाल दी। इससे प्रजातांत्रिक प्रणाली का अन्त हो गया।

विटेन पर प्रभाव-1931 में इंग्लैण्ड ने पुनः स्वर्णमान का परित्याग कर दिया। सरकार ने सोने का निर्यात बन्द कर दिया। इससे ब्रिटेन को लाभ हुआ पर यूरोप को नुकसान। यही नहीं, ब्रिटेन ने मुक्त व्यापार नीति को छोड़कर तटकों में वृद्धि कर दी, देश के उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया। फलस्वरूप ब्रिटेन का व्यापारिक संतुलन सुधरा।

3. फ्रांस पर प्रभाव-फ्रांस पर अधिक विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा। फ्रांसीसी मुद्रा फ्रांक अपनी साख को बनाये रख सकी। फ्रांस पर अन्तर्राष्ट्रीय ऋण नहीं था, इस कारण उस पर मन्दी का कोई असर न पड़ा।

4.रूस पर प्रभाव-स्टालिन ने अपनी पंचवर्षीय योजनाओं, जमींदारों के दमन तथा औद्योगिक योजनाओं के द्वारा रूसी कृषि उत्पादन, कोयले व लोहे का उत्पादन इतना बड़ा दिया कि 1929-30 के आर्थिक मन्दी का रूसी अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उससे पूंजीवादी व्यवस्था का खोखलापन ही उजागर हुआ।

5. अमरीका पर प्रभाव-युद्ध के सोने में अमेरिका कर्ज देने वाला देश हो गया था एक दशक के अन्दर-अन्दर अमरीका का औद्योगिक उत्पादन स्योढ़ा हो गया था। 1929 से 1933 के 4 बसों में अमेरिकी अर्थव्यवस्था रसातल में चली गई। चालू मूल्यों का राष्ट्रीय उत्पादन 6% पट गया, रोजगार में करीब 20 गिरावट आ गई: रुजवेल्ट ने अपनी न्यूडीत व्यवस्था के अन्तर्गत पुनरुत्थान सुधारवाद और संतुलन के द्वारा पूजीवाद की रक्षा की। मोटे रूप से यह कहा जा सकता है कि फ्रांस तथा रूस को छोड़कर विश्व के सभी बड़े व छोटे देशों पर विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का प्रभाष किसी न किसी रूप में अवश्य पड़ा और उसके कारण वहाँ आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन हुए।

आर्थिक प्रभाव-इस आर्थिक संकट में सरकार व समाज के प्रत्येक वर्ग को कठिनाई तथा हानि हुई। सरकारी बजट में घाटा आया। इससे सरकार को करों में वृद्धि करनी पड़ी। बहुत से कारखाने बन्द हो गये। लाखों मजदूर बेकार हो गये। गोदाम वस्तुओं से भर गये लेकिन उनका कोई खरीददार नहीं थी। कारखाने बन्द हो गये। पूंजीपति वर्ग संकट में पड़ गये। मध्यम वर्ग जिनका धन शेयर के रूप में कारखाने में लगा था वे भी परेशान थे सरकारी व्याज की दर कम हो गई थी। बेरोजगारों को भत्ता दिया जाना शुरू किया गया लेकिन धनाभाव के कारण इसमें भी

सफलता नहीं मिली। राजनीतिक प्रभाव-राजनीतिक प्रभाव स्वरूप असुरक्षा की भावना एवं अधिनायक तन्त्र को प्रोत्साहन मिला। हिटलर तथा मुसोलिनी जैसे तानाशाह उदित हुए। साम्यवाद की तरफ आकर्षण बढ़ा। प्रशासकीय नियन्त्रण में वृद्धि हुई क्योंकि कानून जरूरी था। सैन्यवाद भी चरम सीमा पर पहुंचा। फांसीवादी सरकारें उदित हुई तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के भावना की समाप्ति हो गयी। अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन की विश्ववन्युत्त्व की भावनाओं की घोषणा का भी उजागर हुआ। जापान तथा इटली जैसे सैन्यवादी राष्ट्रों अपनी जनता का ध्यान आर्थिक संकट से हटाने के लिए पड़ोसी देशों पर आक्रमण शुरू कर दिया। उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि आर्थिक संकट ने अन्तर्राष्ट्रीय घटना चक्र को व्यापक रूप से प्रभावित किया और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्यों के संतुलन का अन्त कर दिया जिसके परिणाम अत्यन्त गम्भीर एवं दूरगामी हुए।

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