सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्रमबद्ध और प्रादेशिक भूगोल के द्वैतवाद विस्तृत वर्णन कीजिये।

क्रमबद्ध और प्रादेशिक भूगोल के द्वैतवाद विस्तृत वर्णन कीजिये।

 भूगोल के द्विभाजन का इतिहास बहुत पुराना है किन्तु इसका वास्तविक विकास उीसी शताब्दी के भूगोलवेत्ताओं द्वारा सम्भव है। आज से 2000 वर्ष पूर्व यूनानी तथा रोमन भूगोलवेत्ताओं के एक वर्ग का मानना था कि भूगोल का मुख्य उद्देश्य विभिन्न स्थानों तथा देशों के सम्बंध में संगठित सूचनाये एकत्रित करना था जबकि दूसरा वर्ग व-माप, नदियों के स्रोतों की खोज, जलवायु कटिबंधीं के निर्धारण आदि पर बल देता था। सत्रहवीं के प्रसिद्ध जर्मन भूगोलवेत्ता वारेनियस ने भूगोल को दो खण्डों में विभाजित किया था-(1) सामान्य भूगोल और (2) विशिष्ट भूगोल। वारेनियस के अनुसार सामान्य भूगोल विज्ञान का अंग है और पृथ्वी का सामान्य अध्ययन करता है। यह सम्पूर्ण पृथ्वी से सम्बंधित है और उसके विभिन्न क्षेत्रों तथा दृश्य घटनाओं या तथ्यों (phenomena) का वर्णन करता है। वह भूगोल की आधार शिला है और सामान्य नियमों का प्रतिपादन करता है। उन्होंने व्यक्तिगत देशों के अध्ययन को 'विशिष्ट भूगोल का अंग बताया था और स्वयं भी जापान तथा थाईलैण्ड के मानवीय पक्षों का अध्ययन किया था। वारेनियस द्वारा प्रयुक्त शब्दावली और प्रयोग का अन्तर वास्तविक अर्थ में तत्वों और क्षेत्रों के अध्ययन से ही सम्बंधित है। ब्लाश के अनुसार वारेनियसका आस्था भूगोल के द्विभाजन में नहीं थी। अठारहवीं शताब्दी में कांट और उन्नीसवीं शताब्दी में हम्बोल्ट ने सामान्य (general) के स्थान पर भौतिक (physical) का प्रयोग करके पहले से अधिक भ्रांति उत्पन्न कर दी। रिचथोफेन के प्रभाव से उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक जर्मन भूगोलवेत्ता इस बात पर लगभग एकमत हो गये थे कि भूगोल में तत्वों और क्षेत्रों दोनों का अध्ययन समान रूप से महत्वपूर्ण है। जर्मनी में भूगोल को लैण्डशाफ्ट' का अध्ययन माना गया और उसका अनेक अर्थों में प्रयोग किया गया लैण्डशाफ्ट का एक अर्थ प्रदेश या सादृश्य भूमि लगाया गया तथा प्रादेशिक भूगोल का आधार बताया गया और

सामान्य (वर्गीकृत) भूगोल को गौण स्थान दिया गया। बीसवीं शताब्दी में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ब्लाश, भ्रंश, डिमांजिया, ब्लांशार आदि ने प्रादेशिक भूगोल को अधिक महत्व प्रदान किया और वहाँ प्रादेशिक अध्ययनों की भरमार सी हो गयी। हार्टशोर्न के अनुसार, 'वर्गीकृत (क्रमबद्ध) और प्रादेशिक भूगोल के दीर्घकालिन विवाद और बदलते है दृष्टिकोण से स्पष्ट है कि इन दोनों का विकास लगातार और अन्तर्संबंधित रूप से हुआ है |

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam 1857 के महान विद्रोह (1857 के भारतीय विद्रोह, 1857 के महान विद्रोह, महान विद्रोह, भारतीय सेप्पी विद्रोह) को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। 1857 आंदोलन एक राष्ट्रीय उभर रहा था, जो भारतीयों के दिल में एक मजबूत आग्रह से प्रेरित था, जिससे देश मुक्त हो गया। यह ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय एकल घटना थी। यह भारत में सदी के पुराने ब्रिटिश शासन का नतीजा था। भारतीयों के पिछले विद्रोहों की तुलना में, 1857 का महान विद्रोह एक बड़ा आयाम था और यह समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी के साथ लगभग अखिल भारतीय चरित्र ग्रहण करता था। यह विद्रोह कंपनी के सिपाही द्वारा शुरू किया गया था। इसलिए इसे आमतौर पर 'सेप्पी विद्रोह' कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ सिपाही का विद्रोह नहीं था। इतिहासकारों ने महसूस किया है कि यह एक महान विद्रोह था और इसे सिर्फ एक सिपाही विद्रोह कहने के लिए अनुचित होगा। हमारे इतिहासकार अब इसे विभिन्न ना