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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

कल्याणकारी राज्य का आशय इसके प्रमुख विशेषताए

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कल्याणकारी राज्य का आशय इसके प्रमुख विशेषताए 

लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा सामान्यतया लोक कल्याणकारी राज्य का आशय एक ऐसे राज्य से होता है जिसमें शासन की शक्ति का प्रयोग एक वर्ग विशेष हेतु नहीं वरन् जन कल्याण हेतु किया जाता है। इस संदर्भ में लोक कल्याणकारी अथवा जनकल्याणकारी राज्य की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे देश में पुरातन काल से रामराज्य की जो अवधारणा प्रचिलित थी वह एक ऐसे राज्य का प्रतीक है, जिसके माध्यम से प्रत्येक मानव के व्यक्तित्व का स्वतन्त्र रूप से समग्र विकास करने का प्रयास किया जाता है। यद्यपि भारतीय राजनीतिक चिन्तकों ने राज्य के दैवी ठत्पत्ति का प्रतिपादन किया है। लेकिन इसके साथ ही साथ ही उन्होंने राजाओं के कर्त्तव्यों का भी पूर्णतया वर्णन किया है। सभी भारतीय मनीषियों ने इस बात पर बल दिया है कि राजा अथवा सम्राट के द्वारा समस्त कार्य लोक कल्याण को ध्यान में रखकर ही किए जाने चाहिए इससे राजा एवं प्रजा दोनों सुखी रहते हैं। महा कवि तुलसीदास के शब्दों में इसे और स्पष्ट कर सकते हैं जासु राज नृप प्रजा दुखारी। ते नृप होय नरक अधिकारी।।" अर्थात जिस राजा के शासन काल में प्रजा दुखी होती है वह राजा नरक का अधिकारी होता है। इसी प्रकार का विचार यूनानी चिन्तकों ने भी दिया है। युनानी चिन्तन प्लेटो और अरस्तू द्वारा राज्य को एक नैतिक संगठन माना गया है, जिसका प्रमुख ध्येय किसी एक वर्ग के हित में नहीं वरन् सभी नागरिकों के हित में कार्य करना है। अर्थात प्लेटो और अरस्तू भी कहीं न कहीं लोक कल्याण की बात करते हैं। बाद में काण्ट ग्रीन और बैंथम के विचारों में भी इस प्रकार की अवधारणा के दर्शन होते हैं। कल्याणकारी राज्य के सिद्धान्त में व्यक्तिवाद तथा समाजवाद दोनों के अनेक तत्त्वों का समन्वय है। अर्थात् यह दोनों के बीच का है। इसमें कुछ तत्त्व व्यक्तिवाद से तथा कुछ तत्त्व समाजवाद से ग्रहण किये गए हैं। व्यक्तिवाद तथा समाजवाद में व्याप्त कुरीतियों के विरोध स्वरूप उस सिद्धान्त का प्रादुर्भाव हुआ।

 व्यक्तिवाद, व्यक्ति के कार्यों में राज्य के कम से कम हस्तक्षेप में विश्वास करता है, यह राज्य के केवल तीन कार्यों में विश्वास करता है। (1) आन्तरिक शान्ति एवं व्यवस्था (2) बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा (3) न्याय करना तथा अपराधी को दण्ड देना। यह सिद्धान्त पूँजीवादी व्यवस्था का संरक्षण और संवर्धन करता है। पूँजीपतियों के शोषण की खुली छूट देने के लिए यह सिद्धान्त अधिकाधिक नागरिक और आर्थिक स्वतंत्रता पर बल देता है। इसने राज्य को जो तीन कार्य सौंपे हैं वे भी पूँजीवादी व्यवस्था में पूंजीपतियों और उस व्यवस्था के संरक्षण और संवर्धन में सहायक है। लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा व्यक्ति स्वातन्त्र्य में तो पूर्णरूपेण विश्वास करता है परन्तु उनके अनुसार यह असीमित नहीं है। समाज कल्याण की दृष्टि से राज्य उनमें हस्तक्षेप और उन्हें सीमित कर सकता है। राज्य के कार्यों से सम्बन्धित यह नवीन सिद्धान्त है तथा लोकतांत्रिक और समाजवादी दोनों ही सिद्धांतों का प्रभाव इस पर है। लोकतन्त्र के व्यक्ति स्वातंत्र्य तथा समाजवाद के आर्थिक कल्याण एवं आर्थिक अधिकार में यह विश्वास करता है। लोकतंत्र और समाजवाद को एक-दूसरे का विरोधी माना जाता है परन्तु आज लोकतांत्रिक राज्यों के आर्थिक कल्याण से सम्बन्धित कार्यों में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है। लोक-कल्याणकारी कार्यों को ही ये राज्य समाजवादी कार्यों की संज्ञा प्रदान करते हैं। मार्क्सवादियों का मत है कि पूँजीवादी व्यवस्था की रक्षा के लिये ही लोक-कल्याणकारी राज्य के सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ है यह पूँजीवादी व्यवस्था को कमजोर बनाने वाले तत्त्वा का दूर करने का प्रयास करता है। जिन समस्याओं के कारण जनरोष अथवा असन्तोष पैदा होता तथा व्यवस्था के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा होता है, उनके निराकरण के लिए यह लोक कल्याणकारी व्यवस्था के अन्तर्गत ही आर्थिक और सामाजिक कल्याण सम्बन्धी कार्य करने में विश्वास करता है। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि व्यवस्था में परिवर्तन के बिना ही यह समस्याओं का निराकरण चाहता है। व्यक्तिवाद की तरह यह राज्य को एक आवश्यक बुराई नहीं मानता है इसके अनुसार, राज्य आवश्यक है क्योंकि इस पर लोक-कल्याणकारी कार्यों का उत्तरदायित्व है। यह व्यक्ति के जीवन को सुखी और समृद्धिशाली बनाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि लोक-कल्याणकारी राज्य का सिद्धान्त व्यक्ति स्वातंत्र्य को पूर्णतः महत्त्व देता है परन्तु यह व्यक्तिवाद के इस सिद्धान्त में विश्वास नहीं करता है कि राज्य को व्यक्ति के कार्यों में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए। इसी तरह यह मानता है कि राज्य को लोक-कल्याण की दुष्टि से सभी क्षेत्रों में कार्य करना चाहिए परन्तु यह समाजवाद की तरह राज्य के अधिकाधिक नियन्त्रण का समर्थन नहीं करता।

लोक-कल्याणकारी राज्य की परिभाषा लोक-कल्याणकारी राज्य की परिभाषा के लिए हम विद्वानों की परिभाषाओं और इसकी विशेषताओं पर विचार करेंगे 1918 में प्रकाशित 'इनसाइक्लोपीडिया आफ सोशल साइंस' में लोक-कल्याणकारी राज्य की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि "लोक-कल्याणकारी राज्य का तात्पर्य एक ऐसे राज्य से है जो अपने नागरिकों को न्यूनतम जीवन स्तर प्रदान करना अपना अनिवार्य उत्तरदायित्त्व समझता है।"

टी. डब्ल्यू. काण्ट के अनुसार, "लोकहितकारी वह राज्य है जो अपने नागरिकों के लिए व्यापक समाज सेवाओं की व्यवस्था करता है।"

इन समाज सेवाओं के अनेक रूप होते हैं इनके अन्तर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और वृद्धावस्था में पेंशन आदि की व्यवस्था होती है। इनका मुख्य उद्देश्य नागरिकों को सभी प्रकार की सुरक्षा प्रदान करना होता है। जवाहरलाल नेहरू के अनुसार,"सबके लिए समान अवसर प्रदान करना, अमीरों और गरीबों के बीच अन्तर मिटाना और जीवन स्तर को ऊपर उठाना लोकहितकारी राज्य के आधारभूत तत्व है।"

गार्नर के अनुसार, "राज्य का यह साधारण कर्त्तव्य है कि वह इस बात पर ध्यान दे कि व्यक्ति जिस सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में रहने के लिए विवश है वे ऐसी हों कि वह उनमें रहकर अपनी योग्यताओं तथा प्रकृति द्वारा प्रदत्त अपनी क्षमताओं का सर्वाधिक विकास तथा अपने जीवन के लक्ष्य की पूर्ति कर सके।"

उपर्युक्त सभी परिभाषाओं में लोक-कल्याण के आर्थिक पक्ष पर अधिक बल दिया गया है.

परन्तु कल्याण की धारणा केवल भौतिक ही नहीं वरन् मानवीय स्वतन्त्रता और प्रकृति से भी सम्बन्धित है। सन् 1954 में मैसूर विश्वविद्यालय में दीक्षांत भाषण देते हुए न्यायमूर्ति छागला ने लोक कल्याणकारी राज्य की सही अवधारणा को व्यक्त करते हुए कहा था, "लोक कल्याणकारी राज्य का कार्य एक ऐसे पुल का निर्माण करना है जिसके द्वारा व्यक्ति जीवन की पतित अवस्था से निकलकर एक ऐसी अवस्था में प्रवेश कर सके,जो उत्थानकारी और उ्देश्यपूर्ण है। लोककल्याणकारी राज्य का यथार्थ उद्देश्य नागरिक द्वारा सच्ची स्वतंत्रता के उपभोग को सम्भव बनाना है।"

इस प्रकार लोक कल्याणकारी राज्य का अर्थ है राज्य के कार्यक्षेत्र का विस्तारा राज्य के कार्यक्षेत्र के विस्तार का अर्थ प्रायः व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बन्धन लिया जाता है लेकिन कल्याणकारी राज्य का अर्थ राज्य के कार्यक्षेत्र का इस प्रकार विस्तार करना होता है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर कोई विशेष बन्धन न लगे,राज्य के कार्यक्षेत्र के साथ-ही-साथ व्यक्ति का भी अपना स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र हो। वास्तव में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पश्चिमी प्रजातन्त्र और साम्यवादी अधिनायकतन्त्र दोनों से ही भिन्न है। पश्चिमी प्रजातन्त्र राजनीतिक स्वतंत्रता को एक ऐसी पति प्रदान करता है, जिसके अन्तर्गत नागरिकों को आर्थिक सुरक्षा प्राप्त नहीं होती। इसके विपरीत, आर्थिक सुरक्षा के विचार पर आधारित साम्यवादी अधिनायकतन्त्र में राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव होता है लेकिन लोक कल्याणकारी राज्य की धारणा राजनीतिक स्वतन्त्रता और आर्थिक सुरक्षा के बीच सामञ्जस्य का सफल प्रयत्न है। लोक कल्याणकारी राज्य के लक्षण (विशेषताएँ) लोककल्याणकारी राज्य की उपर्युक्त धारणा को दृष्टि में रखते हुए इस प्रकार के राज्य के प्रमुख रूप से निम्नलिखित लक्षण बताये जा सकते हैं-

1. आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था-लोक कल्याणकारी राज्य प्रमुख रूप से आर्थिक सुरक्षा के विचार पर आधारित है। हमारा अब तक का अनुभव स्पष्ट करता है कि शासन का रूप चाहे कुछ भी हो, व्यवहार में राजनीतिक शक्ति उन्हीं लोगों के हाथों में केन्द्रित होती है, जो आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली होते हैं। अतः राजनीतिक शक्ति को जनसाधारण में निहित करने और जनसाधारण के हित में इसका प्रयोग करने के लिए आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था नितान्त आवश्यक है। लोककल्याणकारी राज्य के सन्दर्भ में आर्थिक सुरक्षा का तात्पर्य निम्नलिखित जिन बातों से लिया जा सकता है (क) सभी व्यक्तियों को रोजगार-ऐसे सभी व्यक्तियों को जो शारीरिक और मानसिक

दृष्टि से कार्य करने की क्षमता रखते हैं, राज्य के द्वारा उनकी योग्यतानुसार उन्हें किसी भी प्रकार का कार्य अवश्य ही दिया जाना चाहिए। जो व्यक्ति किसी भी प्रकार का कार्य करने में असमर्थ या राज्य जिन्हें कार्य प्रदान नहीं कर सका है, उनके जीवनयापन के लिए राज्य द्वारा बेरोजगारी गाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। (ख)न्यूनतम जीवन-स्तर की गारण्टी-न्यूनतम जीवन-स्तर के सम्बन्ध में अर्थशास्त्री काउथर ने कहा है कि "नागरिकों के लिए अधिकार रूप में उन्हें स्वस्थ बनाये रखने के लिए र्याप्त भोजन की व्यवस्था की जानी चाहिए। निवास, वस्त्र आदि के न्यूनतम जीवन-स्तर की

सोर से उन्हें चिन्तारहित होना चाहिए। शिक्षा का उन्हें पूर्णतया समान अवसर प्राप्त होना चाहिए और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था के दुःख से उनकी रक्षा की जानी चाहिए। लोक कल्याणकारी राज्य में किसी एक के लिए अधिकता के पूर्व सबके लिए पर्याप्त की व्यवस्था की बानी चाहिए। (ग) अधिकतम समानता की स्थापना-जहाँ तक सम्भव हो, व्यक्तियों की आय के न्यूनतम और अधिकतम स्तर में अत्यधिक अन्तर नहीं होना चाहिए। इस सीमा तक आय की समानता तो स्थापित की ही जानी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अपने धन के आधार पर दूसरे का शोषण न कर सके।

2 राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था-लोक कल्याणकारी राज्य की दूसरी विशेषता राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था की जा सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था की जानी चाहिए कि राजनीतिक क्ति सभी व्यक्तियों में निहित हो और ये अपने विवेक के आधार पर इस राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कर सकें। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं -(क)लोकतन्त्रीय शासन-राजतन्त्र, अधिनायकतन्त्र या कुलीनतन्त्र के अन्तर्गत व्यक्ति नेपने विवेक के आधार पर राजनीतिक कर्तव्यों का सम्पादन नहीं कर सकता। वस्तुतः इन शासन-व्यवस्था में इसका कोई राजनीतिक अधिकार होते ही नहीं हैं लोक कल्याणकारी राज्यमें व्यक्ति के राजनीतिक हितों की साधना को भी आर्थिक हितों की साधना के समान हो झा जाता है, अतः एक लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था वाला राज्य ही लोक कल्याणकारी राज्य हो सकता है। (ख) नागरिक स्वतन्त्रताएँ-संविधान द्वारा लोकतन्त्रीय शासन की स्थापना कर देने से राजनीतिक सुरक्षा प्राप्त नहीं हो जाती। व्यवहार में राजनीतिक सुरक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नागरिक स्वतन्त्रता का वातावरण होना चाहिए अर्थात् नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति और राजनीतिक दलों के संगठन की स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होनी चाहिए। इन स्वतन्त्रताओं के अभाव में लोकहित की साधना नहीं हो सकती और लोकहित की साधना के विना लोक कल्याणकारी राज्य, आत्मा के बिना शरीर के समान होगा।

3. सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था-सामाजिक सुरक्षा का तात्पर्य सामाजिक समानता से है और इस नागरिक समानता की स्थापना के लिए आवश्यक है कि धर्म, जाति, वंश, रंग सम्पत्ति के आधार पर उत्पन्न भेदों का अन्त करके व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में महत्त्व प्रदान किया जाए। वस्तु लोक कल्याणकारी राज्य में जीवन के सभी पक्षों में समानता के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए।

4.राज्य के कार्यक्षेत्र में वृद्धि-लोक कल्याणकारी राज्य का सिद्धान्त व्यक्तिवादी विचार के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है और इस मान्यता पर आधारित है कि राज्य को वे सभी जनहितकारी कार्य करने चाहिए. जिनके करने से व्यक्ति की स्वतंत्रता नष्ट या कम नहीं होती। इसके द्वारा न केवल आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था वरन् जैसा कि हॉब्सन ने कहा है, "डॉक्टर नर्स, शिक्षक, व्यापारी, उत्पादक, बीमा कम्पनी के एजेण्ट, मकान बनाने वाले, रेलवे नियन्त्रक तथा सैकड़ों रोगों में कार्य किया जाना चाहिए।"

5.अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना-इन सबके अतिरिक्त एक लोक कल्याणकारी राज्य, अपने राज्य विशेष के हितों से ही सम्बन्ध न रखकर अन्तर्राष्ट्रीय होता है। वैज्ञानिक प्रगति तथा राजनीतिक चेतना के विकास ने विश्व के सभी देशों को एक-दूसरे के निकट दिया है कि त्रस्त मानव कवच माकला राज्य अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत नहीं कर सकता है। एक कल्याणकारी राज्य तो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' अर्थात् 'सम्पूर्ण विश्व ही मेरा कुटुम्ब है' के विचार पर आधारित होता है। विद्वानों की परिभाषाओं और इसकी विशेषताओं के आधार पर हम निष्कर्ष निकाल सकते कि लोक कल्याणकारी राज्य का सिद्धान्त एक ऐसा सिद्धान्त है जो व्यक्ति स्वातन्त्र्य तथा समाज-कल्याण में समन्वय स्थापित करता है। यह एक ऐसे राज्य में विश्वास करता है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के साथ-साथ उसकी भलाई के लिए कार्य तथा ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करे जिनमें उसकी योग्यता और क्षमता का विकास हो सके।

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