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फाँसीवाद विचारधारा की व्याख्या, अर्थ, इसके मूलभूत विशेषताए

फाँसीवाद विचारधारा की व्याख्या, अर्थ, इसके मूलभूत विशेषताए 

फासीवाद अंग्रेजी भाषा के शब्द फासिज्म का हिन्दी अनुवाद है। फॉसिज्म, की व्युत्पत्ति हटली भाषा के शब्द 'फेसियो शब्द से हुई है जिसका अर्थ है लकड़ियों का बँधा हुआ बोझा इसके साथ कुल्हाड़ी भी रहती है। प्राचीन रोम में लकड़ियों के बोझ के साय कुल्हाड़ी को रोम का राजचिन्ह माना जाता था। लकी का बोझ एकता का तथा कुल्हाड़ी सत्ता का प्रतीक मानी जाती थी। बीसवीं सदी के फासीवाद का उदय इटली में हुआ था। अतः फासीवादी संगठन द्वारा इस चिन्ह को अपनाने के कारण उसकी विचारधारा का नाम फासीवाद रखा गया। इस विचारधारा का प्रतिपादन सोनिये मुसोलिनी ने किया और उसी के द्वारा इसका विकास किया गया । अतः फासीवाद को मुसोलिनी वाद की संज्ञा भी प्रदान की जाती है। मुसोलिनी ने अपनी विचारधारा को कार्यन्वित करने के लिए जिस दल का संगठन किया था, उसका नाम फासीवाद दल रखा और इस चिन्ह को अपने दल का चिन्ह बनाया था।

फासीवाद के मूल सिद्धान्त (विशेषताएं)

1.फासीवाद सिद्धांत की बजाय वास्तविकता पर आधारित है। मुसोलिनी के शब्दों में "फासीवाद का संबंध किसी ऐसी नीति के पोषण से नहीं है जिस पर विवरण सहित पहले से विचार किया गया हो। इसका जन्म क्रियात्मक आवश्यकता के कारण हुआ तथा प्रारम्भ से ही यह सैद्धान्तिक न होकर व्यावहारिक रहा।"

2.फासीवाद एक राष्ट्रीय नेता की तानाशाही में विश्वास करता था और लोकतंत्र की निन्दा करता था। लोकतंत्र की तीन प्रमुख वातों स्वतंत्रता, समानता तथा बन्युत्व में कदापि विश्वास नहीं करता। मुसोलिनी की तानाशाही में दृढ़ विश्वास या, क्योंकि इटली के लोग इतने योग्य नहीं हैं कि वे नेताओं का मार्ग-दर्शन कर सके बल्कि इस चात की आवश्यकता है कि राष्ट्रीय नेता निस्वार्थ भाव से स्वयं काम करके जनता का पथ-प्रर्दशन करें।

3.फासीवाद व्यक्तिवाद का विरोध करता है। इसकी मान्यता है कि राज्य साध्य है व्यक्ति साधन। यह राज्य को एक आध्यात्मिक सावयवी मानता है, अतः राज्य में व्यक्ति का वही स्थान होता था जो कि शरीर में अंगों का।

4.यह सर्वाधिकारवादी (अधिकेन्द्रित सर्वसत्तावादी) राज्य में विश्वास रखता है। इसके अनुसार राज्य को सब क्षेत्रों को नियंत्रित करने का अधिकार है। मुसोलिनी का हस्ताक्षेप और नेतृत्त्व सब क्षेत्रों में दिखाई देता था।

5.फासीवाद हिंसा, शक्ति तथा साम्राज्यवाद में विश्वास करता है। इसके अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का हल शांतिपूर्वक सम्भव नहीं है। अतः यह हिंसा और शक्ति में विश्वास करता है और युद्ध को आवश्यक तथा अनिवार्य मानता है।

6.यह अंतर राष्ट्रवाद का घोर विरोध करता है। इसका विश्व-बन्धुत्त्व में कोई विश्वास नहीं है और इसकी मान्यता है कि समस्त देशों के राष्ट्रीय हितों में कोई सामंजस्य या मेल सम्भव नहीं हैं।

7.फासीवाद का विश्वास था कि राष्ट्रीय राज्य के पास प्रभुसत्ता रहती है न कि व्यक्ति के पास और उसे इसका अवाध रूप से प्रयोग करने का अधिकार है। फॉसीवाद देशभक्ति या राष्ट्रवाद पर विशेष बल देते थे।

8.फासीवाद कार्पोरेट राज्य का समर्थक है। फासीवाद मानते थे कि राज्य भिन्न-भिन्न व्यक्तियों से मिलकर बना हुआ एक समूह नहीं है बल्कि अनेक ऐसे निगमों से मिलकर बना है जिन्हें हम सामाजिक व राजनीतिक जीवन की इकाई मान सकते हैं। इसीलिए फॉसीवाद विभिन्न व्यवसायों के पृथक संगठन बनाने के पक्ष में थे लेकिन वे कहते थे कि ये सव राज्य के अधीन होने चाहिए और उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करें।

9.फासीवाद समाजवाद तथा साम्यवाद का कट्टर विरोधी है ऐतिहासिक भौतिकवाद, धर्म युद्ध, अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत जैसी मारवाड़ी मान्यताओं में ये विश्वास नहीं करते हैं और फासीवाद पूंजीवादियों एवं श्रमिकों के निजी स्वार्थ को छोड़कर राष्ट्रीय हित में काम करना चाहिए। यह अवश्य है कि पूंजीवाद तथा निजी सम्पत्ति को पूर्णरूपेण समाप्त करने का पक्षपाती साम्यवादी नहीं हैं, लेकिन वे ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की वकालत करते हैं। जिससे पूंजीपतियों का लाभ राज्य के द्वारा नियंत्रित हो, मजदूरों के वेतन राज्य द्वारा निर्धारित हों और दोनों के झगड़ों का औद्योगिक न्यायालय निर्णय करें।

10. एक ओर तो व्यक्तियों को इस नीति को फासीवादी कदापि पसन्द नहीं करते कि व्यक्ति के आर्थिक मामलों में राज्य बिल्कुल हस्तक्षेप न करे और दूसरी ओर समाजवादियों की इस नीति के प्रशंसक भी थे कि समस्त उद्योग का समाजीकरण कर दिया जाय। फॉसीवादियों की मान्यता थी कि समाज के लिए अनिवार्य और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाय और शेष समस्त उद्योगों पर निजी स्वामित्व की आज्ञा देते हुए उन्हें देश-हित में वे केवल नियंत्रित एवं नियमित करने के पक्षधर थे। उनकी यह स्पष्ट मान्यता है कि पूँजीपतियों और मजदूरों में से किसी को भी राष्ट्रहित के विरुद्ध कार्य नहीं करने दिया जायेगा क्योंकि उनके हित राष्ट्र के ऊपर नहीं हैं। फासीवाद का दावा है कि आर्थिक क्षेत्र में विश्व को उसकी सबसे बड़ी देन निगम राज्य है। निगम राज्य में पूंजीवाद और समाजवाद के कोई दोष पाये जाते हैं, अपितु उससे उच्चतर और नयी योजना होती है। यह उद्योगों में रुचि रखने वालों को पूर्ण स्वतंत्रता देता है और दूसरी ओर उद्योगों पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करता है। वह श्रमिक और स्वामी दोनों के लिए अलग-अलग चित्र उपस्थित करता है। श्रमिकों से वह कहता है कि वह पूँजीपति का पक्षपाती नहीं है और पूंजीपतियों से कहता है कि वह समाजवाद नहीं चाहता। इस प्रकार वह पूँजीवाद और समाजवाद के बीच का तीसरा हल सामने होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार, राज्य व्यक्तियों का समूह न होकर व्यावसायिक संघों का समूह होता है। विभिन्न देशों के विभिन्न संघ होते हैं। प्रत्येक व्यवसाय में श्रमिकों और मालिकों के अलग-अलग संघ होते हैं। जब ये समूह उच्च स्तर पर पहुँच जाते हैं, तो इन्हें निगम कहा जाता है। इस प्रकार निगमों के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्त्तव्य निभा कर राष्ट्र की उन्नति में भाग लेता है। निगमनात्मक राज्य की व्याख्या करते हुए मुसोलिनी लिखता है, "फॉसी राज्य राष्ट्र के आर्थिक क्षेत्र को अपने क्षेत्र में ले लेता है और अपने द्वारा उत्पन्न निगमनात्मक सामाजिक और आर्थिक संस्थाओं के द्वारा इस निगमनात्मक प्रभाव को राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर डालता है। इसमें राष्ट्र की समस्त राजनीतिक, आर्थिक तथा आध्यात्मिक शक्तियाँ आ जाती हैं।"

फॉसीवादियों को निगमनात्मक राज्य दो मान्यताओं पर आधारित है- पहली मान्यता यह है कि मनुष्य को नागरिक के रूप में राज्य के राज्य के राजनीतिक जीवन में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लेना चाहिए। वह अपने व्यवसाय अर्थात् किसान, श्रमिक, वकील, डाक्टर या कोई भी व्यवसाय के संगठन के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक कार्य में भाग ले सकता है। मुसोलिनी का यह कथन वे केवल अपने व्यवसाय की समस्याएँ इतनी जटिल होती हैं कि उन्हें अधिकांश व्यक्ति समझ नहीं सकते, के समझने वाले मुट्ठी भर लोग होते हैं। ये ही जनता के स्वाभाविक नेता तथा यही शासन करने वाला अभिजात वर्ग है। इसी विचारधारा को मानते हुए लोकतंत्र को मूर्खों का शासन कहते हैं। आलोचना- फासीवाद की आलोचकों ने कटु आलोचना की है, क्योंकि यह हिंसा, तानाशाही और खून-खराबा को प्रोत्साहित करता है इससे विश्व शांति के भंग होने का खतरा है। द्वितीय विश्व युद्ध तो हिटलर एवं मुसोलिनी की फासीवादी नीतियों एवं विश्वासों का ही फल था, जिससे जान-माल की बहुत अधिक क्षति हुई। फॉसीवादियों द्वारा लोकतंत्र का विरोध भी अनुचित है। फॉसीवादियों के कृत्यों के फलस्वरूप ही इटली के नागरिकों की समस्त स्वतंत्रता का लोप हो गया था। वे तर्क-वितर्क को भी कोई महत्त्व नहीं देते और इसमें व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का समग्र विकास एवं कल्याण सम्भव नहीं है। फासीवाद के अधीन तो प्रत्येक व्यक्ति को नेता की आज्ञाओं का अन्धानुपालन करना पड़ता है चाहे उसे वह नापसन्द और अस्वीकृत ही क्यों न हो।

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