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यूरोपीय संघ पर संक्षिप्त टिप्पणी

यूरोपीय संघ पर संक्षिप्त टिप्पणी


यूरोपीय संघ (European Union) देश के विखण्डन को झेलते हुए, पश्चिमी यूरोपीय लोगों ने लगभग पाँच दशक पूर्व एकीकरण के लिए एक प्रति आन्दोलन (conunter movement) प्रारम्भ किया, जिसकी परिणति यूरोपीय संघ की स्थापना के रूप में हुई। यह आन्दोलन रूस के बढ़ते हुए प्रभाव के भय से भी प्रेरित था। आज यूरोपीय संघ पूर्वी तथा पश्चिमी यूरोप के मध्य विभाजन की प्रबल अभिव्यक्ति है।


इतिहास

1950 के दशक में पश्चिमी यूरोप ने पराराष्ट्रीय संघवाद की स्थापना के प्रयास आरम्भ किए, जिसकी पहल आर्थिक क्षेत्र से हुई। यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना 25 मार्च, 1957 को रोम की संधि के तहत छः यूरोपीय राष्ट्रों-बेल्जियम, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, लक्जमबर्ग तथा नीदरलैण्ड की सहायता के साथ हुई थी। 1 मार्च, 1973 को ब्रिटेन, डेनमार्क तथा आयरलैण्ड -यूरोपीय समुदाय में शामिल हुए। 1 मार्च, 1986 को पुर्तगाल व स्पेन तथा 1995 में आस्ट्रिया, फिनलैण्ड व स्वीडन हुए। 1993 में इस समुदाय का नाम 'यूरोपीय संघ' पड़ा। 1मई, 2004 को इस समुदाय का सबसे बड़ा विस्तार हुआ, जिसमें चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, एस्टोनिया, हंगरी, लाटविया, लिथुआनिया, पोलैण्ड, स्लोवेनिया, साइप्रस गणराज्य तथा माल्टा यूरोपीय समुदाय के सदस्य बन गए। उल्लेखनीय है कि साइप्रस तथा माल्टा को छोड़कर शेष सभी देश पूर्व सोवियत संघ के घटक तथा समाजवादी (साम्यवादी) देश हैं।

 2007-08 में रोमानिया तथा बुल्गारिया भी यूरोपीय संघ में सम्मिलित हो गए। अब दस समुदाय (संघ) के 27 सदस्य देश है। टर्की भी यूरोपीय संघ में सम्मिलित होने के लिए उत्सुक है, किनतु यूरोपीय संघ के अन्य सदस्य देश इसे सन्देह की दृष्टि से देखते हैं। यूरोपीय संघ के देश ईसाई है,जबकि तुर्की मुस्लिम देश है। दोनों संस्कृतियाँ परस्पर भिन्न हैं यूरोपीय संघ की यह भी चिन्ता है कि तुर्की की तीव्र दर से बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वह यूरोपीय संघ में सम्मिलित होने पर संघ का वृहत्तम आबादी वाला देश बन जाएगा, तब यूरोपीय संघ के आन्तरिक तथा सत्ता (शक्ति) सम्बन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। विस्तार की प्रक्रिया जारी है। पाँच आधिकारिक प्रत्याशी (candidate) देश-क्रोएशिया, आइसलैण्ड मैसेडोनिया, मोंटेनेग्रो तथा तुर्की हैं। अल्बानिया, बोस्निया एवं हर्जेगोविना तथा सर्बिया को आधिकारिक तौर पर भावी प्रत्याशी माना जाता है। यूरो 17 यूरोपीय संघ देशों (बेल्जियम, एस्टोनिया, जर्मनी, यूनान, स्पेन, फ्रांस, आयरलैण्ड, इटली, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, आस्ट्रिया, पुर्तगाल, स्लोवेनिया, फिनलैंड, साइप्रस, माल्टा तथा स्लोवाकिया) की मुद्रा है।

यूरोपीय संघ की स्थापना मूलतः आर्थिक उद्देश्य से की गई थी, जिसकी प्रमुख नीतियाँ निम्नलिखित हैं-

 1.सभी सदस्य देश अपने उत्पादों को प्रशुल्क दरें (tariff) के बिना ही आपस में बेच सकते हैं।

2.व्यापारिक प्रतिष्ठान सदस्य देशों में अपने उद्योग स्थापित कर सकते हैं।

3.समुदाय के बाहर के देशों के लिए समान सीमा शुल्क तथा समान वाणिज्यिक नीति की स्थापना कर एक इकाई के रूप में कार्य होता है।

4.समुदाय के देशों के बीच व्यक्तियों, सेवाओं तथा पूँजी का स्वतन्त्र निगमन लागू होता है, जिससे कोई भी व्यक्ति अन्य सदस्य देश में अपनी सेवा तथा पूँजी निर्बाध रूप से लगा सकता है। कृषि तथा परिवहन नीति लागू है, जिससे उपभोक्ताओं के हितों का

5. सभी देशों के बीच समान संरक्षण हो सके।

6. इस गुट की एक समान मुद्रा 'यूरो' है। उपरोक्त आर्थिक एकात्मकता के विपरीत, पश्चिमी यूरोप में सामाजिक व सांस्कृतिक विखण्डन का एक लम्बा इतिहास रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध तक पश्चिमी यूरोप के देश परस्पर शत्र बने हुए थे। पश्चिमी यूरोप, जहाँ औद्योगिक क्रांति का जन्म हुआ.अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का जनक रहा.दीर्घकालिक तक राजनीतिक व सांस्कृतिक विखण्डन का अखाड़ा बना रहा। सभी यूरोपीय राष्टों ने अपनी विलग जातीय पहचान बनाए रखने का भरपूर प्रयास किया, पृथक भाषा एवं संस्कृति को भी अक्षुणण रखा।18वीं सदी में फ्रांस यद्यपि एक एकीकृत राजनीतिक इकाई था, तथापि यह अनेक रियासतों का समूह था. जिसके निजी कानून थे। 1871 तक जर्मनी एवं इटली की भी यही दशा थी। इस पृष्ठभूमि में पश्चिमी यरोप की यूरोपीय संघ रूपी वर्तमान आर्थिक एकता किसी चमत्कार से काम नहीं है। एकीकृत यूरोप के विचार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक तथा सांस्कृतिक प्रदेशवाद की है, जो सदस्य देशों की शक्ति को क्षीण कर रहा है। उदाहरणार्थ, स्पेन में केटेलोनिया जैसे स्वायत्तशासी (authonoumous) प्रान्त स्पेन की प्रभुसत्ता को चुनौती दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त, यूरोपीय संघ के भीतर सांस्कृतिक आवेग (Impetus) प्रदेशवाद, अलगाववाद तथा साष्ट्रवाद के विজ् सक्रिय हैं, जो संघ के आर्थिक हितों के विरूद्ध हैं, किन्तु इन सभी समस्याओं के बावजूद, यूरोपीय संघ दृढ़तापूर्वक विकसित हुआ है। यूरोपीय संघ ने संस्थागत समेकन के लिए नए संतिध का भी विचार प्रस्तुत किया, जिसे फ्रांस तथा नींदरलण्डस ने नकार दिया। 2007 में सन्धि के तहत कुछ सुधारात्मक प्रस्ताव भी रखे गए, जिन्हें आयरलैण्ड ने अस्वीकार कर दिया। यूरोपीय संघ वर्तमान विश्व की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है इसकी मुद्रा 'यूरो', जो 2002 से प्रचलित है, 20 देशों में प्रयुक्त होती है तथा 320 मिलियन से अधिक लोग इसका प्रयोग करते हैं। विश्व की मात्र 7% जनसंख्या वाला यूरोपीय संघ वैश्विक अर्थव्यवस्था में अत्यधिक प्रबल है। 2006 में विश्व के निर्यातों में यूरोपीय संघ का अंशदान लगभग 42% था। फार्मास्यूटिकल, इलेक्ट्रिकल सर्किट, रसायन, फर्नीचर, कागज उत्पाद, आधारभूत धातु विनिर्माण उत्पाद, प्लास्टिक तथा इंजन इसके विशिष्ट हैं। पैसेन्जर कार, दूर-संचार, मोटर-वाहन के कल-पूर्जे, विद्युत मशीनरी एवं वायुयान अन्य महत्वपूर्ण निर्यात हैं। 2006 के विश्व आयातों में भी यूरोपीय संघ का अंशदान 42% से अधिक था। यूरोपीय संघ के पूर्वी विस्तार के साथ ही, विशेषतः 2004 से आर्थिक विकास की दो समान्तर प्रवृत्तियाँ - 'यूरोपीय कारण' तथा 'वैश्वीकरण' उभरी हैं। प्रथम प्रवृत्ति एशिया के विकासशील देशों के द्वितीय वृहत्तम आपूर्तिकर्ता (जापान के बाद) के रूप में दृष्टिगोचर होती है। द्वितीय प्रवृत्ति - EU 15 (यूरोपीय संघ के 15 पुराने सदस्य देशों) तथा नए सदस्यों के बीच आन्तरिक समेकन के रूप में दर्शनीय है। इन गतिविधियों तथा प्रयासों से यूरोप में वस्तुओं तथा सेवाओं के व्यापार का विस्तार हुआ है, जिससे रोजगार में वृद्धि तथा श्रम की गतिशीलता बढ़ी है। 2006 में शेपीय संघ में रोजगार के 30 लाख नए अवसर सृजित हुए, जिससे बेरोजगारी में कमी आई है, किन्तु उल्लेखनीय तथ्य है कि यूरोपीय संघ के सभी सदस्य देश आर्थिक दृष्टि से समान रूप से लाभान्वित नहीं हुए हैं। विश्व के आर्थिक फोरम (2007-08) के वैश्विक स्पर्धा सूचकांक में 10 सर्वाधिक महत्वपूर्ण देशों में से 7 यूरोपीय संघ के हैं, जिनमें स्विटरलैण्ड, डेनमार्क, स्वीडन, जर्मनी,फिनलैण्ड, यूनाइटेड किंगडम तथा नीदरलैंड सम्मिलित हैं। यही नहीं, विश्व के 25 महत्वपूर्ण देशों 14 मेंं से देश यूरोपीय संघ के सदस्य देश हैं।

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