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यूरोप में 1830 की क्रान्तियों के कारक

यूरोप में 1830 की क्रान्ति के कारक


यूरोप में 1830 की क्रान्ति नेपोलियन को पराजित करने के बाद यूरोप की प्रतिक्रियावादी शक्तियों ने विएना काँग्रेस व पवित्र संघ, संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था के माध्यम से यूरोप में उभरती आधुनिक विचारधाराओं को दबाने का प्रयास किया। उनकी दमनात्मक कार्यवाहियों के प्रति उदारवादियों की प्रथम प्रतिक्रिया थी। इस क्रान्ति के निम्न कारण थे जुलाई-क्रान्ति में सहायक प्रमुख तत्त्व (1) चार्ल्स का प्रतिक्रियावादी शासन-चार्ल्स दशम के विचार एवं शासन की नीतियाँ प्रतिक्रियावादी थीं उसने प्राचीन परिपाटियों और संस्थाओं को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया था। उसका परिणाम यह हुआ कि जनता में उसका घोर विरोध हो गया। (2) समाचार-पत्रों पर प्रतिबन्ध-एक आदेश द्वारा यह निश्चय किया गया कि सम्राट की आज्ञा के बिना कोई भी समाचार-पत्र होगा और समाचारों को छापने से पहले शासन से उनके लिये स्वीकृति लेनी अनिवार्य होगी। 1827 ई० में समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता का पूर्णत: अन्त करने के लिये एक कानून बनाने की कोशिश की गई किन्तु चेम्बर ऑफ पीयर्स के विरोध के कारण कानून नहीं बन सका। (3) प्रवासी कुलीनों के प्रति सहानुभूति-चार्ल्स ने प्रवासी कुलीनों को पहले के समान ही सुविधायें प्रदान करने का निश्चय किया। इसके लिये उसने कई लाख फ्रैंक राज्यकोष से दिये। जागीरदारों की जागीरों की क्षतिपूर्ति हेतु एक कानून भी बनाया गया और राष्ट्रीय ऋण कर दर 5% से घटाकर 4% कर दी। इससे देश के व्यापारी एवं धनिक वर्ग में सरकार के प्रति विरोध को जन्म मिला। (4) जेसुएट्स के प्रति जन-असन्तोष-जेसुएट्स को क्रान्ति के समय गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था। किन्तु चार्ल्स दशम के सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण के फलस्वरूप उनके प्रभाव में पुनः वृद्धि होने लगी थी। असंख्य जेसुएट्स फ्रांस में वापस आकर पुनः बस गये थे और उन्होंने शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन का कार्य भी आरम्भ कर दिया था। जनसाधारण को चार्ल्स की यह नीति अनुचित प्रतीत हुई। (5) प्रोमोगनीचर बिल का विरोध-इस बिल द्वारा किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी सम्पत्ति को सब पुत्रों में बराबर बाँटने की बजाय समस्त सम्पत्ति का उत्तराधिकारी सबसे बड़े पुत्र को बनाना था। यह बिल क्रान्ति के सिद्धान्तों पर प्रहार था और इसका चैम्बर ऑफ पीयर्स में भी घोर विरोध हुआ। अत: बिल पास न हो सका। (6) बिल्ली मंत्रिमंडल की दोषपूर्ण नीतियाँ-बिल्लेल मन्त्रिमण्डल के समय समाचार पत्रों के प्रकाशन एवं समाचारों के सम्बन्ध में राजकीय नियंत्रण स्थापित कर दिया गया। चैम्बर ऑफ डिपुटीज को उसकी अवधि से 4 वर्ष पूर्व ही भंग कर दिया गया। 76 नये पियर्स ऊपर के

सदन में भर्ती किये गये। इन सब बातों से चार्ल्स के प्रति जनता में विरोध भड़क उठा। (7) राष्ट्र रक्षक सेना भंग करना-1827 ई० में चार्ल्स राष्ट्र-रक्षक सेना का निरीक्षण करने गया तो इस सेना के सदस्यों ने जेसुएट्स का नाश हो,' और 'मन्त्रियों का नाश हो' आदि नारe लगाये। इस पर चार्ल्स ने क्रोधित होकर राष्ट्र-रक्षक सेना को भंग कर दिया। इसका जनता पर बुरा प्रभाव पड़ा और राजा की मनमानी के प्रति विरोध पर ध्यान भड़क उठा। (8) चार्ल्स का हठी स्वभाव-चैम्बर ऑफ डेपुटीज के विरोध पर ध्यान न देते हए चार ने पोलिगनक को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया था। वह पादरियों के अधिकारों का समर्थक था और प्राचीन शासन व्यवस्था में उसका पूर्ण विश्वास था। डेपुटी ने बहुमत से पोलिगनक को प्रधानमंत्री पद से हटाने का अनुरोध किया, किन्तु चार्ल्स ने उनकी बात मानने के स्थान प चैम्बर ऑफ डेपुटीज को भी भंग कर दिया। इसी प्रकार इससे पूर्व उसने मर्टिगनक को योग्य और अनुभवी होते हुए भी उसके पद से इसलिए हटा दिया कि वह उदार नीति का समर्थक था। अत: चार्ल्स की हठपूर्ण नीति ने भी जुलाई-क्रान्ति में योगदान किया। (9) दमनकारी अध्यादेशों की उद्घोषणा-चार्ल्स ने 25 जुलाई 1830 ई० को चार अध्यादेश प्रकाशित कराये। इनके अनुसार, 6) राष्ट्र प्रतिनिधि सभा भंग कर दी गई, (ii) मताधिकार को सीमित और संकुचित कर दिया गया जिसके परिणामस्वरूप 45% मतदाता मताधिकार से वंचित हो गये, (ii) नये चुनावों और चैम्बर ऑफ डेपुटीज के अधिवेशनों की तिथियों की घोषणा कर दी गई, (iv) कोई भी समाचार प्रकाशित होने से पूर्व सरकार द्वारा सेन्सर कराना अनिवार्य कर दिया गया। इसका विरोध करते पीयर्स ने कहा था, "सरकार ने कानून का उल्लंघन किया है, हम इसको नहीं मानेंगे और अपने समाचार - पत्र पर थोपे गये प्रतिबन्ध की परवाह किये बिना इसको नाचेंगे हम इसका भरपूर विरोध करेंगे। (10) मरमाण्ट की सेना के कमान्डर के रूप में नियुक्ति-मरमाण्ट को फ्रांस की जनता 1814 ई० से देशद्रोही समझती थी। किन्तु चार्ल्स ने उसको पेरिस की सेना का कमाण्डर नियुक्त कर दिया। चार्ल्स के इस कार्य ने विद्रोह की चिन्गारी को बुरी तरह भड़का दिया। क्रान्ति का महत्त्व अथवा दूरगामी परिणाम (1) प्राचीन व्यवस्था की पुर्नस्थापना असम्भव-इस क्रान्ति के फलस्वरूप फ्रांस में प्राचीन व्यवस्था की पुर्नस्थापना की सम्भावना पूर्णतया नष्ट हो गई। (2) प्रतिक्रियावादियों का पतन-फ्रांस में प्रतिक्रियावादियों का पतन हो गया और उदारवादी तथा गणतन्त्रवादी दल का प्रभाव बढ़ गया। (3) कट्टर राजतंत्र वादियों का अन्त-इस क्रान्ति के फलस्वरूप केवल कट्टर राजतन्त्रवादियों का ही अन्त हो सका था, क्योंकि बूबों वंश के बाद एक दूसरे राजवंश आर्लियन्स की स्थापना कर दी गई थी। राज-सत्ता का अन्त नहीं था, केवल राजवंश क परिवर्तन हो गया था। (4) राजा के दैवी अधिकार का अन्त-इस क्रान्ति के फलस्वरूप अब फ्रांस में राजा दैवी अधिकारों की समाप्ति होने पर जनता की प्रभुसत्ता पर आधारित राष्ट्रीय संविधान और राष्ट्रीय अधिकारों की स्थापना हो गई। (5) धर्मनिरपेक्ष राज्य की नींव की स्थापना-इस क्रान्ति के फलस्वरूप फ्रांस में एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की नींव डाली गई। (6) रक्त रहित कुछ वाह्य हस्तक्षेप में रहित क्रान्ति-1830 ई० की क्रान्ति पूर्णतय रक्तहीन क्रान्ति थी। इसमें नहीं के बराबर रक्तपात हुआ और विदेशी शक्तियों का कोई भं हस्तक्षेप इस क्रान्ति में न हो सका। (7) जनता सदैव के लिए निरंकुशता से मुक्त-1830 ई० की क्रान्ति के द्वारा जनसाधारण को राजा, पादरियों और कुलीन वर्ग के अनुचित प्रभावों से सदैव के लिए मुक्त कर दिया गय था और जनता के मौलिक अधिकारों को सुरक्षित बना दिया गया। निष्कर्ष-इस क्रांति ने सन् 1789 ई० क्रान्ति के शेष कार्य को बहुतू मी दिया और एक ऐसे संवैधानिक, परिचित राजतंत्र का श्रीगणेश किया जिसमें जनता के मौलिक  अधिकारों पर विशेष बल दिया गया।

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