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सोमवार, 6 जुलाई 2020

द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख चरणों एवं उसके परिणाम

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द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख चरणों एवं उसके परिणाम


प्रथम महायुद्ध 918-19 में समाप्त हुआ था और उसके बाद 20 वर्ष का अन्तराल आया। वर्साय की सन्धि पर विचार करते हुए मार्शल फौज ने कहा था कि यह सन्धि शान्ति सन्धि नहीं बल्कि 20 वर्ष के लिये विराम सन्धि है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जो घटनाक्रम चला वह पुनः दूसरे महायुद्ध की ओर ले गया। म्यूनिख संधि जो ब्रिटेन और फ्रांस के लिये अपमानपूर्ण थी, वहीं शान्ति को स्याही रखने वाली मानी गयी राष्ट्र संघ अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के प्रयास में असफल रहा। अतः यहाँ उन तत्वों का विवेचन करना जरूरी होगा, जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध को अनिवार्य बना दिया और वे तत्व या कारण एक या दो नहीं, अनेक थे। द्वितीय महायुद्ध के कारण -

(1)वर्साय की सन्धि और जर्मनी का उच्च राष्ट्रवाद-वर्साय की सन्धि से जर्मनी का अहित हुआ था। अत: जर्मनी बदला लेने के लिये तत्पर हुआ। जर्मनी की आकांक्षाओं को नाजी कान्ति से बल मिला। हिटलर ने जर्मनी का अनिवार्य सैनिकीकरण कर दिया। उसने आस्ट्रिया का अपहरण कर लिया। चेकोस्लोवाकिया को निगल गया। हिटलर की नीतियों अर्थात् उग्र

राष्ट्रवाद (जर्मन) ने महायुद्ध को अनिवार्य कर दिया। अर्थात् द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए एडोल्फ हिटलर प्रमुख रूप से उत्तरादायी है इस बात को नकारा नहीं जा सकता है।

(2) तानाशाहों का उत्कर्ष-इस समय कई देशों में तानाशाहों का उत्कर्ष हुआ जिनके कार्यों और उग्र नीति ने द्वितीय महायुद्ध को अनिवार्य बना दिया। जर्मनी में हिटलर तानाशाह बन गया, इटली में मुसोलिनी। रोम-बर्लिन-टोकियो पुरी ने यूरोप की राजनीतिक स्थिति को संकटमय बना द्वितीय विश्व युद्ध को अनिवार्य बना दिया।

(3) अल्पसंख्यक जातियों में असन्तोष-अनेक देशों में अल्पसंख्यक जातियों के बीच तीव्र असन्तोष बढ़ता गया। हिटलर ने इस असन्तोष का पूरा लाभ उठाया। उसने पश्चिमी शक्तियों से सौदेबाजी की। 'अल्पसंख्यकों पर सुशासन की आड़ में उसने आस्ट्रिया और सूडान प्रदेश पर बलपूर्वक कब्जा कर लिया, तत्पश्चात् उसने पोलैंड पर हमला बोल दिया।

(4) राष्ट्रों के विभिन्न स्वार्थ-आर्थिक सम्प्नता की होड़, बाजारों की खोज, कच्चे माल प्राप्त करने की सुविधा आदि ने विभिन्न राष्ट्रों में पारस्परिक संघर्ष को प्रोत्साहन दिया। प्रत्येक राष्ट्र अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर कार्य करने लगा।

(5) विश्व का दो गुटों में विभाजन-विश्व दो गुटों में बँट गया था। एक तरफ जर्मनी, इटली और जापान जैसे राष्ट्र थे जो वर्साय संधि के विरोधी तथा अधिनायकवाद के समर्थक थे। अत: इन तीनों ने मिलकर रोम-बर्लिन-टोक्यो धुरी का निर्माण कर लिया। दूसरी ओर मित्र राष्ट्रों का सुदृढ़ संगठन था। प्रत्येक गुट विश्व पर हावी होना चाहता था। अतएव युद्ध का भड़क उठना स्वाभाविक ही था।

(6) राष्ट्रसंप की असफलता-राष्ट्र संघ की स्थापना अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिये हुई थी। शुरू में इसने फिनलैंड, स्वीडन, इटली और यूनान के बीच संघर्ष का निबटारा भी किया बाद में इसकी साख घटती चली गयी। यूरोपीय देशों में एक-दूसरे के विरुद्ध इतने राजनीतिक और सैनिक संगठन हुए कि उनसे सम्पूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण विषाक्त हो गया राष्ट्रों में शस्त्रों की होड़ को राष्ट्र संघ दया नहीं सका। ऐसा समझा जाता है कि यदि राष्ट्र संघ सफल हो जाता तो शायद युद्ध टल जाता।

(7)निःशस्त्रीकरण की सफलता-निःशस्त्रीकरण वर्माय सन्यि के अन्तर्गत वह पोजना थी जिसे जर्मनी को पूर्ण रूप से शक्तिहीन रखने के लिये प्रयुक्त किया गया था। 1936 तक तो अनेक राष्ट्रों ने युद्ध की ऐसी तैयारी कर दी थी कि वे निःशस्त्रीकरण की बात भी सुनने को तैयार नहीं थे। चारों ओर ऐसा वातावरण उत्पन्न हो गया कि निकट भविष्य में युद्ध अनिवार्य दिखायी देने लगा।

(8) मित्र राष्ट्रों के आन्तरिक मतभेद-मित्र राष्ट्रों के पारस्परिक मतभेदों ने जर्मनी और इटली की शक्ति के विकास में बड़ा योगदान दिया क्षतिपूर्ति की समस्या पर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये थे और हिटलर के कदम से ब्रिटेन और फ्रांस ने तुष्टीकरण की नीति अपनायी। फलस्वरूप मित्र राष्ट्र के विरुद्ध कोई कार्यवाही न कर सके। इन सब बातों का परिणाम यह हुआ कि विश्व एक बार फिर पहले से भी भयंकर महायुद्ध की चपेट में आ गया।

(9) इटली और जापान का उग्र राष्ट्रवाद और सैन्यवाद जर्मनी की भौति इटली और जापान भी उग्र राष्ट्रवाद और सैन्यवाद के कट्टर अनुयायी थे मुसोलिनी युद्ध का पुजारी था। इन तीनों धुरी-राष्ट्रों के सैनिक राष्ट्रवाद ने अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में घोर संकट उपस्थित कर दिया और अंतर्राष्ट्रीयवाद की शक्तियों को पीछे ढकेल दिया इन सब घटनाओं का परिणाम द्वितीय महायुद्ध के विस्फोट के रूप में हुई।

(10) स्पेन का गृहयुद्ध और धुरी राष्ट्रों द्वारा समर्थन-जनरल फ्रांको ने 1936 में स्पेन का गृह-युद्ध प्रारम्भ कर दिया। इसमें ब्रिटेन और फ्रांस तटस्थ रहते हुए भी गुप्त रूप से जनरल फ्रांस के प्रति सहानुभूति रखते थे। उन्होंने उदारवादी गणतन्त्र सरकार को कोई उल्लेखनीय सहायता नहीं दी। दूसरी ओर हिटलर और मुसोलिनी ने फ्रांको को खुलकर सक्रिय सहयोग दिया। इसके फलस्वरूप 1939 में स्पेन का प्रजातन्त्र ढह गया और वहाँ फ्रांको की तानाशाही सरकार स्थापित हो गयी। फ्रांस की इस विजय से फासिस्ट राष्ट्रों को बल मिला। ये ब्रिटेन और फ्रांस की कमियों को कोरी गीदड़ भभकी समझने लगे।

(11) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संकट-1930 के महान् आर्थिक संकट ने प्रत्येक देश को प्रभावित किया। इस आर्थिक संकट के फलस्वरूप राष्ट्रों में नि:शास्त्रीकरण की भावना लुप्त हो गयी और वे शस्त्रों की होड़ में लग गये।

12) तात्कालिक कारण-द्वितीय महायुद्ध के लिये उपरोक्त सब कारणों से बारूद का महल खड़ा हो चुका था, केवल उसमें चिंगारी लगाने की देर थी। यह कार्य पोलैंड पर जर्मन आक्रमण से हो गया। 1 सितम्बर, 1939 को हिटलर ने अचानक पोलैंड पर चढ़ाई कर दी। सितम्बर को ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी को युद्ध बन्द करने की चेतावनी दी थोड़े ही समय में युद्ध ने इतना भीषण रूप धारण कर लिया कि वह एक भयानक महायुद्ध हो गया। येक कारणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि युद्ध अवश्यम्भावी हो गया था और, सो वह हआ।

 घटनायें- कई इतिहासकारों ने युद्ध की गतिविधियों को 5 चरणों में बाँटा है-प्रथम चरण-1 सितम्बर, 1939 से 21 जून, 1941। इसमें जर्मनी ने पोलैंड,नार्वे, डेनमार्क, नीदरलैंड,बेल्जियम,लक्जमवर्ग, फ्रांस, ब्रिटेन, यूनान तथा क्रीट पर आक्रमण किया। द्वितीय चरण-22 जून, 1941 से 6 दिसम्बर, 1941 तक। इसमें धुरी-राष्ट्रों का अफ्रीका का अमेरिका पर तथा जर्मनी का रूस पर आक्रमण हुआ। तृतीय चरण-7 दिसम्बर, 1941 से 7 नवम्बर, 1942 तक। इसमें जापान का पर्ल हार्बर पर आक्रमण तथा त्रि-राष्ट्रों के सैन्य बल पर नीदरलैंड, ईस्ट इण्डीज तथा उत्तरी काकेशस पर अधिकार हुआ। चतुर्थ चरण-8 नवम्बर, 1942 से 6 मई, 1945 तक। इसमें फ्रेंच उत्तरी अफ्रीका पर अमेरिका का आक्रमण हुआ तथा जर्मनी ने आत्म-समर्पण किया। पंचम चरण-7 मई, 1945 से 14 अगस्त, 1945 तक। इसमें जापान ने आत्म-समर्पण किया। द्वितीय महायुद्ध के प्रभाव एवं परिणाम- द्वितीय महायुद्ध लगभग 6 वर्ष तक चला। इसके विभिन्न प्रभावों और परिणामों को निम्नलिखित रूप में वर्णित किया जा सकता है-

 (1) विनाश-महायुद्ध काल में दोनों पक्षों को अपार क्षति उठानी पड़ी। युद्ध काल में कुल मिलाकर लगभग 2 करोड़ 20 लाख व्यक्ति मरे, तथा 3 करोड़ 30 लाख घायल हुए। युद्ध पर कई पदम् डालर खर्च हुए और इतने ही की सम्पत्ति नष्ट हुई। करोड़ों असैनिक नागरिकों का जीवन बम-वर्षा आदि से नष्ट हो गया। महायुद्ध ने ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, जर्मनी, इटली, रूस आदि बड़े राष्ट्रों की अपार क्षति तो की ही, और छोटे-छोटे राष्ट्रों को भी भारी नुकसान पहुँचाया। अकेले पोलैंड के ही 60 लाख व्यक्ति मारे गये। तटस्थ स्वीडन को भी युद्ध से पीड़ित होना पड़ा। लगभग । लाख 27 हजार फिनलैंड निवासियों को प्राणों से हाथ धोना पड़ा। संक्षेप में, द्वितीय महायुद्ध ने सम्पूर्ण संसार पर विनाश की कालिमा पोत दी। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में निराशा और अव्यवस्था व्याप्त हो गयी।

2) सामाजिक-आर्थिक प्रभाव-सर्वसाधारण के लिये अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करना एक कठिन समस्या बन गयी। मजदूरों का मिलना कठिन हो गया ।स्त्रियों ने खान खोदना और सरकारी कार्यालयों में काम करना शुरू किया। वस्त्र और खाद्य पदार्थों पर नियन्त्रण लगाया गया। विश्व के सम्पूर्ण राष्ट्रों को अमेरिका से माल मैंगाना पड़ा। अमेरिका में औद्योगिक विकास पूर्ण रूप से हुआ था पूंजीवाद का उदय हुआ। इस प्रकार दो गुट हो गये-पूंजीवाद जिसका प्रमुख समर्थक अमेरिका बना और (ii) साम्यवादी जिसका प्रमुख समर्थक रूस बना।

(3) विज्ञान पर प्रभाव-द्वितीय महायुद्ध में इन्जीनियरों ने कुछ ही घण्टों में सैनिक पुल बना डाले, तेल के नल इंग्लिश चैनल के नीचे बिछा दिये, जंगलों को हवाई अड़ों में बदल डाला और आत्मिक ख्चीली सैनिक सड़कों को बनाने के लिये बड़ी बड़ी बाधाओं को जीत लिया। डी०डी०टी०, सल्फा और पेनिसिलिन जाद किया गया।

(4) साम्राज्यों के अन्त की प्रक्रिया परिस्थितियों से बाध्य होकर महायुद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य मे अपनी नीति में परिवर्तन करके भारत, बर्मा, पाकिस्तान, मलाया, मिस आदि देशों को स्वतंत्रता प्रदान की। बाद में अनेक अफ्रीकी देशों को भी स्वतन्त्रता मिली। फ्रांसीसी हिन्द-चीन में फ्रांस का साम्राज्यवाद समाप्त हो गया। कम्बोडिया, लाओस और वियतनाम (दो भागों में) स्वतंत्र हो गये। थाईलैंड के उपनिवेशों-जावा, सुमात्रा, बोर्नियो आदि ने हिन्देशिया नामक संघ राज्य की स्थापना की तथा स्वतन्त्रता प्राप्त की। मूल द्वीपों और सभी परव्ती छोटे-छोटे द्वीपों पर ही जापान की सम्प्रभुता शेष रही। इटली भी अपने औपनिवेशिक साम्राज्य से वंचित कर दिया गया।

(5) इटली में प्रजातन्त्र की स्थापना-इटली ने सर्वप्रथम अपनी पराजय स्वीकार की। एक तरफ इटली में साम्यवाद का उदय हुआ था दूसरी तरफ इटली में लोकतन्त्रीय सरकार स्थापित करने के लिये दलबन्दी का जन्म हुआ मित्र राष्ट्र के सहयोग से साम्यवादी दल की पराजय हुई और प्रजातन्त्र सरकार की स्थापना हुई।

(6) जर्मनी का विभाजन-विश्व युद्ध का सारा दोष जर्मनी पर पड़ा। सम्पूर्ण जर्मन राष्ट्र को इंग्लिश, प्रेस, रूस और अमेरिका में विभक्त कर दिया गया। यह विभाजन अन्तर्राष्ट्रीय कलह का कारण बन गया।

(7) रूस और अमेरिका का शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उदय-युद्ध ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब संसार में दो ही महान् शक्तियाँ रह गयी हैं-सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका। सोवियत संघ साम्यवादी विचार की विजय का प्रतीक बना और संयुक्त राज्य अमेरिका लोकतन्त्रवादी आंकाक्षाओं का। संयुक्त राज्य अमेरिका ही संसार में एकमात्र ऐसा देश था जिसे युद्ध केवल नगण्य हानि पहुँचा सका था।

(৪) विभिन्न शान्ति सन्धियाँ-विभिन्न देशों के साथ युद्धकालीन समस्यायों के समाधान के लिये शान्ति सन्धियाँ सम्पन्न हुई। इनका क्रम महायुद्ध के समाप्त होने के वर्षों बाद तक चलता रहा।

(9) संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना-विश्व को शांति से मुक्त रखने के उपायों पर राजनेताओं ने पुनर्विचार किया। एक बार फिर लोकतान्त्रिक देशों ने शान्ति की खोज के प्रयास किये और 24 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना कर दी गयी। निष्कर्षतः द्वितीय महायुद्ध का प्रभाव विश्व के सभी राष्ट्रों पर पड़ा। उन देशों पर भी गहरा प्रभाव पड़ा जो इस युद्ध में तटस्थ रहे। इस युद्ध के परिणामस्वरूप शक्ति सन्तुलन ब्रिटेन के हाथ से निकल कर अमेरिका के हाथ में पहुँच गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बीच विज्ञान ने अणुवम जैसे विध्वंसकारी शस्त्रों का निर्माण किया जिससे सम्पूर्ण मानव जाति को बहुत अधिक हानि उठाने पटी टायनबी ने ठीक हो लिखा- उग्र राष्ट्रवादिता मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जिसका 2 सर्य तक दुरुपयोग किया गया और जिसके फलस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध हुआ।"

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