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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

धर्म से आपका क्या अभिप्राय है

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 धर्म से आपका क्या अभिप्राय है


 अर्थ एवं परिभाषा-धर्म शब्द आंग्ल भाषा के "रिलीजन शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। रिलीजन शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के 'Religio' शब्द से हुई है जो कि स्वयं धातु से निकला है। जिसका अभिप्राय बांधने से है। दूसरे शब्दों में किसी "अलौकिक' या "समाजोपरि' या "अति-मानवीय शक्ति' पर विश्वास करने को ही धर्म कहते हैं। किन्तु विश्वास करने पर ही एक मात्र धर्म आधारित नहीं होता बल्कि विश्वास का एक"भावात्मक आधार भी होता है अर्थात् उस शक्ति के प्रति भय, श्रद्धा प्रेम इत्यादि भाव भी रहते हैं। इसके अतिरिक्त धर्म के अन्तर्गत एक सांसारिक पक्ष भी निहित रहता है अर्थात् उस अलौकिक शक्ति से लाभ उठाने तथा उसके कोप से बचने के लिये प्रार्थना या पूजा की अनेक विधियों या संस्कारों को भी करना पड़ता है। हाँ यह बात अवश्य है कि विभिन्न समाजों में अलौकिक शक्ति का स्वरूप अलग-अलग होता है तथा इस शक्ति की आराधना करने के लिये जो संस्कार किये जाते हैं, उनमें प्रयुक्त "धार्मिक सामग्रियों', धार्मिक प्रतीकों', पौराणिक कथाओं, जादू-टोनों इत्यादि में अन्तर होता है। इस प्रकार धर्म का तात्पर्य किसी अलौकिक या समाजोपरि या अति मानवीय शक्ति, जिस प्रायः हम ईश्वर कहते हैं, पर विश्वास से है जिसका आधार भय, श्रद्धा, भक्ति, प्रेम इत्यादि की भावनाच होती है तथा जिसकी अभिव्यक्ति प्रार्थना या आराधना करने को विधियों या संस्कारों में होती है।

टायलर के अनुसार,"धर्म का अर्थ किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास करना है।"

फ्रेजर के अनुसार, "धर्म से हमारा तात्पर्य मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि करना अथवा पूजा करना है जिनके बारे में व्यक्तियों का यह विश्वास है कि वे प्रकृति और मानव जीवन की मार्ग दिखाती है तथा उन्हें नियन्त्रित करती है। मैलीनॉस्की के अनुसार, "मैजिक, साइंस, रिलीजन एण्ड अदर ऐसेज में धर्म के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दोनों पक्षों को महत्वपूर्ण बताते हैं और कहा है कि "धर्म क्रिया को विधि और विश्वासों की व्यवस्था है।

धर्म की विशेषताएँ 

(1) अलौकिक शक्ति में विश्वास-भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहां के निवासी अलौकिक शक्तियों में विश्वास करते हैं। समाज में इस अलौकिक शक्ति को साकार माना जाता है। व्यक्ति अपनी भौतिकवादी प्रवृत्ति के कारण इस शक्ति की आराधना करता है। इसके अतिरिक्त वह प्राकृतिक आपदाओं से बचने हेतु भी अलौकिक शक्तियों की आराधना करता है।

(2) धार्मिक क्रिया-समाज में कुछ ऐसी क्रियाओं को सम्पादित किया जाता है जो धर्म से सम्बन्धित होती है। ये क्रियाएं साधारणतया धार्मिक कर्मकाण्डों के रूप में देखने को मिलती है जिनका प्रचार धार्मिक पुरोहितों कार्यों अथवा मुल्लाओं के द्वारा होता है। व्यक्ति सामूहिक रुप से इन क्रियाओं को करते हैं, अपने पापों का जोर-जोर से वर्णन करते हैं और उनके लिए ईश्वर से क्षमा-याचना करते है। तरह-तरह के नृत्य, भाव, शारीरिक कष्टों और कर्मकाण्डों के द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं और दुर्गम स्थानों की यात्रा करके अपने विश्वास को प्रकट करते हैं। इन धार्मिक क्रियाओं में किसी भी तरह के परिवर्तन को धर्म की अवहेलना करना समझा जाता है और इसीलिए सामान्यतया धर्म के रूप में बहुत समय तक कोई परिवर्तन नहीं हो पाता।

(3) स्वधर्म श्रेष्ठ-धर्म की एक प्रमुख विशेषता यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म को उच्च स्थान देता है। व्यक्ति अपने धर्म को सबसे अधिक मौलिक,सच्चा और प्रगतिशील मानता है सभ्य से सभ्य समाज भी इस धोखे से नहीं बच सका है और इसीलिए वे निर्बल समूहों का शोषण करके उन पर अपना धर्म लादने का हर संभव प्रयत्न करता है। संसार में अनेक युद्ध धार्मिक कारणीं से लड़े गये। जो व्यक्ति स्वधर्म के साथ अन्य दल को श्रेष्ठ बताता है, वह धर्म विरोधी समझा जाता है।

(4) पौराणिक कथाएं- पौराणिक कथाएं छोटी-छोटी कहानियां और उपाख्यानों के रूप में मनुष्य और ईश्वरीय शक्ति के पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट करती हैं। इन गाथाओं की रचना स्वयं ईश्वर दारा मानी जाती है और एक धर्म को मानने वाले सभी व्यक्तियों को इनमें विश्वास करना सिखलाया जाता है। सामान्यतया पौराणिक गाथाएं इतनी मनोवैज्ञानिक और अचम्भित कर देने वाली होती हैं कि व्यक्ति इसके द्वारा अलौकिक शक्ति में सहज ही विश्वास करने लगता है।

अयोग्यता अथवा महत्व-समाज में धर्म की बड़ी उपयोगिता है जिसका विवरण निम्नलिखित है

(1) सामाजिक संघर्षों पर नियंत्रण-धर्म समाज को एकता के रूप सूत्र में बांधने का कार्य करता है। धर्म प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्तव्यों की याद दिलाता है तथा व्यक्ति के सामने त्याग, सेवा, सच्चाई, ईमानदारी और भाई-चारे की भावना पैदा करता है। जिसके कारण समाज में वैमनस्व नहीं फैलने ता है और संघर्ष की स्थिति कम हो जाती है।

(2) मानव व्यवहारों पर नियंत्रण-धर्म मानव व्यवहारों पर नियंत्रण रखता है क्योंकि धर्म है नियंत्रण का एक ऐसा साधन है, जिसे व्यक्ति हृदय से स्वीकार करता है और किसी भी दशा में इसका त उल्लंघन करने का प्रयत्न नहीं करता है। धार्मिक नियम मनुष्य को विश्वास दिलाते हैं कि सभी देवताओं और शासकों के क्रोध से बचने का एकमात्र उपाय धार्मिक नियमों का पालन करना हो है। व्यक्ति धर्म के नियन्त्रण को इसलिए भी मानता है क्योंकि धर्म का पालन ही उसे अमरत्व दिला सकता है। धार्मिक विश्वास ने स्वर्ग और नरक की धारणा के द्वारा बहुत से पापी और लुटेरों को सज्जन व्यक्तियों में बदल दिया। व्यक्ति चाहे कितना भी धनी हो अथवा निधन, क्रूर हो या दयालू, परलोक की धारणा सभी को | एक-न-एक दिन अच्छे मार्ग की ओर ले जाती है। धर्म के अन्दर "स्वर्ग का न्यायालय' सभी को समाज द्वारा मान्यता प्राप्त कार्यों को करने की प्ररणा देता और "ईश्वरीय न्याय' का विश्वास सभी व्यक्तियों को अच्छे कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है। सभी व्यक्ति जीवन में शान्ति और सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। इसलिए सभी व्यक्ति धर्म के आदेशों का पालन करके अपने व्यवहारों को नियन्त्रित रखते हैं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि प्रत्येक परिस्थिति में व्यक्तियों के व्यवहारों को समाज के नियमों के अनुकूल बनाने में धार्मिक विश्वास महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

अनुउपयोगिता-धर्म की उपयोगिता का अध्ययन करने के पश्चात इसकी अनुपयोगिता पर ध्यान दिया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। प्रत्येक समाज में धर्म का एक अलग महत्व है। व्यक्ति धर्म को अपनी आत्मा (हृदय) से समीकृत करता है। एक समाज में कई धर्मों के लोग निवास करते हैं। इन विभिन्न धर्मों के मानने वालों के मध्य कभी-कभी वैचारिक मतभेद भी पैदा हो जाते हैं, जिसके कारण एक संघर्ष छिड़ जाता है, जो धीरे-धीरे विकराल रूप धारण कर लेता है। विश्व में ऐसे अनेकी संघर्ष हुए हैं जिनके मूल में धर्म ही था। उदाहरण स्वरूप हम यूरोप में ईसाई कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट धर्म के संघर्ष की चर्चा यहां कर सकते हैं। इसके साथ ही भारत में अयोध्या मंदिर प्रकरण को भी इसका एक ज्वलंत उदाहरण माना जा सकता है। अत: इस स्थिति में हमें धर्म की भावना को छोड़का सामाजिक भाई-चारे की भावना की आवश्यकता होती है, जिसे धर्मिक भावनाओं के होते हए नहीं पाया जा सकता है।

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