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रविवार, 12 जुलाई 2020

दासता परिवार सम्पत्ति तथा राज्य की उत्पत्ति के सन्दर्भ में अरस्तु के विचार

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दासता परिवार सम्पत्ति तथा राज्य की उत्पत्ति के सन्दर्भ में अरस्तु के विचार 

दासता-संबंधी दृष्टिकोण (विचार)- दास प्रथा यूनानी सभ्यता की बुनियाद थी। उसके विकास की विभिन्न अवस्थाओं में दासों का महत्वपूर्ण भाग था। नगर-राज्यों के नागरिकों को विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उत्पादन का सारा कार्य नासा के द्वारा किया जाता था। यद्यपि कुछ सोफिस्ट विचारकों ने मानव समानता के सिद्धान्त का प्रतिपादन कर इसका विरोध किया था किन्तु अरस्तू ने अपनी रूढ़िवादिता के कारण इसका समर्थन किया। उसकी यह मान्यता थी कि प्राकृतिक दृष्टि से कुछ लोगों के लिए दासत्व अच्छी और न्यायपूर्ण स्थिति है अतः: वह दास-प्रथा का समर्थन करते हुए उसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करता है:

(1) दास-प्रथा एक प्राकृतिक संस्था है- अरस्तू के अनुसार दास-प्रथा प्रकृति प्रदत्त है क्योंकि हमें सर्वत्र यह प्राकृतिक नियम दृष्टिगोचर होता है कि उत्कृष्ट निकृष्ट पर शासन करता है। पुरुष-पुरुष में असमानता प्रकृति का नियम है। कुछ व्यक्ति शासक के रूप में जन्म लेते हैं और कुछ शासित के रूप में कुछ आदेश देने के उद्देश्य से जन्म लेते हैं और कुछ आदेश पालन के उद्देश्य से। जो आदेश देते हैं वे स्वामी होते हैं और जो आदेश का पालन करते हैं वे दास होते हैं।

(2) दास-प्रथा स्वामी तथा दास दोनों के लिए हितकारी है- अरस्तू के अनुसार दास-प्रथा दोनों पक्षों अर्थात् स्वामी हरिदास दोनों के ही लिए उपयोगी और हितकारी होती है। विवेकपूर्ण स्वामियों के लिए दास आवश्यक होते हैं क्योंकि उनकी सहायता से अपने बौद्धिक और नैतिक गुणों सद्गुणों का विकास कर सकें। दास-प्रथा दास के हित में होती है। दास एक विवेकहीन प्राणी होता है। उसकी स्थिति बच्चे के समान होती है। अगर बच्चे को माँ-बाप का संरक्षण प्राप्त न हो तो वह बहुत से ऐसे कार्य भी कर सकता है जो उसका अहित कर सकते हैं। ठीक उसी तरह डांस भी एक विवेक-शून्य प्राणी होने के नाते अगर उसे स्वामी का संरक्षण प्राप्त नहीं हो तो बहुत से ऐसे कार्य कर सकता है जो उसका अहित कर सकता है। इस प्रकार अरस्तू स्वामी हरिदास दोनों के लिए दास-प्रथा को उपयोगी 44 सिद्ध करता है और उसे अनिवार्य बनाता है। उसका कथन है कि, "शरीर के अलग होने पर भी दास स्वामी के शरीर का अंग है।"

(3) नैतिक दृष्टिकोण (Moral point of view)- स्वामी का नैतिक स्तर उच्च और दास का नैतिक स्तर निम्न होता है। अत: उसका नैतिक स्तर उच्च तभी हो सकता है जबकि वह स्वामी के संसर्ग में रहे और उसकी आज्ञा के अनुसार अपने नैतिक जीवन का संचालन करे। उपर्युक्त आधारों पर अरस्तू यह निष्कर्ष निकालता है कि "दासता न केवल आवश्यक है यल्कि सामयिक अनिवार्यता भी है।"

(4) दास-प्रथा को मानवीय बनाने के संबंध में निर्देश -दास-प्रथा का समर्थक होते हुए भी अरस्तू उसके क्रूर स्वरूप का समर्थक नहीं है। वह उसे कुछ ऐसे मानवीय आधारों पर आधारित करना चाहता है जिससे कि उसकी क्रूरता और दोषों को कम किया जा सके और उसे अधिकाधिक मानवीय बनाया जा सके। इस दृष्टि से वह उसके निम्नलिखित आधार निश्चित करता है:

1. अरस्तू की मान्यता है कि स्वामी और दास दोनों के हित समान हैं। अतः स्वामी को अपनी उच्च स्थिति का कभी गलत प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा उसे दास के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए और उसकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना चाहिए।

2.वह दूसरा आधार प्रस्थापित करते हुए कहता है कि सभी दासों को स्वतन्त्रता प्राप्ति का अवसर उपलब्ध होना चाहिए ताकि वे समय होने पर उससे मुक्त हो सकें।

3. आवश्यकता से अधिक दासों को रखने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। अतः उनकी संख्या सीमित की जानी चाहिए।

4.अरस्तु की मान्यता है कि दासता का आधार प्राकृतिक है, वैधानिक नहीं और न वह वंश के अनुसार चलती है यह आवश्यक नहीं है कि दास की संतान दास हो हो। यदि उसमें विवेक शक्ति है तो उसे दासता से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति तथा व्यक्ति के बौद्धिक एवं नैतिक विकास के लिए सम्पत्ति आवश्यक एवं अपरिहार्य है परन्तु इसका न आवश्यकता से अधिक संग्रह और न ही इसकी अप्राकृतिक साधनों चाहिए। से प्राप्ति होनी चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि इसे सीमित होना चाहिए। निजी सम्पत्ति का औचित्य -अरस्तू ने निम्नलिखित आधारों पर निजी सम्पत्ति का औचित्य प्रतिपादित किया है।-

1.निजी हितों की पूर्ति के लिए व्यक्ति कठिन परिश्रम करता है और ऐसा कर वह पूरे समाज को लाभ पहुंचाता है। निजी सम्पत्ति से व्यक्ति की प्रगति होती और अन्ततः समाज प्रगति करता है।

2. सम्पत्ति-प्राप्ति की प्रवृत्ति प्राकृतिक है।

3. परिवार के अस्तित्व और उसके सुचारु संचालन के लिए निजी सम्पत्ति आवश्यक एवं अपरिहार्य है।

4. अच्छे जीवन तथा उदारता, स्वतंत्रता एवं अतिथि सत्कार जैसे गुणों के विकास के लिए भी व्यक्तिगत सम्पत्ति आवश्यक है।

5. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी व्यक्तिगत सम्पत्ति अपरिहार्य है। सभी व्यक्ति इससे प्रेम करते हैं। राज्य-सम्बन्धी दृष्टिकोण (विचार)-"Politics' की प्रथम पुस्तक में अरस्तु ने राज्य-संबंधी विचारों को वर्णित किया है?

राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अरस्तू ने राज्य को एक प्राकृतिक संस्था माना है। कृत्रिम नहीं। अरस्तू ने कहा भी है, "राज्य की उत्पत्ति की प्रथम इकाई मनुष्य है। मनुष्य प्रकृति से हो राजनैतिक प्राणी है और वह प्राणी जो समाज से बाहर रहता है वह या तो पशु है अथवा देवता।"

इससे स्पष्ट होता है कि मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये संस्थाओं की रचना करता है। राज्य भी इन्हों संस्थाओं में से एक है। वह अन्य संस्थाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है क्योंकि अन्य संस्थाएँ केवल एक ही आवश्यकता की पूर्ति करती है किन्तु राज्य व्यक्ति को अच्छा बनाने का कार्य करता है और इस प्रकार वह व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन तथा समस्त संस्थाओं को ही अपने क्षेत्र में सम्मिलित कर लेता है। राज्य की उत्पत्ति मनुष्य के विकास का ही परिणाम है जो उसकी जीवन रक्षा एवं नस्ल के विस्तार तथा मिल-जुलकर रहने की प्रवृत्ति और सामान्य हित की आकांक्षा के कारण प्राकृतिक रूप में विकसित हुआ। राज्य के विकास में परिवार प्रथम इकाई है। जिसमें मनुष्य अपने अस्तित्व को बनाये रखने और अपने वंश का विस्तार करता है। परिवार में इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये स्वामी हरिदास का सम्बन्ध होता है जो जीवन धारण करने के लिये आवश्यक है, दूसरे पति-पत्नी का सम्बन्ध वंश बढ़ाने के लिये आवश्यक है। इस प्रकार परिवार राज्य के विकास क्रम की प्रथम संस्था है। परिवार एक समुदाय है जिसमें सदस्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये एकत्रित होते हैं और आपस में सहयोग जीवन व्यतीत करते हैं। राज्य की उत्पत्ति के विकास मार्ग में दूसरी प्राकृतिक संस्था ग्राम है। जय परिवार का स्वरूप बढ़ जाता है, एवं आवश्यकता भी बद जाती है, तो गाँवों का स्वरूप आ जाता है। राज्य के विकास की अन्तिम अवस्था स्वतः राज्य ही है। अपने आत्मनिर्भर गाँव मिलकर राज्य का निर्माण करते हैं क्योंकि राज्य में व्यक्ति का सर्वाधिक कल्याण हो सकता है। राज्य की प्रकृति अथवा राज्य का स्वरूप एवं उसकी विशेषताएं-राज्य एक प्राकृतिक संस्था है। राज्य की उत्पत्ति का भाव मानव प्रकृति में ही निहित रहता है। प्रकृति शब्द से यह तात्पर्य है कि राज्य विकास के पौधे की तरह होता है।

अरस्तू के अनुसार राज्य की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

(1) राज्य एक प्राकृतिक समुदाय है- प्लेटो एवं अरस्तू से पूर्व सोफिस्ट राज्य को कृत्रिम मानते थे। उसके अनुसार मनुष्य डर से कानून का पालन करता है एवं राज्य कुटुम्ब में शनैः शनैः विकास का परिणाम है। अरस्तू के अनुसार-'राज्य मानवीय आवश्यकताओं पर आधारित मानव समुदाय के बढ़ते हुए घेरे की चरम परिणति है।

(2) राज्य मनुष्य का पूर्ववर्ती है- राज्य मनुष्य के विकास का आखिरी दायरा है। कार्यक्रम की दृष्टि से व्यक्ति पहले था और राज्य सबसे अन्त में किन्तु ऐतिहासिक सम्बन्ध की दृष्टि से राज्य को परवर्ती मानते हुए भी अरस्तू तर्कसम्मत सम्बन्ध की दृष्टि से उसे पूर्ववर्ती मानता है।

(3) राज्य का सावयव स्वभाव- अरस्तू राज्य को एक सावयव की भाँति मानता है। उनके अनुसार राज्य एक संपूर्ण है और उसके सदस्य उसके अंग हैं। जिस प्रकार मानव शरीर में उसके मूल अंग होते हैं जैसे हाथ, पैर, नाक, कान, आँख आदि तथा कुछ प्रभावोत्पादक तत्व जैसे खून आदि होता है इसी प्रकार राज्य में सैनिक, न्यायिक आदि मूल अंग होते हैं। अरस्तू कहता है कि राज्य का विकास एवं सावयवी की भाँति होता है। राज्य के प्रत्येक (अंग नागरिक) अपना कर्तव्य निभाते हैं, अपना क्व्य करते हुए वे राज्य पर निर्भर रहते हैं। राज्य से प्रथम उनका कोई अस्तित्व नहीं होता।

(4) राज्य सर्वोच्च समुदाय- अरस्तू के अनुसार यह सामयिक विकास का चरम रूप है। कुटुम से आरम्भ होने वाला विकास नगर राज्य के रूप में परिपूर्णता को प्राप्त करता है, इसके विकास में ही बाकी संस्थाओं का विकास निहित है अरस्तू के अनुसार 'State Is a spiritual association in a normal life | अतः यह सर्वोच्च संस्था है। आइंस्टीन के अनुसार, 'अरस्तू ने अपने इस विचार के आधार पर राज्य की जैविक धारणा की नींव रखी।

(5) राज्य अन्तिम एवं पूर्ण संस्था- अरस्तू सब वस्तुओं के विषय में आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा को पहुँचा हुआ कहता है। राज्य के बाद (राज्य का) कोई अन्य रूप नहीं रहता आज के विश्व राज्य की उसे कल्पना नहीं थी।

(6) राज्य में बहुत्त्व- अरस्तू राज्य की एकता से सहमत नहीं है। उसका कहना है कि राज्य में यदि अधिक एकता होगी तो वह राज्य ही नहीं रहेगा। वस्तुतः राज्य का स्वरूप बहुत्त्व में ही है। वास्तव में राज्य में अनेकता में एकता रहती है।

(7) राज्य का आधार न्याय है- न्याय मनुष्य की विवेक बुद्धि पर आधारित होता है। विवेक प्राकृतिक गुण है जो मनुष्य को अन्य जीवधारियों से भिन्नता प्रदान करता है। अत: यह स्पष्ट है कि प्रकृति ही मनुष्य के राजनैतिक प्राणी बनने के लिये उत्तरदायी है। मनुष्य के विवेक पर आधारित होने के कारण राज्य की प्राकृतिक संस्था है।

(8) राज्य का उद्देश्य और कार्य- अरस्तू ने 'Politics में लिखा है- "राज्य की सत्ता उत्तम जीवन के लिये है न कि केवल जीवन व्यतीत करने के लिये। पालिटिक्स की तीसरी पुस्तक के नये अध्याय में अरस्तू ने लिखा है कि राज्य को नागरिकों की भलाई के लिये चिन्ताशील होना चाहिये और उन्हें सच्चरित्र और सद्गुणी बनाना चाहिये। बुरे कार्य भले ही दसरे के अधिकारों का अपहरण करें या न करें समान रूप से निन्दनीय है। अरस्तू के राज्य के उद्देश्य की कल्पना बहुत अधिक विस्तृत व्यापक और भावात्मक हैं। अरस्तू के अनुसार राज्य मनुष्य के अस्तित्त्व के लिये आया और वह मनुष्य के सर्वोच्च विकास के लिये विद्यमान है।

राज्य शिक्षा द्वारा नागरिकों को सच्चरित्र बना सकता है, दण्ड के भय से नहीं। अरस्तु ने राज्य और व्यक्ति में गहरा सम्बन्ध स्वीकार किया है। राज्य भी नैतिक नियमों का पालन करता है और व्यक्ति के समान ही अपने सदस्यों को नैतिक विधि मानने के लिय आलोचना-

अरस्तू के राज्य उत्पत्ति एवं प्रकृति सम्बन्धी विचारों की भी आलोचना की गयी है। आलोचकों के अनुसार अरस्तू अपने इन विचारों को स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं कर पाया है क्योंकि एक ओर तो वह मनुष्य को पहले और राज्य को बाद में बताता है तो दूसरी ओर राज्य को पहले बताता है। इन दोनों विचारों में विरोधाभास है। इसके अतिरिक्त, उसने राज्य की तुलना एक सावयव से की है जो कि उचित नहीं है। राज्य के अंग की निर्भरता सावयव के अंग की निर्भरता से भिन्न होती है। यद्यपि अरस्तू के विचारों की आलोचना की गयी है, फिर भी अरस्तू के राज्य की उत्पत्ति एवं प्रकृति के सम्बन्ध में विचार महत्वपूर्ण है उसने ही राज्य को इतनी महत्ता प्रदान की एवं इसमें विकास के क्रम को दर्शाया है। वास्तव में अरस्तू के राज्य के उद्देश्य की कल्पना बहुत अधिक व्यापक एवं भावात्मक है।

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