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शनिवार, 4 जुलाई 2020

दक्षिण एशिया के मिट्टी के प्रकार

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दक्षिण एशिया के मिट्टी के प्रकार 


उत्तर. मिट्टियाँ (Soils) - दक्षिण एशिया के विभिन्न भागों में विविध प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं। जिनमें कुछ अधिक उपजाऊ है तो कुछ सामान्य उपजाऊ और कुछ अल्प उपजाऊ या अनुपजाऊ हैं। दक्षिणी एशिया में पायी जाने वाली मिट्टियों में जलोढ़ काली, लैटेराइट, लाल-पीली, मरूस्थलीय क्षारीय, पर्वतीय आदि प्रमुख हैं। इन मिट्रियों का क्षेत्रीय वितरण अग्रांकित है :


जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)- इस प्रकार की मिट्टी सामान्यतः नदियों की घाटियों तथा डेल्टाओं में पायी जाती है। पश्चिम में सिन्धु नदी घाटी से लेकर पूर्व में गंगा एवं ब्रह्मपुत्र के निचले मैदान तक और दक्षिण भारत में महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, ताप्ती आदि नदी घाटियों में जलोढ़ मिट्टी का विस्तार है। नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में प्रतिवर्ष बाढ़ के दौरान मिट्टी की नयी परत जम जाती है जिससे मिट्टी की उपजाऊपन बना रहता है। इसे नवीन जलोढ़ या खादर के नाम से जाना जाता है। बाढ़ की पहुँच से अधिक ऊँचाई पर स्थित पुरानी मिट्टी को पुरातन जलोढ़ कहते हैं। पुरातन जलोढ़ में सामान्यतः शुष्क ऋतु में फसलों की सिंचाई आवश्यक होती है। यह नवीन जलोढ़ की तुलना में कम उपजाऊ होती है। काली मिट्टी (Black Soil)

इसकी उत्पत्ति लावा निर्मित बेसाल्ट (आग्नेय) शैल के अपक्षय द्वारा हुआ है। इसे रेगड़ (Regur) और काली कपास मिट्टी भी कहते हैं। इस मिट्टी का विस्तार पश्चिमी मध्य प्रदेश, सम्पूर्ण महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिमी आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक और उत्तरी-पश्चिमी तमिलनाडु पर है। काले रंग की यह मिट्टी अत्यन्न उपजाऊ है जो कपास, तम्बाकू, मूंगफली, गन्ना आदि फसलों के लिए विशेष रूप से उपजाऊ है।


लैटराइट मिट्टी (Laterite Soil) इस प्रकार की मिट्टी मौसमी रूप से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है। निक्षालन द्वारा वर्षा जल के साथ घुलनशील पदार्थ निचले संस्तर में चले जाते हैं और ऊपरी संस्तर में लौह ऑक्साइड की अधिकता के कारण इसका रंग लाल हो जाता है। दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार के उच्चवर्ती भागों में इस प्रकार की मिट्टी मिलती है। पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, राजमहल, विन्ध्य, सतपुड़ा आदि पहाड़ियों पर और श्रीलंका में मध्यवर्ती उच्च भूमि में लेटराइट मिट्टी का विकास हुआ है।

4. लाल-पीली मिट्टी (Red-Yellow Soil) इस मिट्टी का विस्तार प्रायद्वीपीय पठार पर कच्छ से राजमहल पहाड़ियों तक और तमिलनाडु से बुन्देलखण्ड तक काली मिट्टी के किनारे-किनारे चौड़ी पेटी में पाया जाता है। यह मिट्टी पश्चिमी
तमिलनाडु, कर्नाटक, दक्षिणी महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा छोटा नागपुर पठार और श्रीलंका में मध्यवर्ती उच्चभूमि के चारों ओर पायी जाती है। उर्वरता की दृष्टि से यह सामान्य उपजाऊ होती है। मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)- पश्चिमोत्तर भारत (राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, दक्षिणी पंजाब) और दक्षिणी पाकिस्तान में रेतीली से बजरी युक्त मिट्टी पायी जाती है जिसमें जैव पदार्थों तथा नाइट्रोजन की कमी पायी जाती हैं। इसका विकास शुष्क जलवायु दशाओं में हुआ है। सिंचाई का प्रबन्ध होने पर इसमें गेहूँ, मोटे अनाज, दलहन, तिलहन आदि की कृषि की जा सकती है। क्षारीय या लवणीय मिट्टी (Alkaline or Saline Soil)- लवण प्रधान यह मिट्टी बिखरे रूप में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र राज्यों के शुष्क क्षेत्रों में पायी जाती है। रेह, ऊसर, कल्लर,धुर आदि नामों से जानी जाने वाली यह मिट्टी प्रायः अनुपजाऊ होती है। पर्वतीय मिट्टी (Mountain Soil) यह मिट्टी अत्यन्त छिछली और परिपक्व होती है। यह मिट्टी अल्प अम्लीय से साधारण अम्लीय है और कम उपजाऊ होती है। इसके अन्तर्गत पाडजाल, पाडजालिक, भूरी मिट्टी, रेडजीना आदि सम्मिलित हैं। हिमालय पर्वत श्रेणी में कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक पर्वतीय ढालों पर इस प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं।


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