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रविवार, 12 जुलाई 2020

बोंदा के राजनीतिक विचारों का परीक्षण

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बोंदा के राजनीतिक विचारों का परीक्षण 

राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में फ्रांसीसी दार्शनिक बोंदा का नाम अग्रणी पंक्ति में रक्खा जाता है, आप का जन्म 1530 ई० में फ्रांस के एन्जर्स नगर में हुआ था। वोंदा ने अपनी उच्च शिक्षा टोल्यूज विश्वविद्यालय फ्रांस से प्राप्त की थी। बोंदा ने दार्शनिक तथा राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में परम्परागत चिन्तन से अलग रहकर अपना मौलिक योगदान किया है। उसने अपने अध्ययन को केवल राजनीतिक तक ही सीमित नहीं रखा वरन् अर्थशास्त्र, दर्शन, शिक्षा, घर्म, इतिहास, न्याय शास्त्र तथा विधि आदि के क्षेत्र पर अपने विचार प्रस्तुत किए। राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में उसके विचार उसके प्रसिद्ध ग्रन्थ 'SIX BOOKS CONCERNING THE STATE' से प्राप्त होते हैं जिसका प्रकाशन 1567 ई० में हुआ था। राजनीति के अनेक सिद्धान्तों को उसने वैज्ञानिक एवं तर्कपूर्ण विवेचना प्रस्तुत की और उन्हें आधुनिक रूप प्रदान किया। वुक (Wook) महोदय के अनुसार, "बौद्धिक प्रभाव की दृष्टि से बोंदा एक ओर अरस्तू तथा माण्टेस्क्यू के मध्य और दूसरी ओर रोमन साम्राज्यवादियों एवं हाव्स के बीच की कड़ी है। बोंदा उन महान् विचारों की पंक्ति में है, जिन्होंने ने घोषणा की राज्य का नैतिक उद्देश्य जनता का कल्याण है। सम्प्रभुता के सिद्धान्त को स्पष्ट रूप से प्रतिपादन तथा अन्य योगदानों के कारण राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में जीन बोंदा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जहाँ मैकियावेली को आधुनिक युग का जनक कहा जाता है, वहीं इसे (बोंदा) आधुनिक युग की प्रवृत्तियों को स्पष्ट रूप से विकसित करने का श्रेय प्राप्त है। यह सत्य है कि मैकियावेली अपने को मध्ययुग से स्पष्ट रूप से अलग कर आधुनिक युग की प्रवृत्तियों का प्रवर्तित करता है परन्तु उन्हें स्पष्ट रूप से विकसित करने का श्रेय उसे नहीं अपितु बोंदा को प्राप्त है। डनिंग, सेवाइन, जोन्स तथा अन्य विद्वानों का भी यही मत है कि मैकियावेली ने आधुनिक प्रवृत्तियों का श्रीगणेश किया और उन्हें विकसित करने का कार्य बोंदा ने ही किया। यही कारण है कि जहाँ पहले (मैकियावेली) को आधुनिक युग का जनक तो दूसरे (बोंदा) को उसका अग्रदूत कहा जाता है। दोनों के बीच तुलना तथा राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में बोंदा का स्थान निर्धारित करने के लिए निर्णायक आधार निम्न हैं-

(1) सम्प्रभुता के सिद्धान्त का प्रतिपादन- राज्य की एक सर्वोच्च और निरपेक्ष शक्ति के रूप में सम्प्रभुता के सिद्धान्त का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन बोंदा का महत्त्वपूर्ण और मौलिक योगदान है। यद्यपि मैकियावेली के अनुसार भी राज्य एक सर्वोच्च और सर्वोपरि संस्था है तथापि उसे सम्प्रभुता के सिद्धान्त के प्रतिपादन का श्रेय नहीं प्राप्त है। यह श्रेय सर्वप्रथम बोंदा को ही प्राप्त होता है।

(2) राजनीति शास्त्र का वैज्ञानिक स्वरूप- राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में बांदा का दूसरा महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि वह अपने चिंतन में वैज्ञानिक पद्धति का सहारा लेता है। मैकियावेली की तरह वह भी आगमनात्मक पद्धति का सहारा लेता है। उसकी तरह वह भी अपने चिंतन में ऐतिहासिक पद्धति अपनाता है परन्तु दोनों में अन्तर यह है कि जहाँ मैकियावेली अपने पूर्व निर्धारित निष्कर्षों और मान्यताओं की पुष्टि के लिए इतिहास के विश्लेषण का सहारा लेता है, वही बॉँदा एक वास्तविक चिंतक की तरह इतिहास के विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष निकालता है। दोनों के ऐतिहासिक विश्लेषण की पद्धतियों का अध्ययन से वह निष्कर्ष निकालना है कि मैकियावेली एक चिंतक नहीं अपितु राजनीतिज्ञ था वही बोंदा एक वैज्ञानिक राजनीति चिंतक था। उसे राजनीतिक चिंतन को वैज्ञानिक बनाने का श्रेय है। डर्निग का कहना है कि उसकी रचनाएँ वैज्ञानिक राजनीति के क्षेत्र में एक युग का निर्माण करती हैं। मैक्सी के अनुसार उसकी पुस्तक (De Republice) सच्चे अर्थ में राजनीति विज्ञान की सबसे आधुनिक रचना है।

(3) राज्य के दर्शन का प्रतिपादन- यद्यपि मैकियावेली ने ही सर्वप्रथम राष्ट्रीय राज्य की परिकल्पना की तथापि उसे राज्य के दर्शन के प्रतिपादन का श्रेय नहीं प्राप्त है। वह राज्य के सैद्धान्तिक पक्ष को नहीं अपितु शासन-कला की विवेचना करता है। वह राज्य के मौलिक तत्वों और सिद्धांतों पर प्रकाश नहीं डालता है। यह कार्य सर्वप्रथम बोंदा करता है।

(4) नागरिकता के सिद्धांत का प्रतिपादन- आधुनिक काल में नागरिकता के सिद्धान्त का सर्वप्रथम प्रतिपादन बोंद ही करता है। राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में उसकी यह महान् देन है। उसके अनुसार वे सभी व्यक्ति नागरिक है जो एक सम्प्रभुता के अधीन रहकर कानूनों का पालन करते हैं तथा किसी के दास नहीं होते हैं। मैकियावेली ने आधुनिक काल की इस महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति के बारे में कुछ भी नहीं कहा है।

(5) दासता की कटु आलोचना-बोंदा ने दासता की कटु आलोचना करते हुए इसे मालिक और दास, दोनों के लिए अहितकर बताया है। वह इसे न तो उपयोगी और न प्राकृतिक हो मानता है। उसकी यह आलोचना आधुनिक राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण देन है। जहाँ तक मैकियावेली का प्रश्न है, वह इस प्रश्न पर मौन रहता है। हैं बोंदा का सम्प्रभुता सिद्धान्त सम्प्रभुता के सिद्धान्त का जन्मदाता यद्यपि बोंदा नहीं था। यूनान और रोम के विचारकों में इसकी झलक मिलती है। बोंदा पहला व्यक्ति था जिसने इसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त बताया ओर उसकी विस्तृत व्याख्या की। सामन्तवादी आतंक और अत्याचारों से त्रस्त जनता ने मुक्ति पाने की गरज से राजा के अधिकारों का समर्थन किया और राजनीतिक विचारक ने राज्य की स्योच्च सत्ता की वकालत की। सामन्तवाद के अन्त में राजाओं की शक्ति के उत्थान में मदद की। इंग्लैण्ड और फ्रास के राष्ट्रीय राज्यों ने यह धारणा बना दी कि राज्यों को कानून बनाने और जनता पर शासन करने का अधिकार है। इस प्रकार प्रभुसत्ता के सिद्धान्त को बढ़ने व फैलने का वातावरण मिला। सम्प्रभुता का स्वरूप- राज्य ही एक ऐसा संगठन है जिसमें प्रभुसत्ता है। वह कहता है-प्रभुसत्ता (राज्य का)नागरिकों तथा प्रजाजनों पर सर्वोच्च अधिकार है और यह कानूनों द्वारा नियंत्रित नहीं
होता।' राजा को किसी भी प्रकार का कानून बनाने का अधिकार है। राजा अपनी इच्छानुसार कार्य कर सकता है। राजा की इच्छा ही कानून है। राज्य के अधीन सभी हैं और राज्य की शक्ति सर्वोच्च है।

सम्प्रभुता की विशेषता -

(1) प्रभुसत्ता का स्थायित्त्व होना- प्रभुसत्ता स्थायी होती है। कुछ समय के लिए प्रभुसत्ता का अधिकार नहीं दिया जा सकता तो वह प्रभुसत्ता नहीं होगी। यदि अल्पकाल तक किसी को दी भी जाए तो वह संरक्षक होगा।

(2) प्रभुसत्ता सर्वोच्च है- प्रभुसत्ता के ऊपर कोई नहीं है। कानून, मर्यादाओं और किसी भी प्रकार के बन्धनों से यह सर्वथा मुक्त है। यह किसी दूसरे व्यक्ति, संस्था, शासक आदि के आदेश मानने के लिए बाध्य नहीं है। इसके आदेश और इच्छा ही कानून हैं।

(3) प्रभुसत्ता जनता में निहित- प्रभुसत्ता किसी व्यक्ति विशेष में नहीं होती जनता अपनी इस शक्ति को कुछ समय के लिए किसी को प्रदान करती है जो इसका संरक्षक होता है। सीमित अवधि के पश्चात् वह शक्ति पुनः जनता में लौट आती है। इसे सीमित अवधि में भी सर्वोच्च होने पर भी वह व्यक्ति या संस्था जनता के प्रति अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है।

प्रभुसत्ता के कार्य- 

(1) प्रभुसत्ता का प्रमुख कार्य कानून बनाना है। इस कार्य में प्रभुसत्ता एकदम स्वतन्त्र और सर्वोच्च है। उससे कोई बड़ा नहीं है, और उसके समान तथा ठससे छोटे की सम्मति आवश्यक नहीं है। इसलिए राजा या शासक की इच्छा ही कानून है। कानून को सभी मानने के लिए बाध्य हैं।

(2) युद्ध करना और सन्धि करना भी प्रभुसत्ता का कार्य है।

(3) प्रजा की अपील सुनना और न्याय के मामले में सर्वोच्च निर्णय देना।

(4) कर माफ करना और सजा अथवा कानून से मुक्त करना।

(5) मुद्रा प्रणाली निश्चित करना और मुद्रा का मूल्य निर्धारित करना।

(6) प्राण दण्ड की सजा देना।

(7) सभी नागरिक के कर्तव्य पालन कराना।

प्रभुसत्ता की सीमाएँ -

(1) प्रभुसत्ता पर प्रकृति और ईश्वर का प्रतिबंध है। राजा में सर्वोच्च शक्ति होते हुए भी प्राकृतिक नियम और भगवान् के नियमों का वह उल्लंघन नहीं कर सकता। ईश्वरीय व प्राकृतिक कानून से प्रभुसत्ता की बाध्यकारी शक्ति का कोई सम्बन्ध नहीं है बल्कि राजा या शासक ईश्वरीय व प्राकृतिक कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य है।

(2) जो मौलिक कानून है उनका उल्लंघन राजा नहीं कर सकता। प्रत्येक देश में कुछ ऐसे नियम होते हैं जिन्हें कोई नहीं तोड़ सकता और उन्हें राजा भी नहीं तोड़ सकता।

(3)बोंदा प्रभुसत्ता को केवल राजनीतिक क्षेत्र तक ही सीमित मानता है, सम्पत्ति के क्षेत्र में इसका प्रभुत्त्व नहीं मानता। वह राजनीतिक व सम्पत्ति के क्षेत्र को पृथक्-पृथक् मानता है। इस सिद्धान्त में उस पर रोमन के प्रभु शक्ति तथा स्वामित्व कानून का प्रभाव पड़ा है। बोंदा सम्पत्ति को काफी महत्त्व देता है। उसका मत है कि राजा सम्पत्ति के स्वामी की आज्ञा बिना सम्पत्ति को छू भी नहीं सकता। इस प्रकार वह राजा को मनमाने कर लगाने पर भी रोक लगाता है। बोंदा कहता है कि जनता के प्रतिनिधि सभा के परामर्श और स्वीकृति के विना राजा कोई कर नहीं लगा सकता। प्रभुसत्ता सम्बन्धी कुछ विरोधाभास आलोचक प्रभुसत्ता सम्बन्धी बोंदा की विचारधारा में अनेक संगतियाँ बताते हैं। बाँदा से सम्प्रभु को सर्वोच्च शक्ति मानते हुए भी उस पर प्रतिबन्ध लगाता है। यदि प्रभु सर्व शक्तिमान और सर्वोच्च है तो उसके कानूनों को सीमा में बाँधा नहीं जा सकता। राजा सर्वोच्च : शक्ति होते हुए
भी ईश्वर और प्रकृति का उल्लंघन नहीं कर सकता। बोंदा पर यहाँ उस समय की धार्मिक परिस्थितियों का प्रभाव है,परन्त बोंदा मैकियावेली की तरह राजनीति को धर्म और नीति से पृथक नहीं मानता, यदि ईश्वरीय कानूनों का उल्लंघन राजा करे वह तो एक चोर-डाकुओं का समूह मात्र रह जाएगा। आधुनिकता का अग्रदूत : बोंदा या मैकियावेली -आज भी यह विवाद का विषय बना रहा है कि आधुनिक कौन है-बोंदा या मैकियावेली। 44 जोन्स ने कहा है कि " मैकियावेली के स्थान पर बोंदा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन के आरम्भ की कहीं अधिक अच्छे ढंग से प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि जय कि वह नवयुग के प्रासाद की देहरी पर खड़ा है, मैकियावेली केवल उसकी बैठक तक ही पहुँच पाया है।

" इस विषय के निर्णायक आधार निम्न हैं- 

(1) अध्ययन-पद्धति-मैकियावेली ने निगमनात्मक पद्धति का त्यागकर आगमनात्मक ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग तो किया किन्त सीमित क्षेत्र में। उसने निरीक्षण द्वारा निकाले गये निर्णयों को इतिहास के सहयोग से पुष्ट किया है। इसके विपरीत बोंदा ने ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग व्यापक रूप में किया है। उसने इतिहास तथा दर्शन का समन्वय किया है। उसने अपने अध्ययन में शुद्ध तुलनात्मक आगमनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति का प्रयोग किया है। डननिंग के अनुसार बोदा ने राजनीति शास्त्र को वह अध्ययन पद्धति दी जिसका अरस्तू के बाद लोप हो गया था।

(2) राज्य- मैकियावेली ही वह पहला लेखक है जिसने राज्य शब्द का प्रयोग किया। किन्तु उसने कहीं भी राज्य के मूल तत्वों का उल्लेख नहीं किया। उसने राष्ट्रीयता के आधार पर एकीकरण की कल्पना तो की किन्तु वह राष्ट्रीय राज्य की कल्पना तक न पहुँच सका। इसके विपरीत बोंदा की राज्य-सम्बन्धी कल्पना बहुत कुछ सत्यता के निकट एवं आधुनिक है। विश्वव्यापी साम्राज्य के अन्त की कल्पना के साथ-साथ उसने राष्ट्रीय राज्य की उत्पत्ति का भी उल्लेख किया है।

(3) प्रभुसत्ता- मैकियावेली ने भी सम्प्रभुता शब्द का प्रयोग नहीं किया है, यद्यपि उसने राज्य की शक्ति का उल्लेख किया है। इसके विपरीत बोंदा ने स्पष्ट रूपों में 'प्रभुसत्ता शब्द का प्रयोग किया है। प्रभुसत्ता को आधुनिक राज दर्शन का अंश बनाने का ध्येय सर्वप्रथम बोंदा को ही जाता है। उसने ही सर्वप्रथम सम्प्रभुता को एक राजनीतिक सिद्धान्त के रूप में प्रतिष्ठित किया।

(4) भौगोलिक वातावरण का प्रभाव- बाँदा ही वह पहला लेखक था जिसने किसी देश के नागरिकों के चरित्र पर जलवायु तथा भौतिक वातावरण के प्रभाव की चर्चा की जबकि मैकियावेली ने ऐसा कोई विचार नहीं दिया।

(5) नागरिकता- मैकियावेली ने नागरिकता के महत्त्व को तो समझा पर वह उसके मौलिक स्वरूप को स्पष्ट नहीं कर पाया। इसके विपरीत बोंदा की नागरिकता सम्बन्धौ धारणा अधिक व्यापक है। वह सब नागरिकों को (स्वतन्त्रता प्रदान करके) एक सत्ता के अधीन रखकर समानता प्रदान करता है। उसने व्यक्तिगत सम्पत्ति को राजा के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखकर अधिक सुरक्षा का भाव भी पैदा किया है। इस दिशा में वह मैकियावेली से अधिक आधुनिक है।

(6)राजनीति एवं नैतिकता- मैकियावेली को मूलरूप से आधुनिक इसलिये कहा जाता है कि उसने ही सर्वप्रथम धर्म तथा नैतिकता को पृथक् करने की कोशिश की और उन्हें रामहित का साधन मात्र मानकर उनके महत्त्व को कम कर दिया। उसने राजहित को सर्वोपरि बताया। इसके विपरीत बाँदा ने मध्यम मार्ग का अनुकरण करके राजनीति तथा नैतिकता के मध्य अन्तर तय किया किन्तु दोनों को पूर्णरूप से पृथक् नहीं किया। उसमें सम्प्रभुसत्ता को  प्रकार की मर्यादाओं से मर्यादित करने की कोशिश की। उसने शासन का विवेकपूर्ण पक्ष प्रकट करके वल प्रयोग का अनौचित्य तथा न्यायिक औचित्य का समर्थन किया। उपरोक्त तथ्यों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि आधुनिकता के अंश तो दोनों (मैकियावेली और बोंदा) में ही पाये जाते हैं सम्प्रभुता का सबसे पहला विचार मैकियावेली ने ही प्रकट किया किन्तु वह इसके स्वरूप को स्पष्ट न कर सका। जबकि बोंदा ही वह पहला विचारक है जिसने सम्प्रभुता का स्पष्ट शब्दों में वर्णन किया। अतः निष्कर्ष तौर पर हम कह सकते हैं कि मैकियावेली की अपेक्षा बोंदा ही आधुनिकता के करीब हैं। अत: आधुनिकता का अग्रदूत हम बोले को ही कहेंगे मैकियावेली को नहीं।

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