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बुधवार, 8 जुलाई 2020

भौगोलिक पर्यावरण का मानव समाज पर प्रभावों

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भौगोलिक पर्यावरण का मानव समाज पर प्रभावों 


भौगोलिक पर्यावरण का मानव समाज पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है। इसका प्रमाण यह है कि विभिन्न भौगोलिक पर्यावरण में रहने वाले समाजों में अनेक क्षेत्रों में भिन्नता पाई जाती है कि इंग्लैण्ड का भौगोलिक पर्यावरण भारत के भौगोलिक पर्यावरण से भिन्न है। इसके परिणामस्वरूप दोनों देशें के निवासियों के रहन-सहन और सामाजिक तथा आर्थिक संगठन में भी भिन्नता है। भौगोलिक पर्यावरण के प्रभवों का विवरण निम्नलिखित है

(अ) भौगोलिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव 

(1) जनसंख्या पर प्रभाव-जनसंख्या के घनत्व मुख्य रूप से भौगोलिक पारिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलता पर निर्भर करता है। जिस भौगोलिक पर्यावरण की पोषण-शक्ति मनुष्य के अधिक अनुकूल है, वहाँ जनसंख्या में वृद्धि तीव्रता से होती है तथा जहाँ भौगोलिक पर्यावरण की प्रतिकूलता होती है, वहाँ लोग रहना कम पसन्द करते हैं, अत: वहाँ जनसंख्या कम होती है। अन्य शब्दों में, जिन भागों में रेगिस्तान, बंजर, पर्वत आदि अधिक होते हैं, वहाँ जनसंख्या का घनत्व कम होता है; परन्त नदियों क मैदानों में, जहाँ सिंचाई के पर्याप्त साधन होते है तथा भूमि समतल होती है, जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है। घनत्व का आशय प्रति वर्ग किमी से पाई जाने वाली जनसंख्या से होता है। उदाहरण के लिए भारत गंगा, यमुना व कावेरी नदियों को घाटियों में देश के अन्य भागों से कहीं अधिक जनसंख्या का घनत्व जैकी राजस्थान तथा पर्वतीय प्रदेशों में जनसंख्या का घनत्व सबसे कम है।

(2) मकानों की बनावट पर प्रभाव-भौगोलिक पर्यावरण मनुष्य के निवास तथ मकानों पर प्रभाव डालता है। मकानों के निर्माण में जिस सामग्री की आवश्यकता होती है तथा जैसा उसका स्वरूप होता है, वह सभी भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव के कारण होता है। मैदानी प्रवेश में गारा-मिट्टी अधिक मात्रा में उपलब्ध हो जाती है, अत: वहाँ मिट्टी और इंटी के मकान बनाए जाते हैं। पर्वतीय प्रदेश में पत्थर और लकड़ी की प्रचुरता होती है, अत: वहाँ मकान पत्थर और लकड़ी के ही बनाए जाते हैं। टण्डा प्रदेश मै बारहों कहाँ मास केवल बर्फ रहती है, इस करण वहाँ बर्फ के मकान बनाए जाते हैं। जापान में प्रायः भूचाल आया करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ अधिकांश मकान लकड़ी के बनाए जाते हैं।

(3) खान-पान पर प्रभाव-भोजन का पर्यावरण से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जिस क्षेत्र में जो खाद्य सामग्री अधिक उपलब्ध होती है उस क्षेत्र का मुख्य भोजन वही खाद्य-सामग्री होती है। उदाहरण के लिए-बंगाल में मछली और चावल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं, अत: वहाँ के निवासियों का यह प्रमुख भोजन है। उत्तर प्रदेश और पंजाब में गेहूं की पैदावार अधिक होती है, अत: इन प्रदेशों में गेहूँ सर्वसाधारण का प्रधान भोजन है। मांस उत्तेजक और उष्ण प्रधान होता है, अत: इसका प्रयोग पर्वतीय व ठण्डे प्रदेशों में अधिक किया जता है। एस्कीमो केवल मांस ही खाते हैं क्योंकि टुण्डू में बर्फ के कारण कोई वनस्पति उत्पन्न ही नहीं होती। शीतप्रधान देशों में गर्म देशों की अपेक्षा शराब का अधिक प्रयोग किया जाता है।

(4) मूल व्यवसायों पर प्रभाव-व्यक्ति के मूल व्यवसाय भी भौगोलिक पर्यावरण पवर आधारित होते हैं। भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होने वाले मुख्य व्यवसाय इस प्रकार है-(i) पशुपालन, (ii) मछली पकड़ना, (i) शिकार करना, (iv) हस्तशिल्प, (v) कृषि, (vi) खान खोदना, (vii) लकड़ी काटना। ये समस्त व्यवसाय भौगोलिक पर्यावरण के ऊपर निर्भर करते हैं। नदियों के मैदानों में पशुपालन और कृषि पर्याप्त होती है। जहाँ विशाल तालाब अथवा समुद्र निकट है, वहाँ मछली-पालन या मछली पकड़ने का व्यवसाय होता है। वनों में लकड़ी एवं ऊन से सम्बन्धित विभिन्न व्यवसाय किए जाते हैं।

(5) शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव-व्यक्ति का रंग, कद तथा आकृति भी पर्याप्तसीमा तक भौगोलिक पर्यावरण इस निर्धारित होती है। अन्य शब्दों में, मनुष्य का काला,गोरा, लम्बा, ठिगना आदि होना भौगोलिक परिस्थितयों के कारण है। जहाँ जितनी अधिक गर्मी पड़ती है, वहाँ के निवासिये का रंग उतना ही काला होता है। शीतप्रधान देशों के निवासियों के रंग गोरा होता है।

(6) यातायात व आवागमन के साधनों पर प्रभाव-भौगोलिक पर्यावरण पर यातायात व आवागमन के साधनों पर भी प्रभाव पड़ता है मैदानों में आवागमन के साधन सड़क, रेल आदि होते है, परन्तु पर्वतीय प्रदेशों में ऐसा सम्भव नहीं है। जिन प्रदेशों में बड़ी नदियाँ हैं, वहाँ नौकाओं और स्टीमरों द्वारा आवागमन होता है।

(ब) भौगोलिक पर्यावरण पर अप्रत्यक्ष प्रभाव 

भौगोलिक पर्यावरण व्यक्ति एवं समाज के जीवन को अप्रत्यक्ष रूप से भी प्रभावित करता है। भौगोलिक पर्यावरण के अप्रत्यक्ष प्रभावों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

 (1) आर्थिक संगठन पर प्रभाव-आर्थिक संगठन पर भौगोलिक पर्यावरण का विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है। आर्थिक संगठन के दो पहलू मुख्य रूप से प्रभावित होते हैं-(क) सम्पत्ति और (ख) उद्योग-धन्धे। बकल का यह कहना पूर्णतया सत्य है कि किसी समाज की सम्पत्ति का निर्धारण भौगोलिक पर्यावरण द्वारा होता है। जिन देशों में पर्याप्त मात्रा में खनिज तेल तथा अन्य प्राकृतिक साधन उपलब्ध होते हैं, वहाँ सम्पत्ति स्वाभाविक रूप से अधिक होती है अमेरिका, रूस तथा सऊदी अरब, आदि देश इसके प्रमुख उदाहरण है।

(2) राजनीतिक संगठन पर प्रभाव-भौगोलिक पर्यावरण मनुष्य के राजनीतिक संगठन को भी प्रभावित करता है। जिस प्रदेश की भूमि, जलवायु तथा परिस्थितियाँ ऐसी होंगी, जिनसे जनता सुखी रह सके, तो उस देश का राजनीतिक संगठन स्तर होगा; लेकिन जहाँ जनता को भरण-पोषण और जीवन-यापन के ही साध्यान नहीं प्राप्त होंगे, वहाँ की राजनीतिक अवस्था सदा अस्थिर एवं अव्यवस्थित रहेगी। इस कारण ही सर्वप्रथम गंगा, यमुना,दजला, फरात, नील आदि नदियों के मैदानों में राज्यों की स्थापना हुई। पर्वतीय तथा रेगिस्तानी प्रदेशों में यातायात तथा संचार-साधनों की व्यवस्था करना कठिन होता है, अत: यहाँ राजनीतिक संगठनों का अभ्युदय सरलता से नहीं होता। इस कारण ही अफगानिस्तान, अल्बानिया, मैकेडेनिया तथा स्कॉटलैंड आदि राज्यों की स्थापना पर्याप्त काल के पश्चात् हुई।

(3) धर्म का प्रभाव-समस्त धार्मिक विश्वास भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होते हैं। सी०एफ० कैरी के शब्दों में,"किसी समाज में लोगों का धर्म अधिकांश रूप से पृथ्वी पर उनकी स्थिति तथा उन दृश्यों एवं उन प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित होता है, जिनमें उनका जीवन बीतता है और जिनक वे आदी होते हैं।" भारत एक प्रकृति-प्रधान देश है, अत: यहाँ वर्षा, पृथ्वी, गंगा, यमुना, वृक्ष आदि का पूजा की जाती है। कृषि-प्रधान देश होने के कारण यहाँ इन्द्र अर्थात् वर्षा के देवता की पूजा का विशष महत्व होता है।

(4) सामाजिक संगठन पर प्रभाव- भौगोलिक पर्यावरण का सबसे अधिक प्रभाव सामाजिक संगठन पर पड़ता है। प्ले के शब्दों में, "ऐसे पहाड़ी प्रदेशों में, जहाँ खाद्यान की कमी होती है, जनसंख्या की वृद्धि अभिशाप मानी जाती है और ऐसी विवाह संस्थाएं स्थापित की जाती हैं जिनसे जनसंख्या में वृद्धि न हो।"


(5) मानव व्यवहार पर प्रभाव- भौगोलिक पर्यावरण मानव-व्यवहार को प्रभावित करत लकेसन के अनुसार, "अपराध तुओं के अनुसार परिवर्तित होते है, जाड़ों में सम्पत्ति सम्बन्धी अपराध होते हैं और गर्मियों में व्यक्ति सम्बन्धी।"

(6) स्वास्थ्य पर प्रभाव- मानव स्वास्थ्य बहुत कुछ भौगोलिक वातावरण पर निर्भर करता है। हटिंगटन के शब्दों में,"स्वास्थ्य और शक्ति को नियंत्रित करने के लिए हवा में नमी की मात्रा महत्वपूर्ण कारकों में से एक है।"

(7) कला तथा साहित्य पर प्रभाव- कला तथा साहित्य भौगोलिक पर्यावरण से विशेष रूप से प्रभावित रहा है। अनेक साहित्यकारों ने अपने स्थानीय प्राकृतिक वातावरण से प्रभावित होकर अनेक महत्वपूर्ण रचनाओं के सुमित्रानन्दन पन्त इसके उदाहरण है।

(8) प्रजातियों पर प्रभाव-प्रजातियों में जो विभिन्नता दृष्टिगोचर होती है उसका मूल कारण भौगोलिक पर्यावरण है। विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियाँ विभिन्न प्रजातियों को जन्म देती है। जिससे उनके रीति-रिवाज, खान-पान तथा साहित्य अदि में विभिन्नता पायी जाती है।

(9) सभ्यता पर प्रभाव-सभ्यता भौगोलिक पर्यावरण से विशेष रूप से प्रभावित होती है। डॉ० हटिंगटन के मतानुसार,सभ्यता का विकास पूर्णतया भौगोलिक तत्वों पर निर्भर करता है। सभ्यता का विकास और विनाश जलवायु पर आधारित होता है। उनके मत में उत्तम जलवायु के बिना सभ्यता का विकास नहीं हो सकता। साथ-हो-साथ प्रतिकूल जलवायु सभ्यता को पतन की दिशा में अग्रसर करते है। जलवायु परिवर्तन शील है, अत: अनुकूल जलवायु की सभ्यता का विकास होता है और प्रतिकूल जलवायु में सभ्यता का विकास रूक जाता है तथा उसका पतन हो जाता है। अपने इस सिद्धान्त को सत्य सिद्ध करने के लिए हटिंगटन ने अनेक मानचित्रों का निर्माण किया तथा यह सिद्ध किया कि जहाँ जलवायु अच्छी है वहाँ स्वास्थ्य दर ऊँची है तथा वहाँ अधिक संख्या में प्रतिभाशाली व्यक्ति पाए जाते हैं।

(10) संस्कृति पर प्रभाव (2004)- ओडम का कथन है कि, "संस्कृति तथा भूगोल अपृथक्कनीय है। भौगोलिकवादियों के मतानुसार संस्कृति का मुख्य आधार भौगोलिक पर्यावरण है। मैदानों तिथ नदियों के किनारे कृषि-संस्कृति का विकास हुआ तथा जिन स्थानों में खनिज पदार्थ उपलबध होते दे, वहाँ औद्योगिक संस्कृति तीव्रता से विकसित हुई परन्तु यह आवयश्यक नहीं कि संस्कृति का पूर्णतया निर्धारण भौगोलिक पर्यावरण द्वारा ही होता है। यदि विश्व की विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन करें तो जात होगा कि समान भौगोलिक पर्यावरण में विभिन्न संस्कृतियाँ फूलती- फलती रही हैं दूसरे, संस्कृति भौगोलिक पर्यावरण की अपेक्षा मानव-विचारों पर अधिक आश्रित है। यातायात तथा अवागमन के साधनों न भी भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव को कम कर दिया है। भौगोलिक पर्यावरण के मानव समाज पर पड़ने वाले प्रभावों के कारण हो अरस्तु, ए्लेटो, मपि टेस्वय,रेटजेल,बनहस, हटिंगटन, डेक्सर, लीप्ले,लेमार्क इत्यादि अनेक विद्वानों ने भगोलिक निश्चयवाद निर्धारणवाद) का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार भौगोलिक पर्यावरण मारे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व शारीरिक पक्षों को प्रभावित करता है।

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