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बुधवार, 22 जुलाई 2020

भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत संस्कृति की परिभाषा

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भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत संस्कृति की परिभाषा 

संस्कृति का तात्पर्य (अर्थ) संस्कृति का आशय है किसी भी देश अथवा राष्ट्र की वह समस्त गतिविधियाँ जिसके अन्तर्गत उस देश का समग्र मानवीय विकास होता है। संस्कृति शब्द देखने में छोटा लगता है, लेकिन यदि हम इसका विस्तृत अध्ययन करें तो संस्कृति से कोई भी चीज अछूती नहीं है। संस्कृति वह समग्र शब्द है जिसके अन्तर्गत उस देश अथवा राष्ट्र की समग्र मानवीय गति विधियाँ आ जाती हैं। संस्कृति को यदि हम इस उदाहरण द्वारा समझते तो संस्कृति के भावात्मक अर्थ को जाना जा सकता है। मनुष्य और जानवरों में आदि काल से एक महत्वपूर्ण अन्तर दृष्टिगत होता है जिससे मनुष्य जानवरों से पृथक् होता है। मानव एक बौद्धिक चिन्तनशील प्राणी है, जबकि जानवरों में बौद्धिकता का अभाव होता है। मनुष्य में सोचने समझने की शक्ति पशुओं से कई गुना अधिक होती है। इसी कारण मनुष्य को बौद्धिक प्राणी कहा गया है। इसलिए किसी ने ठीक कहा है। "बुद्धि अथवा विवेक के अभाव में मनुष्य पशु है।" विवेकशीलता के कारण मानव तर्क एवं चिन्तन करने में समर्थ हुआ है। अतः इसी विवेक के कारण ही धर्म, दर्शन, कला का उद्भव एवं विकास हुआ। धर्म और दर्शन के आधार पर मानव ने स्वयं को परिष्कृत किया। मानव स्वयं अपने विवेक का प्रयोग कर विचार और कर्म के द्वारा अपने को परिष्कृत करता है। इसे संस्कृति कहते हैं। यदि हम दूसरे शब्दों में कहें तो संस्कृति ऐसे तत्त्वों की समष्टि है जिनसे मानव-जीवन नियंत्रित एवं व्यवस्थित रहता है। वह एक ऐसा मानसिक दृष्टिकोण है जो व्यक्ति, जाति अथवा राष्ट्र को समुन्नत एवं परिष्कृत करने का कार्य करता है। संस्कृति का अध्ययन किसी भी व्यक्ति में अपने देश के प्रति स्वाभिमान एवं गौरव की भावनाओं को उद्दीप्त करने में समर्थ है।

व्युत्पत्ति की दृष्टि से भारतीय संस्कृति-सम् उपसर्ग पूर्वक कृ धातु में क्तिन् प्रत्यय लगाने पर संस्कृति' शब्द निष्पन्न होता है। सामान्यतः इसका अर्थ है भूषण-भूत सम्यक् कृति, सुधरी हुई स्थिति, उत्तम कार्य, आचरणगत परम्परा आदि। परन्तु संस्कृति को इतने संकुचित अर्थ में ग्रहण नहीं किया जा सकता। मनुष्य एक बुद्धिजीवी, प्रगतिशील एवं सामाजिक प्राणी है। वह अपने परिवार की, समाज की, जाति की, देश की तथा विश्व की प्रगति के लिए अपनी बुद्धि का प्रयोग करता रहता है। मनःप्रसूत ऐसे विचार, अनुसंधान और चेष्टाएँ एक विशिष्ट परम्परा का निर्माण करती हैं वही संस्थापित परम्परा संस्कृति' शब्द में अन्तर्भूत है। संस्कृति के इसी विस्तृत स्वरूप को विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। संस्कृति की परिभाषाएँ-संस्कृति की परिभाषा अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से दी है। कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाओं का वर्णन लिखित है मैथ्यू अर्नाल्ड-के अनुसार संस्कृति हमें विश्व की जानी और कही गयी श्रेष्ठतम उपलब्धियों से परिचित कराती है। टायलर के अनुसार-संस्कृति एक सम्पूर्ण योग है जिसमें ज्ञान, विज्ञान, विश्वास कला नीति, विधि, परम्परा तथा अन्य गुण एवं आदतें मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में अर्जित करता है। रेडफील्ड के अनुसार-"संस्कृति परम्परागत ज्ञान का कला और उपकरणों से अभिव्यक्त वह संगठित रूप है जो परम्परा से संरक्षित होकर मानव समूह की विशेषता बन जाता है।" जोसेफ पी० के अनुसार-"संस्कृति को प्राणी की समस्त प्राकृतिक वस्तुओं और उन उपहारों एवं गुणों का सर्वस्व मानते हैं जो मनुष्य से सम्बन्ध रखते हुये भी उनकी आवश्यकताओं और इच्छाओं के तात्कालिक क्षेत्र से परे हैं।" मैकाइवर और पेज का विचार है कि, "संस्कृति मूल शैलियों भावात्मक आशक्तियों एवं बौद्धिक अभियानों का क्षेत्र है। इस प्रकार संस्कृति सभ्यता का प्रतिवाद है। वह हमारे रहने तथा सोचने के ढंग में, दैनिक कार्य कला में, कला में, साहित्य में, धर्म में, मनोरंजन तथा सुखोपभोग में हमारी प्रकृति का भिव्यक्ति होती है।" राजगोपालाचारी के अनुसार-"किसी भी जाति अथवा राष्ट्र के शिष्ट पुरुषों के विचार, वाणी एवं क्रिया का जो रूप व्याप्त रहता है उसी का नाम संस्कृति है। द्वाहट का विचार है कि संस्कृति एक प्रतीकारात्मक निरन्तर, संचयी तथा प्रगतिशील प्रक्रिया है।"

सम्पूर्णानन्द का कथन है कि "निरन्तर प्रगतिशील मानव-जीवन प्रकृति और मानव-समाज के जिन-जिन असंख्य प्रभावों और संस्कारों से सुसंस्कृत व प्रभावित होता है, उन सब के सामूहिक पदार्थ को ही संस्कृति कहा जाता है।" के० एम० मुन्शी के अनुसार-"हमारे रहन-सहन के पोछे जो हमारी मानसिक अवस्था, जो मानसिक प्रकृति है, जिसका उद्देश्य हमारे जीवन को परिष्कृत, शुद्ध और पवित्र बनाना है तथा अपने लक्ष्य की प्राप्ति करना है, वही संस्कृति है।"

वासुदेव अग्रवाल ने संस्कृति के अर्थ की विशद विवेचना की है उनका विचार है कि

संस्कृति का अर्थ है-संस्कार सम्पन्न जीवन। ये संस्कार मन, कर्म और वचन के द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं.मानव अपने मन से, कर्म से और शब्द से जो कुछ अब तक रच सका है, वह सब उसकी संस्कृति है। संस्कृति की रचना भूत, भविष्य और वर्तमान में जारी रहने वाला एक निरन्तर सत्र है। सब कुछ उसकी संस्कार सम्पन्नता का नमूना है।"

अंग्रेजी में संस्कृति का पर्याय कल्चर है। टी० एस० इलियट के अनुसार संस्कृति केवल विभिन्न क्रियाओं का योग ही नहीं बल्कि एक जीवन पद्धति है संस्कृति की विशद व्याख्या करते हुये उन्होंने कहा है कि संस्कृति से मेरा तात्पर्य एक स्थान में साथ रहने वाले कुछ विशेष व्यक्तियों को जीवन-पद्धति से है। संस्कृति के दर्शन, उनकी कलाओं, सामाजिक व्यवस्था, आदत, रीति रिवाज, और धर्म में होते हैं, लेकिन ये समस्त वस्तुएँ ही मिलकर संस्कृति का निर्माण नहीं करती हैं। पद्यपि सुविधा के लिए इन्हें हम संस्कृति कह देते हैं, पर वास्तव में ये संस्कृति नहीं वरन् उसके अंग हैं। जिस प्रकार मानव-शरीर विभिन्न अवयवों का संकलन मात्र नहीं है उसी प्रकार संस्कृति भी रोति-रिवाज और धार्मिक विश्वासों का एकीकरण न होकर कुछ और भी । निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि संस्कृति के निर्माण में अनेक तत्त्वों का योग होता है। किसी भी देश के धर्म दर्शन, साहित्य, आचार-विचार, संस्कार तथा सामाजिक विधि-विधान सम्मिलित रूप से संस्कृति की रचना में सहायक होते हैं। संस्कृति और सभ्यता में अन्तर संस्कृति के समानार्थक शब्द के रूप में 'सभ्यता' शब्द का भी प्रचलन है। ये दोनों परस्पर इतने सम्बद्ध हैं कि बहुघा 'सभ्यता को संस्कृति का पर्याय मानकर उसका प्रयोग किया जाता है। वस्तु: सभ्यता और संस्कृति में अन्तर है। यह अन्तर अत्यन्त सूक्ष्म है। संस्कृति आन्तरिक गुण है, सभ्यता बाह्य वस्तु। संस्कृति मानसिक है और सभ्यता भौतिक। 'सभ्य शब्द 'सभायां साधु: अर्थ में सभा शब्द में यत् प्रत्यय लगाने पर निष्पन्न होता है। सभ्यस्यभावः इस अर्थ में सभ्य शब्द से तल् प्रत्यय लगाने पर सभ्यता' शब्द की निष्पत्ति होती है जिसका शाब्दिक अर्थ है सभ्य होने का भाव (सामाजिक आचरण)। साधारणतः सभ्यता का अनुमान हम किसी व्यक्ति के रहन-सहन, वेश-भूषा, उठने-बैठने के ढंग, बोल-चाल आदि से लगाते हैं। स्पष्ट है कि हम उसके बाह्य आचरण को देखकर ही उसे सभ्य की संज्ञा देते हैं। अतः सभ्यता बाह्य वस्तु है। संस्कृति और सभ्यता के अर्थ को जानने के पश्चात् संस्कृति और सभ्यता का अन्तर स्पष्ट हो जाता है। संस्कृति और सभ्यता के सूक्ष्म तात्त्विक अन्तर को विद्वानों ने स्पष्ट करने का प्रयास किया है परिणाम संस्कृति और सभ्यता के निम्नलिखित अन्तर प्रकाश में आए हैं- प्रसिद्ध विद्वान् वेयर का मत है कि सभ्यता में उपयोगी भौतिक पदार्थ और उनको निर्माण करने तथा प्रयोग करने की विधियों शामिल होती हैं, जबकि संस्कृति में किसी समूह के आदर्श, मूल्य और मानसिक तथा भावात्मक पहलू शामिल होते हैं। जे० एल० गिलिन तथा जे० पी० गिलिन के अनुसार- "सभ्यता संस्कृति का अधिक जटिल एवं विकसित रूप है।"

ऑगबर्न लिखते हैं कि, "अधिजैविक संस्कृति के बाद की अवस्था के रूप में सभ्यता की परिभाषा की जा सकती है।"

मैकाइवर और पेज के अनुसार, "सभ्यता के सम्पूर्ण यन्त्र पद्धति और संगठन को करते हैं जिसका मनुष्य ने अपने जीवन का परिस्थितियों पर नियन्त्रण करने के प्रयास नें डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है कि "सभ्यता मनुष्य के बाह्य प्रयोजनों को सहज लभ्य करने का विधान है और संस्कृति प्रयोजनातीत अन्तर के आनन्द की अभिव्यक्ति"

श्री सम्पूर्णानन्द के विचार में संस्कृति मानसिक है, आन्तरिक है, सभ्यता बाह्य व भौतिक संस्कृति को अपनाने में देर लगती है, पर सभ्यता की सद्यः नकल की जा सकती है। अफ्रीका का आदिम निवासी कोट-पतलून पहन सकता है, यूरोपियन ढंग के बंगलों में रह सकता है, फिर भी उसका सांस्कृतिक स्तर अंग्रेजों जैसा नहीं हो सकता। संक्षेप में, संस्कृति में सभ्यता का अन्तर्भाव हो जाता है, पर सभ्यता में संस्कृति का नहीं। संस्कृति को अभिव्यक्ति सभ्यता है-जो बाह्य उपकरणों से अभिव्यक्त होती है। श्री प्रभुदयाल मित्तल के अनुसार- "सभ्यता केवल भौतिक और बौद्धिक विकास है। सभ्यता और संस्कृति का सम्बन्ध दूध में व्याप्त मक्खन, फूलों में सुगन्ध और शरीर में आत्मा के समान है। इस प्रकार सभ्यता केवल बाहरी ढाँचा मात्र है, जो संस्कृति के विना निस्तार और निष्प्राण है। सभ्यता जल्दी बनती है और बिगड़ता भी जल्दी है, किन्तु संस्कृति के बनने में भी पर्याप्त समय लगता है और विगड़ने में भी।"

डॉ० गायत्री वर्मा के शब्दों में, "सभ्यता शरीर के मनोविकार की द्योतक है, जबकि संस्कृति आत्मा के अभ्युत्थान की प्रदर्शिका है। संस्कृति आभ्यन्तर व सभ्यता वाहा तत्त्व है। प्रत्येक सभ्य व्यक्ति आवश्यक नहीं कि संस्कृति भी हो।"

जर्मन विद्वान् स्पैंग्लर का विचार है कि, "सभ्यता, संस्कृति की चरम और अनिवार्य अवस्था है।" अपनी प्रसिद्ध पुस्तक डेक्लाइन आव दि वेस्ट में इसी विचार को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है कि विकास की अवस्था में संस्कृति का रूप आध्यात्मिक और बौद्धिक होता है तथा पतन की अवस्था में व्यापारिक और तांत्रिक पतन की अवस्था को ही सभ्यता कहा जा सकता है। सभ्यता के युग में बौद्धिकता का ह्यास होता है। संस्कृति का पतन सभ्यता का युग होता है। अत: संस्कृति को जीवन और सभ्यता को मृत्यु का प्रतीक माना जा सकता है। टवायनवी नामक विद्वान स्पेंगलर के इस मत के समर्थक हैं परन्तु उनका अपना विचार यह है कि सभ्यता और यान्त्रिक प्रगति का कोई सम्बन्ध नहीं। यान्त्रिक प्रगति होने पर भी किसी समाज में सभ्यता का पतन हो सकता है। साथ ही ठनका कथन है कि विभिन्न संस्कृतियों एक-दूसरे को प्रभावित भी करती हैं संस्कृति एवं सभ्यता के इस अन्तर को ध्यान में रखते हुए यह समझ लेना चाहिए कि संस्कृति और सभ्यता को बिलकुल पृथक्-पृथक् नहीं किया जा सकता। साधारण नियम के अनुसार संस्कृति और सभ्यता दोनों का विकास एक साथ होता है और दोनों एक-दूसरे पर अपना प्रभाव डालती हैं।

सभ्यता तथा संस्कृति का सम्बन्ध -

(1) मनुष्य द्वारा समाज, सामाजिक प्रयास द्वारा सभ्यता तथा सभ्यता के साथ संस्कृति का क्रमिक विकास हुआ है। यह विकास पूर्णतः एक विकासवादी प्रक्रिया का परिणाम है। जब मनुष्य अपने प्रयास द्वारा निर्धारित लक्ष्य की ओर अग्रसर हुआ तो सभ्यता का विकास प्रारम्भ हुआ। यह सभ्यता सामाजिक वातावरण में ही सम्भव हो पायी थी। जब सभ्यता ने अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की तो कतिपय परिणाम सामने आये-ये परिणाम ही संस्कृति के तत्त्व हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यक्ति, समाज सभ्यता तथा संस्कृति मानव जाति की परगति के बढ़ते हुए चरण हैं अत: सभ्यता तथा संस्कृति का सम्बन्य क्रमिक है तथा एक के अभाव में दूसरे का अस्तित्त्व होना असम्भव है।

(2) मनुष्य की सर्वप्रथम आवश्यकता एवं उसके अपने अस्तित्व को बनाये रखना है। इसके लिये मनुष्य ने विभिन्न उपयोगी कार्य किये-जैसे अश्र उत्पादन, जीवन की सुरक्षा हेतु प्रबन्ध, दैनिक जीवन के उपकरणों का निर्माण आदि। जब उसका अपना जीवन सुरक्षित एवं निश्चिन्त हो गया तो उसका ध्यान अपने मानसिक जगत् की ओर गया तथा उसने संस्कृति के गुणों का विकास किया। उदर की क्षुघा तथा तृष्णा शान्ति होने पर मानसिक क्षुधा जागृत हुई तो उसने अनेकानेक अभौतिकीय कल्पनाएँ की तथा इनसे मयुर सम्बन्य, प्रेम, धर्म, कला, साहित्य, सुरुचिपूर्ण निर्माण, आनन्द, चिन्तन और दर्शन आदि सांस्कृतिक क्रियाओं का जन्म हुआ। शनैः शनैः ये सांस्कृतिक क्रियाएँ भी अति आवश्यक हो गई। इस प्रकार सभ्यता तथा बिल्कुल एकाकार हो गई।

(3) सभ्यता तथा संस्कृति की आदि गाथा में पहले तो मनुष्य सभ्य हुआ और फिर उसने सांस्कृतिक गुणों का विकास किया, परन्तु कुछ ही समय पश्चात् सभ्यता संस्कृति की अनुगामिनी हो गई। अब संस्कृति ने सभ्यता को विकसित होने की क्षमता प्रदान करना शुरू किया और आज हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि संस्कृति के अभाव में सभ्यता का अपना अस्तित्त्व नहीं हो सकता।

(4) सभ्यता तथा संस्कृति के सम्बन्ध का एक अन्य पक्ष यह है कि इन दोनों के बीच कोई मौलिक भेद नहीं है। सभ्यता तथा संस्कृति आपस में कुछ इस तरह घुल-मिल गई हैं कि ठनके मध्य कोई भेद करना असंभव सा है। निवास के लिये एक झोपड़ी भी पर्याप्त है, परन्तु अनेक प्रकार की सुख सुविधाओं से युक्त कलात्मक भवनों का भी निर्माण किया जाता है। उपयोगी वस्तुओं को बनाते समय यह भी प्राप्त किया जाता है कि वे होने के साथ-साथ सुन्दर और कलात्मक भी हों। इस प्रकार मनुष्य के उपयोगी टिकाऊ क्रिया कलापों पर उसकी चिन्तन, कल्पना तथा सौन्दर्य सम्बन्धी अभिरुचियों का प्रभाव पड़ता है। इस दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि अपनी आदि अवस्था के बाद सभ्यता तथा संस्कृति साथ-साथ विकसित होती चली आ रही है। सभ्यता तथा संस्कृति के सम्बन्धों की उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर हम निष्कर्ष स्वरूप कह सकते हैं कि सभ्यता तथा संस्कृति का सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ है। सभ्यता के अभाव में संस्कृति का अस्तित्त्वमें आना संभव था। सभ्य मानव ने संस्कृति के प्रारम्भिक रूप का विकास किया और फिर स्वयं संस्कृति सभ्यता के विकास की अनगामिनी हो गई। मानव समाज की उपलब्धियों चाहे वे भौतिक हों अथवा मानसिक-सभ्यता तथा संस्कृति का ही परिणाम हैं।

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