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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

बेन्थम द्वारा उपयोगिता के अर्थ एवं विकास का वर्णन

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बेन्थम द्वारा उपयोगिता के अर्थ एवं विकास का वर्णन 

उपयोगितावाद वास्तव में एक नैतिक सिद्धान्त है और उसका मूल आधार 'आनन्दवाद' या 'Edonism' नामक एक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त है जिसके जीवन का परम उद्देश्य अधिक-से-अधिक सुख प्राप्त करना है और किसी कार्य का मूल्य इस आधार पर ही लगाया जाना चाहिए कि इसके द्वारा कितने सुख की प्राप्ति होती है जिन कार्यों द्वारा दुःख प्राप्त होता है, उन्हें व्यक्ति को नहीं करना चाहिए। उपयोगितावाद का अर्थ-उपयोगितावाद का अर्थ अधिकतम व्यक्तियों का अधिकार सुख" बताया जाता है। इससे स्पष्ट है कि उपयोगितावाद में सात्जनिक कुल्याण की भावना निहित होती है।

उपयोगितावाद का विकास- उपयोगितावाद का प्रतिपादन करने वाले वाहनों में इंग्लैण्ड के विद्वानों का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है परन्तु यूनानी सभ्यता के समय में एपीक्यरियनों की विचारधारा में भी उसके चिह मिलते हैं रिचर्ड, चेम्बरलेन आदि विद्वानों ने भी इस विचारधारा का प्रतिपादन किया। अंग्रेज दार्शनिकों में सबसे पहले डेविडसन ने राज्य का आधार उपयोगिता बताया। इसका प्रभाव फ्रांस के विचारक हेलबेरिया और हल्वास पर भी पड़ा और उन्होंने भी उपयोगितावादी विचारधारा को मान्यता प्रदान की। उपयोगितावादी विचारको में जर्मी बेन्थम और जेम्स मिल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं येन्धम ने लिखा है-

उपयोगिता के सिद्धान्त का अर्थ वह सिद्धान्त है जो प्रत्येक कार्य का समर्थन या विरोध उस कार्य की इस प्रवृत्ति के अनुसार करे कि वह कार्य सुख को बढ़ाने वाला या घटाने वाला है। यह सिद्धान्त न केवल व्यक्तियों के कार्यों के सम्बन्ध में , प्रस्तुत सरकार के प्रत्येक कार्य के सम्बन्ध में सत्य है।"

मिल के विचार बेन्थम के विचारों से मिलते-जुलते हैं परन्तु फिर भी सुख के सम्बन्ध में दोनों के विचारों में पर्याप्त अन्तर है। बेन्थम मात्रात्मक सुख की बात करता है। जवकि मिल गुणात्मक सुख की। बेन्थम वैयक्तिक सुख का समर्थक है जबकि मिल सामाजिक सुख का। बेन्थम समाज को व्यक्ति के विकास के लिए कर्तव्य को गौण मानता है। मानता है परन्तु जेम्स मिल सुख को प्राथमिक और

बेन्थम का उपयोगितावादी सिद्धान्त -उपयोगितावाद के महान् प्रवर्तक जेरेमी बेन्थम का विचार है कि मनुष्य स्वभाव से एक उपयोगितावादी प्राणी है। उपयोगितावाद एक नैतिक सिद्धान्त है, जिसका आधार सुखवाद है, जिसके अनुसार जिस काम से व्यक्ति को सुख पहुँचता है वह उपयोगी है इंग्लैण्ड में वेन्थम ने इस विचारधारा को जन्म दिया। बेन्थम का सुप्रसिद्ध सिद्धान्त अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख उपयोगितावादी दर्शन का मुख्य निचोड़ कहा जा सकता है। जेरेमी बेन्थम के शब्दों में, "उपयोगितावाद के सिद्धान्त से हमारा तात्पर्य उस सिद्धान्त से है, जिससे सम्बन्धित व्यक्ति की प्रसन्नता में वृद्धि या कमी होती है, जिनके आधार पर व्यक्ति कार्य को या तो उचित अथवा अनुचित ठहराता है, या जिससे सुख मिलता है, दुःख नष्ट हो जाता है।" वेन्यम के अनुसार मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य आनन्द सुख की प्राप्ति करना है। बेन्थम के शब्दों में "प्रकृति ने मानव जाति को दो सत्ताधारी स्वामियों सुख और दुःख के अधीन रखा है। मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य सुख की प्राप्ति करना एवं दुःखों को दूर करना है।"

इस तरह बेन्थम का मत है कि अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख प्रदान करने वाले शासन के कार्यों से अन्य सभी व्यक्तियों को सुख मिलेगा।

1. वेंडम मात्रात्मक सुख की कल्पना करता है- बेंथम के उपयोगितावाद में मात्रात्मक सुख की कल्पना की है। उसके विचार में सभी सुख एक ही प्रकार के हैं, उसके अनुसार यच्चों के खेलकूद और काव्य पढ़ने में कोई अन्तर ना है, दोनों बराबर आनन्ददायक हैं। केवल सख की मात्रा पर ही बल दिया जा सकता है।

2.समानता के सिद्धान्त में विश्वास- सभी मनुष्य समान हैं और समान रूप से माना जाना चाहिये। उसका विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति एक गिना जायेगा एक से अधिक नहीं। बेन्थम का दर्शन लोकतन्त्र का दर्शन है। उसके दर्शन में समानता को महत्त्व दिया गया है, बेन्थम दार्शनिक और श्रमजीवी में कोई अन्तर नहीं मानता।

3. यद्भाव्यम् नीति का समर्थक- वेन्यन यद्भाव्यम् नीति का समर्थक होते हुए एडम स्मिथ के सिद्धांत को महत्व देता है इस नीति के कारण मुक्त व्यापार को सहारा मिलता है, इस प्रकार एंथम मुक्त व्यापार और निजी उद्योग की वृद्धि का समर्थक है।

4. व्यक्तिगत सुख का समर्थक-बेन्थम व्यक्तिगत सुख को अधिक महत्त्व देता है. इसी आधार पर उसने व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता एवं राज्य के कम हस्तक्षेप की मांग की है। बेन्थम व्यक्ति को अधिक महत्त्वपूर्ण मानता है और समाज का स्थान गौण मानता है। उसका विचार है कि समाज व्यक्ति के हित के लिए है।

5. सुधारवादी सिद्धांत-"अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख" इस सिद्धान्त के आधार पर बेंच ने कानून, न्याय, प्रशासन जेल आदि में सुधार किये हैं। बेन्यम की इन सुधार नीतियों का इंग्लैण्ड या विश्व में व्यापक प्रभाव पड़ा।

6. यथार्थवादी दर्शन- उपयोगितावादी सिद्धान्त यथार्थवादी दर्शन हैं, उपयोगितावादियों के अनुसार राज्य के आदेशों को इसलिए माना जाता है कि वे लोगों के लिए लाभदायक है। अतः उपयोगितावादी प्रत्येक चीज की उपयोगिता के अनुसार उसे अच्छा और बुरा मानते हैं। इसी आधार पर वे राज्य को उचित मानते हैं।

मिल द्वारा बेन्थम के उपयोगितावाद में संशोधन

1. गुणात्मक सुख-जे० एस० मिल सुख और दुःख के मात्रात्मक भेद के अलावा गुणात्मक भेद को भी मानता है। मिल के अनुसार वे कार्य करना चाहिए जिससे उच्चकोटि का सुख प्राप्त हो, चाहे वह क्षणिक ही क्यों न हो? मिल के शब्दों में, "एक सन्तुष्ट सुअर होने की अपेक्षा, एक असन्तुष्ट मानव होना अधिक श्रेयश्कर (अच्छा) है।" बेन्थम के सुखवादी मापक यंत्र से गुण को नापा नहीं जा सकता।

2. असमानता- मिल के अनुसार सब मनुष्य एक समान नहीं हो सकते, क्योंकि सुकरात जैसा विद्वान् एक मूर्ख व्यक्ति से भिन्न है, तात्पर्य यह है कि सभी व्यक्ति सुकरात, प्लेटो, अरस्तु चाणक्य, महात्मा गांधी और नेहरू नहीं हो सकते। उनके व्यक्तित्त्व में अन्तर है। मिल ने मनुष्यों को एक-दूसरे से भिन्न माना है। इसीलिये मिल ने प्रतिभाशाली व्यक्तित्त्व को "निश्चित संख्या के मत" देने के लिए कहा है। उसका विचार है कि विद्वान् व्यक्ति मत देने का अधिकारी तो है ही, परन्तु उसे एक से अधिक मत देने का अधिकार होना चाहिए।

3. यद्भाव्यम् नीति में सुधार- मिल चाहता है कि यद्भाव्यम् नीति पर कुछ नियन्त्रण होना चाहिए, मिल के विचार से अल्पसंख्यक के लिए तथा श्रमिकों के हितों को ध्यान में रखकर राज्य को कुछ नियन्त्रण आवश्यक रूप से करना चाहिए।

4.मील का अधिक नैतिक होना- मिल का उपयोगितावादी सिद्धान्त नैतिक है, किन्तु बेन्थम का उपयोगितावादी सिद्धान्त राजनीतिक है। मिल सामाजिक सुख की चर्चा करता है कि नैतिक तथा स्वस्थ वातावरण का निर्माण राज्य में होना चाहिए।

5. स्वतंत्रता का समर्थक- मिल बौद्धिक स्वतंत्रता का बौद्ध प्रचारक था, उसने महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता पर बल दिया। महिला मताधिकार की आवाज को सर्वप्रथम मिल ने ही उठाया है। व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ मिल ने लोकतंत्र और प्रतिनिधि शासन आदि पर अपने विचार दिये हैं।

6. अन्तःकरण के तत्त्व पर यल-जे० एस० मिल व्यक्ति के अन्तःकरण पर अधिक ध्यान देता है, परन्तु बेन्थम मनुष्य के बाह्य बातों पर बल देता है। मिल का कहना है कि व्यक्ति यदि अपने अन्त:करण की आवाज को सुनकर कार्य करेगा तो उसे अवश्य ही सुख प्राप्त होगा।

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