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शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

एशिया की पर्वत प्रणालियों का विवरण

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एशिया की पर्वत प्रणालियों का विवरण 


(1) उत्तर के प्राचीन भूखण्ड (2) दक्षिण के प्राचीन भूखण्ड (३) नवीन वलित श्रेणियाँ (4) अवशिष्ट भाग।


1. उत्तर के प्राचीन भूखण्ड (Ancient Blocks of North) एशिया महाद्वीप के उत्तरी भाग में प्राचीन आग्नेय तथा रुपांतरित शैलों से निर्मित भूखण्ड र्थित हैं, जो कैम्ब्रियन युग से पूर्व के हैं इनमें ग्रेनाइट, नीस, शिस्त, स्लेट आदि शैलें पाई जाती हैं। इरों अंगारा लैण्ड भी कहा जाता है। इस भूखण्ड की चार प्रमुख इकाइयाँ हैं (क) बाल्टिक भूखण्ड (Baltic shield), (ख) अंगारा लैण्ड (Angaraland) (ग) चीनी भूखण्ड (Chinese massif) तथा (घ) सारडीनियन भूखण्ड (Sardinian Massif )।

2. दक्षिण के प्राचीन भूखण्ड (Ancient blocks of South) - एशिया के पश्चिमी तथा दक्षिणी मध्य मार्ग पर प्राचीनतम कठोर शैलों से निर्मित दृढ़ भूखण्ड विस्तृत हैं, जो आदिकालीन 'पेन्जिया' के विखण्डन से उत्पन्न 'गोंडवाना लैण्ड' का भाग है। कैम्ब्रियन युग के बाद गोंडवाना लैण्ड विखण्डित होकर तीन दक्षिणी महाद्वीपों तथा भारतीय एवं अरब प्रायद्वीपों के रूप में अस्तित्व में आया इन दृढ़ भूखण्ड पर कभी भी समुद्रों का अतिक्रमण नहीं हुआ, यह वलन क्रिया से भी अप्रभावित रहा है।

3. नवीन वलित पर्वत श्रेणियाँ (New Folded Mountain Ranges) - प्राचीनकाल में आदिकालीन पेंजिया विखडित होकर दो भू-भागों - उत्तर में अंगारा लैण्ड तथा दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड में विभक्त हो गया था इन भू-भागों के मध्य उथला टेथीस सागर स्थित था। स्थल खण्डों से लाये गये अवसाद टेथिस सागर में निपेक्षित होने लगे मेसीजोड़क यूग में प्रारम्भ व्यापक हलचलों से इन अवसादों में वलन पड़े, जिससे वलित पर्वतों की उत्पत्ति हुई। इन पर्वत शृखलाओं में पश्चिम से पूर्व तक टॉरस, वॉण्टिक,जाग्रोस, एलबुर्ज, हिन्दकुश, सुलेमानस किरथर, हिमालय, कराकोरम, तियान शान, अराकान योमा आदि सम्मिलित है। इन पर्वत श्रेणियों के मध्य अनेक उच्च पठार स्थित है इन पर्वत श्रेणियों का निर्माण यूरोप के आल्पस पर्वतों के साथ समान प्रक्रिया द्वारा हुआ था, अतः इन्हें अल्पाइन पर्वत श्रेणियाँ कहा जाता है। अवशिष्ट भाग (Residual Part) - टर्शियरी युगीन पर्वत निर्माण क्रिया है पूर्व में भी कैलेडोनियन तथा हर्सीनियन भूगार्भिक हलचलों द्वारा पर्वत का निर्माण हुआ था। इनकी शैलें पुराजीव कल्प (Paleozoic Era) तथा मध्य जीव कल्प (Mesozoic Era) में निर्मित हुई थी। इन पर्वत की उत्पत्ति के बाद अत्यधिक अपरदन के कारण ये पर्वत घिसकर बहुत नीचे हो गये,अब ये अवशिष्ट पर्वतों के रूप में स्थित हैं। दीर्घकालीन अपरदन से कुछ पर्वत पीसकर समप्राय मैदान (Pene Plane) बन गये हैं । उच्चावच (Relief) एशिया महाद्वीप का धरातलीय स्वरूप अत्यधिक विषम है। यहाँ ऊँची पर्वत श्रेणियाँ, उच्च पठार तथा नदियों के विशाल मैदान मिलते हैं स्थलाकृति की दृष्टि से एशिया महाद्वीप को पाँच भागों में बाँटा जा सकता है

 - (1) उत्तरी निम्न भूमि (2) मध्यवर्ती पर्वत एवं पठार (3) नदियों के मैदान (4) दक्षिणी प्रायद्वीप पठार तथा (5) द्वीप माला।

1.उत्तरी निम्न भूमि (Northern Lowlands) - इसके अंतर्गत साइबेरिया की निम्न भूमि सम्मिलित है जो त्रिभुजाकार रूप में विस्तृत है। यह एक हिमानी हर्षित मैदान है, जिसके ऊपर ओब, यनीसी तथा लीना नदियाँ उत्तर की ओर बहता इस मैदान के उत्तर में आर्कटिक महासागर या पश्चिम में यूराल पर्वत स्थित है। दक्षिण तथा पूर्व में प्रत्यय तथा पठारी भाग स्थित है जीत श्रतु में उत्तर की ओर प्रवाहित होने वाली नदियों के मुहाने जम जाते है, जिससे उनके निचले भाग दलदली हो जाते है। इस निम्न मैदानी भाग को तीन खण्डों में काटा जा सकता है। - (क) पश्चिमी साइबेरिया का मैदान, (ख) मध्य साइबेरिया का मैदान (ग) तुर्किस्तान का मैदान मध्यवर्ती पर्वत एवं पठार (Central Mountains and Plateaus) - एशिया के 20% भू-क्षेत्र को घेरते हुए, उसके मध्यवर्ती भाग में उच्च पर्वत श्रेणियाँ तथा उनके मध्य पठारी भूमि पायी जाती है। पर्वत श्रृंखला का विस्तार पश्चिम में टर्की से लेकर उत्तर-पूर्व में वेरिंग सागर तक है। महाद्वीप के मध्य में पामीर की गाठ स्थित है जिसे दुनिया की छत (Roof of the world) कहा जाता है। यहाँ से अनेक पर्वत श्रेणियों को चार क्रमों में बाटा जाता है। (क) प्रथम पर्वत क्रम - यह पश्चिमी भाग में स्थित है। इसके अंर्तगत उत्तर-पश्चिम दिशा में विस्तृत हिन्दकुश तथा एलर्बुज पर्वत श्रेणियां सम्मिलित हैं। एलबुर्ज श्रेणी पश्चिम में आर्मीनिया की गाँठ से जुड़ी है। पामीर से दक्षिण-पश्चिम की ओर सुलेमान, किरथर तथा जाग्रोस पर्वत श्रेणियाँ स्थित है। जाग्रोस पर्वत श्रेणी पश्चिम में आर्मीनिया की गांठ से जुड़ी है। उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में फैली पर्वत श्रेणियों के मध्य ईरान का पठार स्थित है। एशिया माइनर के पूर्वी भाग में स्थित आर्मीनिया की गांठ से पश्चिम की ओर दो पर्वत श्रेणियाँ भूमध्य सागर तट तक फैली है। इनमें उत्तरी श्रेणी पॉण्टिक तथा दक्षिणी श्रेणी टॉरस कहलाती है पॉण्टिक तथा टॉरस श्रेणियों के मध्य अनातोलिया का पठार स्थित है, जिसे एशिया माइनर कहा जाता है। (ख) द्वितीय पर्वत क्रम - यह पर्वत क्रम दक्षिण तथा पूर्व की ओर विस्तृत है। दक्षिण-पूर्व की ओर हिमालय पर्वत सबसे महत्वपूर्ण है,जो एक चाप की भाँति विस्तृत है। यह पर्वत श्रेणी विश्व में सर्वोच्च श्रेणी है (इसकी सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट (8850 मी) विश्व में सर्वोच्च है)। हिमालय पर्वत की एक शाखा दक्षिण की ओर म्यांमार के तट तक चली गयी है, जिसमें पटकोई, अराकान योमा तथा तनासरिम की पहाड़ियाँ सम्मिलित हैं। (ग) तृतीय पर्वत क्रम यह पामीर की गाँठ से पूर्व की ओर विस्तृत है। इसमें अनेक पर्वत श्रेणियाँ सम्मिलित हैं। पामीर की गाँठ से उत्तर-पूर्व विश्व में विस्तृत पर्वतों में अल्ताईताग, नानशान तथा खिगंन प्रमुख है। दक्षिण-पूर्व दिशा में क्युनलुन, की शान तथा सेलिंग शान श्रेणियाँ तथा क्युनलुन के दक्षिण में काराकोरम श्रेणी विस्तृत है। हिमालय तथा क्युनलुन श्रेणियों के मध्य तिब्बत का पठार (4500 मी.) स्थित है, जो विश्व का सर्वोच्च पठार है। (घ) चतुर्थ पर्वत क्रम - पामीर से उत्तर-पूर्व की ओर तियानशान, अल्टाई,योब्लोनॉय तथा स्टेनोबॉय पर्वत श्रेणियाँ फैली है। सुदूर पूर्व में कराया स्क, कोलिया, अनादिर, कमचटका आदि श्रेणियाँ उल्लेखनीय हैं। तियानशाना तथा क्युनलुन पर्वत श्रेणियों के मध्य तारिम बेसिन स्थित है, जो एक अन्तःप्रवाही क्षेत्र है।

3. नदियों के मैदान (River Plains) पर्वत श्रेणियों तथा पठारी भागों के मध्य अनेक नदियों के मैदान स्थित है, जो नदियों के अवसादों के निक्षेपण से निर्मित है। इन मैदानों में निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं.

(क) दजला-फरात का मैदान- यह मैदान इराक में दजला (Tigris) तथा फरात (Euphrates) नदियों के दोआब पर विस्तृत हैं। ये दोनों नदी उत्तर में अराशत पर्वत से निकलकर दक्षिण की ओर बहता हुई फारस की खाड़ी में गिरती है। खाड़ी में गिरने से पुर्व ये दोनों परस्पर मिलकर शत्तल अरब कहलाती है। यह मैदान दक्षिण-पश्चिम एशिया के शुष्क मरुस्थल का ही अंग है। प्राचीनकाल में यहाँ बेबीलोन, असीरिया मेरी आदि सभ्यताओं का विकास हुआ था।

(ख) सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान - इस मैदान का विस्तार भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में सुलेमान-किरथर श्रेणियों के पूर्व में तथा हिमालय पर्वत के दक्षिण में है। सिन्धु का मैदान अधिकांशतः

पाकिस्तान में विस्तृत है,जबकि गंगा तथा ब्रह्मपुत्र का मैदान भारत तथा बंगलादेश में विस्तृत है। यह मैदान विश्व का सर्वाधिक विस्तृत जलोढ़ मैदान है। सिंधु घाटी तथा कालांतर में वैदिक (आर्य) सभ्यता

का विकास इसी मैदान में हुआ था। (ग) इरावदी का मैदान-म्यांमार के दक्षिणी भाग में विस्तृत है। (घ) मीना का मैदान- इसका विस्तार थाईलैंड में हैं। (ङ) मीकांग का मैदान - इसका विस्तार हिन्द चीन पर है। (च) वांग हो का मैदान- इस मैदान का विस्तार उत्तरी चीन पर है। यह वांग हो तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा लोयस के पठार से बहाकर लाये गये अवसादों के निक्षेपण से निर्मित हैं। (छ) यांग्त्सी का मैदान- इसका विस्तार मध्यवर्ती चीन पर है। उर्वर होने के कारण यह चीन का सबसे अधिक आबादीवाला क्षेत्र है। (ज) सी क्यांग का मैदान-यह मैदान चीन के दक्षिण भाग में स्थित है। यह एक संकरा मैदान है, किन्तु चावल तथा चाय की खेती के लिए उपयुक्त है।

4. दक्षिणी प्रायद्वीप पठार (Southern Peninsular Plateaus) - एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में तीन प्रादीपीय पठार-अरब का पठार, दकन का पठार तथा हिन्द चीन का पठार स्थित है। अरब का प्रायद्वीपीय पठार - एशिया के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में अरब प्रायद्वीप स्थित है, जो पूर्व में फारस की खाड़ी, पश्चिम में लाल सागर तथा दक्षिण में अरब सागर द्वारा घिरा है। यह पठार प्राचीन कठोर शैलों से निर्मित गोडवाना लैण्ड का अंग है। यह एक शुष्क, रेतीला मरूस्थल है। भारतीय प्रायद्वीपीय पठार (दकन का पठार) यह पठार भी प्राचीन गोंडवाना लैण्ड का अंग है। यह अग्नेय तथा रुपांतरित शैलों से निर्मित है। इसके पश्चिमी भाग में पश्चिमी घाट की पहाड़ियां स्थित है तथा पूर्वी भाग में कम ऊँची तथा विच्छेदित पहाड़ियाँ पूर्वी घाट के रूप में स्थित है। पठार के उत्तरी भाग में अनेक नीची पहाड़ियाँ पूर्व-पश्चिम दिशा में विस्तृत हैं, जिनमें विंध्या, सतपुड़ा, कैमूर,राजमहल आदि प्रमुख हैं। इस पठार पर महानदी गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि नदियों पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में गिरती है, जबकि नर्मदा एवं तापी पश्चिम की ओर अरब सागर में गिरती है। यह पठार नदियों द्वारा अत्यधिक काट-छाँट दिया गया है। हिन्द-चीन का पठार - इस पठार का विस्तार कम्बोडिया, लाओस तथा वियतनाम पर है। इस पठार के अंर्तगत शान, क्वीचाऊ तथा यूनान के पठार भी सम्मिलित हैं। यह नदियों द्वारा अत्यधिक अपरदित हो गया है।

5. द्वीपमालाएं (Archipelagoes) एशिया के पूर्व तथा दक्षिण-पूर्व में मुख्य स्थल के निकट उत्तर से दक्षिण की ओर द्वीपों तथा द्वीप समूहों की चापकार श्रृंखला मिलती है। इनका निर्माण टर्शियरी युगीन नवीन वलित पर्वत श्रेणियों के साथ हुआ था। वस्तुतः ये द्वीप समूह वलित पर्वत श्रेणियों के उच्च भाग हैं, जो कालांतर में सागरों में डब गये थे। इन सभी द्वीपों के मध्यवर्ती भाग में वलित पर्वत, भ्रश तथा ज्वालामुखी पाए जाते है। इनकी संरचना अत्यधिक जटिल है तथा इनमें रूपांतरित शैलो की प्रधानता है। इन द्वीपों की संख्या कई हजार है। अकेले फिलीपींस द्वीप समूह में ही लगभग 7000 द्वीप ती है जिनमें लुजो तथा मिंडानाओ द्वीप विशालतम तथा समर, विसायन, बोहोब, पनाय.

नेपाल अन्य प्रमुख द्वीप है। फिलीपींस के उत्तर में क्यूराइल, सखालीन, जापान के द्वीप होकैडो,होन्शू, क्यूशू तथा शिकोकू) एवं ताइवान स्थित है। फिलीपीन्स के दक्षिण में जावा, सुमात्रा, सेलीवीज, मदुरा, बोनियो, न्यू गिनी, कालीमंटन, इरियन आदि द्वीप स्थित है सुमात्रा के उत्तर-पश्चिम में अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूह स्थित हैं। अधिकांश द्वीपों के मध्यवर्ती भाग में उच्च भूमि तथा तटीय भाग में संकरी मैदानी पट्टी पाई जाती है।अन्य द्वीपों में मालदीव, लक्षद्वीप आदि है, जो मुख्यतः प्रवाल (coral) से निर्मित हैं।

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