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एशिया के सदाबहार वनों के आर्थिक महत्व

एशिया के सदाबहार वनों के आर्थिक महत्व 


वन(forest)भूतल के किसी विस्तृत क्षेत्र में वृक्षों से आच्छादित भूमि तथा वृक्षों के समूह को वन कहते हैं। वन में पाये जाने वाले वृक्ष प्राकृतिक अथवा मानव द्वारा रोपित हो सकते हैं जो प्रायः लम्बे, परिपक्व तथा सघन होते हैं। वृक्षों के विकास के लिए अपेक्षाकृत अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है। इसी कारण से वन प्रायः उन प्रदेशों में पाये जाते हैं जहाँ वर्षा अधिक होती है अथवा वाष्पीकरण कम होने से नमी में हास कम होता है। शीतोष्ण कटिबंध में वर्षा अपेक्षाकृत कम होने पर भी जहाँ वाष्पीकरण कम होता है, वहाँ भी वनों का विकास होता है।वनों विकास के लिए उच्च तापमान,अधिक वर्षा, पर्याप्त सूर्य प्रकाश, उपजाऊ मिट्टी आदि दशाएं उपयुक्त होती हैं। एशिया में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के वनों की विशेताओं और उनक वितरण का विवरण अग्रांकित है। उष्णकटिबंधीय वर्षा वन (Tropical Rain Forests) इस प्रकार के वन भूमध्य रेखा के समीप 10° उत्तरी अक्षांश और 10° दक्षिणी अक्षांश के मध्य पाये जाते है। भूमध्यरेखीय वन दक्षिणी-पूर्वी एशिया मलाया, इण्डोनेशिया तथा न्यूगिनी) और श्रीलंका में पाये जाते हैं। उष्ण जलवायु के कारण भूमध्य रेखीय प्रदेशों में विविध प्रकार के लम्बे लम्बे वृक्ष सघन रूप से उगते हैं जो चौड़ी पत्ती वाले होते हैं और अपनी पत्तियां बारी-बारी से गिराते हैं जीरो वन सदैव हरे-भरे रहते हैं। भूमध्यरेखीय वर्षा वन अत्यंत सघन होने के कारण वृक्षों में सूर्य प्रकाश की प्राप्ति के लिए होड़ लगी रहती है जिससे वृक्ष अधिक लम्बे हो जाते हैं इन वनों में 60 से 80 मीटर तक लम्बे वृक्ष पाये जाते है। इन वनों में अनेक जाति के वृक्ष साथ-साथ मिले-जुले उगते हैं। वृक्षों के शिखर छतरीनुमा होते है जिसके कारण सूर्य की रोशनी भूमि तक नहीं पहुँच पाती है और दिन में भी अंधकार बना रहता है। बड़े वृक्षों के नीचे लघु वृक्ष और झाड़ियाँ मिलती हैं वृक्षों के साथ सघन लतायें पायी जाती है जो वृक्षों पर चढ़ी होती है और उन्हें बांधे रहती हैं जिसके कारण इन वनों में प्रवेश करना अत्यंत कठिन होता है। भूमध्यरेखीय वनों में महोगनी,सिनकोना, रबड़, एबोनी, गटापार्चा,रोजवुड, ताड़,बांस, बत, बनूस आदि वृक्षों की प्रमुखता पायी जाती है इन वृक्षों की लकड़िया कठोर और मजबूत होती है जो इमारती उपयोग, फर्नीचर आदि के लिए उपयुक्त होती हैं यातायात के साधनों के अभाव, वनों की सघनता के कारण प्रवेश की कठिनाई आर्थिक पिछड़ेपन तथा जलवायु की विषमता एवं अनुपयुक्ता के कारण इन वनों का आर्थिक प्रयोग बहुत कम हो पा रहा है। उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous Forests)- उष्णकटिबंधीय मानसूनी प्रदेशों में जहाँ 100 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा होती है सामान्यतः बॉडी पत्ती बाले पर्णपाती वन उगते हैं इन्हें मानसूनी वन के नाम से भी जाना जाता है। इस मानसूनी वन सामान्यतः 10 से 30 अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पूर्वी तथा दक्षिणी-पूर्वी भार्गों में पाये जाते हैं। उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (मानसूनी वन) दक्षिण एशिया में पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश दक्षिण-पूर्व एशिया में म्यांमार, थाईलैंड, कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम और दक्षिणी चीन में मिलते हैं इन वनों में आने वाले प्रमुख वृक्ष हैं साल,सागौन, बांस, आम, जामन, नीम, पीपल, बरगद, गुलर,महोगनी, देवदार, नारियल आदि। मानसूनी वनों के वृक्ष शीतकात के अंत में एक साथ अपनी पत्तियों गिरा देते हैं और उनके स्थान पर बसंत ऋतु में नवीन पत्तियों निकलती हैं। इसीलिए इन्हें पर्णपाती वन कहते हैं।

 इस प्रकार के वन 30 से 40°-अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में भूमध्य सागरीय जलवायु प्रदेशों में विकसित होते हैं, अतः इन्हें भूमध्य सागरीय वन के नाम से भी जाना जाता है। इन प्रदेशों की प्रमुख विशेषता है ग्रीष्म ऋतु का शुष्क होना और केवल शीत ऋतु में ही वर्षा का होना । इन प्रदेशों में ग्रीष्मकालीन औसत तापमान 15 से 25 सेल्सियस और शीतकालीन औसत तापमान से 10 सेल्सियस तक पाया जाता है और औसत वार्षिक वर्षा 50 से 75 सेमी० पायी जाती है। वर्षा प्रायः शीत ऋतु में होती है और ग्रीष्म शुष्क रहती है और तेज गर्मी पड़ती हैं। भूमध्य सागरीय वन एशिया में सीरिया, लेबनान, इजराइल और तुर्की के सागर तटीय भागों में पाये जाते हैं। भूमध्यसागरी प्रदेशों में जलवायु के अंकल कम ऊँचाई वाले सदापर्णी वक्ष और झाड़ियाँ उगती हैं। यहाँ ऐसे वृक्ष और पौधे उगते हैं जो शुष्क ग्रीष्म ऋतु को झेल सकें। पर्यावरण के अनुकूल इस वन के वृक्षों की जड़े लम्बी और गाँठदार होती हैं जो भूमि में अधिक गहराई से नमी को ग्रहण कर सकें। वृक्षों की छाले मोटी और चिकनी तथा पत्तियाँ मोटी. गूदेदार और छोटी होती हैं जिससे वाष्पीकरण कम होता है तथा मिट्टी से नमी की ड्रेस कम होता भूमध्य सागरीय वनों के वृक्षों में नींबू, नारंगी, अंजीर, सेब शहतूत, जैतून, ओक आदि प्रमुख हैं। ऊँचे पर्वतीय भागों में पाइन, फर, सीडर, साइप्रस, यूकलिप्टस, बालनट, जूनीफर, रोजउड आदि वृक्ष उगते हैं भूमध्यसागरीय प्रदेश में रसदार फलों वाले वृक्षों एवं लताओं की प्रमुखता पायी जाती है इनके अतिरिक्त यत्र-तत्र छोटे-छोटे वृक्ष तथा झाड़ियां भी आती हैं जैसे मैक्विस, चैपरल, नागफनी आदि। शीतोष्ण कटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले पर्णपाती वन (Temperate Broad Leaves Deciduous Forests)-

इस प्रकार के पर्णपाती वन 40 से 60 उत्तरी अक्षांश के मध्य पूर्वी एशिया में पाये जाते हैं जिसका विस्तार उत्तरी-चीन, मंचूरिया, कोरिया, जापान आदि देशों में है। इन्हें शीतोष्ण मानसूनी पर्णपाती वन भी कहा जाता है। इस प्रदेश के वृक्ष शुष्क ऋतु के आरम्भ में अपनी पत्तियाँ एक साथ गिरा देते हैं जिनके स्थान पर नवीन पत्तियों के निकलने पर ये वृक्ष पुनः हरे भरे हो जाते हैं। शीतोष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वृक्षों में ओक, बीच, मैपिल, अखरोट, चेस्टनट तुंग,पापलर, ऐश, बर्च, चेरी, एल्म, शहतूत आदि प्रमुख हैं। इन वन से मजबूत और सुन्दर लकड़ियाँ प्राप्त हैं जो भवन निर्माण तथा फर्नीचर निर्माण के लिए उपयुक्त होती हैं मैदानी भागों में वनों को साफ करके कृषि की जाने लगी है और वन मुख्यतः पर्वतीय भागों में ही सुरक्षित हैं। शीतोष्ण कटिबंधीय स्कूल वन (Temperate Coniferous Forests)- इन वनों के वृक्ष स्कूल या कोणधारी होते हैं जिनकी पत्तियाँ नुकीली होती हैं। ये वन सदापर्णी होते हैं तथा वृक्षों की पत्तियाँ वर्ष भर गिरती-उगती रहती हैं। जिससे वन सदैव हरे-भरे रहते हैं। इस प्रकार के वन टैगा तुल्य जलवायु प्रदेशों में विकसित होते हैं, अतः इन्हें टैंगा वन (Taiga forest) के नाम से भी जाना जाता है। टैगा वन उत्तरी गोलार्द्ध में 60 से 70 अक्षांश के मध्य पाये जाते हैं। एशिया में टैगा वनों का विस्तार उत्तर में ट्ण्ड़ा प्रदेश और दक्षिण में शीतोष्ण घास प्रदेश के मध्य साइबेरिया में है। टैगा वनों की पेटी 1000 से 2500 किलोमीटर तक चौड़ाई में फैली हुई है। टैगा वनों की पत्तियाँ नुकीली होती हैं और नीचे की ओर झुकी होती है। इस विशेषता के कारण ये कठोर शीत और हिमपात से अपनी सुरक्षा करने में समर्थ होती हैं। टैगा वनों में स्प्रस पाइन, चोदा, सीडर, हेमलाक,फर, लार्च आदि वृक्ष बहुतायत से पाय जाते हैं ।टैगा वन के दक्षिणी छोर पर मैपिल जीच ऐश, चेस्टनट आदि चौड़ी पत्ती वाले पर्णपाती वृक्ष भी पाये जाते हैं जिससे वहाँ के वन लिखित प्रकार के हैं। शंकुधारी टैगा वनों की लड़कियों कोमल होती हैं और लुग्दी, गत्ता, कागज, माचिस माचिस की तीलियों आदि बनाने के लिए उपयुक्त होते हैं। इसी कारण से टेंगा वनों का अर्थिक महत्व सर्वाधिक है।

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