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शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

एशिया के मानसून की विशेषता

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एशिया के मानसून की विशेषता 

जलवायु (Climate) - एशिया की जलवायु में अनेक विविधता तथा अतिशयता (extremes जाती है। विश्व के द्वितीय उच्चतम (जैकोबाबाद 54 से0) एवं न्यूनतम (वखोयास्क 50°से) ताप भी यही दर्ज होते है। एशिया की जलवायु को प्रभावित करने में तीन कारकों- अक्षांशीय विस्ता समुद्र से दूरी तथा उच्च पर्वत श्रेणियों का प्रमुख प्रभाव महत्वपूर्ण है। एशिया का कुल अक्षांशीय विस्तार 90% (10 दक्षिण से 80° उत्तर तक) है। इस विश महाद्वीप के मध्यवर्ती भाग महासागरों से 3000 किमी तक दूर है, जिससे आतन्तरिक भाग सागरी प्रभाव से वंचित रह जाते हैं तथा तापमानों की मौसमी अतिशयताएँ उत्पन्न होती हैं। एशिया के मध्यवतों भागों में स्थित उच्च पर्वत श्रेणियों की जलवायु के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।  यह पर्वत श्रेणियाँ एशिया को दो भागों में विभाजित करती हैं -उत्तर में 'शुष्क एशिया तथा दक्षिण मानसून एशिया'। ये पर्वत श्रेणियाँ उत्तरी बर्फीली पवनों को रोककर दक्षिण तथा दक्षिणी-पूर्व एशिया को अत्यधिक शीतल होने से बचाती है। ऋतुएँ (Seasons)

एशिया में मोटे पर दो ऋतुएँ पाई जाती हैं-ग्रीष्म ऋतु तथा शीत ऋतु। ग्रीष्मकालीन दशाएँ.


अप्रैल से सितम्बर तक रहती है। 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत चलता है, जिस सम्पूर्ण महाद्वीप में तापमानों में वृद्धि होती है। उत्तरी ध्रुवीय प्रदेश में भी तापमान 10 सेल्यिस तक पहुँच जाते हैं। दक्षिण-पश्चिमी मरूस्थली भाग में दिन के तापमान 45 सेल्सियस तक होते हैं। जैकोबाबाद (पाकिस्तान) में तापमान 50 से अधिक दर्ज होते हैं। 25 सेल्सियस की समताप रेखा एशिया के मध्य से गुजरती है। दक्षिण एशिया में तापमान 35-40 सेल्सियस तक दर्ज होते हैं। वायुदाब

ग्रीष्म ऋतु में पश्चिमोत्तर भारत से लेकर ईरान तक विस्तृत मरूस्थलीय भाग निम्न दाब के क्षेत्र बन जाते हैं। द्वितीय निम्न दाब का क्षेत्र हिमालय के उत्तर में मध्य एशिया में बनता है। इसके विपरीत, हिन्द महासागर एवं पश्चिमी प्रशान्त महासागर पर उच्च दाब के क्षेत्र स्थित होते हैं। अतट महासागरों से स्थल की ओर आर्द्र पवनें चलने लगती हैं, जिसे ग्रीष्मकालीन मानसून कहा जाता है। वर्षा

एशिया के ग्रीष्मकालीन मानसून को दो वर्गों में रखा जा सकता है दक्षिण-पश्चिमी मानसून, जिसमें पवनें अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी से स्थल (भारतीय उपमहाद्वीप की ओर चलती हैं। दक्षिण-पूर्वी मानसून, जिसमें पवनें प्रशान्त महासागर से दक्षिणी-पूर्वी तथा पूर्वी एशिया (चीन एवं जापान) की ओर चलती है। उल्लेखनीय है कि महाद्वीप पर स्थल एवं जल के विषम वितरण के कारण तापमानों एवं वायुदाब का विपरीत सम्बन्ध प्रभावी होता है। ग्रीष्मकाल में मानसूनी पवने सागर से स्थल की ओर चलती हैं, जिनसे पवनोन्मुख ढालों पर अधिक तथा विमुख ढालों पर कम वर्षा प्राप्त होती है। भारतीय उपमहाद्वीप में 80% से अधिक वर्षा ग्रीष्मकालीन मानसूनों द्वारा प्राप्त होती है। दक्षिण-पूर्वी एशिया के धिकांश मांगों में 200 सेमी से अधिक वर्षा होती है। वर्षा की मात्रा सामान्यतः पूर्व से पशिचम की और कृमश जाती है। दक्षिण-पश्चिम एशिया, मध्य एशिया तथा उत्तरी एशिया में अल्प वर्षी सेमी वार्षिक) होती है। ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनें के साथ सामान्यतः उष्णकटिबंधीय चक्रवात (जो निकटवर्ती रामुद्रों में उत्पन होते है) तटवर्ती भागों में भारी वर्षा कराते है । भारत में पूर्वी तट उड़ीसा तथा आन्दर प्रदेश एवं बांग्लादेश से बहुत प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार चीन सागर में उत्पन्न होने वाले टाइफ चीन के तटीय भागों तथा फिलीपीन्स में भारी वर्षा कराते हैं । मानसून की वास्तविक प्रकृति को विस्तारपूर्वक समझाने के लिए इसे दो भागी में बाँटना उपयुक्त होगा-दक्षिण एशियाई मानसून तथा पूर्वी एशियाई मानसून। दक्षिण एशियाई मानसून दक्षिण एशियाई मानसून भारत, बांग्लादेश पाकिस्तान, श्रीलंका तथा नेपाल एवं दक्षिण- पूर्वी एशियाई देशों में सक्रिय होता है। यह मानसून मूलतः धरातल की प्रकृति से नियन्त्रित होता है। इसमें हिमालय पर्वत तथा तिब्बत के पठार की विशेष भूमिका है। दक्षिण एशियाई (भारतीय) मानसून की उत्पत्ति में उच्च वायुमण्डलीय जेट धाराओं (jet streams) अल निनो तथा दक्षिणी दोलन (EL Nino And Southern Oscillation-ENSO) का भी विशेष प्रभाव है। भारतीय उपमहाद्वीप में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून का आगमन आकस्मिक होता है। तडिपझांझा
(thunder stroms) के साथ मूसलाधार वर्षा, आँधी, बादल की गरज तथा बिजली की चमक के साथ मानसून के प्रथम झोंके का आगमन होता है, जिसे 'मानसून का प्रस्फोट' (burst of monsoon) कहा जाता है है। मानसून के आगमन के साथ ही वायुमण्ड की सापेक्ष आर्द्रता में अप्रत्याशित वृद्धि होने के कारण मौसम उमस भरा हो जाता है। भारत में केरल के तट पर मानसून का आगमन सर्वप्रथम होता है। अरब सागरीय मानसून उत्तर की ओर बढ़ता है तथा धीरे धीरे देश के पश्चिमी भाग में इससे व्यापक वर्षा होती है। पश्चिमी घाट के पवन विमुख ढाल वृष्टि छाया प्रदेश में होने के कारण कम वर्षा प्राप्त करते हैं। बंगाल की खाड़ी का मानसून अपेक्षाकृत देर से प्रारम्भ होता है तथा भारत के पूर्वी तट एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों में वर्षा कराता है। मानसून की इस शाखा से प्राप्त वर्षा की मात्रा पूर्व से पश्चिम की ओर क्रमशः घटती जाती है। पूर्वी एशियाई मानसून पूर्वी एशियाई मानसून प्रणाली दक्षिणी एशियाई मानसून से सर्वथा भिन्न है इसके निम्नलिखित कारण हैं-

1.पूर्वी एशिया का भूखण्ड शीतोष्ण कटिबन्ध में स्थित है, जबकि दक्षिणी एशिया पूर्णतः उष्ण कटिबन्ध में स्थित है। 2-भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर तथा पूर्व में स्थित हिमाचल तथा अन्य पर्वत श्रेणियों के कारण मध्य एशिया की शीतकालीन शुष्क तथा शक्तिशाली पवनें उपमहाद्वीप को प्रभावित नहीं करती। इसके विपरीत पूर्वी एशियाई देश (चीन, जापान, कोरिया, ताइवान) प्रति चक्रवात से उत्पन्न शीतल एवं शुष्क पवनों से प्रभावित होते हैं।

3-पूर्वी एशिया में ग्रीष्मकालीन मानसून की अपेक्षा शीतकालीन मानसून अधिक शक्तिशाली होता है तथा पवनों की दिशा में अपेक्षाकृत अधिक स्थिरता पाई जाती है। इसके विपरीत, दक्षिणी एशिया में ग्रीष्मकालीन मानसून अधिक शक्तिशाली होता है तथा पवनों की दिशा अधिक स्थिर होती है। इस भिन्नता का मूल कारण यह है कि भारत में ग्रीष्मकालीन न्यून दाब क्षेत्र शीतकालीन उच्च दाब क्षेत्र की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है। इसके विरीत, पूर्वी एशिया के शीतकालीन मानसून को प्रभावित करने वाला साइबेरिया स्थित उच्च दाब क्षेत्र ग्रीषमकालीन नयूनदाब क्षेत्र की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है।

दक्षिण तथा पूर्वी एशिया के मानकों को नियन्त्रित करने वाले नम्न दब तथाहव दाब के भा भिन्न होते हैं। पूर्वी एशियाई मानसून के नियंत्रण केन्द्र मध्य एशिया में स्थित होते है,म दक्षिण एशियाई मानसून का नियंत्रण केन्द्र पश्चिमोत्तर भारत मे स्थित होता है। भारतीय मानसून का आगमन तूफानी विस्फोट के रूप में होता है,जबकि पूर्वी एशियाई मान के आगमन के समय मौसम उतना उपद्रव पूर्ण नहीं होता। शीतकालीन दशाएँ-

तापमान-


एशिया में अक्टूबर से मार्च तक की अवधि को शीत ऋतु माना जाता है। 22 दिसम्बर को सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमता है. अतः शीत ऋतु में महासागरों की अपेक्षा स्थलीय भाग अधिक ठन्डे होते हैं। जनवरी शून्य सेल्सियस की समताप रेखा पश्चिम में टर्की से पूर्व की और हिमाचल पर्वत होते हुए मध्य चीन तथा आगे उत्तरी जापान तक जाती है। मध्यवर्ती उच्च पर्वत श्रेणियों के उत्तर मेले पवनों के कारण तापमान काफी नीचे गिर जाते हैं साइबेरिया के उत्तरी भाग में न्यूनत तापमान-50°सेल्सियस से भी नीचे गिर जाते है। हिमालय के दक्षिण में शीतकालीन औसत तापमान 10 सेल्सियस से ऊपरी ही रहते हैं मध्य साइबेरिया, तिब्बत के पठार, हिमालय के उच्च भागों में तापमान शून्य के नीचे दर्ज होते हैं तथा बर्फ जमी रहती है। वायुदाब-
मध्य एशिया में तेजी से तापमान घटने के कारण वायुदाब में वृद्धि होती है तथा उच्च दाब केन्द्र स्थापित हो जाता है। बाहर की ओर वायु दाब घटता जाता है तथा निकटवर्ती महासागरों पर निम्न दाब स्थापित हो जाता है। हिमालय के दक्षिण में उच्च दाब का केन्द्र पश्चिमोत्तर भारत तथा पाकिस्तान में रहता है। शीतकालीन मानसूनी पवने स्थल से सागर की ओर चलने लगती हैं,जो शुष्क होती हैं। हिमालय के विरोध के कारण उत्तर की बर्फीली पवने भारतीय उपमहाद्वीप तक नहीं पहुंच पाती हैं। इस समय भारत में उत्तरी-पूर्वी मानसून सक्रिय होता है। पूर्वी एशिया में शीतकालीन मानसूनी की दिशा उत्तरी-पश्चिमी होती है। वर्षा-

शीतकालीन पवनें शुष्क होने के कारण शीत ऋतु में एशिया महाद्वीप में अल्प वर्षा होती है, किन्तु सागरों के ऊपर से गुजरने पर ये पवनें आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं, जिससे चीन, जापान, वियतनाम, फिलीपीन्स के तटीय भागों में कुछ वर्षा हो जाती है। भारत में तमिलनाडु तट एवं श्रीलंका में भी उत्तरी-पूर्वी मानसूनी पवनों से वर्षा होती है। इसके अतिरिक्त, पश्चिम से आने वाले शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों से दक्षिण-पश्चिमी एशिया में इजराइल, लेबनान, सीरिया, जोर्डन, टर्की आदि भूमध्य सागर तटीय देशों में 50 सेमी तक वर्षा हो जाती है। ये चक्रवातीय विक्षोभ पूर्व की ओर बढ़कर उत्तरी भारत के मैदानी भागों में वर्षा कराते हैं। पश्चिमी हिमालय में हिमपात के रूप में वर्षा होती है। मध्य एशिया तथा उत्तर-पूर्वी एशिया के अधिकांश भाग शीत ऋतु में सामान्यतः शुष्क रहते हैं। कहीं-कहीं अत्यल्प वर्षा हिमपात के रूप में होती है। एशिया के जलवायु प्रदेश (Climatic Regions of Asia)- एशिया के विशाल अक्षांशीय विस्तार, विशाल क्षेत्रीय आधार, मध्यवर्ती उच्च श्रेणियों की उपस्थिति के कारण जलवायु में भिन्नता होना स्वाभाविक ही है। कोपेन, थानथ्वेट, स्टाम्प आदि विद्वानों ने एशिया के जलवायु प्रदेशों को सीमांकित करने के प्रयास किए हैं। एशिया को सामान्यतः निलिखित जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है - (1) विषुवत रेखीय,(2)मानसूनी (3) उष्ण मरुस्थलीय जलवायु प्रदेश, (4) चीन तुल्य, (5) ईरान तुल्य, (6) तूरान तुल्य, (7) भूमध्य सागरीय, (8) तिब्बत तुल्य, (9) अल्टाई तुल्य, (10) मंचूरिया तुल्य, (11) प्रेयरी तुल्य, (12) टैगा तुल्य, (13) टुण्ड्रा तुल्य।

1. विषुवत रेखीय जलवायु प्रदेश एशिया में इसका विस्तार इण्डोनेशिया तथा दक्षिणी मलाया में है। यहाँ औसत तापमान 21° सेल्सियस से 27° सेल्सियस तक होते हैं तथा वार्षिक तापान्तर 2.50 सेल्सियस रहता है। यहाँ प्रतिदिन सायंकाल संवाहनिक वर्षा होती है। वार्षिक वर्षा का औसत 150 सेमी0 रहता है।

2. मानसूनी जलवायु प्रदेश एशिया में इसका विस्तार सर्वाधिक है। इसके अन्तर्गत भारत की अधिकांश भाग, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम तथा दक्षिण चीन सम्मिलित हैं। यहाँ ग्रीष्मकाल औसत तापमान 22 सेल्सियस तथा शीतकाल में 10° सेल्सियस रहते हैं। अधिकांश वर्षा ग्रीष्मकालीन मानसूनों से होती है। कुछ भागों में अल्प वर्षा शीतकाल में भी होती है। वार्षिक वर्षा का औसत 50-100 सेमी होता है।
               


3. उष्ण मरुस्थलीय जलवायु प्रदेश इसके अन्तर्गत भारत का उत्तरी-पश्चिमी तथा संलग्न पाकिस्तान का थार मरुस्थल एवं अरब प्रायद्वीप सम्मिलित हैं। यहाँ ग्रीष्मकाल में 45 सेल्सियस से अधिक तापमान रहते हैं तथा धूलभरी आंधियां चलती हैं। शीतकाल में हिमांक तक गिर जाते है। वार्षिक वर्षा का औसत 25 सेम रहता है। शीतकाल में अल्प वर्षा भूमध्य सागर की और से आने वाले चक्रवातों से होती है। 

4. चीन तुल्य जलवायु प्रदेश इस प्रदेश का विस्तार मध्य तथा उत्तरी चीन, उत्तरी जापान तथा दक्षिणी कोरिया में है। यहाँ ग्रीष्मकालीन औसत तापमान 250-30 सेल्सियस रहते है, किन्तु शीतकाल में बर्फीली हवाओं के कारण तापमान शून्य से भी नीचे पहुँच जाते हैं। वर्षा का औसत 100 सेमी0 तक रहता है, जो पूर्वी एशियाई मानसूनी से प्राप्त होता है। यहाँ उष्णकटिबंधीय चक्रवात (टाइफून) भयंकर विनाशकारी होते हैं, जिनसे भारी वर्षा होती है। शीत ऋतु प्रायः शुष्क रहती है। 

5-ईरान तुल्य प्रदेश इसके अन्तर्गत पूर्वी इराक, ईरान तथा अफगानिस्तान सम्मिलित है। इसकी जलवायवीय दशाएँ उष्ण मरुस्थलीय जलवायु से बहुत साम्य रखती हैं। ग्रीष्म ऋतु में दिन का तापमान 45° सेल्सियस तक पहुंच जाते हैं, जबकि शीत ऋतु में रात्रि के तापमान शून्य के नीचे पहुँच जाते हैं। वार्षिक वर्षा का औसत 25 सेमी0 रहता है। शीत ऋतु में हिमपात होता है।

6-तूरान तुल्य प्रदेश यह जलवायु मध्य एशिया के पश्चिमी भाग में तरान प्रदेश में पाई जाती है। महाद्वीप के आन्तरिक भाग में स्थित होने के कारण यहाँ विषम महाद्वीपीय जलवायु पाई जाती है। ग्रीष्म ऋतु में तापमान 40° सेल्सियस तक पहुँच जाते हैं, जबकि शीत ऋतु में शून्य के भी नीचे गिर जाते हैं तथा हिमपात होता है। वार्षिक वर्षा का औसत 20 सेमी रहता है। शीतकाल शुष्क रहता है ग्रीष्मकाल में अल्प वर्षा होती है। 

7-भूमध्य सागरीय जलवायु प्रदेश इसके अन्तर्गत भूमध्य सागर तटीय देश (जॉर्डन, इजराइल, सीरिया, लेबनान, पश्चिमी टर्की तथा साइप्रस) सम्मिलित हैं। इस जलवायु की प्रमुख विशेषता आर्द्र शीत ऋतु एवं शुष्क एवं ग्रीष्म ऋतु है। ग्रीष्मकालीन औसत तापमान 20°-25°सेल्सियस तथा शीतकालीन औसत तापमान 8°-10° सेल्यिस पाये जाते हैं। पछुवा पवनों के साथ आने वाले चक्रवातों से 25- सेमी0 तक वर्षा होती है। 

8-तिब्बत तुल्य जलवायु प्रदेश यह जलवायु तिब्बत तथा पामीर के पठार पर पाई जाती है। यहाँ ग्रीष्म ऋतु छोटी तथा गर्म एवं शीत ऋतु लम्बी व कठोर होती है। दैनिक तापान्तर ऊँचे रहते हैं। ग्रीष्म ऋतु में औसत तापमान15° 20° सेल्सियस तथा शीत ऋतु में शून्य से बहुत नीचे रहते है। पर्वत शिखरों तथा घाटियों में हिमपात होता है। अधिकांश वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती है। वार्षिक का औसत 50 सेमी० रहता है।

9. अल्टाई तुल्य जलवायु प्रदेश यह उच्च पर्वतीय जलवायु प्रदेश है, जो मध्य एशिया में अल्टाई श्रेणी एवं निकटवर्ती भागों में विस्तार है। यहाँ ग्रीष्म श्रतु लघु होती है तथा तापमान लगभग 10°सेल्सियस रहता है। शीत ऋतु लम्बी होती है तथा तापमान सामान्यतः - 20° सेल्सियस से नीचे रहते हैं। बर्फीली हवाएँ चलती हैं। अधिकांश वर्षा ग्रीष्मकाल में होती है। शीत ऋतु में हिमपात होता है।

10. मंचूरिया तुल्य जलवायु प्रदेश इसका विस्तार मंचूरिया, उत्तरी कोरिया, उत्तरी जापान तथा सखालीन द्वीप पर है। इस जलवायु में साधारण गर्म ग्रीष्मकाल तथा कठोर शीतकाल रहता है। वार्षिक तापान्तर अधिक रहते हैं। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 40 सेमी से कम होती है, जो अधिकांशतः ग्रीष्म ऋतु में होती है। कुछ वर्षा शीत ऋतु में टाइफूनों द्वारा भी होती है।

11. प्रेयरी तुल्य जलवायु प्रदेश इसके अन्तर्गत पश्चिमी साइबेरिया तथा मंगोलिया की घास भूमि सम्मिलित हैं, जिन्हें 'स्टेपी' कहा जाता है। यहाँ ग्रीष्मकाल में अधिक गर्मी होती है। औसत तापमान 20°-25° सेल्सियस रहते हैं, जबकि शीतकाल में तापमान हिमांक के नीचे पहुँच जाते हैं। बर्फीली हवाएँ भी चलती हैं। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 25-30 सेमी0 होती है, जो सामान्यतः ग्रीष्म तथा बसंत ऋतु में हिमपात होता है।

12. टैगा तुल्य जलवायु प्रदेश इस प्रदेश की विस्तार साइबेरिया के उत्तरी भाग पर है। यहाँ ग्रीष्म ऋतु मात्र तीन माह की होती है तथा शीतकाल लम्बा (8-9मास का) होता है। ग्रीष्मकालीन तापमान 5 सेल्सियस तथा शीतकाल में -50° सेल्सियस ताप तापमान रहते हैं। विश्व का द्वितीय सबसे ठण्डा (न्यूनतम तापमान) स्थान वरर्वोयॉस्क यहीं स्थित है। यहाँ अधिकांश वर्षा हिम के रूप में होती है। औसत वार्षिक वर्षा 25-40 सेमी होती है।

13. टुण्ड्रा तुल्य जलवायु प्रदेश इस प्रदेश का विस्तार एशिया के उत्तरी भाग में आर्कटिक महासागर के तट के सहारे एक संकीर्ण पेटी में है। यहाँ 10 माह की कठोर शीत ऋतु होती है। उत्तरी बर्फीले पवनों से तापमान अत्यधिक गिर जाते हैं, जो - 50° सेल्सियस दर्ज होते हैं। सम्पूर्ण प्रदेश हिमाच्छादित रहता है। ग्रीष्मकाल मात्र दो मास का होता है, तब तापमान 5°-10° सेल्सियस तक हो जाते हैं तथा हिम पिघलने लगती है। ग्रीष्म ऋतु में अल्प वर्षा तथा शीत ऋतु में हिमपात होता है। वार्षिक वर्षा का औसत 25-30 सेमी रहता है।

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