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रविवार, 12 जुलाई 2020

अरस्तू को राजनीति विज्ञान का जनक क्यों कहा जाता है?

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अरस्तू को राजनीति विज्ञान का जनक क्यों कहा जाता है? 

अरस्तू को राजनीति विज्ञान का पिता अथवा 'जनक (Father of Political Science) माना जाता है। जबकि राजनीतिक चिन्तन के शुभारम्भ का श्रेय सुकरात तथा प्लेटो को प्राप्त है। राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में अरस्तु का स्थान तीसरा है। फिर भी राजनीति विज्ञान अथवा शास्त्र को स्वतंत्र विज्ञान की कोटि में लाने का श्रेय अरस्तु को प्राप्त है तथा साथ ही प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक होने का श्रेय भी यूनानी दार्शनिक अरस्तु को प्राप्त है। उसने ही सर्वप्रथम राजनीति शास्त्र को विज्ञान का रूप दिया अर्थात् सर्वप्रथम वैज्ञानिक प्रणाली से राजनीतिक विषयों का अध्ययन शुरू कर इस शास्त्र को एक सुव्यवस्थित परिभाषा प्रदान की तथा साथ ही इस विषय के क्षेत्र का निर्धारण किया। अरस्तु के गुरु प्लेटो ने राजनीतिशास्त्र के चिन्तन में जहाँ कल्पना का सहारा लिया वहीं अरस्तु इस व्यावहारिक रूप में वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं उसने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'राजनीतिशास्त्र' की परिभाषा एवं क्षेत्र के साथ-साथ अन्य विषयों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया। अत: उसके राजनीतिक विषयों के अध्ययन पद्धति की वैज्ञानिकता से यह स्पष्ट हो जाता है वह प्रथम राजनीतिक विचारक अथवा दार्शनिक था जिसने इस शास्त्र को विज्ञान का दर्जा दिया अरस्तू ने इस शास्त्र को न केवल वैज्ञानिक पद्धति का सहारा दिया वरन् इसे नीतिशास्त्र जैसे विषय से स्वतंत्र किया। उसके राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में किए गए आवेदनों को लिखित विन्दुओं के आधार पर विवेचित किया जा सकता है

(1) पाश्चात्य राजनीतिक जगत् में वह प्रथम चिन्तन और दार्शनिक था जिसने राजनीतिशास्त्र को स्वतंत्र विज्ञान का दर्जा दिया। वही पहला व्यक्ति था जिसने राजनीतिशास्त्र को नीतिशास्त्र से अलग किया। प्रो० ड्निंग का कथन है कि नीतिशास्त्र की धारणा से इसे पृथक् करके ही उसने इसे स्वतंत्र विज्ञान का रूप दिया। उसने वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर सबसे पहले इस शास्त्र की परिभाषा और इसके क्षेत्र का व्यवस्थित रूप से निर्धारण किया। उसके इस योगदान के कारण ही मैक्सी ने उसे सर्वप्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक की संज्ञा प्रदान की है।

(2) उसने इस शास्त्र को केवल विज्ञान का दर्जा ही नहीं अपितु इसे सर्वोच्च विज्ञान भी कहा है कि जहाँ नीतिशास्त्र वैयक्तिक भलाई तथा अर्थशास्त्र घरेलू भलाई का शास्त्र है, वहीं राजनीतिशास्त्र समस्त मानव की भलाई से सम्बन्धित शास्त्र है, अत: यह सर्वोच्च विज्ञान है।

(3) अरस्तू का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है उसने राजनीति शास्त्र तथा राजनीतिक विषयों के अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया। प्लेटो की भांति उसने कल्पना को कहीं आधार नहीं बनाया। उसने तथ्यों एवं आकड़ों को एकत्र कर उसने परीक्षण के पश्चाट् नियमों एवं सिद्धान्तों का निर्धारण किया। उसने समीक्षात्मक, अनुभावात्मक, ऐतिहासिक तथा प्रयोगात्मक पद्धति के आधार किया अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'राजनीति' की रचना के पूर्व उसने 158 राज्यों के संविधानों का अध्ययन तथा विश्लेषण किया और उसके बाद इसकी रचना की। किसी भी राजनीतिक विषय पर विचार के पूर्व वह तत्कालीन राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन और विश्लेषण करता था।

(4) विषय के वैज्ञानिक विश्लेषण के प्रति झुकाव के कारण उसने न केवल राजनीतिशास्त्र को विज्ञान का दर्जा दिया अपितु उसने आगमनात्मक अथवा व्यक्ति मूलक पद्धति को जन्म भी दिया। इसके अन्तर्गत ठसने वर्गीकरण, ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक पद्धतियों के आधार पर अध्ययन किया।

(5) राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में उसका अन्य महत्वपूर्ण योगदान उसका व्यवहारवादी दृष्टिकोण है। उसने अपने गुरु प्लेटो की भाँति कल्पना नहीं अपुित व्यावहारिकता को अपने चिन्तन का आधार बनाया है।

(6) पाश्चात्य जगत् का वह पहला राजनीतिक चिन्तन और दार्शनिक था जिसने राज्य की उत्पत्ति से लेकर उससे सम्बन्धित समस्त बातों का व्यवस्थित रूप से अध्ययन किया। यद्यपि उसने नगर राज्यों के बारे में अध्ययन किया तथापि अपने अध्ययन के माध्यम से उसने राज्य से सम्बन्धित सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। उसी ने सबसे पहले यह कहा कि व्यक्ति एक राजनीतिक प्राणी है।

(7) राज्य के साथ-साथ उसने सरकार के संदर्भ में भी सिद्धान्तों का निरूपण किया। उसी ने सर्वप्रथम सरकार के तीनों अंगों-नीति निर्धारक प्रशासकीय और न्यायिक का उल्लेख किया।

(8) अपने गुरु प्लेटो से भिन्न उसी ने सर्वप्रथम विधि की सर्वोच्चता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। वह बुद्धिमान व्यक्तियों के विवेक के स्थान पर कानून की श्रेष्ठता में विश्वास करता था।

(9) सर्वप्रथम उसी ने व्यक्तिगत सम्पत्ति के महत्त्व तथा उसके सार्वजनिक हित में उपयोग पर बल दिया। कहने का आशय यह है, उसी ने सर्वप्रथम निजी सम्पत्ति और सार्वजनिक हित में समन्वग स्थापित किया।

(10) पाश्चात्य जगत् में वही प्रथम राजनीतिक दार्शनिक था जिसने नागरिकता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

11) क्रान्ति के संदर्भ में उसके विचार राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में उसके महत्त्वपूर्ण देन है। क्रांति की परिभाषा तथा उसके कारणों और उनके रोकने के उपायों के बारे में उसने जो विचार व्यक्त किये हैं वे ठसकी महत्त्वपूर्ण देन के रूप में हैं।

(12) से व्यक्ति की स्वतंत्रता और रास्ता के मध्य समन्वय स्थापित कर राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया है।

(13) उसने राज्य में लोकमत अथवा जनमत और परम्पराओं के महत्व को स्वीकार किया है। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि उसने वैज्ञानिक पद्धति से राज्य सम्बन्धी बातों का अध्ययन कर राजनीति शास्त्र को विज्ञान का दर्जा प्रदान किया है। राजनीति विज्ञान का जनक होना ही उसका राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में सबसे प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण देन है।

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