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अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का सार है

"अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का सार है।" 

हमारे देश भारत में सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं ये लोग बहु भाषा-भाषी है। इनकी इन विषमताओं को देखकर कोई भी बाहरी व्यक्ति यह समझ सकता है अथवा ठसे सन्देह हो सकता है कि भारत एक देश न होकर छोटे छोटे खण्डों का विशाल जन समूह है। जहाँ प्रत्येक की अपनी पृथक्-पृथक् संस्कृति अथवा सभ्यता है। किन्तु इन प्राकृतिक एवं सामाजिक स्तर की विभिन्नताओं में एकता की एक कभी न टूटने वाली ऐसी कड़ी है जिसकी हम अपेक्षा नहीं कर सकते। इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध विद्वान् हर्यट रिजले ने ठीक लिखा है, "भारत में विभिन्न प्राकृतिक एवं सामाजिक विविधताओं भाषा प्रथाओं तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बीच हिमालय से कन्याकुमारी तक एक निश्चित आधारभूत समरूपता अब भी देखी जा सकती है। वस्तुतः यहाँ एक समान भारतीय चरित्र एवं व्यक्तित्व है जिसे हम घटकों में विभाजित नहीं कर सकते।" यही कारण है कि तमाम विद्वान् यह कहने को बाध्य हो जाते हैं कि अनेकता में एकता है हिन्द (भारत) को विशेषता। इस परिप्रेक्ष्य में यदि हम भारतीय संस्कृति के लौकिक पक्ष का निरूपण करते हैं तो हमें निम्न विशेषतायें देखने को मिलती हैं- भारत की मौलिक एकता -मौलिक एकता का आशय किसी भी देश के वीरों, वर्गों, जातियों, धर्मों, भाषाओं, रीति-रिवाजों, परम्पराओं, वस्त्राभूषणों, खान-पान एवं अन्य विभिन्न तत्वों में एकीकरण तथा समन्वय स्थापित करना है। दूसरे शब्दों में किसी भी देश की मौलिक एकता की बात करने का अर्थ है- इस देश के मूल्यों, आदर्शों, विश्वास, सामाजिक जीवन, आध्यात्मिक विचारों, परम्पराओं तथा व्यवहार आदि की एकता पर विचार करना। एकता तभी स्थापित हो सकती है, जब किसी देश की संस्कृति में एकताबद्ध होने की क्षमता हो। संस्कृति की जड़ें मजबूत होने पर ही एकता संभव हो सकती है। इसके लिए समन्वय, सहिष्णुता तथा उदारता होना बहुत आवश्यक है। विविधता में एकता उत्पन्न करना किसी भी संस्कृति का विशेष लक्षण है। संस्कृति ही देश में परस्पर विरोधी विचारों के लोगों, विरोधी सम्प्रदायों, विभिन्न धर्मावलम्बियों आदि में एकता की स्थापना कर सकती है। भारत एक विशाल देश है। इसमें भौगोलिक स्तर की अनेक विषमताएँ हैं। एक ओर हिमालय की पर्वत श्रेणियाँ घोर हिम के कारण अत्यन्त शीतल हैं तो दूसरी ओर कोंकण और कोरोमण्डल क्षेत्र में प्रचण्ड ग्रीष्म है। यदि एक ओर पृथ्वी की सतह इतनी निचली है कि वह समुद्र की सतह के बराबर है तो दूसरी ओर यहाँ विश्व के सर्वाधिक ऊँचे शिखर हैं। चेरापूंजी में भीषण वर्षा होती है और रेगिस्तानी भू-भाग में वर्षा का अभाव बना रहता है। जलवायु और भौगोलिक बनावट के कारण वनस्पति, पशु-पक्षियों आदि में बेहद अलगाव है। भारत की जनसंख्या समस्त विश्व की जनसंख्या का लगभग पाँचवाँ भाग है। सारे योरोप (रूस को छोड़कर) के क्षेत्रफल के बराबर इसका क्षेत्रफल है।

भारत में विभिन्न जातियाँ निवास करती हैं- यथा आर्य, द्रविड़, यूनानी, शक, सीथियन, हूण, मुसलमान, कोल-भील, संथाल आदि। जातियों की भाषाएँ भी भिन्न हैं। हिन्दु, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई, इस्लाम, पारसी आदि धर्मावलम्बी भी यहाँ विद्यमान हैं। सामाजिक जीवन और परम्पराओं में भी खूब विभिन्नता है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में सांस्कृतिक विभिन्नता भी है। फिर भी इतनी अधिक विभिन्नताओं और विषमताओं के बावजूद भारत में सुदृढ़ मौलिक एकता है। डॉ० बेनी प्रसाद के अनुसार, "बहुत पुराने समय में ही जब आना-जाना बहुत कठिन था- भारतवासियों ने बहुत अच्छी तरह से समझ लिया था कि हमारा देश तथा शिष्टाचार बाहर वालों से जुदा है। रामायण तथा महाभारत के समय में "भारतवर्ष" नाम से काश्मीर से कन्याकुमारी तक के तथा सिन्यु से ब्रह्मपुत्र तक के देश का सम्बोधन होने लगा था। आपस में कितना ही फर्क हो पर दूसरों के सामने सब भारतवासी एक ही जान पड़ते थे।" भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों में हमें एक निश्चित एक सूत्रता तथा तारतम्य मिलता है। प्रश्न उठता है कि इतनी अधिक विभिन्नताओं के विपरीत भारत की भौगोलिक एकता क्यों और कैसे सम्भव हो पायी है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हम भारत की मौलिक एकता के विषय में विचार करेंगे।

भौगोलिक अनेकता में एकता- भारत एक विशाल देश है। इसकी भौगोलिक विभिन्नता विषम है। विविधताओं के कारण भारत को विश्व का "संक्षिप्त प्रतिरूप" कहा जाता है। यद्यपि भारत में अनेक प्रकार के भूखण्ड, जलवायु, जीव, जन्तु तथा वनस्पतियाँ हैं तथापि प्रकृति ने इसे विश्व का एकीकृत देश होने का सौभाग्य प्रदान किया है। भारत के उत्तर में दुर्गम हिमालय है तो दक्षिण में समुद्र की जलसीमा ने इसे घेर रखा है। जब हम विभिन्नता में एकता की दृष्टि से भारत की भौगोलिक एकता के विषय में विचार करते हैं तो हमें पता चलता है कि हमें जो भौगोलिक अनेक रूप दिखाई देती है, उसमें प्रच्छन्न मौलिक एकता है। इस एकता ने हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक भारतीय जीवन को एक सूत्र में बाँध रखा है। भौगोलिक अनेकता में एकता के दर्शन भारतवासियों की भावनाओं में देखने को मिलते हैं प्राचीन साहित्य में सम्पूर्ण देश को भारत वर्ष कहा गया है उसके निवासियों को विष्णुपुराण में "भारतीय संतति" या

"भारत का उत्तराधिकारी" कहा गया है- तथा "उत्तम यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र संतति।" -ऋग्वेद में भारत की एकता का आह्वान करते हुए कहा गया है-

"मे गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोयं सचता परुष्णी। असिकन्या मरुधे वितस्तया कीये श्रृणुया सुषोमया।।"

आर्यों ने अपनी मातृभूमि को सर्वकामना पूर्ण करने वाली कह कर उसके गौरव का खूब बखान किया। यूनानी लेखों से पता चलता है कि सिकन्दर के समय में भारतवासियों को भारत की विशालता का पूरा-पूरा ज्ञान था। स्ट्रैबो के अनुसार, "सिकन्दर ने सम्पूर्ण भारत की भौगोलिक स्थिति का वर्णन लोगों से सुना था।" कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दक्षिण भारत सहित सम्पूर्ण भारत में पाई जाने वाली आर्थिक सामग्री का उल्लेख है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस समय भारत में भौगोलिक एकता की भावना दृढ़ हो चुकी थी। भौगोलिक एकता की भावना ने भारतीय संस्कृत के विकास में बहुत योग दिया। राजनीतिक अलगाव होते हुए भी भारत की एकता बनी रही। ऐसे अनेक अवसर आये जव विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को विजित करना चाहा, परन्तु भारत के विभिन्न राज्यों और शासकों के प्रयासों द्वारा भारत की भौगोलिक एकता छिन्न-भिन्न न हो सकी।

राजनीतिक विभिन्नता में एकता- कुछ विद्वानों की मान्यता है कि अंग्रेजों के भारत आगमन और सत्ता की स्थापना से पहले भारत छोटे-छोटे परस्पर प्रतिद्वन्द्वी राज्यों में बँटा हुआ था। ये विद्वान् अंग्रेजों को यह श्रेय देते हैं कि ठन्होंने ही भारत में राजनीतिक स्थिरता को प्रतिस्थापित किया। किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से यह विचार गलत है। भौगोलिक अनेकताओं के विपरीत एकता में बद्ध भारतवासी राजनीतिक एकता के आदर्शों से प्राचीन काल में ही परिचित थे। वाजपेय तथा राजसूय यज्ञों में चक्रवर्ती सम्राट के अभिषेक का उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में ऐसे सम्राटों का उल्लेख है जिनके राज्य की सीमाएँ समुद्र तक विस्तृत थीं। शतपथ ब्राह्मण में ऐसे तेरह राजाओं का उल्लेख है जो सार्वभौम थे। पुराणों में भी सार्वभौम राजाओं के नाम मिलते हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सार्वभौम राजा को "चातुरस्तो राजा" कहा गया है। उनके साम्राज्य की सीमाएँ भारत के चारों कोनों का स्पर्श करती थीं। भारत का सार्वभौम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य था। उसके समय सम्पूर्ण देश एक मण्डल के समान था। उसके पौत्र अशोक महान् का साम्राज्य असम से लेकर हिन्दुकुश तया पामीर से लेकर सुदूर दक्षिण तक विस्तृत था। समुद्रगुप्त ने चौथी शताब्दी ई० में उत्तरी भारत और पूर्वी समुद्र तट से होकर दक्षिण भारत में भी विजय प्राप्त की थी। हर्षवर्धन के साम्राज्य में उत्तर में नेपाल से लेकर दक्षिण में नर्मदा तथा पश्चिम में मालवा से लेकर गुजरात तक के प्रदेश थे। मध्यकाल में भारत को राजनीतिक एकता अलादीन और अकबर के समय में स्थापित हुई थी। मुगलों के समय तक राज्यतन्त्रात्मक प्रणाली की प्रधानता रही। अंग्रेजों के शासन काल में वस्तु तानाशाही रही, परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में पूर्णतया राजनीतिक एकता स्थापित हो गई। विभिन्न युगों में अलग-अलग वंशों के राज्य थे परन्तु राजनीतिक वातावरण में विभिन्नता नहीं थी। स्थान भारत में राजनीतिक संगठनों तथा दलों का विकास हुआ। इनमें पारस्परिक मतभेद हैं परन्तु ये सभी भारत की राजनीतिक एकता को सर्वोपरि मानते हैं। सामाजिक विभिन्नता में एकता-सारे भारत का सामाजिक जीवन स्थानीय विभिन्नताओं के बावजूद भी एक सरीखा है। यद्यपि भारत में हिन्दू मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि की सामाजिक प्राणियों में भिन्नता है तथापि उनके आपसी सामाजिक सम्बन्ध सहिप्यु, टावर तया सहयोगी हैं। भारतीय सामाजिक जीवन का आदर्श लोकमंगल तथा मानवमात्र का कल्याण है। भारतीय सामाजिक जीवन में लचीलापन है इसका दृष्टिकोण समन्वयवादी है। कठोर से कठोर थपेड़े सहता हुआ भारत का सामाजिक जीवन विभिन्नता में एकता से ओत-प्रोत है।

आर्थिक विभिन्नता में एकता- प्राचीन काल में आर्थिक विभिन्नता होते हुए भी समाज में आर्थिक सन्तोष था। परन्तु आधुनिक भारत में आर्थिक समता के दर्शन नहीं होते हैं इस विषय में यह बात दृष्टव्य है कि भारत के अधिकार जन निर्धनता को दैव का विधान मानते हुए सन्तोष कर लेते थे और इसी कारण वे आर्थिक विभिन्नता में सन्तोष रखते थे।

जातिगत विभिन्नता में एकता- भारत में अल्पसंख्यक विभिन्न जातियां हैं इनमें से कई यहाँ की मूल निवासी हैं तो कई बाहरी देशों से यहाँ आकर बसीं। यह सच है परन्तु यह भी सच है कि यद्यपि भारत में अनेक जातियों-आर्य द्रविड़, शक, सोथियन, हूण, तुर्क, पठान, मंगोल आदि का आगमन हुआ, किन्तु उनमें से अधिकांश हिन्दू समाज में इतनी पुल-मिल गयी कि उनका अपना मौलिक अस्तित्व जाता रहा। भारत की मिट्टी में कुछ ऐसा चमत्कार है कि इन जातियों की संस्कृतियों के टकराव स्वरूप यहाँ पर सांस्कृतिक टकराव ज्यादा नहीं हुआ है। भारतीय संस्कृति की उदारता और सहिष्णुता ने सभी जातियों को स्वयंभू कर लिया। भारत में जातियों की विभिन्नता में आधारभूत एकता है।

भाषागत विभिन्नता में एकता- भारत में भाषाओं की बहुतायत है। एक गणना के अनुसार यहाँ पर लगभग 180 भाषाएँ प्रचलित हैं ऐसा होना स्वाभाविक ही है। जहाँ पर विभिन्न जातियाँ होंगी वहाँ पर भाषाओं में भी पर्याप्त विभिन्नता होगी। द्रविण, कोल, आर्य, ईरानी, यूनानी, हूण, तुर्क, अरब, पठान, मंगोल, डच, फ्रेन्च, अंग्रेज आदि की भाषा अलग-अलग रही, परन्तु जब उन्होंने भारत में बसना शुरू किया तो एक दूसरे को समझने और विचारों के आदान-प्रदान के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता पड़ी। शनैः-शनैः माध्यम रूप में भाषागत एकता आने लगी। प्राचीनकाल में संस्कृत और बाद में हिन्दी भारत के अधिकांश की भाषा बनी। यदि घ्यानपूर्वक देखा जाये तो पता चलेगा कि भारत में संस्कृत का पुट है। बंगला, तमिल और तेलुगू पर तो संस्कृत का गहरा प्रभाव है। मुसलमानों के आगमन पर उर्दू का प्रचलन हुआ। अंग्रेजों के आने पर अंग्रेजी का प्रसार हुआ। इतना सब होते हुए भी भाषागत टकराव नहीं हुआ। स्वाधीन भारत ने भाषागत विभिन्नता को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दी।

धार्मिक विभिन्नता में एकता- जब हम भारतीय धर्मों की अनेकता के विषय में विचार करते हैं तो हमें पता चलता है कि भारत में सदैव से ही अनेक घों तथा धार्मिक सम्प्रदायों का अस्तित्व रहा है। परन्तु भारत की धार्मिक सहिष्णुता इतनी प्रबल रही है कि यहाँ पर सभी धर्म समान रूप से फलते-फूलते रहे। भिन्न धर्मानुयायी अपने-अपने धर्म में विश्वास रखते हुए मानव धर्म की प्रति समर्पित रहे। भारत की आत्मा धर्मनिरपेक्ष है। सांस्कृतिक विभिन्नता में एकता- भारत की सारी विभिन्नताओं को एकता में पिरोने का श्रेय भारत की संस्कृति को प्राप्त है। प्रोफेसर हुमायूँ कबीर के अनुसार, "भारत की संस्कृति को कहानी एकता, समाधानों का एकीकरण तथा प्राचीन भारतीय परम्पराओं के पूर्णत्व तथा उन्नति की कहानी है। यह प्राचीन काल में रही है और जब तक विश्व रहेगा तब तक रहेगी। सभी संस्कृतियाँ नष्ट हो गया, परन्तु भारतीय संस्कृति की एकता सतत एवं अमर है।" सांस्कृतिक विभिन्नता को एकताबद्ध करने में भारत के साहित्य तथा कला का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। स्थानीय विशेषता होते हुए भी भारत के साहित्य, स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत तथा नाटक आदि में भारतीयता की एकताबद्ध झलक देखी जा सकती है। इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि भारत भौगोलिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एकतावद्ध रहा है। विस्तार में विस्तृत तथा रीति रिवाजों में विभिन्नतापूर्ण होते हुए भी भारत में सदैव से मौलिक एकता बनी रही है। "भारत हमारी मातृभूमि है" यह विचार भारतवासियों के हृदय में सदैव से व्याप्त रहा है। विभिन्नता में एकता सर्वत्र विद्यमान दृष्टिगत होती है। भारत की भौगोलिक अनेकता ने हमें अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए पारस्परिक मतभेदों को भुलाने की प्रेरणा दी है। धार्मिक तथा सामाजिक अनेकता के दुष्परिणामों के प्रति भारत सदैव से सचेत रहा है इस सचेता ने राष्ट्रीय भावना को बल प्रदान किया। आधुनिक विषमताओं के समय में भी हम एकता को सर्वोपरि मानते हैं। संकट तथा विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए, राष्ट्रीय मामलों में भारत आज भी एकताबद्ध हो जाता है। एकता भारत की आत्मा का अन्तर्निहित गुण है। भारत की संस्कृति तथा सभ्यता ने, इसकी भौगोलिक परिस्थिति और उसके पुराने अनुभवों ने भारत को एकता और अखण्डता प्रदान की है। संक्षेप में, कहा जा सकता है कि वास्तविकता के प्रति आस्था, आध्यात्मिक अनुभव का महत्व, संस्कारों और सिद्धांतों की सापेक्षता, बौद्धिक आदर्शों के प्रति गहरी आस्था तथा विरोधियों को परास्त करने वाली शान्तचित्तता ने भारत को विभिन्नता को एकताबद्ध किया हुआ।

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