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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

अधिकार का अर्थ,परिभाषा, महत्त्व

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अधिकार का अर्थ,परिभाषा, महत्त्व


अधिकार का अर्थ

प्रत्येक व्यक्ति में अन्तर्निहित कुछ शक्तियाँ होती हैं अर्थात् प्रत्येक मानव कुछ अन्तर्निहित शक्तियों का स्वामी होता है। इन्हीं शक्तियों के विकास से व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है परन्तु उन शक्तियों के विकास के लिए व्यक्ति को कुछ सुविधाओं की आवश्यकता होती है। इन्हीं सुविधाओं की प्राप्ति हेतु मनुष्य समाज के समक्ष कुछ अपनी माँगें रंखता है। ये माँगे कई तरह की हो सकती हैं, कुछ पूर्णतः स्वार्थ से युक्त कुछ लोक कल्याण के हित में और कुछ तटस्थता समाज प्रायः उन मांगों की स्वीकार कर लेता है। समाज द्वारा स्वीकृत व्यक्ति की इन्हीं माँगों को अधिकार के नाम सम्बोधित किया जाता है।

अधिकार की परिभाषा

अधिकार को विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाओं का वर्णन अग्रलिखित है प्रसिद्ध विद्वान लास्की ने अधिकार को परिभाषित करते हुए लिखा है-"अधिकार समाजिक जीवन की वह परिस्थितियां है, जिनके अभाव में कोई मनुष्य अपनी सर्वोच्च उन्नति नहीं कर
सकता है।" हालैण्ड के अनुसार-"अधिकार एक व्यक्ति की इस क्षमता को कहते हैं, जिसके द्वारा वह दूसरे व्यक्ति के कार्यों को समाज की राय एवं शक्ति द्वारा प्रभावित करता है।" जान आस्टिन के अनुसार-"अधिकार मनुष्य की उस क्षमता को कहते हैं, जो दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के कार्यों को सीमित करती है।"

बोसांके के शब्दों में-"अधिकार वे अभियाचनाएँ हैं, जो समाज द्वारा स्वीकृत की जाती हैं और राज्य द्वारा लागू की जाती हैं।

मेकेन के अनुसार-“अधिकार सामाजिक कल्याण की कुछ सुविधाजनक वे दशाएँ हैं, जो नागरिकों के विकास के लिए आवश्यक हैं।" अधिकारों का महत्त्व-व्यक्ति के जीवन में अधिकारों का अत्यन्त महत्त्व है। समाज की व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहे, इसके लिए नागरिकों के अधिकारों एवं उनके कर्तव्यों का निर्धारण होना परमावश्यक होता है। अधिकारों के अभाव में मनुष्य पंगु हो जाता है तथा उसका विकास रुक जाता है। अधिकारों के माध्यम से ही व्यक्ति का विकास होता है। अधिकार ही मनुष्य में कर्त्तव्य की भावना प्रेरित करते हैं। अधिकार और कर्तव्य नागरिक जीवन रूपी गाडी के दो पहिए हैं, जिनके द्वारा गाड़ी सुचारु रूप से गति करती है। अधिकारों का सिद्धान्त व्यक्ति के अधिकारों का अस्तित्त्व कैसे आया और वर्तमान समय में इनके क्या-क्या रूप होने चाहिए इस बारे में उनके सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। जिनका वर्णन अप्रलिखित है-

1.अधिकार का प्राकृतिक सिद्धान्त-अधिकारों का प्राकृतिक सिद्धान्त सर्वाधिक प्राचीन तथा महत्त्वपूर्ण है इसका प्रचलन यूनानियों के समय से है। इस सिद्धान्त के अनुसार मानव के अधिकार प्राकृतिक होते हैं। ये अधिकार व्यक्ति को प्रकृति की ओर से प्राप्त हो जाते हैं इन अधिकारों पर कोई भी किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगा सकता है। हॉब्स, लॉक,रूसो, मिल्टन, वाल्टेयर, टॉमस पेन आदि ने इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। प्रसिद्ध विद्वान स्पेन्सर का मत है कि समाज स्वाधीनता का अधिकार सभी व्यक्तियों का मौलिक अधिकार है।
सिद्धान्त का प्रभाव-फ्रांस एवं अमेरिका का प्रेरक सिद्धान्त का कार्य प्राकृतिक सिद्धान्त ने किया है इस सिद्धान्त के अनुसार ही भोजन, वस्त्र, निवास और आजीविका को प्राकृतिक अधिकार की श्रेणी में रखा गया। इस सिद्धान्त के आधार पर ही स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व को समान अधिकार दिया गया।"सभी मनुष्य स्वतन्त्र और विवेकी पैदा होते हैं और समाज में आने के पूर्व ही व्यक्ति को ये अधिकार प्राप्त होते हैं।
"
महत्त्व-प्राकृतिक सिद्धान्त व्यक्ति के व्यक्तित्त्व के विकास के लिये बहुत आवश्यक है। इस अधिकार से व्यक्ति को वंचित नहीं किया जा सकता। प्राकृतिक सिद्धान्त और मौलिक अधिकारों की अवधारणा में, केवल अन्तर यही है कि मौलिक अधिकारों की धारणा से यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य मानव अधिकारों का हनन् नहीं वरन् रक्षा करता है। इस प्रकार अधिकारों को प्राकृतिक सिद्धान्त का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है।

2. अधिकारों का वैधानिक सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार प्राकृतिक या स्वाभाविक नहीं वरन् कृत्रिम है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त का विरोधाभास है इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य के तीन कार्य हैं-(1) अधिकारों की सीमाएँ निर्धारित करना, (2) अधिकारों का अर्थ बताना, (3) उनके उपभोग के आश्वासन की व्यवस्था करना। अधिकार राज्य की इच्छा व कानून का परिणाम है जिनकों राज्य मान्यता देता है। अधिकारों का अस्तित्व राज्य पर ही निर्भर करता है। राज्य चाहे तो व्यक्ति के उन अधिकारों को छीन भी सकता है जो उसने व्यक्ति को दिये हैं। जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति का अधिकार राज्य द्वारा ही दिया जाता है। राज्य ही इस बात का निर्णय करता है कि उसके अधिकारों का प्रयोग व्यक्ति किस प्रकार करता है। बेन्थम, ऑस्टिन, हॉब्स, हालैण्ड आदि विद्वानों के द्वारा इस सिद्धान्त का समर्थन किया गया है। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार अधिकारों का मापदण्ड नैतिक आधार न होकर वास्तविकता है। इसलिए इस सिद्धान्त को वास्तविक कहा जा सकता है। महत्त्व-वैधानिक सिद्धान्त का अत्याधिक महत्त्व है यद्यपि इस सिद्धान्त की अनेक आलोचनाएँ की गयी हैं, लेकिन इस बात को टाला नहीं जा सकता कि इस सिद्धान्त में सत्य का अंश है। व्यक्ति के विकास के लिये जो अनिवार्य दावे हैं उन्हें तब तक अधिकार नहीं कहा जा सकता है जब तक राज्य उन्हें मान्यता प्रदान नहीं करता है।

3.अधिकारों का ऐतिहासिक सिद्धान्त-जिन रीति-रिवाजों का हम पालन करते हैं वे रीति-रिवाज ही अधिकार के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार इतिहास का ही परिणाम है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादकों के अनुसार अधिकार का निर्माण न तो राज्य द्वारा हुआ है और न ही ये प्राकृतिक हैं। बल्कि हम जिन रीतिरिवाजों का पालन करते हैं, जिन्हें समाज स्वीकार कर लेता है उन्हें ही अधिकार कहते हैं। अधिकारों के ऐतिहासिक सिद्धान्त को अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण माना गया है। अधिकारों के ऐतिहासिक सिद्धान्त का समर्थन करते हुये बर्क ने लिखा है कि, "इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति का आधार अंग्रेजों के रीतिरिवाजों पर आधारित अधिकार ही थे।" ऐतिहासिक सिद्धान्त के समर्थक प्रो० रिची ने लिखा है कि"जो अधिकार व्यक्ति की आवश्यकतायें है वे उन्हें मिलने ही चाहिए, ये ही अधिकार होते हैं जिनके वे अभ्यस्त होते हैं या जिनके सम्बन्ध में सही या गलत उनकी यह घारणा होती है कि वे उन्हें कभी प्राप्त थे।"

 महत्त्व-यद्यपि इस सिद्धांत की कई आलोचनाएँ की गयी हैं। फिर भी इस सिद्धान्त में सत्यता निहित है कि व्यक्ति के अधिकार रीति-रिवाजों व परम्पराओं पर आधारित है।

4.अधिकारों का समाज कल्याण सिद्धान्त-अधिकार समाज की देन है यह समाज कल्याण सिद्धान्त का मानना है। अधिकारों का अस्तित्त्व समाज कल्याण पर ही निर्भर है। इस सिद्धान्त के अनुसार जो अधिकार समाज के हित में है व्यक्ति केवल उन्हीं अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। कानून, रीति-रिवाज और अधिकार सभी को समाज कल्याण के सामने झुकना चाहिए और इन सब का उद्देश्य समाज कल्याण ही है।
प्रो० लॉस्की का अभिमत है कि, "लोक कल्याण के विरुद्ध मेरे कोई अधिकार नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा करना मुझे ठस कल्याण के विरुद्ध अधिकार देना है जिनमें मेरा कल्याण घनिष्ठ व अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।"

एंथम और मिल जैसे उपयोगितावादियों और रास्को पाउण्ड प्रो० चेफर के द्वारा इस सिद्धांत का समर्थन किया गया। लास्की ने भी उपयोगिता को अधिकार की कसौटी माना है।। बेंथम का "अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख" का सिद्धान्त ही निर्धारित करता है कि व्यक्ति को कौन से अधिकार कब और कैसे प्राप्त होने चाहिए।

महत्त्व-इस सिद्धांत की अनेक सी आलोचनाएँ होने के बावजूद भी इस सिद्धान्त का अपना विशेष महत्त्व है। समाज में ही अधिकार का महत्त्व होता है और उसका उपयोग समाज के हित में किया जाना चाहिए।

5.अधिकारों का आदर्शवादी (व्यक्तिवादी) सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार,

"अधिकारों का उद्देश्य एक आदर्श व्यक्तित्व का विकास करना है।" जिस सिद्धान्त में समाज के अन्तर्गत रहते हुये व्यक्ति के जीवन का सर्वोच्च विकास किया जाता है उसे आदर्शवादी सिद्धांत कहा जाता है। क्योंकि इस सिद्धांत के अनुसार अधिकारों का अस्तित्त्व व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर ही निर्भर है इसलिए इसे व्यक्तित्त्ववादी सिद्धान्त कहा जाता है। "अधिकार विवेकपूर्ण जीवन के विकास के लिए आवश्यक बाहरी परिस्थितियाँ है।"क्रास के अनुसार-"मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिये जो भौतिक परिस्थितियाँ आवश्यकक हैं, उनकी रक्षा के लिये जो कुछ जरूरी है वही अधिकार है।" हेनरीची के अनुसार-क्रास, हेनरीची, ग्रीन, लॉस्की द्वारा जो परिभाषा दी गयी हैं वे अधिकारों के आदर्शवादी सिद्धांत पर निर्भर हैं।

महत्त्व-अनेक आलोचनों के होते हुये भी इस सिद्धांत का अपना विशेष महत्त्व है। इसलिए इस सिद्धांत को सन्तोषप्रद सिद्धांत कहा गया है। वहरी परिस्थितियों के होते हये ही व्यक्ति का विकास सम्भव है। ग्रीन के शब्दों में, "समाज एवं राज्य नैतिक जीवन के मार्ग की बाधाओं को बाधित करके व्यक्ति के जीवन को नैतिक बना सकते हैं।" व्यक्ति को कौन से अधिकार प्राप्त होने चाहिए यह आदर्शवादी सिद्धांत ही बता सकता है। अधिकारों के सिद्धान्तों में आदर्शवादी सिद्धांत का अत्य अधिक महत्त्व है।

अधिकारों के अन्य सिद्धांतों में आदर्शवादी या व्यक्तिवादी सिद्धान्त को सर्वाधिक 'सन्तोषप्रद सिद्धांत कहा गया है इस सिद्धांत के अन्तर्गत सर्वप्रथम इस तथ्य की स्वीकृति प्रदान की गयी है कि व्यक्ति स्वयं में साध्य है और अन्य किसी के उत्कर्ष का साधन मात्र नहीं है। इसके अतिरिक्त यह सिद्धांत व्यक्तित्व को आदर्श रूप में स्वीकार करता है और इस तरह प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व को समान स्तर प्राप्त होता है। यह सिद्धान्त इस बात को सत्य मानता है कि व्यक्ति को वे अधिकार प्राप्त होने चाहिए जो उसके व्यक्तित्व के विकास काय आवश्यक है। यह सिद्धांत न तो व्यक्ति के गलत अधिकारों का समर्थन करता है और न ही उसके सभी अधिकारों से उसे वंचित करता है। यह सिद्धान्त न तो प्राकृतिक सिद्धान्त की तरह अधिकारों की निरपेक्षता या असीमितता का प्रतिपादन करता है और न ही वैज्ञानिक सिद्धान्त या समाज कल्याण सिद्धान्त की तरह अधिकारों की सापेक्षता का प्रतिपादन करता है। यह सिद्धान्त कहता है कि व्यक्ति के अधिकारों पर केवल वे ही प्रतिबन्ध लगाये जाने चाहिए जो अन्य व्यक्तियों के विकास हेतु आवश्यक है। अत: इस सिद्धान्त का यह प्रतिपादन कि व्यक्तित्व के विकास रूपी आदर्श की प्राप्ति के लिये जो कुछ आवश्यक है, वह व्यक्ति का अधिकार है, सत्य प्रतीत होता है। व्यक्ति को कौन से अधिकार प्राप्त होने चाहिए, इस संबंध में आदर्शवादी सिद्धान्त एक ऐसा मापदण्ड प्रस्तुत करता है जो अन्य सिद्धान्त नहीं बता पाते और इसलिए यह सिद्धान्त सर्वोत्तम है। इस सिद्धान्त में ऐसे तथ्यों का समावेश है जिसके कारण 'आदर्शवादी सिद्धान्त' को 'सन्तोषप्रद सिद्धान्त कहा गया है।

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