सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आर्थिक संस्था क्या है

आर्थिक संस्था क्या है


आर्थिक संस्थायें (Economic Institutions)- प्रत्येक समाज का अपना पृथक भौतिक पर्यावरण होता है। वस्तुओं का उत्पादन भौगोलिक पर्यावरण पर निर्भर होता है, अत: प्रत्येक समाज की आर्थिक व्यवस्था उस पर्यावरण से निश्चित होती है, जिसमें वह निवास करता है। पारसन्स (Parsons) ने आर्थिक संस्थाओं को अनुकूलन की उपव्यवस्था के रूप में स्पष्ट किया है। जिन पद्धतियों, नियमों और कार्य प्रणालियों तथा प्रविधियों के द्वारा कोई समाज अपने भौतिक पर्यावरण के साथ अनुकूलन करता है अर्थात अपने अस्तित्व की रक्षा और जीवन के सुख और समृद्धि की वृद्धि करता है, उन्हीं का नाम अर्थव्यवस्था है। भोजन वस्त्र और आवास की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सुविधा और आनन्द की वृद्धि से सम्बन्धित सामाजिक क्रियाओं और व्यवहारों की व्यवस्था को आर्थिक संस्था कहते हैं। मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत जिन मानवीय क्रियाओं को स्वीकृति और मान्यता प्रदान की जाती है, उन समस्त नियमों और पद्धतियों के संकलन को हम आर्थिक संस्थायें कह सकते हैं। इस प्रकार आर्थिक संस्थाओं का सम्बन्ध वस्तुओं के उत्पादन, उपभोग, विनिमय और वितरण की पद्धतियों और व्यवस्थाओं से होता है। आर्थिक संस्था की परिभाषा : किंग्सले डेविस के अनुसार "किसी समाज में, चाहे वह आदिम हो अथवा सभ्य सीमित वस्तुओं के वितरण को नियन्त्रित करने वाले मूलभूत विचारों नियमों और स्थिति को हम आर्थिक संस्थायें कहते है।"

इस प्रकार मनुष्य की जो क्रियायें, आदर्श, प्रविधियाँ और विचार उसके भौतिक अस्तित्व और आर्थिक प्रगति से सम्बन्धित होती हैं उनकी समग्रता को आर्थिक संस्था के रूप मे परिभाषित किया जा सकता है। जोन्स ने आर्थिक संस्था की स्पष्ट परिभाषा करते हए लिखा है,

आर्थिक संस्था जीवन निर्वाह की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए पर्यावरण के उपयोग से सम्बन्धित प्रविधियों विचारों तथा प्रथाओं की जटिलता है।"

संक्षेप में आर्थिक संस्था भौतिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के उद्देश्य से विकसित प्रौद्योगिकी एवं आर्थिक क्रिया-कलापों की व्यवस्था है। आर्थिक संस्था का विकास:

टी.बी. बोटोमोर ने आर्थिक संस्था के विकास से सम्बन्धित दो आधारभूत तत्वों की व्याख्या की है। आर्थिक संस्था का प्रथम तत्व 'सम्पत्ति का विचार है और दूसरा श्रम विभाजन' । मानव जीवन के आदिकाल में श्रमविभाजन नहीं था और सभी मनुष्य अपनी मालिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए स्वयं प्रत्येक कार्य करते थे। जंगली जीवन होने के कारण निजी-संपत्ति का कोई विचार उत्पन्न नहीं हुआ था इमाइल दुर्खीम ने आर्थिक और समाजिक जीवन के विकास में 'श्रम विभाजन' को मूलभूत कारण बताया है। जैसे-जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ती गयी और एक ही स्थान पर रहने वाले लोग अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इधर-उधर फैलने लगे, वैसे-वैसे एक -एक मौलिक व्यवसाय उप-व्यवसायों में विभाजित हो गया और इस प्रकार श्रम विभजन और विशेषीकरण की प्रक्रिया तेज होती गयी। व्यक्तिगत भिन्नताओं के बढ़ने से व्यक्तियों में विशिष्टता आने लगी। व्यक्तिगत अथवा निजी सम्पत्ति का विचार विकसित होता गया और धीरे-धीरे आर्थिक संस्थाओं के स्वरूप जटिल होते गये। नवीन परिस्थितियों ने नवीन आर्थिक संस्थाओं को जन्म दिया।

आर्थिक अवस्था: कंद-मूल भोगी शिकारी जीवन - मनुष्य के प्रारम्भिक आर्थिक जीवन की अवस्था में किसी प्रकार का उत्पदन कार्य नहीं होता था। घुमक्कड़ जंगली जीवन में मनुष्य जंगल के फल-फूल इकट्ठा करके तथा शिकार करके अप उदर पूर्ति करता था। जंगल सबका था। अत: निजी सम्पत्ति का विचार भी नहीं था। श्रम विभाजन केवल लैंगिक आध र पर था। पुरूष प्राय:शिकार करते थे और स्त्रियाँ कंद-मूल आदि एकत्रित करती थीं। शिकार करने के यंत्र ही व्यक्ति की सम्पत्ति थी। चरवाहा जीवन : धीरे-धीरे मनुष्य ने दूध देने वाले पशुओं को मारने की अपेक्षा उन्हें पालना प्रारम्भ कर दिया, क्योंकि मारने से उनका प्रयोग एक दो बार के भोजन में किया जा सकता था, जबकि पालने से उनके दूध से भूख प्रतिदिन मिटाई जा सकती थी और संतान का भी उपयोग किया जा सकता था। पशु-पालन के आर्थिक स्तर पर निजी सम्पत्ति का विचार उत्पन्न हो गया। पशु स्वयं सम्पत्ति बन गया। पशुओं को बाँधने आदि से सम्बन्धित, दूध रखने तथा उसके द्वारा अन्य भोज्य वस्तुयें बनाने के लिए आवश्यक पात्रों तथा उपकरणों आदि का निर्माण होने लगा, जिसके कारण श्रम-विभाजन भी बढ़ गया। कुछ दस्तकारों अथवा शिल्पियों के कार्यों का विकास हो गया। कृषि जीवन-कार्यवाही अवस्था में मनुष्य निरन्तर घुमक्कड़ जीवन को छोड़ कर कुछ-कुछ स्थाई होने लगा था। पशुओं को हर समय लेकर घुमा नही जा सकता था। इसके पश्चात खेती का कार्य प्रारम्भ हो गया। अच्छी उपजाऊ भूमि पर मनुष्य ने खेती प्रारम्भ की। पहले छोटे-छोटे औजारों से और फिर हल-बैल आदि से। खेती उगाने में भी मनुष्य कुछ दिनों तक जमीन की निरन्तर देखभाल करनी पड़ती थी और फसल प्राप्त होने पर उसकी भी रक्षा करना पड़ती था। इस प्रकार खेती मनुष्य को स्थायी रूप से एक ही स्थान पर रहने के लिए बाध्य कर देती थी। इस प्रकार कृषि के आर्थिक स्तर पर निजी-सम्पत्ति का स्वरूप स्पष्ट हो गया। हल-बैल, पशु, भूमि और मकान आदि सम्पत्ति बन गये श्रम विभाजन का विकास हो गया। समाज में उनके व्यावसायिक कार्यों का विकास होने पर भी मुख्य रूप से जमीदार, किसान और दस्तकार, इन तीन वर्गों का विकास हो गया। सामन्तवादी अर्थव्यवस्था विकसित हो गयी। औद्योगिक जीवन : आज का आर्थिक जीवन औद्योगिक जीवन है। ज्ञान-विज्ञान का विकास होने से प्रौद्योगिकी में परिवर्तन हो गया और वस्तुओं के उत्पादन के लिये नवीन यंत्रों का आविष्कार हो गया। बड़े-बड़े कारखाने प्राकृतिक शक्तियों के उपयोग से चलने लगे। कारखानों म बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा। श्रम-विभाजन और विशेषीकरण चरम सीमा पर पहुँच गया। पूजी औद्योगिक समाज-रचना का प्रमुख आधार है। अत: इस युग में पूँजीवादी अर्थव्य का विकास हो गया जिसमें निजी-सम्पत्ति आर्थिक जीवन का प्रमुख अंग बन गई। उत्पादनं साधनों पर पूंजीवादियों का प्रभुत्व हो गया और मार्क्स के अनुसार समाज पूंजीपति और श्रमित दो वर्गों में विभाजित हो गया। पूँजीवाद के साथ-साथ औद्योगिक विकास ने ही समाजवादी अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है। इस समय पूँजीवाद और समाजवाद से सम्बन्धित अनेक आर्थ संस्थाओं का विकास हो गया है।

श्रम विभाजन: सामाजिक जीवन में अर्थव्यवस्था विशेष महत्व रखती है। भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य विभिन्न प्रकार के कार्य करते हैं। प्रत्येक मनुष्य अपनी समस्त आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए स्वयं अकेला सभी वस्तुओ का उत्पादन नहीं कर सकता। भिन्न-भिन्न मानवीय आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करने वाली वस्तुओं का उत्पादन भिन्न-भिन्न लोग करते हैं। प्रारम्भ में जब जनसंख्या कम थी और मनुष्यों के छोटे-छोटे समूह शिकार करके या कंद-मूल इकट्ठा करके अपना जीवन निर्वाह करते थे, तो भिन्न-भिन्न कार्यों को करने के लिए अलग-अलग लोगों की व्यवस्था नही थी। सारा समूह एक ही प्रकार की अथवा सब प्रकार की क्रियाओं में संलग्न रहता था। किन्तु जनसंख्या का आकार और घनत्व बढ़ने से धीरे-धीरे कार्यों का भी विभाजन होने लगा और भिन्न-भिन्न व्यक्ति अपनी रूचि और योग्यता के अनुसार अथवा अपनी आवश्यकता के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यवसायों को अपनाने लगे। समाज में श्रम का विभाजन होने लगा। श्रम विभाजन आर्थिक क्रिया का अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्व बन गया। आधुनिक समाज में श्रम का अत्यधिक विभाजन हो गया। एक ही कार्य को निरन्तर करते रहने से व्यक्तियों में आर्थिक क्रिया का विशेषीकरण बढ़ गया। समाजशास्त्र में श्रम विभाजन की बुद्धि समाजशास्त्रीय व्याख्या करने वाला प्रथम विद्वान इमाईल दुर्खीम था। जिसने अपने शोध ग्रन्थ 'समाज में श्रम विभाजन ' पर डाक्ट्रेट की डिग्री प्राप्त ही थी। दुर्खीम के विचार से आदिम समाज से आधुनिक समाज तक जो भी विकास हुआ, वह निरन्तर बढ़ते हुए श्रम विभाजन का ही परिणाम है।

सम्पत्ति (Property) समाज में होने वाले अधिकांश व्यक्तिगत संघर्ष का मूल कारण सम्पत्ति को माना जाता है। यदि श्रम-विभाजन आर्थिक वस्तुओं के उत्पादन से सम्बन्धित तथ्य है तो सम्पत्ति आर्थिक वस्तुओं के वितरण से सम्बन्धित है। श्रम-विभाजन का विकास वस्तुओं के विनिमय को आवश्यक बना देता है। इस विनिमय की प्रक्रिया में सभी को समानता प्राप्त नहीं होती है। वस्तुओं की कमी होती है। व्यक्ति अधिक प्राप्त करना चाहता है। इस दशा में मनुष्यों के स्वार्थ परस्पर टकराते हैं। इस टकराव को रोकने की दृष्टि से प्रत्येक समाज में वस्तुओं के वितरण के सम्बन्ध में उन पर अधिकार के सम्बन्ध में कुछ नैतिक नियमों की पारस्परिक सहनशीलता की व्यवस्था की जाती है।आर्थिक संस्था ऐसी वस्तुओं के वितरण से सम्बन्धित नियमों और स्थितियों की व्याख्या करती है,जो कम होती है। सम्पत्ति के उपार्जन, वितरण और अधिकारों की व्यवस्था करना आर्थिक संस्था का मुख्य कार्य है। हॉवहाउस के अनुसार सम्पत्ति को वस्तुओं पर मनुष्य के नियन्त्रण के आधार पर समझा जाना चाहिए। नियन्त्रण जिसे समाज स्वीकृति प्रदान करता है, जो किसी सीमा तक स्थायी होता है। डेविस ने संपत्ति की अधिक स्पष्ट परिभाषा करते हुए लिखा है, अपने स्थायी पक्ष में सम्पत्ति अनिवार्यतः: एक वितरण की व्यवस्था है। इसमें किसी अभावपूर्ण वस्तु के सम्बन्ध में अन्य सभी व्यक्तियों और समूहों के विरूद्ध किसी एक व्यक्ति या समूह (स्वामी) के अधिकार और कर्तव्य निहित होते हैं।

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे