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तुर्की के आधुनिकीकरण एवं इसमें मुस्तफा कमाल पाशा के योगदान

तुर्की के आधुनिकीकरण एवं इसमें मुस्तफा कमाल पाशा के योगदान


मुस्तफा कमाल पाशा एक दूरदर्शी नेता था जिसने समझ लिया कि तुर्की (टर्की) का पुनरुत्थान तभी संभव है जब वह आधुनिकीकरण की प्रवृत्तियों को आत्मसात करे, देश के आर्थिक ढाँचे का पुनर्गठन करे और तुर्की के राजनीतिक जीवन को नई दिशा और एक नई गति प्रदान करे यही कारण था कमाल पाशा के नेतृत्त्व में तुर्की ने पश्चिमी शक्तियों की सफलता पूर्वक अवहेलना करने पर भी पाश्चात्य अथवा पश्चिमी सभ्यता संस्कृति का स्वागत करने में कोई संकोच नहीं किया। उसका विश्वास था किसी भी देश के प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा उसका परम्परागत रीतियों का अनुसरण करना है यदि कोई देश अपने पूर्व बनाये गये परम्पराओं का अनुसरण करता रहा तो वह कभी नई सभ्यता एवं संस्कृति के साथ कन्ये से कन्या मिला कर नहीं चल सकता। परिवर्तन समय की मांग होती है तथा परिवर्तन को हृदय से स्वीकार करना चाहिए। यही कार्य मुस्तफा ने अपने देश तुर्की के विकास के लिए किया जिस चिरकाल तक तुर्की की जनता ऋणी रहेगी।

अपने देश को विदेशी प्रभाव से मुक्त करने के उपरान्त मुस्तफा कमाल ने टका का आधुनिकीकरण किया। कमाल पाशा के योग्य निर्देशन में टकी ने पश्चिमीकरण की योजना पर ध्यान केन्द्रित किया। मुस्तफा ने अनुभव किया कि के भूतकाल के रीति-रिवाज और संस्कृति के प्रति बड़ा ही श्रद्धालु था, आधुनिक सभ्यता के सम्पर्क में नहीं था और इसलिये प्रगति के द्वार को उसने अपने ही हाथों बन्द कर रखा था अत: मुस्तफा ने टर्की में सुधार आरम्भ किये चाहे जो इस प्रकार थे

1.पोशाक में परिवर्तन-की की पुरानी पोशाक के स्थान पर आधुनिक कोट और टोप धारण करने पर जोर दिया गया और यदि लोगों ने विरोध किया तो उन्हें स्वीकार करने के लिये विवश किया गया।

2. कानून में परिवर्तन-देश के कानून भी मुस्तफा कमाल को भदे और अन्यायपूर्ण प्रतीत हुए। उसने उन्हें हटा दिया और उनके स्थान पर जर्मनी के व्यापारिक कानून, इटली के दण्ड कानून, स्विस कानून अपने देश की परिस्थितियों के अनुकूल डाल कर आरम्म किये।

3. राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिवर्तन-मुस्तफा कमाल ने सुल्तान और खलीफा के पद समाप्त कर दिये और ट्की को गणतन्त्र घोषित किया। उसने राज्य में सभी धर्मों की समानता को मान्यता प्रदान की और स्त्रियों को मताधिकार दिया। कमाल ने अपनी बहन की सहायता से महिलाओं की समितियाँ संगठित की। शीघ्र ही अंगारा में दो महिला न्यायाधीश बन गयी और इस्तंबूल की नगरपालिका की कौंसिल में दो से चार महिलायें हो गयी। उसने संसदीय सरकार की स्थापना करने का भी प्रयत्न किया, परन्तु इसके लिये समय नहीं आया था, पर उसने जनता को उपर्युक्त आदर्श बतला दिया था। कमाल ने आर्थिक ढांचे में भी परिवर्तन किया उसने कृषि और उद्योगों के विकास के लिये कुछ विशेष विभाग गठित किये। इसके अतिरिक्त उसने अनेक उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया और अनेक का राष्ट्रीयकरण किया। उद्योगों के विकास के लिये 1934 में एक पंचवर्षीय योजना भी लागू की।

4.शिक्षा में परिवर्तन-मुस्तफा ने तुर्की में व्याप्त अज्ञान के बन्धन को हटाने के लिये अनिवार्य शिक्षा की आवश्यकता महसूस की। प्राचीन तुर्की लिपि कठिन थी जिसके परिणामस्वरूप तुर्की के बहुत कम लोग लिख तो पढ़ सकते थे। अपने सलाहकारों की सहायता से कमाल ने नयी लिपि निकाली-एक वर्णमाला जिसमें तुर्की ध्वनियाँ थी किन्तु लिखी लैटिन अक्षरों में जाती थी। मुस्तफा का प्रयास था कि जनता को विस्तृत ज्ञान सम्भव हो सके, उसका टकों के लोगों में प्रसार किया जाये। इसमें उसने युवा और वृद्ध सबको शामिल किया।
मुस्तफा कमाल पाशा की विदेश नीति मुस्तफा कमाल पाशा ने अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में टक्कर को पुनर्जीवन प्रदान किया। वैदेशिक सम्बन्ध के क्षेत्र में लोसाने की सन्धि कमाल पाशा की पहली शानदार सफलता थी पराजित देशों में टर्की ही ऐसा प्रथम देश था जिसने पहले सम्पत्र की गयी सन्धि को टुकरा कर मित्र राष्ट्रों को एक ऐसी सन्यि स्वीकार करने के लिये बाध्य किया जो उसके स्वयं की इच्छा पर आधारित थी परन्तु कई पक्षों में, ट्की की आकांक्षाओं की पूर्ति करने पर भी लोसाने की सन्यि टी की सभी वैदेशिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकी थी। तुर्की तैया इराक की सीमा मोसल की समस्या तथा सीरिया के साथ सीमा एवं जिले की स्वायत्तता के प्रश्न अनिश्चित ही छोड़ दिये गये थे। इसी तरह टी और यूनान सम्बन्धी आवादी की अदला-बदली का प्रश्न भी नहीं सुलझा था जिसके द्वारा यह निश्चित होना था कि दोनों देशों में से कोई भी जातिगत अल्पसंख्यकों के बारे में एक देश दूसरे से किसी भी प्रकार की मांग नहीं करेगा ओटोमन काल के ऋण के विभाजन और भुगतान का प्रश्न भी अभी तक

उलझन में ही पड़ा हुआ था। अत: तुर्की ने नये शासन की विदेश नीति का मूल ठद्देश्य अपनी सार्वभौमिक एकता एवं स्वाधीनता की रक्षा करना, पाश्चात्य देशों के स्वार्थपूर्ण ठ्देश्यों की पूर्ति न होने देना, साम्यवादी रूस के साथ मैत्री संबंधों की स्थापना करना, मध्यपूर्वी देशों के साथ मित्रतापूर्ण एवं सामान्य सम्बन्ध कायम करना, इटली की विफल करने के लिये बल्कान राज्यों के साथ मधुर सम्बन्ध स्थापित करना और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के तूफानों से पृथक रहना था रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली जर्मनी और बल्कान प्रदेशों के साथ रूस के सम्बन्ध समय की मांग के अनुसार अच्छे ही थे। टर्की पर राष्ट्रों का युद्ध से पूर्व कुछ ऋण था, जिसे टर्की ने लौटाना स्वीकार किया। युद्धकाल में तुर्की और अमेरिका में संबंध विच्छेद हो गया था काफी प्रयलों के बाद 1927 ई० में दोनों देशों में पुनः कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित हो गये और बाद में व्यापारिक सम्बन्ध भी स्थापित हो गये। तुर्की की स्थिति मजबूत करने के लिये मुस्तफा कमाल पाशा ने 1932 ई० में टर्की को राष्ट्रसंघ की सदस्यता भी ग्रहण करवा दी। सन् 1936 ई० की माट्रों जलडमरूमध्य संधि तुर्की की विदेशनीति के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि एवं कमाल पाशा की दूरदर्शिता का प्रतीक थी इस समझौते के अन्तर्गत टर्की को जल डमरूमध्य की किले बन्दी करने तथा काले सागर के अन्य देशों के युद्ध पोतों पर वहाँ से गुजरने पर नियन्त्रण लगाने का पूर्ण अधिकार दिया गया। अब युद्ध काल में टर्की काले सागरीय देशों के जहाजों के लिए भी जलडमरूमध्य को बन्द कर सकता था, यदि वे समझौते की श्तों की अनुसार न हो। इस सन्धि में यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि टर्की स्वयं युद्धरत हो तो जलडमरू में आने-जाने का अधिकार पूर्णतः: उसके इच्छा पर निर्भर होगा लेकिन शान्तिकाल में काले सागरीय देशों के व्यापारिक और सामरिक जहाजों को निर्वाचन आवागमन का अधिकार था। यह समझौता 20 वर्षों का था। इस सन्धि ने पश्चिमी शक्ति और टर्की के बीच मैत्री स्थापित की। इसके बाद तो तुर्की का सम्बन्ध रूस एवं पाश्चात्य राष्ट्रों से घीरे-घीरे सामान्य होता गया और अब तुर्की सामूहिक सुरक्षा सिद्धान्त का समर्थक बन गया। इस प्रकार टर्की का मुस्तफा कमाल पाशा ने राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में एक कुशल राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठापित करने के लिए सभी प्रकार के प्रयास किये, जो टर्की के बहुत लाभदायक एवं दूरगामी सिद्ध हुए।

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