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रविवार, 12 जुलाई 2020

थॉमस एक्विनास के राजनीतिक विचारों का विश्लेषण

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थॉमस एक्विनास के राजनीतिक विचारों का विश्लेषण 

थॉमस एक्विनास मध्यकालीन युग का प्रमुख विचारक था। उसकी विचारधारासमन्वयवादी चिन्तन पर आधारित थी। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती अरस्तू, सिसरो आदि दार्शनिकों के मतों का सुन्दर समन्वय किया है। मध्य काल में पश्चिम में चर्च तथा राज्य की सर्वोच्चता के प्रश्न को लेकर काफी संघर्ष छिड़ा था। थॉमस एक्विनास से अन्त तक दोनों में समन्वय के लिए अथक प्रयास किया। मध्ययुगीन विचारों में सर्वाधिक महान् माने जाने वाले इस व्यक्ति को फास्टर महोदय ने महान् दार्शनिक की संज्ञा से सम्बोधित किया है। 49 वर्ष की अवस्था तक जीवित रहने वाले इस महान् दार्शनिक ने मध्य युगीन राजनीतिक दर्शन में एक ठल्लेखनीय योगदान दिया। उसके लिए मध्य युगीन राजनीतिक चिन्तन चिर काल तक उसका ऋणी रहेगा। अर्थात् दूसरे शब्दों में उसके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, मध्ययुगीन राजनीतिक चिन्तन में उसके योगदान को परिभाषित करते हुए फास्टर महोदय ने ठीक ही लिखा है- "एक्विनास की विशेषता यह धी कि उसके विचार की विभिन्न धाराओं को, जो कि पहले अलग-अलग प्रवाहित थी, एके ही प्रणाली से संश्लि् करके एक कर दिया। वह मध्य युग के समग्र चिन्तन अथवा विचार धारा का प्रतिनिधित्व करता है। अन्य किसी भी मध्यकालीन विचारक को यह श्रेय नहीं दिया जा सकता। एक्विनास का कार्य समन्वय का था। इसने मुख्य रूप से चर्च व अरस्तू के दर्शन में समन्वय करने का प्रयोग किया। अरस्तू की शक्तियों को प्रारम्भ में सन्देह की दृष्टि से देखा जाता था परन्तु बाद में ईसाई सिद्धांत के अनुसार उसकी व्याख्या हुई।

एक्विनास के गुरु अलबर्ट महान् ने अरस्तू के दर्शन का प्रचार करना ही जीवन का ध्येय समझा। एक्विनास भी उसी लाइन पर चले उन्होंने विज्ञान, दर्शन, धर्मशास्त्र का ऐसा समन्वय किया कि इसके मिश्रण से ऐसी दर्शन की घारा बही जिसमें प्रत्येक के उचित सम्बन्ध भी कायम रहे और सभी का समन्वय भी ऐसा हुआ कि वे एक ही दर्शन के अभिन्न अंग भी बन गये। उसने वह वृहद् ग्रन्थ 'सम्मा थ्योलोजिका लिखकर उद्देश्य की प्राप्ति की। इस ग्रन्थ में एक्विनास की समस्त विचारधारा समाविष्ट है। एक्विनास के राजनीतिक विचार सन्त थामस एक्विनास ने अपने ग्रन्थ 'अरस्तू का राजनीति पर दो व्याख्याएँ (Commentaries on the politics of Aristotle) और धर्म शास्त्र का संक्षेप आदि में राजनीतिक विचारों का दिग्दर्शन किया।

(1) राज्य सम्बन्धी विचार-ईसाइयत मत राज्य की उत्पत्ति के कारण पाप मानता है। सन्त आगस्टाइन आदि ने इसी मत पर जोर दिया, पर एक्वीनास ने अरस्तू के सिद्धान्त को अपनाया कि राज्य की उत्पत्ति स्वाभाविक है। मनुष्य अपने स्वभाव से राजनीतिक और सामाजिक प्राणी है। इस प्रकार राज्य सबसे कल्याण के लिए आवश्यक है परन्तु नगर राज्य आत्मनिर्भर पूर्ण संगठित हो। अरस्तू के राज्य सम्बन्धी विचारों को मानते हुए भी वह उसमें संशोधन करता है। वह राज्य और समाज के संगठन का लक्ष्य पारलौकिक सुख मानता है। इसके अतिरिक्त चर्च को वह पारलौकिक सुख की प्राप्ति में सहयोग मानता है। वह लौकिक और धार्मिक दो संगठन मानता है। जिसमें लौकिक संगठन धार्मिक के अन्तर्भेद होना चाहिए। उसके मत में राज्य और चर्च एक दूसरे के विरोधी नहीं सहायक हैं। एक्विनास राज्य के कार्यक्षेत्र का व्यापक रूप देता है। वह राज्य को आर्थिक जीवन में प्रवेश अनुमति भी देता है क्योंकि सुखी लौकिक जीवन का आधार आर्थिक ही है। शासन प्रणाली-एक्विनास शासन-प्रणालियों का वर्गीकरण भी अरस्तू के अनुसार ही करता है। शासक का हित चाहने वाली बुरी प्रणाली है और जनता का हित व भलाई करने वाली प्रणाली ही अच्छी हैं राज्य के लक्ष्य निर्धारण में एक्विनास फिर अरस्तू से आगे बढ़ जाता है। अरस्तू सद्गुणी जीवन की प्राप्ति ही राज्य का लक्ष्य मानता है। परन्तु एक्वीनास मोक्ष को प्राप्त करने वाले सद्गुणी जीवन की प्राप्ति का लक्ष्य राज्य का मानता है। अरस्तू लोकतंत्र को राजतंत्र और एक्वीनास राजतन्त्र को लोकतन्त्र से श्रेष्ठ मानता था। राज्य के कार्य-एक्विनास ने राज्य के कार्य निम्नलिखित बताये हैं- (I) राज्य को ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करना व उपलब्ध कराना चाहिये जिससे शान्ति कायम रहे और नागरिक उत्तम जीवन व्यतीत करें। बाह्य आक्रमण से सुरक्षा और कानून पालन कराने की व्यवस्था हो।

(ii) विशेष मुद्रा पद्धति, भार, तौल आदि का व्यवस्था हो।

(iii) सड़के चोर-डाकुओं आदि से सुरक्षित हों।

(iv) राज्य गरीबों का भरण-पोषण करे और उनकी देखभाल करे।

(v) व्यापार का नियंत्रणं उचित मजदूरों का मूल्य निर्धारण तथा अधिक लाभ पर रोक लगाना चाहिये। राज्य एवं चर्च (धर्म) में सम्बन्ध-एक्विनास का कथन था कि सरकार अथवा राज्य का उद्देश्य मनुष्य को नेक बनाना है जिससे वे मोक्ष प्राप्त कर सके कोई मनुष्य चाहे कितना हो नेक क्यों न हो, विना चर्च (धर्म) की सहायता से मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। इसका अभिप्राय है प्रत्येक राजकीय शासन (राज्य) को चर्च के सहयोग से तथा चर्च के अधीन होकर कार्य करना चाहिए। मोक्ष तर्क के आधार पर नहीं वरन् विश्वास के आधार पर प्राप्त हो सकती । विश्वास के समस्त प्रश्नों पर चर्च का अधिकार सर्वोच्च है। चर्च राज्य का निर्देशन करता ह, अत: चर्च की शक्ति राज्य की शक्ति से सर्वोपरि है। राज्य के शासक को केवल राजनीतिक संगठन का ही अधिकार प्राप्त है। पोप समस्त आध्यात्मिक वस्तुओं पर नियन्त्रण रख सकता हा अंत: पोप की आज्ञा का पालन प्रत्येक व्यक्ति को (राज्य के शासक समेत) करना चाहिए। सम्राट ईश्वर का प्रतीक हो सकता है, परन्तु चर्च के आदेश की अवहेलना करने पर उसको पोप ईसाई धर्म से बाहर निकाल सकता था। समस्त मध्य युग के विचारकों के समान एक्वीनास भी विश्व की अनुशासन हीनता तथा क्रान्तियां फैले होने पर भी, एकता में विश्वास रखता था तथा उसको महत्त्व देता था। उसके अनुसार इस एकता को स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि विश्व के समस्त मनुष्य ईश्वर के अधीन हो। पोप को राज्य के शासकों पर नियन्त्रण रखने का, उनकी सजा देने का तथा अन्य किसी व्यक्ति की शासन की आज्ञा मानने से मुक्ति देने का अधिकार प्राप्त है। राज्य तथा चर्च एक दूसरे से पृथक् न होकर एक-दूसरे के पूरक थे। राज्य पर चर्च का पूर्ण रूप से नियन्त्रण था। राज्य की प्रभुता भी पोप में ही केन्द्रित थी, चर्च के अध्यक्ष के नाते पोप सम्पत्ति का स्वामी था। परन्तु इस सम्पत्ति पर किसी राज्य के शासक का कोई नियन्त्रण नहीं था। सेवा महोदय ने एक्विनास के सन्दर्भ में लिखा है, "एक्वीनास ने अपने दर्शन में ईश्वर प्रकृति तथा मानव में एक सुन्दर सामंजस्य स्थापित करने के लिए कारणों की खोज की जिससे प्रत्येक समाज तथा राज्य में उचित स्थान पा सकें।"

(2) कानून अथवा विधि सम्बन्धी धारणा-कानून अथवा विधि के विचार अरस्तू और स्ट्रायकस की विचारधारा से प्रभावित है। वह कहता है-"विधि सार्वजनिक हित की दिशा में एक विवेकात्मक अध्यादेश है, जिसे वही व्यक्ति प्रकाशित करता है जिस पर किसी सम्प्रदाय के पालन का दायित्व है।" वह राजा और पोप दोनों की विधि में आस्था आवश्यक समझता है। एक्विनास कानून को मानवीय उत्पत्ति न मानकर आन्तरिक ही मानता है। वह दैवी और मानवीय कानूनों को एक करने का प्रयत्न करता है। वह दैवी व्यवस्था के अधीन ही मानवीय कानून को मानता है।

उसने कानून के चार भाग किये (1) शाश्वत कानून (2) प्राकृतिक कानून (3) दैविक कानून (4) मानवीय कानून।

(1)शाश्वत कानून-शाश्वत् कानून ईश्वर की परिकल्पना और इसकी योजना पूर्णरूप में वहीं जानता है। यह वह योजना है जिसके अनुसार ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया और इस कानून के द्वारा ही उस सृष्टि को बनाए रखती है। इसका आभास संसार में होता है परन्तु ईश्वर में ही इसका पूर्ण विकसित रूप रहता है। इस कानून के अधीन समस्त सृष्टि और प्राणिजगत, जड़-चेतन आदि है। ईश्वर शाश्वत् कानून का आभास प्राकृतिक कानून में देता है क्योंकि मनुष्य की बुद्धि पूर्ण: ग्रहण करने में सक्षम नहीं है।

(2) प्राकृतिक कानून-यह शाश्वत् कानून की छाया या प्रतिबिम्ब है। पेड़-पौधे व इतर प्राणियों की अपेक्षा मानव जगत् में इसका सुन्दर रूप मिलता है। क्योंकि जड़ पदार्थ और इतर प्राणियों में विवेक नहीं होता। ईश्वर इसके द्वारा मानवीय व्यवहार को नियन्त्रण करता है। ईश्वर ने मनुष्य को शुभ-अशुभ का ज्ञान दिया है और पाप-पुण्य को समझने की बुद्धि। मनुष्य शुभ-अशुभ और पुण्य को अपनाता है तथा अशुभ और पाप से बचता है। यह एक आदर्श है जो मनुष्य का लक्ष्य और मापदण्ड निश्चित करता है। (अधिक कानून-शाश्वत् और दैविक कानून आदिकाल से चले आ रहे हैं। और ये ह समय मौजूद थे और हैं।

(3)"दैविक कानून" से तात्पर्य है-देवी-इच्छाओं का प्रकाशन । मनुष्य की सीमित बुद्धि प्राकृतिक नियमों के कुछ अंग को ही समझ पाती है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक नियम को साध्य है साधन कुछ और है। यह ईश्वर प्रदत है जो मनुष्य के अन्ता से निकलती है। एक्विनास यह मानते हैं कि ईसाइयों को ईशस द्वारा, यहदियों को सिनाई पर्वत पर हिंदुओं को वेदों से मनुष्य के और मुसलमानों का मुहम्मद साहव के द्वारा इस कानून का ज्ञान कराया गया लिए साध्य तक पहुंचने हतु यह एक धनात्मक कानून है जो प्राकृतिक कानून से आधा विस्तृत है। प्राकृतिक कानून और देविका विरोधी नहीं हैं बल्कि पूरक हैं।

(4)मनावीय कानून-थामस एक्वीनास ने इसका विस्तृत वर्णन किया है। प्राकृतिक कानून से बचा हुआ क्षेत्र ही इस कानून के अन्तर्गत आता है। ये किन्हीं निश्चित और विशेष परिस्थितियों के कारण बनाये जाते हैं। ये कानून समाज का संरक्षक (राजा आदि) लागू करता है।

"बुद्धि के अध्यादेश" कहता है और इन्हें प्राकृतिक कानून के अन्तर्गत ही रखता है। राजा की जो आज्ञा न्यायोचित न हो उसे प्रजा पालन न करे। कानून सामान्य हित के पोषक हों, व्यक्ति विशेष वर्ग विशेष के लिए न हों। राजा लौकिक विषयों पर ही कानून बना सकता है।

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