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मंगलवार, 14 जुलाई 2020

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

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रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना 

रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है।

रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ में लिखा है कि-व्यक्ति के भावना प्रधान इच्छा की बाहुल्यता रहती है। जब भावनाप्रधान इच्छा स्वार्थ और संकीर्णता के घेरे से बाहर निकलकर परमार्थ तथा उदारता के घेरे में प्रवेश करती है तो वह सामान्य इच्छा की परिधि में आ जाती है। यथार्थ इच्छा का एक ही रूप सामान्य इच्छा का स्वरूप है। सामान्य इच्छा सत्य यथार्थ पर आधारित होती है। डॉ० आश्शीवादम् के अनुसार, सामान्य इच्छा मनुष्यों की उन आदर्श इच्छाओं का संयोग है जिनके द्वारा समाज की स्थापना हुई है।' प्रो० सेवाइन महोदय ने भी इस सामान्य इच्छा की परिभाषा दी है 'सामान्य इच्छा समाज का एक विचित्र प्रतिनिधित्व करती है। इसका उद्देश्य स्वार्थपरता और कुछ इने गिने हितों की रक्षा न होकर सर्वसाधारण के हितों की रक्षा करना होता है। रूसो के मतानुसार -सामान्य इच्छा अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। इच्छा को सामान्य बनाने वाली बात यह है कि निर्वाचकों की संख्या की अपेक्षा लोक कल्याण की भावना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।' रूसो का विश्वास था कि एक व्यक्ति की इच्छा से अनेक व्यक्तियों की इच्छा अधिक अच्छी होती है। सामान्य इच्छा में सामूहिक रूप से समाज के कल्याण की इच्छा निहित रहती है।

रूसो के सामान्य इच्छा की विशेषताएँ-रूसो की सामान्य इच्छा की मूल विशेषताओं को अग्रलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत वर्णित किया जा सकता है-

1. स्थायित्त्व-सामान्य इच्छा में सर्वप्रथम विशेषता यह होती है कि वह स्थाई होती है। रूसो के शब्दों में-ठसका कभी अन्त नहीं होता है, न वह कभी प्रकट हो पाती है। अनित्य परिवर्तनशील तथा पवित्र होती है।

2. एकता-रूसो की सामान्य इच्छा की द्वितीय विशेषता यह भी है कि वह युक्तिसंगत होती है। विवेक पर आधारित होने के कारण वह परस्पर विरोधी नहीं हो सकती। सामान्य इच्छाओं का अर्थ विभिन्नता में एकता स्थापित करना है।

3. औचित्य-सामान्य इच्छा की तृतीय विशेषता यह होती है कि वह सदैव ठीक ही होती ठसका आधार लोक कल्याण की भावना है। उसका निर्माण लोकहित के लिए है।

4. नैतिकता-सामान्य इच्छा में स्वार्थ का अभाव होती है वह नैतिकता के आधार पर होती है।

5. विधि अथवा कानून का स्रोत-सामान्य इच्छा के द्वारा ही विधि अथवा कानूनों का निर्माण होता है। कानून का आधार सर्वसाधरण का हित होता है। राज्य के सभी अंगों को कानून ही व्यवस्थित रखता है। सामान्य इच्छा जितनी ही उच्च होगी कानून उतना है महान् होगा।

6. संप्रभुता धारी-सामान्य इच्छा सम्प्रभुता धारी है वह अविभाज्य और अदेय है। इसके राज्य सरकार को विभिन्न अंगों कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका में विभक्त करना, इसे नष्ट करना है। यह असीमित है। रूसो ने अपने सम्प्रभु को सर्वोच्च या निरंकुश शक्ति प्रदान की है।

इच्छाओं का वर्गीकरण-रूसो की सामान्य इच्छा का सिद्धान्त राजनीतिक चिन्तन काफी महत्व रखता है। सामाजिक समझौते का सिद्धांत भी सामान्य इच्छा के सिद्धान्त पर आधारित है। रूसो के मतानुसार इच्छा के दो भेद होते हैं-वास्तविक इच्छा तथा भावना प्रधान भावना प्रधान इच्छा मानव के स्वास्थ्य पर आधारित होती है। उसमें विवेक का पुट नहीं होता है। इच्छा में संकीर्णता का प्रधान गुण होता है। परिणाम आपसी कलह होता है। वास्तविक या यथार्थ इच्छा भावना प्रधान इच्छा से कैसे भिन्न होती है उसका आधार विवेक होता है। को कार्य विना सोचे-विचारे इसके अन्तर्गत नहीं आता। उचित अनुचित का इसमें सदैव ध्यान रखा जाता है। सम्पूर्ण समाज का कल्याण इसमें निहित होता है। सामान्य इच्छा का निर्माण-रूसो का मानना था कि सामाजिक प्रश्नों पर विभिन्न व्यक्तियों का मत विभिन्न हो सकता है। व्यक्ति या व्यक्तिसमूह स्वार्थमय दृष्टिकोण रख सकता है। शिक्षित समाज के व्यक्तियों द्वारा वाद-विवाद करने पर शुद्ध भाव हो रह जाते हैं। ये शुद्ध भाव ही सामान्य इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत की कहावत पंचों में परमेश्वर वास करता है। इन्हीं विचारों के आधार पर सामान्य इच्छा का निर्माण होता है। रूसो का मत है, सबसे उत्तम सामान्य इच्छा सबसे न्यायपूर्ण और जनता की आवाज होती है। वास्तवव में यह ईश्वर की आवाज होती है।

रूसो के सामान्य इच्छा की आलोचना-रूसो की सामान्य इच्छा की आलोचना अनेक विचारकों ने की है। उसकी आलोचना के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं- 

(1) अनेक आधुनिक विद्वान् रूसो की सामान्य इच्छा के सिद्धान्त को मूढ़ एवं स्पष्ट बताते हैं। यह सामान्य लोगों की समझ से बाहर है। रूसो का सामान्य इच्छा का सिद्धान्त गणित सिद्धान्त से हल करना बड़ी अटपटी बात थी।

(2) कुछ विद्वान् रूसो के सामान्य इच्छा के सिद्धान्त को निरंकुशता की पुष्टि करने वाला बताते हैं। जोन्स का मत है, रूसो की सामान्य इच्छा के सिद्धान्त में कुछ ऐसे अस्थिर तत्त्व है। जो इनको जनतन्त्र के समर्थन से हटाकर निरंकुश शासन की ओर ले जाते हैं।

(3) सामान्य इच्छा समस्त जनता की इच्छा पर आधारित होती है। किसी कार्य के परिणाम को बिना देखे यह कैसे कह दिया जाये कि यह सार्वजनिक हित का कार्य है।

(4) रूसो का कहना है कि समान इच्छा में व्यक्ति अपनी इच्छा पर विलीयन कर देता है। इस सम्बन्ध में वाहन का मत है, व्यक्ति का दृष्टिकोण व्यक्तिवाद के विरुद्ध है।

(5) एक ओर रूसो ने कहा कि व्यक्ति स्वतन्त्र पैदा हुआ है, दूसरी तरफ वह कहता है कि व्यक्ति को सामान्य इच्छा का पालन करना चाहिए। यह विरोधाभाषी विचार है।

(6) कुछ व्यक्ति कहते हैं कि रूसो सामान्य इच्छा को बहुसंख्यक वर्ग को इच्छा नहीं बताता है। बहुसंख्यक इच्छा स्वार्थ रूप हो सकती है। जबकि एक व्यक्ति की इच्छा विना स्वार्थ हो सकती है। इस प्रकार हम देखते है कि व्यक्ति की इच्छा न तो सामान्य ही है और न इच्छा ही है। उसमे अनेक त्रुटियां हैं और अव्यावहारिकता का भी दोष पाया जाता है।

रूसो के सामान्य इच्छा के सिद्धान्त का महत्त्व-निम्नलिखित तथ्य रूसो की सामान्य इच्छा के सिद्धान्त के महत्व को स्पष्ट करते हैं प्रथम सामान्य इच्छा के सिद्धान्त ने ही आदर्शवादी विचारधारा की नींव डाली और इसी को आधार मानकर ग्रीन ने राजा का मुख्य आधार बल ने मानकर इच्छा माना है। उसने इसी सिद्धान्त के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि जनतन्त्र बहुमत की शक्ति का परिणाम न होकर सक्रिय निस्वार्थ इच्छा का फल है। द्वितीय रूसो की सामान्य इच्छा राजनीतिक क्षेत्र में पथ-प्रदर्शक का कार्य करती है। उसके अनुसार सामान्य इच्छा का प्रभुत्व कार्य, विधि निर्माण और शासन तन्त्र की नियुक्ति और उसे भंग करना है। तृतीय अपने इस सिद्धान्त के द्वारा रूसो ने व्यक्तिगत स्वार्थ की अपेक्षा सामान्य हित को उबारने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। चतुर्थ सामान्य इच्छा के सिद्धान्त में इस बात का पोषण किया है कि राज्य एक नैतिक संगठन है जिसका कार्य सामाजिक कल्याण की भावना का ध्यान रखना है। पंचम यह सिद्धान्त समाज एवं व्यक्ति में शरीर तथा उनके अंशों का सम्बन्ध स्थापित करके मानव के सामाजिक स्वरूप को दृढ़ता प्रदान करता है।

हॉब्स और रूसो की सामान्य इच्छा (संप्रभुता) में समानता-हॉब्स और रूसो के सामान्य इच्छा में समानता के सन्दर्भ में वाहन महादय ने लिखा है-'यदि हाब्स के मानव देव (लेवियाथन) की शीश काट दिया जाय तो वह रूसो की सामान्य इच्छा होगी।" अर्थात् दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि रूसो की सामान्य इच्छा सिर कटा हुआ लेवियाथन है। सामान्य इच्छा सम्बन्धी सामान्य विशेषताओं का जो वर्णन हाब्स ने किया वही लगभग रूसो ने भी किया है। अन्तर केवल इतना है कि रूसो संप्रभु का निवास सामान्य इच्छा में मानते हैं जब कि हाब्स का संप्रभु एक मानव देव (लेवियाथन) है। हाब्स तथा रूसो के सम्प्रभु में निम्न समानता है-

(1) हाब्स की तरह रूसो की सामान्य इच्छा को सम्पूर्ण मानता है। (2) हॉब्स के मानव देव का अविभाज्यता सम्बन्धी गुण रूसो की सामान्य इच्छा में भी पाया जाता है। (3) हॉब्स की प्रभुसत्ता की भाँति रूसो भी अपनी सामान्य इच्छा को अहस्तान्तरणीय मानते हैं। जिसके हस्तान्तरण का अर्थ है प्रभुसत्ता का लोप। (4) हॉब्स की भाँति रूसो भी प्रभुसत्ता को स्थायी मानते हैं। (5) रूसो के सामान्य इच्छा सम्बन्धी विश्लेषण में हॉब्स के सम्प्रभु की एक ओर विशेषता पायी जाती है। और वह विशेषता है एकता की। (6) हॉब्स की भाँति रूसो भी एक ही समझौते की चर्चा करता है। जिसके फलस्वरूप राज्य तथा समाज दोनों की उत्पत्ति होती है। वह लॉक की भाँति दो समझौतों की चर्चा नहीं करते हैं। (7) रूसो भी हॉब्स के समान ही सामान्य इच्छा को न्यायिक इच्छा बताते है और इस वात का प्रतिपादन करते हैं कि सम्प्रभु सदैव ही न्याय प्रिय होता है। (8) हॉब्स तथा रूसो के बीच विशेष समानता यह है कि रूसो के सामाजिक समझौते में हो हॉब्स के समान व्यक्त अपनी सभी शक्तियों का आत्मसमर्पण कर देता है और समझौते के परिणाम स्वरूप उत्पन्न सामान्य इच्छा भी इतनी ही निरंकुश है। जितना हॉब्स का लेवायथन। रूसो भी इस बात का प्रतिपादन करता है कि राज्य का व्यक्तियों के पूर्णजीवन पर अधिकार होता है और व्यक्ति का मूल कर्तव्य राज्य की आज्ञाओं का पालन करना है। इस प्रकार रूसो का सम्प्रभु हॉब्स से अधिक निरंकुश है। हॉब्स राज्य की असीमित शक्ति प्रदान करते हुए व्यक्ति को आत्मरक्षा के अधिकार के हित में राज्य का विरोध करने के लिए स्वतन्त्र छोड़ देती हैं किन्तु रूसो व्यक्ति को राज्य का विरोध करने का अधिकार प्रदान नहीं करता है। उनकी दृष्टि से सामान्य इच्छा व्यक्तियों की आदर्श इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है और इसलिए वह किसी भी स्थिति में गलत नहीं हो सकती है। स्वयं रूसो ने लिखा है कि "जिस प्रकार प्रकृति ने मनुष्य को शरीर के विभिन्न अवयवों पर पूर्ण नियन्त्रण का अधिकार प्रदान किया है, ठीक उसी प्रकार सामाजिक समझौते ने राजनीतिक सामान्य इच्छा को उसके शरीर के विभिन्न व्यक्तियों के ऊपर पूर्ण निरंकुश अधिकार प्रदान किये हैं।"

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