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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

रूसो के प्राकृतिक अवस्था सिद्धान्त

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रूसो के प्राकृतिक अवस्था सिद्धान्त 

रूसो अपने सामाजिक समझौता सिद्धान्त सम्बन्धी पुस्तक की शुरुआत इस कथन से करता है मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है, मगर हर तरह से यह जंजीरो में बंधा रहा उसके इस कथन की व्याख्या के लिए उसके प्राकृतिक अवस्था एवं सामाजिक समझौता सम्बन्धी सिद्धान्त का विवेचन आवश्यक है जो संक्षिप्त रूप से निम्न लिखित है प्राकृतिक अवस्था हॉब्स और लॉक की तरह रूसो ने भी सामाजिक समझौते के पूर्व एक प्राकृतिक अवस्था की परिकल्पना की है। उसकी प्राकृतिक अवस्था- हॉब्स और लॉक के द्वारा चित्रित अवस्थाओं से पृथक है। वह न तो हॉब्स द्वारा चित्रित अवस्था की तरह अन्यकारमय एवं कष्टमय है और हो लॉक द्वारा वर्णित अवस्था की तरह आदर्श है। उसने प्राकृतिक अवस्था को दो भागों में बाँटा है-प्रारम्भिक और उसके बाद की अवस्था।

प्राकृतिक अवस्था को प्रारम्भिक काल-

1. प्रारंभिक काल में मनुष्य का जीवन पूर्णतः प्राकृतिक था अर्थात् उसकी आवश्यकता और आकांक्षायें कम थीं। जिस प्रकार पशु, पक्षी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, उसी प्रकार वह भी करता है। आवश्यकताओं की पूर्ति के तरीके में उसमें और पशुओं में कोई विशेष अन्तर नहीं था।

2. नैसर्गिक प्रवृत्तियों के आधार पर ही वह अपना जीवन संचालित करता था। उसमें अधिकार, कर्तव्यों तथा नैतिकता-अनैतिकता की भावना नहीं थी।

3. विवेक और बुद्धि का विकास नहीं हुआ था।

4. इसमें केवल दो भावनाएँ थीं-आत्मरक्षा की और दया की भावना। आत्मरक्षा की भावना के कारण यह स्वार्थी था परन्तु दया की भावना के कारण यह अन्य की सहायता तथा लोगों के हितों को कम से कम हानि पहुंचाने में विश्वास करता था। वह लोगों को कम से कम क्षति पहुंचा कर अपने हितों की पूर्ति करता था।

5. उस काल में सभी लोग समान तथा किसी अन्य मनुष्य के नियंत्रण से मुक्त थे। प्राकृतिक अवस्था के दूसरे काल को रूसो ने पतन की अवस्था बताया है। उसने बताया है कि जनसंख्या में वृद्धि तथा निजी सम्पत्ति का भाव उदय होने पर प्राकृतिक अवस्था का द्वितीय चरण शुरू हुआ, जो पतन का द्योतक था। इसका चित्रण ठसने इस प्रकार किया है

1. लोगों के मन में निजी सम्पत्ति की भावना का उदय हुआ।

2. उनकी आवश्यकताओं में वृद्धि हुई।

3.ऐसे ज्ञान की वृद्धि की और इस प्रकार की परिस्थितियों के कारण कौटुम्बिक जीवन का प्रारम्भ हुआ।

4.लोगों के मन में और भावना जागृत हुई और इस प्रकार समानता-असमानता, प्रेम-विद्वेष तथा ऊँच-नीच का विचार पैदा हुआ। भौतिक दृष्टि से उत्थान का यह चरण मानव जाति और मानवता के पतन का चरण था।रुसो के अनुसार प्राकृतिक अवस्था के इस दूसरे चरण ने स्वतंत्र, स्वस्थ, निष्ठावान और सुखी जीवन का अन्त कर दिया। इसका विकास होता गया जिसे मानव-सभ्यता का विकास कहते हैं। इस विकास ने प्राकृतिक अवस्था के प्रथम चरण के स्वर्णिमकाल का अन्त कर दिया। इसने मनुष्य की स्वतंत्रता समाप्त कर दी। रूसो के शब्दों में, मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है परन्तु वह सर्वत्र बेड़ियों से जकड़ा है। जीन जैक्स रूसो का यह कथन आज भी उतना प्रासंगिक है, जितना पूर्व काल में था। सामाजिक समझौता' एवं 'सामान्य इच्छा सिद्धान्त' का संस्थापक रूसो राज्य की उत्पत्ति के सन्दर्भ में विवेचन करते हुए कहता है कि मनुष्य जन्म से तो स्वतंत्र था परन्तु इसके पश्चात् सदैव वह किसी न किसी संबंधों की जंजीरों में जकड़ा रहा। प्रारम्भ में वह माता-पिता एवं परिवार में बाद में समाज में इसके पश्चात् राज्य के बन्धन में आवद्ध रहता है। दूसरे शब्दों में, वह तो पैदा स्वतंत्रता में होता है पर जीवन मृत्यु पर्यन्त तक वह बन्धनों में ही जकड़ा रहता है। इस प्रकार रूसो ने प्राकृतिक अवस्था के प्रथम चरण को आदर्श और दूसरे को पतन बताया है। प्राकृतिक अवस्था के चित्रण के मामले में वह लॉक और हॉब्स के बीच में है। प्रारम्भ आदर्शमय और बाद का काल अन्धकारमय चित्रित किया गया है। प्रारम्भिक अवस्था में यह स्वतंत्र, दयालु, आत्मनिर्भर तथा भावनाओं और ग्रन्थियों से मुक्त था। उसका जीवन स्वच्छ और स्वस्थ, सुखमय था। बाद में उसका जीवन परतंत्र तथा घृणा, द्वेष, अंहकार और वैमनस्य आदि की भावनाओं और ग्रन्थिों से युक्त हो जाता है। सभ्यता का विकास होता है तथा उसकी आवश्यकताएँ बढ़ जाती है जो अनेक बुराइयाँ और समस्याएँ पैदा करती है।

सामाजिक समझौता-सभ्यता के विकास ने मानव जीवन के स्वर्णिम काल का अन्त कर उसका जीवन कष्टमय बना दिया। इस स्थिति के कारण आवश्यकता महसूस होने लगी कि स्वतंत्रता और सुव्यवस्था के समन्वय के लिए एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जाय जिसमें सभी की इच्छाओं की पूर्ति हो तथा लोग एक दूसरे का सहयोग करें। इस आवश्यकता ने प्राकृतिक अवस्था में रहने वाले व्यक्तियों को आपस में समझौता करने के लिए प्रेरित किया। रूसो ने सामाजिक समझौते का जो रूप प्रस्तुत किया है, उसमें हॉब्स और लॉक, दोनों के ही सिद्धांत की विशेषताएँ हैं। रूसो का सामाजिक समझौता इस प्रकार का था-

1. व्यक्तियों ने अपने सभी अधिकार समर्पित कर दिये। हॉब्स के भी सामाजिक समझौते में व्यक्ति अपने सभी अधिकार समर्पित कर देते हैं। लॉक ने कुछ ही अधिकारों के समर्पण की यात की है।

2. व्यक्तियों ने अधिकार किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे समाज को समर्पित किये। लॉक ने भी पूरे समाज को समर्पण की बात कही है जबकि हॉब्स ने एक व्यक्ति-विशेष अथवा समूह-विशेष को समर्पित करने की बात कही है। सामाजिक समझौते के इस रूप का चित्रण करते हुए उसने कहा है कि इसमें व्यक्ति कुछ खोता नहीं, बल्कि पाता ही है क्योंकि वह उसी समाज को समर्पित करता है जिसका वह सदस्य है। उसने कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने को, सभी को समर्पित करने के कारण किसी को भी समर्पित नहीं करता है। हममें से हर व्यक्ति अपने को तथा अपने समस्त अधिकारों को सामान्य इच्छा के सर्वोच्च निर्देशन में सामान्य को सांप देता है तथा समष्टि रूप में हम प्रत्येक सम्पूर्ण समाज के अभिन्न अंग हो जाते हैं। इस प्रकार रूसों के अनुसार, सामाजिक समझौते के जरिये नागरिक समाज और राज्य अस्तित्त्व में आया।

राज्य और व्यक्ति का सम्बन्ध- सामान्य इच्छा की परिकल्पना कर रूसो ने लोकतांत्रिक राज्य का स्वरूप प्रस्तुत किया है। प्रत्येक व्यक्ति उसी को अधिकार समर्पित करता है और इस प्रकार यह राज्य की सम्प्रभुता में समान भागीदार तथा उसका अविभाज्य अंग बन जाता है। प्रत्येक व्यक्ति शासन और शासित दोनों होता तथा विधिनिर्माण में वह समान रूप से भाग लेता है। 'सामान्य इच्छा' की बात कर वह लोकप्रभुता की परिकल्पना करता है। उसकी सम्प्रभुता अविभाज्य तथा सर्वोपरि होते हुए भी निरंकुश नहीं है। वह एक व्यक्ति अथवा समूह-विशेष में नहीं, बल्कि 'सामान्य इच्छा में निहित है।

सामान्य इच्छा सामाजिक समझौते के सिलसिले में रूसो ने जिस सामान्य इच्छा की परिकल्पना की है, वह राजनीतिशास्त्र को उसकी मौलिक और महत्त्वपूर्ण देन है। परिकल्पना के अन्तर्गत उसने लोक प्रभुत्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ है। इसकी सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि यह स्पष्ट नहीं है। कभी वह इसे बहुमत की इच्छा और कभी समाज कल्याण की सामान्य इच्छा के रूप में प्रस्तुत करता है। स्पष्ट ही नहीं हो पाता कि रूसो की सामान्य इच्छा क्या है और किसमें पायी जाती है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि यह व्यक्तियों की सर्वश्रेष्ठ इच्छा है जिसमें स्वार्थ की बू तक न हो। यह विवेक इच्छा की प्रतीक है जिसमें स्वार्थ का कोई अंश न हो। कुल मिलाकर हम यही कह सकते हैं कि यह सभी व्यक्तियों की बुद्धि इच्छाओं के योग के रूप में है। प्रश्न उठता है कि इसकी अभिव्यक्ति कौन करेगा ? रूसो के विचारों से स्पष्ट है कि यह एक व्यक्ति की इच्छा के रूप में भी अभिव्यक्त हो सकती है। इसके लिए बहुमत की इच्छा के रूप में होना आवश्यक नहीं है। बहुमत की इच्छा से इसे अलग कर रूसो ने अस्पष्टता और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। उपर्युक्त विवेचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रूसो का उक्त कथन सर्वथा सत्य है। प्रारम्भ से लेकर अंत तक मनुष्य किसी न किसी रूप में बंधनों में आबद्ध रहा है।

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