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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

राजनीतिक चिन्तन में जे एस मिल के योगदान

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राजनीतिक चिन्तन में जे एस मिल के योगदान 

मिल की स्वतंत्रता सम्बन्धी अवधारणा अथवा सिद्धान्त को राजनैतिक दर्शन में अत्यन्त ही उच्च कोटि का स्थान प्राप्त है। उसकी इस चिर प्रसिद्ध अवधारणा ने उसे मिल्टन, स्पिनोजा, वाल्टेयर, रूसो, जैफरसन तथा अन्य महान् दार्शनिकों की श्रेणी में ला खड़ा करता है। मैक्सी महोदय का यह कथन राजनीतिक चिन्तन (दर्शन) के क्षेत्र में उसकी उपयोगिता को अपने आप प्रमाणित कर देता है। जे०ए० मिल ने आने स्वतंत्रता सम्बन्धी अवधारण अथवा विचार को अपनी प्रसिद्ध ग्रन्थ Essay on Liberty (स्वतंत्रता पर निवन्ध) मैं संकलित किया है। इस ग्रन्थ में उसने व्यक्ति की स्वतंत्रता का जिस प्रभावपूर्ण ढंग से वर्णन किया है वैसा मिल्टन की सुप्रसिद्ध ग्रन्थ 'एरोपेगीटिका के अतिरिक्त अन्य कहीं नहीं मिलता। इस ग्रन्थ में मिल ने एक प्रबल व्यक्तिवादी के रूप में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया है। वह अपने मत के समर्थन में अनेक तर्क प्रस्तुत किए हैं जिन्हें अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उपयोगितावादी तकों का अतिक्रमण हो गया है इसलिए प्रसिद्ध विद्वान् सेवाइन महोदय ने लिखा है-"मिल का व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन उपयोगितावादी समर्थन से कहीं अधिक है।" तथा इसके साथ मिल स्वतंत्रता की नकारात्मक अवधारणा का भी समर्थन किया है। मिल के मतानुसार व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को विकसित करने और सुन्दर बनाने की स्वतंत्रता है। इस क्षेत्र में समाज अथवा राज्य को व्यक्ति पर कोई प्रतिवन्ध नहीं लगाना चाहिए। उसके अनुसार व्यक्ति अपने शरीर और मस्तिष्क का स्वामी है, इसलिए उसे अपने सम्बन्ध में पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए।

व्यक्ति की राज्य और समाज के हस्तक्षेप से रक्षा होना आवश्यक है। समाज व राज्य को तो आचरण के केवल उस भाग का नियंत्रण करना ही उचित है, जो दूसरे से सम्बन्धित हो मिल के अनुसार, "शासकगण नियमित रूप से समाज के प्रति उत्तरदायी हैं। राजनीतिक क्षेत्र में बहुमत के अत्याचार जैसी बुराई से अपनी रक्षा करना आवश्यक है।" अतः राज्य को व्यक्ति के जीवन में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिये। मिल का सम्पूर्ण राजनीतिक चिन्तन व्यक्ति के मूल्य पर आधारित है। 'व्यक्ति के हितों को व्यक्ति ही समझ सकता है न कि समाज।' मिल ने जिस स्वतंत्रता का पक्ष पोषण किया है, वह एक व्यापक स्वतंत्रता है। मिल ने कहा है कि 'मानव जाति किसी भी कारक की स्वतंत्रता में केवल एक ही आधार पर हस्तक्षेप कर सकती है और वह है आत्मरक्षा। समाज मानव आचरण के केवल उसी अंश को नियन्त्रित कर सकता है, जो दूसरे व्यक्तियों से सम्बन्धित हैं। स्वयं अपने ही कार्यों में उसकी स्वतंत्रता, अधिकार: निरपेक्ष है। मिल के अनुसार स्वतंत्रता के दो प्रकार हैं

(1) विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (2) कार्यों की स्वतंत्रता।

(1) विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-मिल विचार-स्वातन्त्र्य का कट्टर समर्थक या। व्यक्ति की स्वतंत्रता मानव जाति की उन्नति और कल्याण के लिये आवश्यक है। मिल मू्खो तक को भी भाषण की स्वतंत्रता देने के पक्ष में थे। मिल का कथन था, "दस मूर्ख व्यक्तियों में से नौ पूर्ण मूर्ख हो सकते हैं, परन्तु दसवाँ व्यक्ति मनुष्य जाति के लिये इतना लाभदायक सिद्ध हो सकता है, जितना सर्वसाधारण मिलकर भी नहीं हो सकते। भाषण और विचारों की स्वतंत्रता से सत्यता की पुष्टि होती है। सत्य का ज्ञान विभित्र विचारों के समन्वय से होता है। मिल ने विचार व भाषण स्वतंत्रता के समर्थन में उदाहरण प्रस्तुत किया है कि ईसा मसीह और सुकरात को यदि वह स्वतंत्रता दी गई होती तो इससे मानव जाति का और कल्याण होता। ईसा मसीह को सूली पर चढ़ा दिया गया और सुकरात को सत्य विचार प्रकट करने के कारण जहर का प्याला दिया गया। मिल के शब्दों में, "क्या मानव जाति कभी भूल सकती है कि किसी जमाने में सुकरात नाम का एक मनुष्य था जिसकी राज्याधिकारियों से एक स्मरणीय टक्कर हुयी थी।

जे० एस० मिल ने विचार स्वातन्त्र्य के समर्थन में एक तर्क यह भी दिया है कि बहुमत को भी यह अधिकार नहीं होना चाहिये कि वह अल्पमत को इन स्वतन्त्रताओं से वंचित कर सके। मिल के शब्दों में, "यदि एक व्यक्ति के अतिरिक्त सम्पूर्ण मानवजाति का एक ही मत हो जाये तो भी मानव जाति को उसे जबरन चुप करने का उसी प्रकार अधिकार नहीं है, जिस प्रकार यदि उसके पास शक्ति होती तो उसे मानव जाति को चुप करने का अधिकार नहीं होता। मिल ने दृढ़तापूर्वक कहा है कि किसी भी सत्य के दमन से सामाजिक प्रगति अवरुद्ध होती है।

2) कार्यों की स्वतंत्रता - मिल ने व्यक्तिवाद कि सिद्धान्त का दार्शनिक वर्णन इस प्रकार किया है, "मानव जाति व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से अपने किसी भी सदस्य की स्वतंत्रता में केवल एक बात के लिये हस्तक्षेप कर सकती है और वह है आत्म-रक्षा। मध्य समाज के किसी भी घटक के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग केवल एक ब्देश्य के लिये उचित हो सकता है और वह है-उसे दूसरों को हानि पहुँचाने से रोकना।"

मिल ने कार्य करने की स्वतंत्रता को दो भागों में बांटा है

(1) स्व संबंधी (स्वविषयक)कार्य (2) परसम्बन्धी (परविषयक)कार्य व्यक्ति के स्व सम्बन्धी या आत्मविषयक कार्य थे होते हैं जो उसी व्यक्ति को प्रभावित करते हैं जैसे व्यक्ति के विश्वास, धर्म, विचारों की स्वतन्त्रता, वेशभूषा शिक्षा प्राप्त करना आदि में राज्य को अनुचित हस्तक्षेप करना नहीं चाहिये। इस प्रकार के कार्यों के लिये व्यक्ति ही अपने हितों का श्रेष्ठ निर्णायक है। मिल इन कार्यों हेतु व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करने के पक्ष में हैं। पर सम्बन्धी या परविषयक कार्य व्यक्ति के वे कार्य हैं जिनसे समाज या अन्य व्यक्ति प्रभावित होते हैं। ऐसे कार्यों में राज्य द्वारा हस्तक्षेप किया जा सकता है जैसे सड़कों पर तीव्र गति से कार चलाना, रात्रि में तीन स्वर में गाना गाकर पड़ोसियों की नींद हराम करना, व्यक्ति को गाली देना, चोरी, डकैती, हत्या, आदि करना। इस प्रकार यदि व्यक्ति समाज में अनैतिकता का कार्य करता है, दूसरे व्यक्ति की स्वतन्त्रता में बाधा डालता है, समाज में शान्ति सुरक्षा मांग होती है, तो ऐसी दशा में राज्य को उस व्यक्ति के कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार है। बुरी आदतों की क्रियाओं को रोकने के लिये राज्य को परोक्ष रूप से हस्तक्षेप करना चाहिये। मिल ने कार्यों की स्वतन्त्रता को चरित्र निर्माण और सामाजिक विकास की दृष्टि से न्यायपूर्ण बतलाया है। जॉन स्टुअर्ट मिल का मत है कि, "जब तक लोगों को अपनी राय बताने और रखने की स्वतंत्रता नहीं दी जाती है तब तक वे मानसिक उन्नति नहीं कर सकेंगे जिस पर सब कुछ निर्भर है। व्यक्ति की स्वतंत्रता केवल इतनी सीमित होनी चाहिये कि वह दूसरे लोगों के लिये दुःख का कारण न बन सके।"

मिल के स्वतंत्रता के दर्शन ने व्यक्तिवाद के विकास और उसकी उन्नति में गहरा योग दिया है। उन्होंने यह शोध किया कि बहुमत भी निरंकुश हो सकता है उनकी यह खोज व्यावहारिक है। मिल लोकतन्त्र के आधार स्तम्भों में प्रमुख हैं। मैक्सी के शब्दों में, "मिल का स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार राजनीतिक दर्शन के इतिहास में बहुत ही उच्च स्थान रखता है। यह दर्शन उसे मिल्टन, स्पिनोजा, वाल्टेयर, रूसो, जैफर्सन तथा स्वतंत्रता के अन्य महारथियों की श्रेणी में ला खड़ा करता है।"

आलोचना- यद्यपि मिल ने स्वतंत्रता की अवधारणा के सम्बन्ध में विवेकपूर्ण विचार प्रकट किये हैं, फिर भी विद्वानों ने इसकी आलोचना की है। मिल व्यक्ति की विचार, भाषण एवं कार्य की स्वतंत्रता से आगे आध्यात्मिक स्वतंत्रता का पोषक है। वह व्यक्ति के मौलिक विकास द्वारा समाज के प्रत्येक पहलू का विकास व सर्वांगीण विकास करना चाहता है। लेकिन वाकर के अनुसार मिल की स्वतंत्रता में प्राप्त गुंजाइश छोड़ देने पर भी मिल रिक्त स्वतंत्रता एवं सारहीन व्यक्तिवाद का पैगम्बर लगता है। अधिकार दर्शन का कोई स्पष्ट रूप ठसके पास नहीं था, जिसके द्वारा वह स्वतंत्रता का विचार ठोस रूप में प्रकट करता। उसका समाज का कोई स्पष्ट विचार नहीं था, जिसे प्राप्त करने के लिये राज्य और व्यक्ति की गलत धारणा लुप्त हो जाती।" एक अन्य स्थान पर बाकर महोदय ने लिखा है-"मिल खोखली स्वतंत्रता एवं काल्पनिक व्यक्तिवाद-का प्रतिपादक था।"

मिल की स्वतंत्रता सम्बन्धों आवधारणा की आलोचनाएं निम्न है -

(1) व्यक्ति के कार्यों का कोई ऐसा पक्ष नहीं होता जो भाग उसे ही प्रभावित करे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ही कार्य समाज के अन्य सदस्यों को भी प्रभावित करता है।

(2) तर्क के संघर्षों के आधार पर विचारों में से योग्यतम को बने रहने दिया जाम, लेकिन जीवन के प्रत्येक पहलू पर कुतर्क करना कुत्ता होता है।

(3) मिल का यह विचार परिपूर्ण है कि अवयस्कों एवं निम्न वर्गों को विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता न हो पाए यह नियन्त्रण उचित नहीं है।

 (4) सनकी व्यक्तियों को भी विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता देने की वकालत करके मिल ने मानव सभ्यता के साथ खिलवाड़ किया है।

(5) स्वतंत्रता के नाम पर निन्दनीय एवं अनैतिक कार्यों को प्रोत्साहन दिया गया है। उपरोक्त आलोचनाओं के उपरान्त भी मिल की स्वतंत्रता सम्बन्धी अवधारणा का विशेष महत्त्व है। उसने व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल दिया और राज्य के कम से कम हस्तक्षेप को स्वीकार किया। यही कारण है कि उसकी स्वतंत्रता के विचारों को बहुत सराहा गया। इबन्स्टीन ने मिल की स्वतंत्रता के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कहा है कि "जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, मिल की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और महत्त्व में और महान् होती जाती है।"

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