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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

मार्क्स के प्रमुख सिद्धांतों का विवेचना

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मार्क्स के प्रमुख सिद्धांतों का विवेचना 


मार्क्स तथा एंजेल्स द्वारा प्रतिपादित मार्क्सवाद अथवा साम्यवाद पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध एक मानवीय संवेदनात्मक विद्रोह है। मार्क्स तथा एजेंल्स की अनेक कृतियों में इस सिद्धान्त का प्रणयन हुआ है। इनमें मार्क्स की 'दास कैपिटल मार्क्स तथा एंजेल्स  दोनों के द्वारा प्रणीत 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो' तथा एंजेल्स कृत ओरिजिन ऑफ फैमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एण्ड द स्टेट' मुख्य हैं। इनमें मार्क्स के सिद्धान्तों पर प्रकाश पड़ता है।

मार्क्सवाद के निम्न मुख्य तत्त्व हैं-

1. अलगाव का सिद्धान्त

2. द्वंद्वात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धान्त

3. अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त

4. वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त

5. सर्वहारा वर्ग की क्रांति एवं अधिनायकता का सिद्धान्त अलगाव का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्तिगत संपत्ति समस्त मानवीय संबंधों के विकास का कारण है। व्यक्तिगत संपत्ति के कारणवश मानव स्वयं से, समाज से, प्रकृति से अपनी मेहनत से अलग हो जाता है। वह भटक जाता है घन की चकाचौंध में जो संपत्ति मानव की सेवा करने के लिये एक साधन था वह मानव की स्वामिनी बनकर उसे उसकी मानवता से अलग कर देती है।

दृंद्वात्मक भौतिकवाद- द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में समाज की प्रगति के तीन अंग प्रमुख है। वाद, प्रतिवाद और समवाद। वाद को समाज की साधारण स्थिति माना गया है जिसमें कोई अंतर्विरोध नहीं पाया जाता है। कुछ समय उपरांत वाद से असन्तुष्ट होने से जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है उसका परिणाम प्रतिवाद के रूप में स्पष्ट दिखाई पड़ता था। यह एक निषेधात्मक स्थिति होती है जो कि वाद की अपेक्षा अधिक प्रगतिवाद जान पड़ती है। प्रतिवाद में अन्तर्विरोध की प्रक्रिया पाई जाती है इसके परिणामस्वरूप प्रतिवाद का भी प्रतिवाद उत्पन्न होता है इस प्रकार जब दो प्रतिवाद मिलते हैं तो समवादों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार वाद से प्रतिवाद उत्पन्न होता है तथा प्रतिवाद से समवाद उत्पन्न होता है यह प्रक्रिया इस प्रकार निरन्तर चलती रहती है। द्वंद्वात्मक प्रक्रिया को आर्थिक जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार समझा जाय तो इसमें वाद व्यक्तिगत सम्पत्ति या पूंजीवाद को माना गया है। इसमें समाज शक्तिशाली व सर्वहारा दो वर्गों में बैठ जाता है अतः इसमें असंगति पाई जाती है जिसके कारण समाज में संर्घष की उत्पत्ति होती है। इसके बाद विकास की वह अवस्था जिसे सर्वहारा वर्ग के अधिनायक तन्त्र की अवस्था कहा जाता है आती है यह अवस्था व्यक्तिगत सम्पत्ति की सामाजिक व्यवस्था के प्रतिवाद स्वरूप उत्पन्न होती है। तत्पश्चात साम्यवाद की अवस्था आती है जो कि इन दोनों अवस्थाओं के समवादस्वरूप आती है इसमें व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्थान पर सार्वजनिक स्वामित्व की अवस्था होती है। मार्क्स ने भौतिकवाद को अपने दर्शन का आधार बनाया क्योंकि उसके अनुसार वह न केवल प्रत्यक्ष सत्य या वास्तविक ज्ञान है वरन् सुस्पष्ट शास्वत रूप भी है। द्वान्द्वाद के अनुसार विश्व स्वतन्त्र और असम्बद्ध वस्तुओं का ढेर या संग्रह मात्र नहीं है वरन् समग्र इकाई है जिसकी समस्त वस्तुएँ परस्पर निर्भर हैं। ऐतिहासिक भौतिकवाद- इतिहास की प्रचलित अध्ययन पद्धतियों को गैर वैज्ञानिक मानकर मार्क्सवाद ऐतिहासिक भौतिकवाद द्वारा समाज के विकास के वैज्ञानिक नियमों की खोज करता है। इस सिद्धान्त को इतिहास की आर्थिक व्याख्या या इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या भी कहा जाता है। मार्क्सवाद के अनुसार यह सिद्धान्त इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या करता है। जो समाज के विकासशील चरित्र को व्याख्यापित करता है। समाज में जीवित रहने के लिये मानव को भोजन, वस्त्र, आवास सरीखी सुविधाओं की आवश्यकता होती है जो उत्पादन पर आधारित होता है। उत्पादन के लिये श्रम तथा उत्पादन के साधनों- कच्चा माल, उपकरण आदि की आवश्यकता पड़ती है। यह सभी उत्पादन की शक्तियां कहलाती हैं तथा इनमें विकास ही समाज के विकास का मुख्य कारण है।

उत्पादन का चरित्र सामाजिक है। उत्पादन में मानव केवल उत्पादन के साधनों पर नहीं बल्कि एक-दूसरे पर भी कार्य करते हैं उत्पादन के लिये वे एक-दूसरे से कुछ संबंध स्थापित करते हैं। इन्हें उत्पादन का संबंध कहा जाता है। समाज की उत्पादन प्रणाली उत्पादन की शक्तियों तथा उत्पादन के संबंधों के आधार पर तय होती है। यही समाज का सभी सामाजिक परिवर्तनों का आधार है। इसी कारणवश इसे अपः संरचना कहा जाता है। इस पर समाज का राजनीतिक , सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक ऊपरी संरचना खड़ा रहता है। इस कारणवश सामाजिक विकास का इतिहास उत्पादन तथा उत्पादन प्रणाली के विकास का इतिहास । समाज के इतिहास के बैज्ञानिक नियम समाज के आर्थिक जीवन के अध्ययन से प्राप्त हो सकते हैं। उत्पादन में श्रम मुख्य होता है, अतः समाज के विकास का अध्ययन करने कलिय श्रम करने, वाली जनता का अध्ययन आवश्यक है।

समाज में वर्ग-विभाजन उत्पादन के साधनों के स्वामित्व पर निर्भर करता है तथा विभिन्न यों का संघर्ष ही इतिहास है। इन रगों में एक प्रगतिशील वर्ग होता है। दूसरा प्रगति विरोधी। प्रगतिशील वर्ग की जीत निश्चित हैं।इसी प्रकार समाज का विकास वर्ग संघर्षों के माध्यम से होता है, क्रांति के माध्यम से होता है। एक प्रकार की उत्पादन-प्रणाली के दूसरे प्रकार की उत्पादन प्रणाली में बदल जाने से होता है।

सामाजिक परिवर्तनों में वर्गों की आंदोलनकारी शक्ति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। उत्पादन संबंध तथा आर्थिक अवस्थाओं के आधार पर मार्क्स ने इतिहास को 5 वर्गों में विभक्त किया है। (1) आदिम साम्यवादी युग (2) दास युग (3) सामंतवादी युग (4) पूंजीवादी युग (5) समाजवादी कारण।

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत- मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत को समझने के लिये मूल्य के श्रम सिद्धान्त को समझना आवश्यक है। मार्क्स के अनुसार प्रत्येक वस्तु के साथ दो प्रकार के मूल्य जुड़े होते हैं

(1) उपयोग मूल्य (2) विनिमय मूल्य उपयोग मूल्य वस्तु की उपयोगिता और आवश्यकता के आधार पर निर्धारित होता है तथा विनिमय मूल्य का होता है जिस मूल्य पर खरीददार विक्रेता से उस वस्तु को खरीदता है। मार्क्स के विचार में अर्थव्यवस्था में विनिमय मूल्य अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार किसी वस्तु का विनिमय मूल्य मानव श्रम की उस मात्रा से निर्धारित होता है जो किसी विशेष समाज में निर्माण के लिये खर्च किया जाना आवश्यक है। यही मूल्य का श्रम सिद्धान्त है। अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत मूल्य के श्रम सिद्धांत पर आधारित है इसके आधार पर मार्क्स के अनुसार प्रत्येक वस्तु का वास्तविक मूल्य उस पर खर्च किए गए केवल श्रम के अनुसार होता है। किन्तु बाजार में वह वस्तु काफी ऊँचे दामों में बेंची जाती है। बेचने से प्राप्त होने वाला अतिरिक्त घन पूँजीपति अपने पास रख लेते हैं मार्क्स के अनुसार "पूँजीपति द्वारा अपने पास रख लिया गया यह घन ही अतिरिक्त मूल्य है।" "यह उन दो मूल्यों का अन्तर है जिसे मजदूर वास्तव में पैदा करता है और जिसे वह वास्तव में पाता है।"

अर्थात यह वह मूल्य है जिसे पूंजीपति मजदूरों के श्रम से प्राप्त करता है जिसके लिए उसने मजदूर को कोई मूल्य नहीं चुकाया है। इस प्रकार मार्क्स के विचार इन तीनों सिद्धान्तों में स्पष्ट हो जाते हैं।

वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त- औद्योगिक विकास के परिणाम स्वरूप श्रम विभाजन की उत्पत्ति हुई श्रम-विभाजन के समाज दो वर्गों में विभाजित हो गया पूंजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग इस प्रकार व्यक्तियों का वह समय जो उत्पादन की किसी विशेष प्रक्रिया से सम्बन्धित हो वर्ग कहलाता है। ये वर्ग अपने विरोधी हितों के कारण संघर्षरत रहते हैं पूंजीपति वर्ग द्वारा जिसका उत्पादन के साधनों भूमि और पूँजी पर अधिकार होता है है अपने आश्रित रहने वाले श्रमिक वर्ग का शोषण करता है। श्रमिक वर्ग परिश्रम करने के बाद भी कठिन जीवन यापन करता है। पूंजीपति तथा श्रमिक दोनों एक-दूसरे के पूरक होने पर भी परस्पर विरोधी हैं पूँजीपति वर्ग अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिये श्रमिक वर्ग से कम से कम मजदूरी से अधिक से अधिक परिश्रम कराना चाहता है। इस प्रकार हितों के विरोध इन दोनों वर्गों में संघर्ष की उत्पति होती है।

वर्ग संघर्ष की अवधारणा के अनुसार माक्स पूँजीवाद के अन्त का समर्थन करता है क्यों कि पूंजीवाद ही वर्ग संघर्ष का सर्वप्रथम कारण है पूँजीपतियों का अधिक उत्पादन में विश्वास के परिणाम स्वरूप घोड़े से व्यक्तियों के हा्ों से धन एकत्रित हो जाने से पूंजीपतियों को संख्या में कमी तथा श्रमिकों की संख्या में यूट्धि होती है पूंजीवादी व्यवस्था के परिणाम स्वरूप देश में बार-बार आर्थिक संकट उत्पन्न होते है। इस प्रकार पति की स्थिति असुरक्षित हो जातो हैं।

श्रमिक वर्ग के शोषित होने के कारण उनका आन्दोलन अत्यधिक सुसंगठित हो जाता है। इस प्रकार पूँजीवादी कमजोर पड़ जाने के कारण अपने होने वाले विनाश का कारण स्वयं हो बन जाता है। इस प्रकार श्रमिक 'सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित कर सकते हैं। श्रमिक वर्ग की क्रांति तथा सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद मार्क्स के अनुसार समाज में वर्ग संघर्ष निश्चित रूप से क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की दिशा में अग्रसर होता है। शासक वर्ग स्वेच्छा से कभी सत्ता नहीं छोड़ते। उन्हें क्रांति के द्वारा ही सत्ताच्युत किया जा सकता है। क्रांति प्रत्येक सामाजिक परिवर्तन को जन्म देने वाली घाय है। विना क्रांति के सत्ता परिवर्तन नहीं हो सकता। बिना वर्ग संघर्ष के क्रांति नहीं हो सकती। इस प्रकार वर्ग संघर्ष तथा क्रांति में गहरा संबंध है। मार्क्स ने क्रांतिकारी परिवर्तन पर जोर दिया तथा यह माना कि क्रांति केवल वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने से ही आ सकती है। वर्ग संघर्ष को तेज करने के लिये वर्ग चेतना तथा वर्ग संगठन आवश्यक है। इसलिये क्रांति हेतु विचारधारा तथा श्रमिक वर्ग के क्रांतिकारी राजनैतिक दल की अत्यन्त आवश्यकता है। परन्तु जब दूसरे वर्ग के साथ संघर्ष चलता है तब मजदूर वर्ग स्वर्य को संगठित कर एक लड़ाकू वर्ग के रूप में गठित हो जाता है और क्रांति के माध्यम से राजसत्ता पर कब्जा करके शक्ति द्वारा पुराने संबंधों को नष्ट कर देता है। मार्क्स का मत है कि किसी भी सुधारवादी तरीके से चुनावों के माध्यम से मजदूर वर्ग का रास्ता पर कब्जा नहीं होता है। 1872 में एक भाषण में मार्क्स ने यह विचार व्यक्त किया कि इंग्लैण्ड, अमेरिका सरीखे देशों में शान्तिपूर्वक तरीके से परिवर्तन लाया जाना संभव है। मार्क्स के अनुयायी लेनिन ने मार्क्स के इस विचार का खण्डन यह कहकर किया कि आज इन देशों में पुलिस, अफसरशाही, सेना आदि में बढ़ोत्तरी हो जाने से यह संभावना समाप्त हो गयी। लेनिन के अनुसार सुधारवादी तरीके से कोई भी सामाजिक परिर्वतन नहीं लाया जा सकता। मार्क्स ने क्रांति के लिये यदि आवश्यक हो तो शक्ति एवं बल प्रयोग को युक्तिसंगत माना। मार्क्स के अनुसार क्रांति का अंतिम उद्देश्य समाजवाद की स्थापना है। क्रांति के द्वारा रास्ता प्राप्त करना ही श्रमिक क्रांति का उद्देश्य नहीं है, वरन सत्ता के सर्वहारा वर्ग के हाथों में आ जाने से वर्ग विहीन समाज के निर्माण का कार्य आरंभ होता है इसका पूंजीवादी वर्ग जमकर विरोध करेगा और वह सर्वहारा वर्ग के शासन को येन-केन प्रकारेण नष्ट करने का प्रयास करेगा। अतएव सर्वहारा वर्ग इस संभावना के लिये अधिनायकवादी तौर-तरीकों से काम करेगा। सर्वहारा वर्ग के कार्यक्रमों को लागू करने के साथ ही राज्य की उपयोगिता समाप्त हो जायेगी। समाज के उत्पादन के साधनों का सामाजिक स्वामित्व स्थापित कर समाज को वर्ग विहीन बनाते हुये साम्यवादी समाज की स्थापना की जाती है। आलोचना मार्क्सवादी एक विवादित राजदर्शन है। इसकी आलोचना विभिन्न विद्वानों द्वारा विभिन्न दृष्टिकोण से की गयी है। पूंजीवादी लेखक कार्ल पॉपर, सामाजिक प्रजातंत्रवादी जैसे- बर्नस्टीन, कॉटस्की, कीन्स जैसे अर्थशास्त्री प्रमुख हैं। पेपर के द्वारा अपनी पुस्तक 'द ओपन सोसाइटी एण्ड इट्स इनेमीज में की गयी आलोचना सबसे पूर्ण तथा सशक्त मानी जाती है। पॉपर की आलोचना का प्रत्युत्तर ब्रिटिश मार्क्सवादी लेखक कॉर्नफोर्थ ने अपनी पुस्तक - 'द ओपेन फिलासफी एण्ड द ओपेन सोसाइटी' में दिया है। कार्ल पॉपर ने माक्क्सवाद को दुबारा से वल प्रदान की हयी कट्टरता कहा है। पॉपर के अनुसार मार्क्सवाद कट्टर विचारों की प्रणाली है। जो स्वतंत्र मानव समाज को शत्रु है। स्वतंत्र समाज से उनका आशय है एक ऐसा समाज जहां व्यक्तित्व तथा योग्यता कपून त्या मुक विकास में कोई बाधा न हो और जहां समाज और सामाजिक संस्थाओं को व्यक्तियों के निर्णय से बदला एवं विकसित किया जा सके। विभिन्न दृष्टिकोणों से की गयी मार्क्सवाद की विभिन्न आलोचनाएँ निम्न हैं

1. मार्क्सवाद मानव व्यक्तित्व को समाज एवं सामाजिकता के बंधनों में जकड़कर नष्ट कर देता है। यह मानव की स्वतंत्रता का शत्रु है।

2. मार्क्सवादी केवल आर्थिक, भौतिक तत्वों को महत्त्व देते हैं। उन्होंने अन्य आवश्यक तत्वों की उपेक्षा की है।

3. गुणात्मक परिवर्तन के लिये क्रांति आवश्यक नहीं है जबकि मार्क्सवाद के आलोचक क्रांति के बिना परिवर्तन को संभव मानते हैं।

4. मार्क्स का आदर्श वर्ग विहीन राज्य विहीन समाज इतिहास की अंतिम अवस्था मानी जाती है जो मार्क्स के दार्शनिक विश्लेषण से यह मेल नहीं खाता है।

5. मार्क्स के आर्थिक सिद्धान्त की तीव्र आलोचना की गयी है। मार्क्स के इतिहास के आर्थिक विश्लेषण तथा वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त की आलोचना की गयी है।

6. समाज में मार्क्सवाद के अनुसार केवल दो वर्गों का अस्तित्व निहायत ही आधारहीन है। समाज में अनेक वर्ग होते हैं। स्वयं मार्क्स ने मध्यम वर्ग का होना स्वीकार किया है।

7. समाज में वर्ग संघर्ष मूल नहीं है बल्कि अनेक वर्ग परस्पर पूरक होते हैं। जिनमें पारस्परिक संघर्ष होता है। वर्ग संघर्ष से द्वीप, हिंसा की उत्पात्त होती है वास्तव में समाज में स्थायित्व प्रेम, शांति, अहिंसा आदि से स्थापित होता है।

8. मार्क्स के क्रांति सिद्धान्त की तीन आलोचना की गयी है वर्तमान लोकतांत्रिक राजव्यवस्थाओं में सत्ता परिवर्तन का माध्यम शांतिपूर्ण मतदान द्वारा होता है।

9. राज्य के विलुप्त होने की अवधारणा निराधार है। राज्य सभी समाज की एक आवश्यक आवश्यकता है।

10. क्रांति के उपरांत श्रमिक वर्ग की तानाशाही वस्तुतः कम्युनिस्ट पार्टी और पार्टीगत नेतृत्व की तानाशाही होती है। यह अततः बन्द समाज की जननी होती है।

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