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मंगलवार, 14 जुलाई 2020

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

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लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण 


जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे राज्य के विरुद्ध क्रान्ति का सहारा लेना भी तकं संगत होगा। क्योंकि राज्य की उत्पत्ति इन प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा हेतु हुई है। सामाजिक समझौता सम्बन्धी अवधारणा को प्रस्तुत करने वाले विचारों में एक जॉन लॉक का राजनीतिक चिन्तन में महत्वपूर्ण योगदान के अन्तर्गत उसका प्राकृतिक अधिकार सम्बन्धी सिद्धान्त है। मैक्सी जैसे प्रसिद्ध विद्वान् ने उसके इस योगदान को विशिष्ट योगदान ही नहीं वरन् सर्वाधिक शक्तिमान योगदान जैसी कोटि में रखा है लॉक द्वारा प्रस्तुत जीवन, स्वतंत्रता छापा सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार को जिस रूप में मानव के अलघ्य प्राकृतिक अधिकार पोषित कर राजनीतिक सत्ता को इनके माध्यम से मर्यादित रखने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। वह लॉक के बाद वर्तमान युग तक न केवल राज्यों के संविधानों में ही नहीं अपितु अन्तराष्ट्रीय सांप के द्वारा भी मानव के इन अधिकारों को मौलिक अधिकारों के रूप में घोषित करने तथा राज्य की संप्रभु शक्ति का प्रयोग करने वाली सरकार को इनके द्वारा मर्यादित रखने की परम्परा अपनायी जा रही है। व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार लॉक की विचारधारा का केन्द्रीय तत्त्व पा। चाहे लॉक ने इसके औचित्य को जिस रूप में भी चित्रित किया हो, परन्तु यह घर ऐसी है जिसने भविष्य की व्यक्तिवादी, पूंजीवादी समाजवादी, साम्यवादी आदि सभी विचारधाराओं को इस प्रकार चिन्तन करने की प्रेरणा दी इसमें सन्देह नहीं कि लॉक 7वीं शताब्दी के पश्चात् की किसी शताब्दी में उत्पन्न होता तो सम्पत्ति के सम्बन्ध में उसकी विचारधाराएँ भित्र प्रकृति की होती क्योंकि भविष्य की शताब्दियों के आर्थिक व्यवस्था के परिवर्तन उसकी इस धारणा को बदल देते हैं।

 प्राकृतिक अधिकार-लॉक का यह विचार है कि प्राकृतिक दशा में मनुष्य को तीन प्रकार के अधिकार प्राप्त । (1) जीवन का अधिकार (2) स्वतंत्रता का अधिकार, (3) सम्पत्ति का अधिकार। ये अधिकार उसे प्राकृतिक नियमों के द्वारा प्राप्त होते थे।

(1) जीवन का अधिकार-मानव की सबसे प्रवल आकांक्षा आत्मसंरक्षण की है और यही उसके समस्त कार्यों का पोषण तत्त्व है। ठसे यह अधिकार प्राकृतिक दशा में भी प्राप्त थे और प्राकृतिक नियमों के द्वारा उसे यह अधिकार रक्षक थे।

(2) स्वतंत्रता का अधिकार-हाव्स स्वतंत्रता के अधिकार से यह अर्थ लगाता है कि प्राकृतिक दशा में भी लोग मनमाना कार्य करते थे। इस प्रकार ठसकी स्वतन्त्रता का अधिकार स्वच्छन्दता का अधिकार है परन्तु लॉक कैसे असहमति प्रकट करता है। उसके अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ स्वछन्दता नहीं। मनुष्य को प्राकृतिक नियमों का पालन करना होता है और इसके अतिरिक्त वह किन्हीं भी अन्य प्रकार के नियमों से मुक्त है। इस प्रकार लॉक प्राकृतिक नियमों के अतिरिक्त अन्य नियमों से मुक्त होकर कार्य करना ही स्वतन्त्रता मानता है।

(3) सम्पत्ति का अधिकार-लॉक यह मानता है कि प्राकृतिक दशा में जीवन को धारण कराने में समर्थ वाद्य वस्तुओं पर वैयक्तिक नियन्त्रण था। उसने अपने दूसरे निबन्ध में पाँचवें अध्याय में अपने वैयक्तिक स्वामित्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। वह लिखा है कि आरम्भ में वस्तुओं पर सबका समान रूप से अधिकार था, परन्तु अब कोई व्यक्ति अपने शरीर के श्रम को किसी वस्तु के साथ जोड़ लेता था तो उस पर उसका वैयक्तिक अधिकार हो जाता था। लॉक मानता है कि ईश्वर ने भूमि एवं समस्त वस्तुओं पर सब व्यक्तियों को समान रूप प्रदान किया है। मनुष्य का शरीर ही एक मात्र ऐसी बस्तु है जिस पर उसका पूर्ण अधिकार है। जब वह अपने शरीर के श्रम को ईश्वर प्रदत सामूहिक वस्तुओं के साथ जोड़ देता है तो व्यक्तिगत सम्पत्ति बना लेता है। इस प्रकार लॉक मानता है कि श्म से ही सम्पत्ति की उत्पत्ति होती है। उदाहरण के लिए भूमि को ईश्वर ने समस्त मनुष्यों को समान रूप से प्रदान को परन्तु जब कोई व्यक्ति भूमि से मिट्टी खोदकर अपना घर बना लेता है तो वह निजी सम्पत्ति हो जाती है। लॉक का यह भी विचार है कि श्रम से हो वस्तुओं का मूल्य निश्चित होता है। लॉक के इस श्रम सिद्धान्त को कालान्तर में समाजवादी विचारकों ने विशेष रूप से विकसित किया है। लॉक सम्पत्ति के अधिकार को इतना अधिक महत्त्व प्रदान करता है कि वह अन्य दो अधिकारों को भी इसमें सम्मिलित कर देता है। वह यह लिखता है कि मनुष्य को स्वाभाविक रूप से इस बात का अधिकार है कि वह अपनी सम्पत्ति को अर्थात् जीवन स्वतन्त्रता एवं जायदाद को सुरक्षित रखे।

लॉक के प्राकृतिक अधिकारों की आलोचना-लॉक एक ओर प्राकृतिक अधिकारों को निरपेक्ष और राज्य द्वारा अनुल्लंघनीय घोषित करता है और दूसरी तरफ बहुमत के शासन के सिद्धान्त को न्यायोचित बतलाता है। बहुमत अपने निर्णय से अल्पमत के मौलिक अधिकारों को अगर कुचलता है, तब भी लॉक उसे सामाजिक हित की दुहाई देकर बहुमत के निर्णय को स्वीकार करने की बात कहता है। यह बात प्राकृतिक अधिकारों की निरपेक्षता और अनुल्लंघनीयता के विरुद्ध जाती है। लॉक ने सम्पत्ति के अधिकार का प्रबल समर्थन किया है और यह बताया है कि राज्य की उत्पत्ति इसी अधिकार की रक्षा करने के लिए हुई है। उसके द्वारा जिस ढंग से सम्पत्ति को एक मौलिक अधिकार घोषित करके उसे राज्य द्वारा अनुल्लंघनीय बतलाया गया है, उससे मनुष्य के शोषण पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था को अनुचित बल प्राप्त हुआ है। प्राकृतिक अधिकारों की उसकी अवधारणा की इस आधार पर भी आलोचना की जाती है कि अधिकार का स्रोत समाज होता है तथा उसकी रक्षा हेतु राज्य परम आवश्यक है। समाज और राज्य के जन्म के बिना किसी अधिकार की परिकल्पना गलत है। उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद भी उसकी यह अवधारणा राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में उसकी अमूल्य देन है। निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं राजनैतिक दर्शन के विकास में लॉक का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस क्षेत्र में उसकी मुख्य देन उसकी प्राकृतिक अधिकारों की परिभाषा है। जीवन स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति को वह मनुष्य के प्राकृतिक अधिकार समझता था। उसके बिना राजनैतिक समाज की कल्पना भी नहीं हो सकती थी।

लॉक का शासन (सीमित सरकार या शासन) सम्बन्धी विचार -राज्य के कार्यों और उसकी विशेषताओं से स्पष्ट है कि लॉक ने सीमित राजतन्त्र का समर्थन किया है। उनका विचार है कि नागरिक समाज (Civil Society) जनता की सहमति पर आधारित है और इसलिए वह कभी भी निरंकुश नहों हो सकता। लॉक निरंकुश शासन की कल्पना भी नहीं कर सकता। वह तो संवैधानिक सरकार का पक्षपाती है जो शक्ति विभाजन पर आधारित होती है। लॉक शासन पर अनेक प्रतिबन्ध लगाता है। कोई भी सरकार जनता की इच्छा के विरुद्ध कोई आदेश नहीं दे सकती। शासन व्यक्ति की सहमति के बिना उसकी वैयक्तिक सम्पत्ति को नष्ट नहीं कर सकता या उसे छीन नहीं सकता। वह व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों-जीवन, स्वतन्त्रता एवं सम्पत्ति के अधिकारों का अपहरण कभी भी नहीं कर सकता। सरकार या शासन की स्थापना इस अधिकारों के संरक्षण के लिए ही होती है और इसीलिए राज्य का निर्माण होता है अतएव इन अधिकारों को अपहरण करने का अधिकार किसी भी शासन का नहीं है। सरकार मनमाने ढंग से शासन नहीं कर सकती बल्कि उसे कानूनों के अनुसार ही शासन करना होता है। लॉक सरकार की प्रभुसत्ता में विश्वास नहीं करता। वह जनता को सहमति पर आधारित कानून की प्रभुसत्ता को मानता है और वह जनता को यहाँ तक अनुमति दे देता है कि यदि शासन उसकी सहमति से कार्य न करे और एक न्यायाधीश या टूटी के विरुद्ध कार्य करे या अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन करे तो जनता को शासन सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने का पूरा अधिकार है। उसका विचार है कि जब व्यवस्थापिका अपनी मर्यादा के बाहर जाने लगे तो जनता को व्यवस्थापिका को पदच्युत कर देना चाहिए। साथ ही लॉक यह भी कहता है कि व्यवस्थापिका अपने कानून बनाने के अधिकार को किसी को हस्तांतरित नहीं कर सकती। इस प्रकार स्पष्ट है कि लॉक ने शासन पर अनेक प्रतिबन्ध लगाकर सहमति पर आधारित वैज्ञानिक शासन का विचार प्रस्तुत किया है। मैक्सी ने अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में लिखा है-"उससे पहले किसी राजनीतिक विचारक ने इतने स्पष्ट और शक्तिशाली रूप में इस सिद्धान्त की स्थापना नहीं की थी। यदि कोई शासन प्रजाजनों की सहमति पर आधारित हो तो वह अवैध और निराधार होता है।

सरकार की प्रकृति, कार्य एवं सीमा -जॉन लॉक ने सरकार की शक्ति के लिये ट्रस्ट को मान्यता दी है वाहन के अनुसार

"संविदा के स्थान पर ट्रस्ट की धारणा को अपनाकर लॉक न केवल सरकार के ऊपर जन नियन्त्रण की व्यवस्था करता है, वरन् एक उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात का प्रतिपादन करता है, वह है अनुभव के आधार पर उस नियन्त्रण का दिन प्रतिदिन प्रसरण।"

लॉक के अनुसार सरकार का उद्देश्य निश्चित और उसकी शक्ति सीमित जनता की सम्पत्ति का संरक्षण और उसके हितों का पोषण ही सरकार का मुख्य उद्देश्य है। लॉक यह कहता है कि,

"मनुष्य के राज्य में संगठित होने तथा अपने आप को सरकार के अधीन रखने का मुख्य उद्देश्य अपनी सम्पत्ति की रक्षा करना है। इस उद्देश्य से लॉक मुख्य रूप से सरकार के तीन कार्य निर्धारित करता है

(1) समाज में उत्पन्न होने वाले सम्पूर्ण विवादों के निर्णय के लिये प्राकृतिक कानूनों के अनुसार कानून निर्मित करना अर्थात् व्यवस्थापिका सम्बन्धी कार्य करना।

(2) समाज कल्याण के लक्ष्यों को प्राप्त करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिये इन कानूनों को कार्यन्वित करना अर्थात् कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य करना।

(3) प्रचलित कानूनों का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दण्ड देना और पारस्परिक विवादों का समाधान करना अर्थात् न्यायपालिका के रूप में कार्य करना। इस तरह लॉक सरकार के तीनों अंगों व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के उपयुक्त भिन्न-भिन्न कार्यों का वर्णन करता है और कहता है कि यह सभी कार्य अलग-अलग व्यक्तियों के द्वारा सम्पन्न किये जाने चाहिये क्योंकि उसका मत है कि अगर कानून निर्मित करने वाले और कानूनों को कार्यान्वित करने वाले व्यक्ति समान हुये तो समाज के हितों को हानि पहुँच सकती है। इस ओर संकेत करते हुये वह कहता है कि वे अपने बनाये हुये कानूनों के पालन से अपने को मुक्त समझने लगेंगे और कानून का निर्माण और व्यवहार अपनी व्यक्तिगत इच्छा के अनुसार करने लगेंगे। उनका यह कार्य समाज की इच्छा से निम्न तथा उसके और राज्य के उद्देश्यों के प्रतिकूल ही हो सकता है। इस प्रकार लॉक ने शक्ति विभाजन के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसे बाद में जाकर माप्टेस्क्यू ने अपने चिन्तन का मुख्य आधार बनाया।

लॉक सरकार के तीनों अंगों में से व्यवस्थापिका को सर्वोच्च मानता है लेकिन वह उसकी निरंकुशता का समर्थक नहीं है क्योंकि वह उसे जनता के अधीन और वह उसके प्रति उत्तरदायी मानता है तथा व्यवस्थापिका अपने शक्तियों का प्रयोग उन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर सकती है, जिनके लिए समाज ने उसका निर्माण किया है। प्राकृतिक नियमों से उसका अधिकार क्षेत्र मर्यादित है। वह का उल्लंघन नहीं कर सकती है। अगर वह अपनी सीमाओं का उल्लंघन करती है तो उससे शक्ति को वापस ले सकती है। इस तरह लॉक कार्यपालिका की

शक्ति को भी सीमित मानता है। उसकी शक्ति पर प्राकृतिक विधि और व्यवस्थापिका दोनों का नियन्त्रण रहता है तथा स्वतंत्रता की सुरक्षा की दृष्टि से यह आवश्यक है। इस तरह लॉक सरकार की शक्तियों और कार्यों को इस ढंग से संयोजित और सीमित करता है जिससे कि निरंकुश शासन का उदय न हो सके।

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