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क्रमबद्ध भूगोल एवं प्रादेशिक भूगोल एक दूसरे के पूरक है ?

क्रमबद्ध भूगोल एवं प्रादेशिक भूगोल एक दूसरे के पूरक है ?

क्रमबद्ध एवं प्रादेशिक भूगोल वेड अंतर्सम्तर्य (Inter-relationship between Systematic and Regional Geography) भौगोलिक अध्ययन की क्रमबद्ध विधि और प्रादेशिक विधि परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बंधित तथा एक दूसरे की पूरक हैं। अधिकांश भौगोलिक अध्ययनों में दोनों ही विधियों प्रयुक्त होती हैं। भौगोलिक अध्ययन में तथ्यों के सम्मिश्र को कम जटिल समूहों में और अध्ययन क्षेत्र को छोटे छोटें समरूप उप क्षेत्रों (लघु क्षेत्रों) में विभक्त किया जाता है। इस प्रकार किसी सुसंगठित भौगोलिक अध्ययन में क्रमबद्ध और प्रादेशिक दोनों विधियों के पारस्परिक सम्बंध काफी महत्वपूर्ण होते हैं।

हेटनर का समर्थन करते हुए हार्टशोर्न ने क्रमबद्ध भूगोल तथा प्रादेशिक भूगोल के समन्वय को ही भौगोलिक की सर्वाधिक उपयुक्त विधि बताया है। उनके अनुसार क्रमबद्ध तथा प्रादेशिक भूगोल में केवल विषयों और प्रदेशों के चुनाव के तरीकों का ही अंतर है। एक बृहत प्रदेश के पूर्ण क्रमबद्ध अध्ययनों के योग में वे सभी तथ्य और सम्बंध समाहित होते हैं जो उसके प्रादेशिक भूगोल में अंतर्लिप्त होते हैं। क्रमबद्ध भूगोल में सम्पूर्ण अध्ययन क्षेत्र को एक पूर्ण इकाई मानकर उसके विभिन्र उसके विभिन्न तत्वों (विषयों) का अध्ययन किया जाता है। प्रादेशिक भूगोल में भी लगभग उन्हीं विषयों का अध्ययन किया जाता है किन्तु अंतर यह है कि इसमें इनका अध्ययन विभिन्न उपविभागों (उपक्षेत्रों या प्रदेशों) के अनुसार अलग-अलग किया जाता है। विश्व के क्रमबद्ध भूगोल के अन्तर्गत विश्व की स्थिति एवं विस्तार से आरम्भ करके उसकी संरचना, उच्चावच, अपवाह, जलवायु, मिट्टी एवं खनिज, प्राकृतिक वनस्पति, जीवजन्तु, कृषि, उद्योग, व्यापार, परिवहन, जनसंख्या तथा अधिवास का क्रमशः अध्ययन किया जाता है। विश्व के प्रादेशिक भूगोल के अन्तर्गत पहले-विश्व को समान विशेषताओं वाले प्रदेशो (यहाँ महाद्वीपों) में विभक्त किया जाता है और तदन्तर एक-एक प्रदेश (महाद्वीप) के विभिन्न भौगोलिक तत्वों (प्रकरणों) का अध्ययन किया जाता है यद्यपि इसमें प्रकरणों या उपादानों का वर्णन क्रमिक रूप में होना आवश्यक नहीं माना जाता है और उनके महत्व के अनुसार ऊपर-नीचे किया जा सकता है। इस प्रकार सभी उपक्षेत्रों का भौगोलिक अध्ययन पूरा हो जाने पर सम्पूर्ण विश्व का अध्ययन पूर्ण हो जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक प्रदेश) के अध्ययन संपन्न हो जाने के पश्चात सम्पूर्ण अध्ययन क्षेत्र का भौगोलिक अध्ययन पूर्ण हो जाता है। अतः यह कहा जा सकता है कि क्रमबद्ध और प्रादेशिक भूगोल एक-दूसरे से भिन्न या प्रतियोगी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक और परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बंधित है। क्रमबद्ध भूगोल और प्रादेशिक भूगोल के अंतर्सम्बंध और अन्तर्निर्भरता को देखते हुए भूगोल को दो भाग में विभक्त करना उचित नहीं है। लेखराज सिंह (1972) के शब्दों में, अध्ययन क्षेत्र का जो भी विस्तार हो, हम दृश्य घटनाओं को असंगत जटिल समाकलन का विश्लेषण करते हैं जिसमें अत्यंत जटिल क्षेत्रीय विभेदशीलता होती है। इस दोहरी जटिलता को सुविधापूर्वक अध्ययन करने के लिए भूगोल में यह वांक्षनीय है कि विश्लेषण की दोनों विधियों को यथा आवश्यकता विभिन्न अंशों में प्रयोग किया जाय। जितना अधिक महत्व वर्गीकृत (क्रमबद्ध) विधि को दिया जाता है उतना ही कम प्रादेशिक विधि की आवश्यकता पड़ती है। क्रमबद्ध अध्ययन में जितनी अधिक जटिलता होती है, उसके सूक्ष्म स्तर के लिए प्रादेशिक विधि की उतनी ही अधिक आवश्यकता। भौगोलिक अध्ययनों को दो वर्गों में विभाजित नहीं किया जा सकता है क्योंकि दोनों में अटूट निरन्तरता होती है, जिसमें प्रारंभिक स्तर पर वर्गीकृत अध्ययन तथा समाकलन के उच्चतर स्तर पर प्रादेशिक अध्ययन की यथा आवश्यकता पर बल दिया जाता है।

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