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सोमवार, 6 जुलाई 2020

जापान में मेइजी पुनः स्थापना से आप क्या समझते हैं

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जापान में मेइजी पुनः स्थापना से आप क्या समझते हैं

 मेइजी की पुनर्स्थापना साबुन के पद की समाप्ति के साथ ही जापान में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। जापान को पूर्ण शक्ति अब सम्राट के अधीन केन्द्रीभूत हो गयी थी। मेइजो (मेइजी नाम उसके शासन को दिया गया था अर्थात् प्रबुद्ध प्रशासन जबकि उसका अपना नाम मुत्सूहिता था) जब गद्दी पर बैठा तब उसकी आयु केवल 14 वर्ष थी। इसलिए वह अपने सलाहकारों से प्रभाषित हुआ। उसने नये युग के आदतों को स्वीकार किया यद्यपि उसके राज्य की प्रगति का मुख्य श्रेय उसकी सलाहकार परिषद का है। उसके समय में जापान का न केवल आधुनिकीकरण हुआ

अपितु जापान की गणना एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में होने लगी थी। इसके लिए न केवल शासक वर्ग बल्कि प्रत्येक देश ने महत्त्वपूर्ण योगदान किया। प्रशासन का केन्द्रीयकरण प्रशासन का केन्द्रीयकरण राज्य की पहली आवश्यकता थी। 1868 ई० में चीन की मकत पर एक प्रकार के परिषद् का संगठन किया गया इसमें तीन पद रखे गये। पहला पद था सर्वोच्च अधिकारी (सोसाई) का जो सम्राट के निकट सम्बन्धी को ही मिलता था, दूसरा पद प्रथम श्रेणी के पार्षदों (गीतों) का था, जिनमें दरबारी कुलीन वर्ग (गे) के होते थे और शेष प्रमुख कुलों के (डाइम्यो) क्षेत्रीय भूस्वामियों के। इसका काम अधिकांशतः विषयों का था और अंशतः शासको का। तीसरा पद था दूसरी श्रेणी के पार्षदों (सान्यों) का, जिसमें पांच दूगे 15 मामुसाहों होते थे और इन तीनों पदों के अधिकारी विधान परिषद (छाइजोक्कन) को हस्तांतरित हो गये; इसके दो सदन थे-राज्य परिषद या उच्च सदन में गीजों व सान्यों में और विधान सभा (निम्न सदन) में सामंती वर्ग के प्रतिनिधि थे। असली शक्ति इसी में निहित थी 1868 ई० में राजधानी क्योतो से हटाकर वेदों में स्थापित की गयी थी और इसका नाम टोकियो अर्थात् पूर्वो राजधानी रखा गया। शोगुन के दुर्ग को राजा ने अपना आवास बनाया इसके राजनीतिक एवं भौगोलिक दोनों लाभ घे। सामन्ती प्रथा का अन्त सत्ता के केन्द्रीयकरण की दिशा में पहला कदम सन् 1868 ई० में उठाया गया, जब यह आदेश जारी हुआ कि प्रत्येक सामन्ती सरदार के क्षेत्र में केन्द्रीय प्रशासन के प्रतिनिधि के रूप में नागरिक अधिकारी की नियुक्ति होगी। दूसरा कदम 1869 ई० में उठाया गया, जबकि पश्चिमी कुलविदों साइगों व अन्य नेताओं ने केन्द्रीय सरकार को सशक्त बनाने की आवश्यकता स्वीकार कर सत्सुमा, चोरा, हिजेन व तोसा, कुल नेताओं को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों की भूमि व आबादी के नक्शे व रजिस्टर सम्राट को सौंप दें, इस प्रकार सपाट का अधिकार इन दोनों पर स्पष्ट रूप से जम गया। शेष 300 के लगभग सामन्तों में से अधिकांश ने स्वेच्छा से अपनी जागीरें राजा को सौंप दी। राष्ट्र प्रेम की इस भावना के कारण ही राजा के अधीन एक सुगठित प्रशासन सम्भव हुआ। 1871 ई० में एक शाही फरमान द्वारा सामन्तवाद का पूर्णतः अन्त कर दिया गया। संविधान की घोषणा-संविधान रचना का कार्य इटों के नेतृत्व में कुछ लोगों को सौंपा गया या। इस कार्य का सम्पादन गुप्त रूप से सौंपा गया। फरवरी,1889 ई० में एक भव्य समारोह में राजा ने इसकी घोषणा की। यह घोषणा की गयी थी कि तत्कालीन राजा शाश्वत काल में अनवरत रूप तक चली आ रही श्रृंखला की ही एक कड़ी है यह सर्वोपरि है, अनेक प्रशासकीय सेवाओं के संगठन, नागरिक व सैनिक सेवाओं में नियुक्ति व सेवाच्युत करने और उनके वेतन निर्धारित करने का अधिकार उन्हीं को था। वही स्थलसेना व नौसेना का सर्वोच्च सेनापति था। साम्राज्य की विधानसभा की सहमति से सम्राट ही सभी कानून बनाते थे। सम्राट अध्यादेश भी जारी करता था। इन अधिकारों का प्रयोग सम्राट दो वैधानिक परामर्श-दात्री प्रिवि कौंसिल मंत्रि परिषद की सहायता से करता पा सभी कार्य व्यावहारिक रूप से उसके मंत्रियों द्वारा ही निष्पादित किये जाते थे। शिक्षा के क्षेत्र में विकास-सन् 1886 ई० तक सभी विषयों में विभागों की स्थापना की गयी इस प्रकार बीसवीं सदी के अन्त तक जापानी शिक्षा प्रणाली पूर्णतः विकसित हो चुकी थी। सामान्य शिक्षा के साथ ही व्यावसायिक, वैज्ञानिक, प्राविधिक शिक्षा की भी व्यवस्था की गयी जिसके परिणामस्वरूप जापान कुछ ही समय में पश्चिमी देशों के समकक्ष खड़ा हो गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में यद्यपि सरकार ने कोई प्रोत्साहन नहीं दिया फिर भी शीघ्र ही अनेक समाचार पत्र प्रकाशित होने लगे। जापान का प्रथम दैनिक समाचार पत्र दी योकोहामा मेनिची 1870 ई० में आरम्भ हुआ।

शिया धर्म को पुनः प्रतिष्ठित करना सम्राट के प्रति आदर-भाव को बैठाने के लिए सरकार की और से शिंतो धर्म पुनः प्रतिक्षित करने का प्रयास किया गया। शिंतो धर्म को राजधर्म घोषित किया गया। 186718720 के मध्य कई बौद्ध मन्दिरों को तोड़ा गया। बीसवीं शताब्दी के ठत्तरार्थ में जापान में ईसाई धर्म के प्रभार को भी प्रीत मिल गया। फ्रांस के रोमन कैथोलिक और अमेरिका के प्रोटेस्टेंट पादरियों ने यहाँ अनेक मिशनी वी स्थापना की और इनके कारण अनेक जापानी इस पाश्चात्य धर्म की और आवर्षित होने लगे फिर भी शताब्दियों से चली आ रही ईसाई धर्म के प्रति प्रतिकार भावनाएँ भुलाई नहीं जा सकीं। मेहंदी की पुनर्स्थापना काल में राजनीतिक मान्यताओं, व्यापार, वाणिज्य, परिवहन, व्यवस्था, उद्योग, शिक्षा, चिन्तन एवं धर्म के क्षेत्र में है महान परिवर्तनों के अतिरिक्त कुछ अन्य परिवर्तन हुए थे जिनमें वेश-भूषा, खान-पान, भवन निर्माण कला गृह सना आदि में एक अद्मुत मिश्रण देखने को मिलता है।

सैनिक सुधार जापान के अस्तित्व एवं आधुनिकीकरण के लिए सैन्य सुधार आवश्यक था। जापानी सैन्य व्यवस्था को जर्मनी के आधार पर पुनर्गठित किया गया। 1873 ई० से जापान में सैनिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गयी 187। ई० में टोकियो, सेननडाई, औसाका तथा क्रमातमोटों पर नौसैनिक अड्डे बनाये गये। बड़े जहाजों को इंग्लैंड से खरीदा गया। जई विधि संहिता सुधार आन्दोलन के नेताओं ने राष्ट्र के लिए एक कानून संहिता और तैयार की थी पाश्चात्य मानदण्डों के अनुसार जिन शारीरिक दण्डों को नेशनल समझा गया उनको हटा दिया गया। जूरी प्रथा अभी स्वीकार नहीं की गयी थी पर एक ऐसी न्याय-प्रणाली शुरू की जा चुकी थी जिसमें वाणिज्य सम्बन्धी कानून जर्मन पद्धति पर आधारित किये गये थे तथा दण्ड विधान को फ्रांस के आधार पर तैयार किया जा रहा था। 1890 ई० में राजा के विधि-संहिता को अन्तिम स्वीकृति प्रदान की। 1899 ई० में जापान में 'अपर देशीयता के अधिकार का अन्त कर दिया। सुनियोजित आर्थिक विकास मेजी युग में जापान में आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र सुधार करके आश्चर्यजनक विकास किया। उसने पाश्चात्य देशों का अनुकरण कर औद्योगिक क्रांति को सफल बनाया अभी तक जो जापान विदेशी नागरिकों को भी नफरत की दृष्टि से देखता था अब वही जापान पश्चिमी देशों के दिशा-निर्देश पर चल रहा था पेरिस की संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद जापान में व्यापार का तेजी से विनाश हुआ व्यापार में सर्वाधिक समृद्धि का समय चीन के साथ युद्ध के बाद आया। विकास के प्रारम्भिक वर्षों में इस नये व्यापार पर अधिकांशत: विदेशी दलालों का नियन्त्रण था ये दलाल सामान्यतः पश्चिमी देशों के सही प्रतिनिधि नहीं थे, तथा उन्हें इससे परिचित होने तथा उपयुक्त अधिकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए समय की आवश्यकता थी। व्यापार के विकास के साथ साथ समुद्र का संग्रह बढ़ता गया। अब तक विनिमय के लिए सोना-चांदी का प्रयोग होता था। 1868 ई० में सरकार के पास अपना खर्च चलाने के लिए भी पर्याप्त आय नहीं थी सरकार ने मुद्रा विनिमय व बैंक की समस्या को सुलझाने के लिए 1872 ई० में पहला कदम उठाया 18731 में अमेरिकी पद्धति पर एक राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की गयी। इस बैंक को अपरिवत्रय नोट जारी करने की अनुमति दी गयी। इसका कार्य धीमा रहा। 1881 ई० में जापान ने एक बड़े केन्द्रीय संस्थान की स्थापना की जिसे आगे चलकर जापान बैंक कहा गया। 1896 ई० में राष्ट्रीय बैंकों को निजी बैंकों में परिवर्तित कर राष्ट्रीय बैंक प्रणाली समाप्त कर दी गयी 1887 ई० में पहला योकी-हामा सोना चांदी बैंक स्थापित हुआ, इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा के व्यापार को नियन्त्रित करना व विदेशी व्यापार के लिए पूंजी उपलभ्य कराना या। कारखाने में बचत बैंकों की स्थापना की गयी। 1900 ० से पूर्व इस व्यवस्था ने अन्तिम रूप ग्रहण कर लिया था। इसे ही आगे चलकर नोट छापने का अधिकार दिया गया। 1894 ई० के पश्चात् औद्योगिक कृषि बैंकों की स्थापना हुई इस प्रकार धीरे धिरे नये जापान के विकास के आधार पर बैंक प्रणाली का विकास हुआ। औद्योगिक क्षेत्र में भी मेइजी सरकार का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। 1870 ई० में उद्योग मंत्रालय की स्थापना की गयी। विदेशी व्यापार पर यूरोपीय नियन्त्रण को समाप्त करने के लिए विनिमय केन्द्र स्थापित किये गये। जापान में वस्त्र उद्योग को काफी प्रोत्साहन मिला। 1890 ई० में जापान में दो सौ से अधिक वाष्प चालित कारखाने थे, इनमें कपड़ा, मशीन, शीशा, रेशम, कागज आदि का उत्पादन होने लगा था औद्योगिक विकास के साथ-साथ जापान में यातायात के साधनों में भी सुधार हुआ। सरकार ने आर्थिक सहायता देकर जहाज बनाने वाली कम्पनियों को स्थापित किया इसके परिणाम स्वरूप जापान 20 वीं सदी में प्रत्येक क्षेत्र में अग्रगण्य हो गया।

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