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सोमवार, 6 जुलाई 2020

इटली के फासीवाद के विकास पर विवेचना

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 इटली के फासीवाद के विकास पर विवेचना  


पश्चिमी यूरोप के जितने देश विश्व युद्ध में विजयी हुए थे उनमें से इटली ही एक ऐसा देश था जो सर्वाधिक शांत था। देश भर में अनेक क्रान्तिकारी संस्थाएँ बनने लगी और संतोष की ज्वाला भड़कने लगी। क्रान्तिकारी दलों, समाजवादियों, साम्यवादियों और अराजकतावादियों के दिन लौट आए। कार्ल मार्क्स और लेनिन के सिद्धान्त लोकप्रिय होने लगे। समाजवादियों ने युद्ध का विरोध किया था एवं सरकार को चेतावनी दी थी कि युद्ध के परिणाम इटली के लिए बड़े भयंकर होंगे समाजवादियों की चेतावनी ठीक निकली और उनकी लोकप्रियता बढ़ी। निराश एवं बेकार सैनिक, असंतुष्ट मजदूर, किसान और नगरवासियों ने समाजवादियों का समर्थन किया। 1919 के नवम्बर के संसदीय निर्वाचनों में प्रतिनिधि सदन के लिये 157 सदस्यों को निर्वाचित करके समाजवादियों ने अपनी शक्ति को बढ़ा लिया। साम्यवादियों ने मजदूरों का कारखानों पर स्वामित्त्व एवं सर्वहाराओं के अधिनायक तंत्र की आवाजें लगाई। साम्यवादियों के साथ समाजवादी इटली में रूसी कान्ति का प्रतिरूप तैयार करने की चेष्टा करने लगे। एक तरफ इटली में इस तरह अराजकता फैल रही थी और दसरी ओर वहाँ की सरकार हाथ पर हाथ घरे चुपचाप बैठी हुई थी। सरकार ने पूर्ण उदासीनता की नीति का अवलंबन किया और अराजकता पूर्ण स्थिति का अंत करने का कोई प्रयास नहीं किया। फलतः इटली की दशा उत्तरोत्तर बिगड़ती गई। साम्यवादियों अथवा उग्र समाजवादियों ने सरकार को बलपूर्वक उलटने का प्रयत्न किया। इटली में दंगे हुए, भूमि-हड़प शुरू हुई, मकान जला दिये गये, पशुओं को मार डाला गया एव २ पूंजीपतियों को डराया-धमकाया गया। औद्योगिक क्षेत्र में हड़ताल आरम्भ हुई। रेल, ट्राम बस, डाक एवं तार-घर, रसद आदि की व्यवस्था ठप पड़ गई। इटली में एक और उग्र समाजवादी अथवा साम्यवादियों का प्रभाव बढ़ रहा था, परन्तु दूसरी और वहाँ ऐसे व्यक्तियों का एक दल बन रहा था जो अपने देश की समस्याओं को ने सुलझाने के लिये विदेशी आदर्शों और प्रणाली को नहीं अपनाना चाहते थे इन व्यक्तियों में बड़े-बड़े उद्योगपति, पूँजीपति, जमींदार और विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक थे। वे सरकार को शक्तिशाली बनाना चाहते थे जिससे व्यक्तिगत संपत्ति की रक्षा की जा सके। देशभक्त सैनिक, विश्वविद्यालय के प्राध्यापक आदि इटली को उग्र समाजवाद अथवा साम्यवाद से बचाना चाहते थे। इनकी इच्छा थी कि परिष्कृत एवं सबलीकृत नवीन वृत्तियों द्वारा संचालित एवं नवीन विचारों तथा नियंत्रित राज्य सुरक्षित बना रहे। वे अकर्मण्य और भ्रष्ट सरकार के स्थान पर एक ऐसी सरकार की स्थापना चाहते थे जो देश को विनाश के गर्त से निकालकर विकासोन्मुख कर सके। अतएव विनाशकारी तत्वों एवं विघटनात्मक प्रवृत्तियों से लोहा लेने के लिए वे प्रतिरोध संगठन की स्थापना करने लगे ये संगठन 'फेसियों कहलाते थे। आरम्भ में यह दल अधिक प्रभावशाली नहीं था किन्तु धीरे-धीरे इस आन्दोलन का रूप बदलता गया। इस दल को बेनिटो मुसोलिनी जैसा एक योग्य व्यक्ति मिल गया। इसी पृष्ठाधार में फासिस्टवाद का जन्म हुआ। देश को बिगड़ती आर्थिक स्थिति, वर्साय की संधि से नुकसान, गरीबी व बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार जैसी स्थिति का लाभ वहाँ के समाजवादियों ने उठाया तथा इन्हें दूर करने हेतु अपने अपने सिद्धान्तों का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने देश की जनता के असंतोष का लाभ उठाकर सरकार के विरुद्ध सीधी कार्यवाही करके अराजकता फैलानी प्रारम्भ कर दी। समाजवादी पूँजीवाद के विरोधी थे फलतः इटली के पूंजीवादियों ने बढ़ते समाजवाद को रोकने हेत मुसोलिनी की तरफ आशा की दृष्टि से देखते हुए फासीवाद के ठदय में अपनी स्वीकृति दी जिससे फासीवाद का उदय संभव हो सका। मुसोलिनी या फासीवाद के उदय में स्वयं मुसोलिनी के व्यक्तित्व का बड़ा हाथ था। वह महान गुणी तथा एक उत्कृष्ट राजनीतिक चितक था। उसके भाषण बड़े ही प्रभावोत्पादक थे। उसने जनता की दयनीय दशा रूपी नस को पकड़ते हुए इटली की कायापलट का दावा करते हुए अपने पक्ष में करना प्रारम्भ कर दिया। उसके कार्यक्रम व नानि तत्कालीन जनता में लोकप्रियता प्राप्त की। उसने दक्षिणपंथी व वामपंथी नारों का इस प्रकार विलय किया कि जनता पूँजीवाद का विरोध करने लगी तया राष्ट्रवाद की दिशा में प्रेरित हो गयी। यहूदियों का विरोध करके राष्ट्रवाद एवं जातिवाद को उत्तेजित किया गया। मजदूरों से पूँजी एवं सहयोग के द्वारा जन जीवन-स्तर उठाने का वायदा किया गया। छोटे उत्पादकों एवं व्यापारियों के लाभ के लिए गिल्ड बनाने की घोषणा की गयी अंत में यह तक दिया गया कि निगमवादी प्रशासन प्रष्ट संसदीय तंत्र को समाप्त करेगा। वर्ग व्यवस्था के संबंध में मुसोलिनी ने घोषणा की कि "समाजवाद कहता है सब समान तथा अमीर रहें, वर्ग व्यवस्था के प्रयोग ने इस बात को असंभव कर दिया है। हम कहते हैं कि सब समान सब गरीब है। फलतः

मुसोलिनी के आकर्षक व्यक्तित्व व उसके आकर्षक कार्यक्रमों ने तत्कालीन जनता को इसके प्रति झुकाव पैदा किया जिससे फासीवाद व मुसोलिनी के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकार मुसोलिनी के प्रयासों से इटली के समाज के कुछ प्रमुख वर्गों से फासीवाद का घनिष्ठ संबंध स्थापित हो चुका था जिसमें जमींदार, उद्योगपति, व्यवसायी, भूतपूर्व सैनिक, युवक आदि शामिल थे। इसके संगठन फेसियो कहलाते थे मुसोलिनी ने 1919 ई० में मिलान में फासिस्ट दल का विधिवत संगठन किया। फासीवाद की विशेष पहचान काली कमीज तथा झंडा कठोर अनुशासन था। मुसोलिनी ने स्वयंसेवकों के द्वारा समाजवादियों व साम्यवादियों का दमन प्रारम्भ कर दिया था 1922 ई० तक आते आते फॉसिस्ट दल सारे इटली में शक्तिशाली हो गया। सरकार की अकर्मण्यता के कारण मुसोलिनी का हौसला काफी बढ़ गया। 1922 ई० में इटली के जनरलों ने सार्वजनिक रूप से फासिस्ट दल के साथ मिलने की घोषणा कर दी। सेना के सिपाहियों में भी फासीवादियों के गुट विद्यमान थे। इस प्रकार अपने को सर्वशक्तिमान देखकर मुसोलिनी ने सत्ता पर अधिकार जमाने की योजना बना ली। उसने नेपल्स नगर में एक सभा का आयोजन किया जिसमें अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित 40 हजार स्वयंसेवक आये। इस सम्मेलन में मुसोलिनी ने मांग की कि इटली का शासन फासिस्टों के हाथ में सौंप दिया जाय अन्यथा रोम पर आक्रमण किया जायेगा। इस प्रकार पूर्व निर्धारित तिथि को इटली के प्रधानमंत्री जियोलिटी ने त्यागपत्र दे दिया किन्तु क्वेटर ने उसे सत्ता सौंपने से इंकार कर दिया जिससे गृह युद्ध की स्थाति उत्पन्न हो गया। फलत: घबड़ा कर राजा ने मुसोलिनी को सत्ता सौंप देने का निश्चय किया इस प्रकार इटली में फासीवाद की स्थापना हो गयी। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत जनता की निराशा, आकाँक्षा व असंतोष के समय फासीवाद व मुसोलिनी एक समान उद्देश्य के रूप में प्रकट हुए तथा मुसोनिली ने अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व के बल पर इटली में अपनी सत्ता की स्थापना कर डाली।

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