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हीगल के द्वन्द्वात्मक पद्धति के अर्थ एवं महत्त्व

हीगल के द्वन्द्वात्मक पद्धति के अर्थ एवं महत्त्व

प्रसिद्ध दार्शनिक हीगल की द्वंद्वात्मक पद्धति (द्वंद्ववाद) विश्व में होने वाले परिवर्तनों को समझने के लिए एक नया और मौलिक उपकरण है। उसने विकासवादी प्रक्रिया से प्रगति के विचार पर बल देते हुए यह प्रतिपादित किया कि हम किसी वस्तु के यथार्थ रूप को उसी विरोधी रूप में उसकी तुलना करके ही जान सकते हैं। हीगल का विश्वास था द्वन्द्र की यूह प्रक्रिया प्रकृति, सामाजिक जीवन, राजनीतिक संस्थाओं, दर्शन धर्म, कला, साहित्य सभी के विकास में दृष्टिगत होती है। द्वंद्वात्मक पद्धति के रूप में उसने विश्व में होने वाले महान् परिवर्तनों को समझने के लिए एक नवीन दार्शनिक साधन प्रस्तुत किया। द्वंद्वात्मक पद्धति की अवधारणा हेगेल के दर्शन का मूल तत्त्व अवश्य है, किन्तु यह उसका मौलिक चिन्तन नहीं है। वस्तुत: इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सुकरात ने किया था।

हीगल ने यूनानियों से द्वन्द्वात्मक पद्धति को आत्मसात् करते हुए उसमें मौलिक परिवर्तन कर दिये और इसे वाद-विवाद के स्तर से उठाकर वाद, प्रतिवाद और संवाद के स्तर पर ले गया। हेगेल के अनुसार यूनानियों के विचार में द्वन्द्व की प्रक्रिया के दो ही चरण थे उदाहरणार्थ, उनके विचार में राजतन्त्र का प्रतिवाद निरंकुशतन्त्र था, परन्तु हीगल इस प्रक्रिया की जटिलता को दर्शाता है और उसका मत है कि यह प्रक्रिया तीन चरणों में चलती है। हेगेल के अनुसार किसी वस्तु की वास्तविकता की पहचान में तीन चरण होते हैं-

1. उसका होना (Being) ।

2. उसका प्रतिरोध अर्थात् वह क्या नहीं है (Non-Being)।

3. दोनों का संश्लेषण अर्थात् उसका बन जाना (Becoming) | हीगल के मतानुसार, 'विश्वात्मा' के विकास -क्रम में राज्य का एक विशिष्ट स्थान है पर विश्वात्मा के विकास की प्रक्रिया किस प्रकार होती है, उसके प्रमुख सोपान कौन-कौन से हैं तथा राज्य का किसलिए विशिष्ट स्थान है, ये सब बातें द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया से ही जानी जा सकती हैं।

होटल का मत है कि मानव सभ्यता का विकास सीधा और सपाट नहीं है, वह टेढा-मेढा है जिसे आध्यात्मिक चिन्तन या बुद्धि द्वारा जाना जा सकता है। विकास की प्रक्रिया गतिशील तथा द्वन्द्वात्मक है, साथ ही यह आन्तरिक विरोध के द्वारा संचालित होती है। इसका प्रत्येक सोपान वाद, प्रतिवाद तथा संवाद से बनी त्रयो के रूप में दृष्टिगोचर होता है। मानव मस्तिष्क धीरे-धीरे सत्य की ओर अग्रसर होता है। किसी भी विषय के सत्य की जो प्रथम झलक मानव को मिलती है, वही वेद' है। आगे चलकर जब मनुष्य को उसकी अपूर्णता का आभास होता है और वह नये सत्य का अन्वेषण करता है तो वह 'प्रतिवाद' को जन्म देता है, परन्तु 'वाद' की भाँति यह प्रतिवाद भी आंशिक सत्य ही रहता है, पूर्ण सत्य नहीं। अतः शीघ्र ही उसकी असत्यता का आभास भी मानव बुद्धि को होने लगता है और उसके विरुद्ध भी प्रतिक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। मनुष्य फिर वाद और प्रतिवाद के आंशिक सत्यों का मेल कर संवाद के रूप में एक नवीन सत्य का अन्वेषण करता है।

सभ्यता के विकास क्रम को द्वंद्वात्मक पद्धति के अनुसार समझाते हुए हीगल कहता है कि सबसे पहले प्रत्येक वस्तु का मौलिक रूप होता है जो वाद के रूप में होता है। विकसित होने की प्रकृति के कारण धीरे-धीरे यह विकसित होकर अपने निहित अन्तर्विरोधों के कारण अपने विपरीत रूप को जन्म देता है जो उसके प्रतिवाद' का रूप ग्रहण कर लेता है। विकास की प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है, अतः प्रारम्भ में इन दोनों रूपों में संघर्ष होता है। जिससे अन्ततः उसमें समन्वय एवं संतुलन स्थापित होता है और वह 'संवाद' के रूप में प्रकट होता है। यह 'संवाद', 'वाद' और प्रतिवाद दोनों का समन्वित रूप होने के कारण इन दोनों से विकास की उच्च स्थिति का द्योतक होता है, लेकिन विकास की प्रक्रिया यहाँ आकर रुकती नहीं वरन् बराबर जारी रहती है। अत: कालान्तर में यह 'संवाद' पुनः 'वाद में अपने आपको परिवर्तित कर लेता है और पुनः अपने प्रतिवाद' को जन्म देता है जिससे पुनः 'संवाद' की स्थिति उत्पन्न होती है। इस तरह 'वाद', 'प्रतिवाद और संवाद' की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है और सभ्यता अपने विकास के मार्ग पर अग्रसर होती रहती है। अतः हीगल के अनुसार सभ्यता के विकास का मार्ग त्रिकोणात्मक है। हीगल के अनुसार विश्वात्मा की विकास शृंखला वाद', 'प्रतिवाद' एवं 'संवाद' के अनेक यो समूहों से बनी है। प्रत्येक त्रयी की व्यापकता में अन्तर है। कोई त्रयी काफी लम्बी, कोई उससे कम व्यापक रही। सर्वव्यापक त्रयी-तर्क, प्रकृति और आत्मा है जिसके अन्तर्गत अन्य त्रयी-समूह भी आ जाते हैं। सर्वव्यापक त्रयी को निम्नलिखित रेखाचित्र के आधार पर समझा जा सकता है

 इस श्रृंखला का क्रम तर्कसंगत है-समय के अनुसार नहीं कि पहले तर्क था फिर प्रकृति और फिर आत्मा आयी। इसका अर्थ यह है कि यदि हम विचार करना प्रारम्भ करते हैं तो सर्वप्रथम तर्क पर आते हैं। इससे हमें किसी वस्तु की सत्ता का ज्ञान होता है। फिर उस वस्तु के विचार का सार समझ में आने लगता है और अन्त में हम उसके वारे में अपने विचार बनाते हैं। विचारों को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए हम प्रकृति के उदाहरणों का सहारा लेते हैं तथा इससे यन्त्र विज्ञान, भौतिक विज्ञान एवं प्राणी शास्त्र के सिद्धांतों का ज्ञान होता है। इन प्राणियों एवं भौतिक वस्तुओं में आत्मा नहीं होती है। विकास क्रम में आगे ऐसी त्रयी आती है जब हमे आत्मा का भी बोध होता है। पहले हमें अपनी ही आंतरिक आत्मा का ज्ञान होता है, फिर बाह्यात्मा का जिसके अन्तर्गत आचार-शास्त्र, राजनीति और विधिशास्त्र आते हैं और अन्त में मनुष्य को निरपेक्ष आत्मा अर्थात् कला, धर्म, दर्शन आदि का ज्ञान होता है। द्वंद्वात्मक पद्धति द्वारा समाज तथा राज्य के विकास सम्बन्धी हेगेल का अध्ययन

(क) दन्द्वात्मक पद्धति द्वारा हीगल समाज और राज्य के विकास का अध्ययन करता है- सामाजिक विकास क्रम में परिवार सर्वप्रथम सामाजिक व्यवस्था है। परिवारवाद के रूप में उपस्थित होता है जहाँ से हीगल राज्य का विश्लेषण करना प्रारम्भ करता है। परिवार का आधार पारस्परिक विश्वास और स्नेह है। इसमें एकत्त्व की भावना रहती है तथा पति पत्नी, सन्तान आदि सभी एकत्त्व का अनुभव करते हैं। उनके हितों में परस्पर विरोध नहीं होता, किन्तु धीरे-धीरे बच्चे बड़े होते हैं तथा उनके विचारों का क्षेत्र व्यापक होता जाता है, वे परिवार को अपनी प्रगति में बाधक मानने लगते हैं।

(ख) परिवार से निकलकर वे व्यापक सामाजिक व्यवस्था में प्रवेश करते हैं- इस सामाजिक व्यवस्था को हीगल 'बुर्जुआ समाज का नाम देता है तथा यह व्यवस्था परिवार की प्रतिक्रिया स्वरूप 'प्रतिवाद (Antithesis) के रूप में सामने आती है। इस व्यवस्था में व्यक्ति को संघर्ष करना पड़ता है और सबको अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है। इस व्यवस्था में उद्योग तथा व्यापार की पर्याप्त उन्नति होती है तथा व्यापारिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की शुरुआत होती है। आगे चलकर मनुष्यों को यह व्यवस्था भी असन्तोषपूर्ण दिखाई देती है।

(ग) व्यक्तिगत संघर्ष की तीव्रता-जब व्यक्तिगत संघर्ष बहुत बढ़ जाता है तब वह व्यक्ति के विकास का साधन न रहकर बाधक बन जाता है। अतः इस संघर्ष को नियमित और सीमाबद्ध करने के लिए राज्य का प्रादुर्भाव होता है।

(घ) राज्य परिवार और समाज का सामंजस्य (संवाद) है-राज्य व्यक्तियों की रक्षा भी करता है तथा उन्हें पारस्परिक संघर्ष करके आगे बढ़ने का अवसर भी देता है। हीगल के अनुसार"राज्य सभी संस्थाओं से उच्चतर संस्था है जिसमें परिवार तथा व्यवस्थित समाज दोनों के गुणों का समावेश है।"

हीगल के द्वंद्वात्मक पद्धति की विशेषताएँ- हेगेल द्वारा प्रतिपादित द्वंद्वात्मक पद्धति की मूल विशेषताएँ अग्रलिखित हैं-

1. सत्य के अन्वेषण का अद्वितीय तरीका-द्वंद्वात्मक पद्धति द्वारा हीगल ने सत्य के अन्वेषण का व्यवस्थित नियम बतलाया है। हीगल ने यही दर्शाया कि किसी भी वस्तु की वास्तविकता एक वस्तु को उसकी प्रतिकूल वस्तु से तुलना करके ही की जा सकती है। अतः भलाई का अस्तित्त्व इसलिये है क्योंकि युराई का अस्तित्त्व है, गर्मी का इसलिए है क्योंकि सर्दी का है।

2. संघर्ष ही विकास का निर्धारक है-द्वंद्वात्मक पद्धति के मूल मान्यता है कि प्रगति या विकास दो परस्पर विरोधी वस्तुओं या शक्तियों में द्वन्द्व या संघर्ष का परिणाम है। वस्तुतः व्यक्ति और समाज का विकास सीधी रेखा में नहीं होता।

3. स्वतः प्रेरित और स्वतः संचालित-इस पद्धति की प्रमुख विशेषता इसमें स्वतः संचालित होने का गुण है। इसकी स्वतः चलायमान होने की शक्ति आधार इसमें निहित अन्तर्विरोधी संघर्ष, की प्रवृत्ति है। वाद धार-धार स्वतः प्रतिवाद बन जाता है और प्रतिवाद स्वतः 'संवाद वन जाता है। संवाद नया वाद वनकर प्रतिवाद', को जन्म देने के लिए बाध्य होता है। हीगल ने इसे 'ऐतिहासिक आवश्यकता' कहा है।

हीगल के द्वंद्वात्मक पद्धति की आलोचना- आलोचकों ने हीगल के द्वंद्वात्मक पद्धति की आलोचना में निम्नलिखित तर्क दिये हैं-


1.अस्पष्ट पद्धति-आलोचकों के अनुसार होटल की पद्धति अस्पष्ट एवं क्लिष्ट है। उसके द्वन्द्व की अस्पष्टता को उसके द्वारा प्रस्तुत (क) समाज और परिवार (क) कला और धर्म के उदाहरणों में देखा जा सकता है। उसके अनुसार परिवार का प्रतिवाद' समाज है, जबकि परिवार के समस्त गुण प्रेम, स्नेह, एकत्त्व आदि समाज में जाकर नष्ट नहीं होते। समाज तो परिवार का विकसित ही नहीं विराट् रूप है। इसी प्रकार कला का विरोधी धर्म का होना पूर्ण अनुचित लगता है। यह कहना अत्यन्त कठिन है कि कला और घर्म आपस मैं विरोधी तत्त्व हैं।

2, विभिन्न वस्तुओं में विरोध की अनावश्यक कल्पना- द्वंद्वात्मक पद्धति द्वारा हीगल ने विभिन्न वस्तुओं में विरोध की अनावश्यक कल्पना कर ली है। हीगल जहाँ कहीं थोड़ी भिन्नता देखता है वहाँ तुरन्त द्वन्द्वात्मक विरोध की कल्पना कर लेता है और वाद', प्रतिवाद व संवाद के त्रिकोण की स्थापना में लग जाता है।

3. वैज्ञानिकता का अभाव- आलोचकों के अनुसार द्वंद्वात्मक पद्धति में वैज्ञानिकता का अभाव है। इसमें किसी भी वस्तु को मनमाने ढंग से 'वाद' और किसी को प्रतिवाद के रूप में माना जा सकता है। अत: इस पद्धति के अनुसार किसी भी अच्छी व्यवस्था को बुरी तथा बुरी व्यवस्था को अच्छी सिद्ध किया जा सकता है इस पद्धति का प्रयोग करके स्वयं हीगल ने निरंकुश राजतन्त्र को विश्व की सर्वश्रेष्ठ शासन व्यवस्था सिद्ध किया था ।

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