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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

ग्रीन के राज्य सिद्धान्त की विवेचना

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ग्रीन के राज्य सिद्धान्त की विवेचना 

राजनीतिक चिन्तन अथवा की दृष्टि से ग्रीन आदर्शवादी (प्रत्ययवादी) चिन्तन की श्रेणी में है परन्तु वह हीगेल तथा अन्य जर्मन आदर्शवादियों की भौँति न तो राज्य के सर्वाधिकारवादी स्वरूप में विश्वास करता है और न ही उसे साध्य मानता है। वह व्यक्तिवादियों की भाँति उसे साधन मानता है, परन्तु उसके और उनके चिन्तन में मौलिक भेद यह है कि वह उसे (राज्य) एक स्वाभाविक और नैतिक संस्था मानता है जिसका अधिकारों की रक्षा की सामान्य इच्छा के कारण जन्म होता है। वह व्यक्तिवादियों की भांति शक्ति को राज्य का आधार नहीं मानता है। उसके अनुसार राज्य का आधार शक्ति (बल) नहीं इच्छा है। राजनीतिक चिन्तन के अन्तर्गत है राज्य के स्वरूप, राज्य के आधार पर उसके उद्देश्य एवं कार्यों, उसकी आज्ञा पालन के आधार, राज्य के अतिरिक्त अन्य समुदाय, सम्प्रभुता, स्वतन्त्रता, अधिकार, दण्ड, सम्पत्ति एवं भूमि, युद्ध तथा अन्तर्राष्ट्रीयता पर विचार किया है। इन विषयों पर उसके चिन्तन में जर्मन आदर्शवाद और व्यक्तिवाद, दोनों के तत्वों का सम्मिश्रण मिलता है। राज्य का स्वरूप एवं उसकी उत्पत्ति जहाँ तक राज्य की उत्पत्ति का प्रश्न है उसका चिन्तन आदर्शवादी है। वह न तो व्यक्तिवादियों की भाँति शक्ति और न संविदावादियों की भाँति संविदा को ही उसकी उत्पत्ति का कारण मानता है। उसके अनुसार राज्य एक कृत्रिम नहीं अपितु स्वाभाविक संस्था है उसका मत है कि व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा हेतु ही राज्य अस्तित्व में आया है। उसके अनुसार सामान्यतः लोग एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते परन्तु कभी-कभी क्रोध, घृणा और स्वार्थ के कारण लोग एक दूसरे के अधिकारों की अवहेलना भी करते हैं इस स्थिति में सभी की यह सामान्य इच्छा होती है कि उनके अधिकारों की रक्षा के लिए कोई संस्था होनी चाहिए। इस इच्छा के फलस्वरूप ही राज्य स्वाभाविक रूप से अस्तित्व में आया है। वह इच्छा को उसकी उत्पत्ति का क्या कारण ही नहीं अपितु उसे उसके अस्तित्व का आधार भी मानता है।

अत:वह व्यक्तिवादियों के निकट है। राज्य का सर्वाधिकारवादी स्वरूप अस्वीकार कर वह जर्मन आदर्शवादियों से भिन्न हो जाता है। सारांशतः हम यह कह सकते हैं कि इच्छा को राज्य का आधार मानना उसके चिन्तन का व्यक्तिवादी तत्त्व है। जहाँ तक राज्य के स्वरूप का प्रश्न है उसके चिन्तन में व्यक्तिवाद और आदर्शवाद, दोनों के तत्त्व मिलते हैं। वह आदर्शवादियों की भाँति राज्य को साध्य नहीं अपितु साधन मानता है। उसके अनुसार वह व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए अस्तित्व में आया है अतः वह एक साधन है। उसे साधन मानने के कारण वह आदर्शवादियों की भाँति उम्रके सर्वाधिकारवादी स्वरूप में विश्वास नहीं करता है। यहाँ उसके चिन्तन में स्पष्ट रूप से व्यक्तिवाद के तत्व मौजूद हैं। राज्य को साधन मानने के साथ-साथ वह उसे एक स्वाभाविक एवं नैतिक संस्था तथा समुदायों का समुदाय अथवा सर्वोच्च नैतिक समुदाय मानता है जिसका लोगों के अधिकारों की रक्षा तथा उन्हें नैतिक होने के लिए परिस्थितियाँ पैदा करना कार्य होता है। यह उसके चिन्तन का आदर्शवादी तत्त्व है। राज्य को सर्वाधिकार सम्पत्र और निरंकुश न मानना उसके चिन्तन का व्यक्तिवादी तत्व है। इस प्रकार राज्य की उत्पत्ति और उसके स्वरूप के मामले में चिन्तन आदर्शवाद और व्यक्तिवाद, दोनों के ही तत्त्व मौजूद हैं।

राज्य के उद्देश्य एवं कार्य-ग्रीन नैतिकता के विकास को ही सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास मानता है। उसके अनुसार राज्य एक नैतिक संस्था तथा सर्वोच्च नैतिक समुदाय है जिसका नैतिक उत्थान के लिए मार्ग प्रशस्त करना प्रमुख लक्ष्य है। वह उसे व्यक्ति को प्रत्यक्षत: नैतिक बनाने का उत्तरदायित्व नहीं सौंपता है। उसके अनुसार व्यक्ति को नैतिक बनानेवाली परिस्थितियों का निर्माण तथा उसके नैतिक विकास के मार्ग की बाधाएं दूर करना उसका उद्देश्य है। इसे और स्पष्ट करते हुए उसने कहा है कि स्वतन्त्र नैतिक इच्छा मार्ग की बाधाएं दूर करना उसका कार्य है। वह निष्काम भाव से कर्तव्य पालन को ही नैतिकता मानता है। इस कार्य के मार्ग में आने वाली बाधाएँ दूर करना ही राज्य का कार्य है। इस प्रकार कि उसने राज्य के उद्देश्यों और कार्यों को दो भागों में बाँटा है-(1) सकारात्मक (2) नकारात्मक। राज्य के उद्देश्य और कार्य के बारे में उसका यह चिन्तन स्पष्ट रूप से आदर्शवादी है परन्तु इसमें व्यक्तिवाद का भी एक हल्का पुट है। वह व्यक्ति को प्रत्यक्षरूप से नैतिक बनाने का उत्तरदायित्व राज्य को नहीं सौंपता है। वह उसे केवल परिस्थितियाँ पैदा और बाधाएं दूर करने का ही कार्य सौंपता है। इस प्रकार व्यक्ति के कार्य में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की अनुमति न देना उसके चिन्तन का व्यक्तिवादी तत्त्व है।

राज्य का आधार-राज्य का नैतिक एवं स्वाभाविक संस्था तथा सर्वोच्च नैतिक समुदाय मानने के साथ-साथ वह इच्छा अर्थात् सामान्य इच्छा को जिसे उसने आदर्श इच्छा की संज्ञा प्रदान की है, इसके अस्तित्त्व का आधार मानता है। उसके अनुसार लोग भय अथवा शक्ति प्रयोग के कारण नहीं अपितु स्वेच्छा से राज्य की आज्ञा का पालन करते हैं। उसके चिन्तन का यह व्यक्तिवादी तत्त्व है। परन्तु इस इच्छा को आदर्श नैतिक इच्छा की संज्ञा प्रदान कर वह आदर्शवाद के निकट हो जाता है। उसके अनुसार आदर्श नैतिक इच्छा स्वार्थी इच्छा के विपरीत है। यह सम्पूर्ण समाज की इच्छा होती है। दण्ड तथा राज्य के नियन्त्रण एवं उसके बल प्रयोग को भी वह इसी इच्छा का प्रतीक और प्रकटीकरण मानता है। यह भी उसके चिन्तन का आदर्शवादी तत्त्व है। सारांशतः राज्य के आधार के बारे में उसके चिन्तन में आदर्शवाद के साथ-साथ व्यक्तिवाद का भी पुट है। राज्य के आदेश पालन के पीछे बल प्रयोग को नकारना उसके चिन्तन का व्यक्तिवादी तत्त्व है। यह सही है कि ग्रीन के अनुसार व्यक्ति सामान्य इच्छा के कारण राज्य का आदेश का पालन करता है, परन्तु इसके पीछे कहीं न कहीं उसकी निजी इच्छा भी अप्रत्यक्ष रूप से कार्य करती है। उसकी सामान्य इच्छा की परिकल्पना के पीछे समाज हित अर्थात् कल्याणकारी राज्य का विचार ही अप्रत्यक्ष रूप से कार्यरत है। स्वतंत्रता और अधिकार सम्बन्धी अवधारणा- मानव चेतना और व्यक्तित्व के विकास तथा आदर्श चरित्र के निर्माण के लिए ग्रीन स्वतंत्रता को न केवल अनिवार्य अपितु अपरिहार्य भी समझता है। इसकी अवधारणा सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है वह हीगेल और कांट, दोनों से प्रभावित है, परन्तु उस पर अधिक प्रभाव हीगेल का ही दिखायी पड़ता है। सिद्धान्ततः स्वतंत्रता को अत्यधिक महत्त्व देना उसके चिन्तन का व्यक्तिवादी तत्व है, परन्तु उसके अनुसार इसकी वह अवधारणा नहीं है जो व्यक्तिवादियों की है। उसने इसे आदर्शवादी हीगेल और कांट के अर्थ में लिया है। उनकी तरफ ही वह भी मानता है कि राज्य के अनुरूप हो जाने में ही स्वतन्त्रता है क्योंकि वह ईश्वर का प्रतिबिंब और साकार रूप है। इस सम्बन्ध में ग्रीन का चिन्तन हीगेल-काण्ट से इस अर्थ में भिन्न है कि वह सभी प्रकार के नहीं अपितु आदर्श राज्य से अनुरूपता स्थापित करने का पक्षधर है। आदर्श राज्य से उसका आशय उस राज्य से है जो नैतिकता और व्यक्तित्व के विकास की परिस्थितियाँ पैदा तथा उसके मार्ग में आनेवाली बाधाएँ दूर करता है। यह उसके चिन्तन का आदर्शवादी तत्त्व है। आदर्श राज्य के आदर्श और कानून पालन को वह स्वतंत्रता मानता है। उसके चिन्तन के ये सभी तत्त्व आदर्शवादी हैं। हीगेल की भाँति वह राज्य के सभी कानूनों के पालन का पक्षधर नहीं है। उसके अनुसार उन्हीं कानूनों का पालन होना चाहिए जिनसे व्यक्तित्व का सर्वोत्तम विकास सम्भव हो। जो इस कार्य में सम्भव न हो उसका विरोध होना चाहिए। हीगेल आदि की तरह के विशुद्ध आदर्शवादी किसी भी हालत में राज्य के विरोध की आज्ञा नहीं देते हैं। ग्रीन ने विरोध की जो अनुमति दी है, वह उसके चिन्तन का व्यक्तिवादी तत्व है।  वह स्वतंत्रता के साथ-साथ अधिकार का भी समर्थक है तथा उसे उसका पूरक और तार्किक परिणाम मानता है। उसके अनुसार मानव चेतना स्वतंत्रता चाहती है और उसमें अधिकार निहित होते हैं तथा अधिकार अपनी रक्षा के लिए राज्य की माँग करते हैं। यह समाज और राज्य के बाहर किस अधिकार की परिकल्पना नहीं करता है। व्यक्ति की निम मांग को समाज और राज्य स्वीकृति प्रदान करते हैं, वह ठसके अधिकार का रूप धारण कर लेती है।

 वह नैतिकता और व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकार को अनिवार्य और अपरिहार्य मानता है। अपनी अनिवार्यता और अपरिहार्यता के कारण वह स्वाभाविक अर्थात् प्राकृतिक होता है। अधिकार पर बल देना तथा उसे अनिवार्य और अपरिहार्य मानना उसके चिन्तन का व्यक्तिवादी तत्त्व है। नैतिकता और व्यक्तित्व के विकास के साथ उसे (अधिकार) सम्बद्ध करना उसकी आदर्शवादी तत्त्व हैं। उसके अनुसार वे वाह्य और भौतिक स्थितियां अधिकार हैं जो नैतिक आदर्श की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं। सम्पत्ति सम्बन्धी अवधारणा -स्वतन्त्र जीवन, स्वतंत्र अभिव्यक्ति तथा सर्वोत्तम जीवन प्राप्ति के लिए वह असमानता में विश्वास करता परन्तु वह अनियन्त्रित घन संचय का पक्षधर नहीं है। वह सम्पत्ति के अधिकार का समर्थन करते हुए कहता है कि वह उसकी सीमा तक प्राप्त होना चाहिए जहाँ तक वह दूसरों की स्वतन्त्र इच्छा की अनुभूति में बाधा न उत्पन्न करता हो। उसकी इस चिन्तन में व्यक्तिवाद और आदर्शवाद दोनों का ही सम्मिश्रण है। सम्पत्ति के अधिकार विश्वास करना उसके चिन्तन का व्यक्तिवादी तथा उसे सर्वोत्तम जीवन अर्थात् नैतिक जीवन के प्राप्ति के सम्बद्ध करना आदर्शवादी तत्त्व है। निष्कर्ष: यह कहा जा सकता है कि टी०एच०ग्रीन के विचारों में आदर्शवाद एवं व्यक्तिवाद दोनों के तत्त्व मौजूद हैं अत: न वह न पूरी तरह आदर्शवादी है और न ही व्यक्तिवादी वरन दोनों का समन्वित रूप ही उसके राजनीतिक चिन्तन में परिलक्षित होता है।

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