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यूरोप में 1848 ई० की क्रान्ति के कारण एवं परिणामों

यूरोप में 1848 ई० की क्रान्ति के कारण एवं परिणाम

1848 की यूरोपीय क्रान्ति-सन् 1848 ई० यूरोपीय इतिहास में क्रान्ति का वर्ष । यूरोप में इस वर्ष छोटी-बड़ी सत्रह क्रान्तियां हुई क्योंकि ये क्रान्तियां तेजी से बदलते हुए नाज की देन थीं, उनके स्वरूप की समीक्षा करना सरल कार्य नहीं है। एक प्रतिष्ठित इतिहासकार मध्य यूरोप के विद्रोहों को "बुद्धिजीवियों की क्रान्ति" का नाम दिया है यह कहना धिक ठीक प्रतीत होता है कि क्रांति के तत्कालीन कारण आर्थिक तथा राजनीतिक असन्तोष मिश्रण थे। परन्तु एक जैसे उद्देश्यों और नारों के बावजूद प्रत्येक देश में क्रान्तियां अपने पने ढंग से आगे बढ़ीं, तथा उनके परिणाम भिन्न-भिन्न रूपों में सामने आए।

 यूरोप के पिछले बीस वर्ष के आर्थिक विकास और 1848 की क्रान्तियों के बीच ठतना ही गहरा सम्बन्ध था जितना की राजनीतिक परिवर्तन व महान क्रांति की देन के बीच था आर्थिक दृष्टि से दो तत्त्व महत्त्वपूर्ण थे-जनसंख्या में भारी वृद्धि तथा उद्योगों और यातायात के साधनों का विकास। इन दोनों परिवर्तनों का विशेषकर मध्य यूरोपीय देशों के समाज पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा था। जहां तक जनसंख्या के बढ़ने का प्रश्न था, ठसका सबसे अधिक प्रमाव कृषि प्रधान पिछड़े हुए ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य पर पड़ा। ये सभी समस्याएँ 1846-47 के आर्थिक संकट के कारण ऊपर उभर आई। 1846 में कृषि संकट आया जिसका मुख्य कारण यूरोप में, विशेषकर आयरलैण्ड, नीदरलैण्ड और जर्मनी में, आलू की फसल का नष्ट होना था फलतः पश्चिमी और मध्य यूरोप में खाने की चीजों की कमी हो गई। संकट के कारण झगड़े हुए, विशेषकर उन देशों में जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि और उद्योग दोनों पर निर्भर थी। 1846 के कृषि संकट के बाद 1847 में आर्थिक संकट आया जिससे पूंजी-निवेश और पूरे वर्ष के लिए साख की सुविधा समाप्त हो गई। ऐसी स्थिति में औद्योगिक संकट भी उत्पन्न हुआ जिससे आम जनता के कष्टों में वृद्धि हुई। असन्तोष की जो भावना 1848 में जागृत हुई उसका स्वरूप प्रमुखतः राजनीतिक था यूरोप के विभिन्न भागों में स्वतन्त्रता की कमी के कारण क्रांति ने भिन्न-भिन्न रूप धारण किए। फ्रांस में 1848 की क्रांति का स्वरूप-फ्रांस में 1848 की क्रान्ति रूढ़िवाद के विरुद्ध न होकर जुलाई राजतन्त्र के विरुद्ध हुई जिससे उदारवादी सरकार की कमजोरियों पर प्रकाश पड़ा। फ्रांस के उदारवादी दल, जैसे गणतन्त्रवादी उग्र सुधारवादी और समाजवादी तत्कालीन सरकार से अत्यन्त असन्तुष्ट थे। वे चाहते थे कि फ्रांस गणतन्त्रीय सिद्धान्तों की ओर बढ़े जिसमें सभी व्यक्तियों को मतदान का अधिकार प्राप्त हो सके परन्तु इसके विपरीत लुई फिलिप अधिक राजनीतिक स्वतन्त्रता देने के पक्ष में नहीं था उसने विरोधी दलों की निर्वाचन तथा संसदीय सुधार की मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया। यह युग फ्रांस में समाजवाद के उत्थान का समय था और समाजवादी विचारों का प्रचार सेंट साइमन, फूरियो और लुई ब्लों जैसे लेखक कर रहे थे। मजदूर वर्ग के सुधार के लिए उन्होंने कई मांगें रखीं, जैसे बेरोजगारों को काम, वेतन में वृद्धि और काम करने के घंटों में कमी। इसके अतिरिक्त उन्होंने निर्वाचन प्रणाली में सम्पत्ति की योग्यता को हटाने की भी मांग की, परन्तु लुई फिलिप जो स्वयं उच्च मध्य वर्ग का समर्थक था, हस्तक्षेप की नीतियों पर अटल रहा क्योंकि उसके विचार में उद्योग व कारखाने पूँजीपतियों की निजी सम्पत्ति थे जिनमें सरकार को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं था। वास्तव में क्रान्ति का मूल कारण फ्रांस के उच्च व सम्पन्न मध्यम वर्ग की नीतियाँ थीं जो राजनीतिक व सामाजिक सत्ता को निम्न मध्य वर्ग और मजदूर वर्ग के साथ बांटने के लिए तैयार नहीं थे। इसके विपरीत निम्न वर्ग उनके इस एकाधिकार को समाप्त करना चाहता था। इस प्रकार फ्रांस में मध्य वर्ग के उच्च व निम्न वर्ग तथा श्रमिक वर्ग के बीच एक त्रिगुट प्रतिद्वन्द्विता दिखाई देती थी। फरवरी की क्रान्ति उच्च वर्ग के विरुद्ध हुई। परन्तु कुछ समय बाद मजदूर वर्ग की बढ़ती हुई शक्ति के भय से उच्च और निम्न मध्य वर्गों में मेल हो गया तथा दोनों वर्गों ने समाजवाद के खतरे को दबाने का फैसला किया। सरकार द्वारा कुछ सुविधाएँ, जैसे 'राष्ट्रीय वर्कशॉप की स्थापना करने और बेकारी भत्ता प्रदान करने के बावजूद आर्थिक स्थिति नहीं सुधार और श्रमिकों का असन्तोष और बढ़ गया। पेरिस के जून के विद्रोह को सरकार ने कठोरता से कुचल दिया। 1848 ई० की असफलता का समाजवादियों पर गहरा प्रभाव पड़ा और आगामी वर्षों में उन्होंने मध्य वर्ग से मिलकर समाजवाद की स्थापना का दूसरा प्रयत्न नहीं किया। इस सम्बन्ध में मार्क्स ने भी वामपंथी दलों (Left parties) की कड़ी आलोचना की। इसके अतिरिक्त उदारवादी तत्त्व स्वयं दुर्बल पड़ गए और एक नई प्रकार की राष्ट्रीयता ने जन्म लिया, जिसका आधार उदारवाद न होकर सैनिक शक्ति था। जर्मनी और इटली में 1848 ई० की क्रान्तियाँ-जर्मनी और इटली में क्रान्तियां मुख्यतः वियना समझौते द्वारा स्थापित मेटरनिख व्यवस्था के विरुद्ध हुई। दोनों देशों 1848 ई० में क्रांतिकारियों का उद्देश्य तानाशाही व रूढ़िवादी संस्कारों को हटाने के साथ राष्ट्रीय एकीकरण की ओर बढ़ना था। इस प्रकार क्रांतिकारियों के उदारवादी तथा राष्ट्रवादी सिद्धान्त एक-दूसरे से मिलकर प्रतिक्रियावादी शक्तियों का दमन करना चाहते थे उनकी योजना नए संविधान तथा उदारवादी संस्थाओं के निर्माण के द्वारा इटली व जर्मनी के निवासियों को राष्ट्र का रूप देने की थी। इटली में पीडमांट के शासक चार्ल्स एलवर्ट ने मार्च 1848 ई० में एक उदारवादी संविधान की घोषणा की और इटली के राष्ट्रीय नेताओं से मिलकर आस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और कुछ समय के लिए लोम्बार्डी तथा वेनिशिया से आस्ट्रिया को निकाल दिया। जर्मनी में उदारवादी दलों ने बर्लिन में आन्दोलन प्रारम्भ किया था फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ को एक उदारवादी संविधान लागू करने के लिए विवश किया। जर्मनी के दक्षिण-पश्चिमी राज्यों में, विशेषकर बेदन, बवेरिया, हैस कासेल, सेक्सी और हैनोवर के शासकों ने भी उदारवादी संविधानों की घोषणा की। सभी राज्यों में असन्तोष व क्रान्ति का मुख्य कारण निरंकुश शासन स्वतन्त्रता का अभाव तथा सरकार के तानाशाही तरीके थे। इन सभी प्रदेशों में क्रान्ति का नेतृत्व मध्य वर्ग ने किया परन्तु कुछ स्थानों पर किसान वर्ग ने भी, जिस पर कृषि-संकट का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा था, मध्य वर्ग का साथ दिया। परन्तु थोड़े ही समय में शाही सेनाओं ने जनता के विद्रोहों का दमन कर दिया। आस्ट्रिया में 1848 ई० की क्रान्ति-जर्मनी व इटली में क्रान्ति द्वारा जहाँ केन्द्राभिमुखी शक्ति को बढ़ावा मिला वहां ऑस्ट्रिया और हंगरी के साम्राज्य में क्रान्ति के कारण केन्द्र से विमुख होने की प्रवृत्ति उभरने लगीं क्योंकि यह साम्राज्य अनेक जातियों का मिश्रण था। अप्रैल 1848 ई० में वियना में फर्डिनेंड ने क्रांतिकारियों के डर से एक उदारवादी संविधान लागू किया। ऐसी स्थिति में मेटरनिख इंग्लैण्ड भाग गया। उसने वियना छोड़ने से पहले कहा

"मैं एक बूढ़ा हकीम हूं मैं अच्छी तरह जानता हूं कि साध्य और असाध्य रोगों में क्या अन्तर है। यह बीमारी घातक है।" समस्त यूरोप में मेटरनिख के भागने के समाचार पर खुशियाँ मनाई गई उसकी प्रतिक्रियावादी नीति के विरुद्ध क्रांतिकारियों की यह जबरदस्त विजय थी।

आस्ट्रिया के अन्य भागों में उदारवादी व राष्ट्रवादी क्रान्तिकारी मिलकर काम करने में असमर्थ थे। हंगरी का राष्ट्रीय आन्दोलन आन्तरिक कलह से विभाजित था हंगरी की दो प्रमुख जातियां, प्यार और स्लाव में अलग-अलग राष्ट्र के निर्माण का आन्दोलन हुआ परन्तु कोसथ जो कि प्यार नेता था, स्लाव जाति की मांग सुनने के लिए भी तैयार नहीं था। उसके शब्दों में "मुझे यूरोप के नक्शे में क्रोशिया नहीं दिखाई देता।" ऐसी स्थिति में क्रीट और सवर्ण जाति के लोग प्यार के नेतृत्त्व में आस्ट्रियाई शासन स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। इसी कारण उन्होंने क्रान्ति का दमन करने में आस्ट्रिया का साथ दिया। इस प्रकार पूर्वी यूरोप में क्रान्ति का स्वरूप अत्यन्त सीमित था और उसमें उदारवादी व राष्ट्रवादी तत्व वरी तरह उलझे प्रतीत हुए। यही कारण था कि कुछ ही समय में क्रान्तिकारी अनुदारवादियो से समझौता करने को तैयार हो गए। 1848 ई० की क्रान्ति का अन्य देशों पर प्रभाव-क्रान्ति का प्रभाव डेनमार्क हालैण्ड, स्विट्जरलैंड और इंग्लैण्ड पर भी पड़ा। डेनमार्क के राजा ने उदारवादी संविधान और संसदीय व्यवस्था लागू करने की घोषणा की। हालैण्ड की संसद में मध्य वर्ग के व्यक्ति निर्वाचित होने में सफल हुए। स्विट्जरलैंड में गृह-युद्ध के पश्चात् उदारवादियों की विजय हुई और वहाँ एक नया संविधान बनाया गया परन्तु इंग्लैण्ड में चार्टिस्ट आन्दोलन तथा आयरलैण्ड के विद्रोह का दमन कर दिया गया जिसके कारण वहां पर उदारवादी तत्त्व असफल रहे। 1848 ई० की क्रान्ति का मूल्यांकन-1848 ई० के विद्रोह की सफलता अल्पकालिक सिद्ध हुई और 1850 के अन्त तक उदारवादी शक्तियां इटली तथा जर्मनी में फिर से हावी हो गईं। स्लावों, हंगरी वासियों तथा रोमानिया वासियों के आन्दोलनों को भी दबा दिया गया। समस्त मध्य तथा पूर्वी यूरोप में पुरानी शक्तियों की पुनः स्थापना हो गई। उदारवादी आन्दोलन की जो कुछ सीमित सफलताएँ थीं, जैसे आस्ट्रिया और प्रशा के संविधान, उन्हें भी भंग कर दिया गया। फ्रांस में भी गणतन्त्र का अन्त समीप था क्योंकि लुई नेपोलियन दूसरे साम्राज्य के निर्माण की योजना में लगा हुआ था।

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