सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

एशिया के प्रमुख मृदा प्रकार

 एशिया के प्रमुख मृदा प्रकार 


मिटियाँ (Soils) - एशिया के कृषि प्रधान अर्थ तंत्र में मिट्टियों का विशेष योगदान है। प्राचीनकाल में इसकी नदी-घाटियों में प्रारम्भिक सभ्यताओं का उदय हुआ था, जिसका प्रमुख आधार उर्वर मिट्टियाँ थीं। मिट्टी के निर्माण में जलवायु धरातली स्वरूप (उच्चावच), शैल संरचना तथा प्राकृतिक वनस्पति का विशेष योगदान होता है। एशिया में इन सभी तत्वों की विविधता के कारण महाद्वीप में विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ मिलती हैं, जिन्हें तीन प्रमुख वर्गों में रखा जा सकता है- (1) कटिबन्धीय (zonal), (I) अन्तः कटिबन्धीय (inter zonal) तथा (III) पार्श्विक (azonal)।

कटिबन्धीय मिट्टियाँ (zonal Soils) ये मिट्टियाँ जलवायु के कटिबन्धों के अनुसार पाई जाती हैं तथा पूर्णतः विकसित होती हैं। खनिज तथा जैव पदार्थों की उपस्थिति के आधार पर इन्हें दो वर्गों में विभाजित किया जाता है

1.पेडाल्फर तथा 2. पेडोकल। पेडाल्फर मिट्टियाँ (Pedalfer Soil) इन मिट्टियाँ में एलुमिनियम तथा लोहे की मात्रा अधिक पाई जाती है। ये मिट्टियाँ मुख्यतः वन प्रदेशों तथा लम्बी घास वाले प्रदेशों में मिलती हैं। इनके चार प्रमुख उपवर्ग हैं- (क) पोडजोल, (ख) पोडजोली, (ग) लेटराइट था (घ) पोडजोली-लेटोजोली।

पोडजोल मिट्टियाँ (Podzol soil) -


ये मिट्टियों साइबेरिया के टैगा वन प्रदेश में विकसित होती है इनमें पोडजोलीकरणको प्रक्रिया होने के कारण मिट्टी में जल तत्व, कैल्शियम आदि खनिजों की कमी रहती है तथा लोहे ए एलुमिनियम का उच्च अनुपात मिलता है। यह मिट्टी सामान्यतः अनुर्वर होती है। पॉडजोल मिट्टियाँ (Podzolic soils) ये मिट्टियाँ टैगा वन प्रदेश के दक्षिण में विकसित होती है, जहाँ पोडजोलीकरण की प्रक्रिया सापेक्षतः कम होती हैं इनमें जैव तत्व अधिक मिलते हैं। ये पोडजोल से अधिक गहरी होती है। इनका विस्तार उत्तरी चीन, कोरिया तथा उत्तरी जापान में मिलता है। लेटराइट मिट्टी (Laterite soils) इन मिट्टियों का निर्माण लेटराइजेशन प्रक्रिया द्वारा होता है। दक्षिणी भारत तथा दक्षिण, पूर्वी एशिया के उष्णार्द्र विषुवत रेखीय वनों में इनका विस्तार अधिक है। यहाँ तेज वर्षा के कारण मिट्टियों में अपक्षालन (leaching) की प्रक्रिया अधिक होने से ऊपरी परत के घुलनशील खनिज तथा जैव तत्व बह जाते हैं। इनमें ऊपरी संस्तरों में महत्वपूर्ण खनिजों तथा जैव तत्वों का प्रायः अभाव पाया जाता है। अतएव ये अनुपजाऊ होती है। इनमें लोहे तथा एलुमिनियम तत्वों की प्रधानता के कारण इनका रंग लाल है। इनका विस्तार दक्षिणी एवं पूर्वी भारत, म्यांमार, थाईलैण्ड, इण्डो-चीन, मलाया, दक्षिणी चीन एवं फिलीपीन्स में मिलता है।

 पोडजोली- लैटोजोली मिट्टियाँ (Podzolic and Latozolic soils) -

ये मिट्टियाँ लम्बी वाले प्रदेशों में मिलती है जहाँ पोडजोलीकरण तथा लेटराइजेशन की प्रक्रिया विभिन्न अनुपात में सक्रिय रहती हैं। वर्षा अधिक होने पर अपक्षालन क्रिया तीव्र होती है। निम्न तापमानों वाले क्षेत्रों में पोडजोलीकरण की प्रक्रिया तीव्र होती है इंन मिट्टियों में खनिज तत्व तथा जैव तत्वों की कमी पाई जाती है। इनका विस्तार दक्षिणी भारत के उत्तर-पूर्वी पठारी भाग, दक्षिणी जापान आदि में मिलता है। टुंड्रा मिट्टी (Tundra soil) इस मिट्टी का विस्तार एशिया के टुण्ड्रा प्रदेश में एक व्यापक पेटी में मिलता है। अधिकांशतः हिमाच्छादित रहने के कारण इस मिट्टी का विकास बहुत कम हो पाता है। इसमें जैव पदार्थों का लगभग अभाव पाया जाता है। ये उथली, दलदली तथा अनुपजाऊ होती हैं। पेडोकल मिट्टियाँ (Pedocal soils) इन मिट्टियों में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। ये कम वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती हैं, जहाँ केशिका क्रिया (Capillary action) के कारण निचले संस्तर का कैल्शियम (चूना) जल के साथ ऊपर आ जाता है। इन मिट्टियों को तीन उपवर्गों में विभाजित किया जाता है - (क) चरनोजम, (ख) भूरी स्टेपी तथा (ग) मरुस्थलीय मिट्टी। (क) चरनोजम मिट्टी (Chemozem sol - यह स्टेपी छोटी घास वाली वनस्पति वाले क्षेत्रों में विकसित होती हैं। इसे 'चेस्टनट' भी कहा जाता है। यह काले या भूरे रंग की होती है इसमें जैव पदार्थ (ह्यूमस) तथा चूने की प्रधानता होती है। यह उर्वरक मिट्टी खाद्यानों (मुख्यतः गेहूँ) की खेती के लिए उत्तम होती है। भूरी स्टेपी मिट्टी (Grey steppe soil) - इसमें चरनोजम से कम जैव पदार्थ मिलते हैं यह चरनोजम तथा मरूस्थलीय मिट्टियोंके मध्य पाई जाती है।

मरूस्थलीय मिट्टी (Desert soil)-

यह उष्ण मुरथल में पाई जाती है। एशिया में इसका विस्तार अरब के मरूस्थल से लेकर ईरान, अफगानिस्तान, थार, देवी आदि मरुस्थल पर है। इन मिट्टियों में कोशिका क्रिया (Caplary action)तीव्र होने के कारण ऊपरी संस्तर में चना एकत्रित हो जाता है, इनमें जैव पदार्थी की भी कमी होती है। सिंचाई द्वारा इनमें खेती की जा सकती है। अन्तः कटिबन्धीय एवं अनार्थिक मिट्टियाँ (Intrazonal and Azonal Soils)- ये मिट्टियों नदी, पवन, हिमनद आदि अपरदन के साधनों द्वारा पदार्थों के स्थानान्तरण तथा निक्षेपण से उत्पन्न होती है, अतः इनका पूर्ण विकास नहीं हो पाता है। इनमें विभभिन्न संस्तर विकसित नहीं होते हैं। ये सामान्यतः उर्वर होती हैं। इनमें लावा के अपक्षय से निर्मित को भी सम्मिलित किया जाता है। तदनुसार ये चार प्रकार की होती है- (को जलोढ, (ख) वायूदया लोयस. (ग) हिमाढ़ तथा (घ) रेगड़।

 जलोढ़ या कॉप मिट्टी (Alluvial soil)- 

यह मिट्टी नदियों के मैदानी तथा डेल्टाई भागों में मिलती है। जलोढ़ दो प्रकार के होते हैं नूतन जलोढ़, जो बाढ़ के निम्न प्रदेश में बनती है, जिन्हें 'खादर' कहते है तथा पुरातन जलोढ़, जो बाढ़ से सुरक्षित उच्च भागों में मिलती है, बाजार' कहा जाता है। नूतन जलोढ़ में मिट्टी के कण सूक्षम होते हैं, जबकि बांगर में मोटे कणों वाली मिट्टी पाई जाती है। ये मिट्टियाँ बहुत उर्वर होती हैं।

 वायू (लोयस) मिट्टी (Aeolian or Loess soil) - 

शुष्क तथा अर्द्ध शुष्क प्रदेशों में उड़ाकर लाए गए धूल कणों के निक्षेपण से निर्मित को वायूढ़ कहते हैं। उत्तरी-पश्चिमी चीन के मैदान में लोयस के पठार से लाए गए निक्षेपों से निर्मित वायूढ़ मिट्टी को 'लोयस' कहा जाता है, जो7 लाख वर्ग किमी0 क्षेत्र पर विस्तृत है। इनमें क्वार्टज, अभ्रक, फेल्सपार, कैल्साइट आदि खनिज पाए जाते हैं। सिंचाई द्वारा इस मिट्टी में उत्तम कृषि होती है। हिमोढ़ मिट्टी (Moraine soil) हिमनदों द्वारा बहाकर लाए गए तथा निक्षेपित अवसादों से इस मिट्टी का निर्माण होता है। इसमें छोटे शैल, खण्ड, बजरी, रेत, मृतिका आदि पदार्थ अधिक होते है। साइबेरिया में यह मिट्टी यत्रतत्र मिलती है, जो अनुपजाऊ होती है। रेगुर मिट्टी (Regur soil) काले रंग की यह मिट्टी लावा निर्मित बेसाल्ट के अपक्षय से बनती है। यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है, किन्तु इसमें जल मिलने पर यह चिपचिपी हो जाती है तथा सूखने पर इसमें दरारें पड़ जाती है तथा यह कठोर हो जाती है। दकन के पठार पर विस्तृत क्षेत्र में यह मिट्टी पाई जाती है, जो कपास के लिए विशेष उपयोगी होने के कारण 'कपास की काली मिट्टी' भी कहलाती है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे