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शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

आर्थिक प्रदेश की परिभाषा

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आर्थिक प्रदेश की परिभाषा 


प्रदेश एक क्षेत्रीय इकाई होता है जिसके अन्तर्गत कुछ या अधिकांश भौगोलिक तत्वों या प्रकरणों (topics) की समानता या समानता पायी जाती है। यह भूमि का एक खण्ड या क्षेत्रीय इकाई होता है जिसके अन्तर्गत विशिष्ट अथवा समान अभिलक्षण (unique or similar characters) पाये जाते हैं और वह अपने विशिष्ट अभिलक्षणों द्वारा अन्य भूभागों से भिन्नता रखता है। प्रदेश की कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएं निम्नलिखित हैं-

1. फ्रांसीसी मानव भूगोल के संस्थापक वाइडल डी ला ब्लाश (vidal de La Blache) के अनुसार,"प्रदेश का आशय एक ऐसे भौगोलिक क्षेत्र से है जहाँ एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न जैविक इकाइयाँ कृत्रिम ढंग से वहाँ संग्रहित किये जाने के पश्चात स्थानीय पर्यावरण में परस्पर सह-अस्तित्व के फलस्वरूप परस्पर संयुक्त हो जाती हैं जिसके आधार पर सम्बद्ध क्षेत्र की अलग पहचान बन जाती है।

2. ब्रिटिश भूगोलवेत्ता हरबर्टसन (A.J.Herbertson) के अनुसार, "प्रदेश वह भौगोलिक इकाई है जिसमें भूमि, जल, वायु, पशु, पेड़-पौधे तथा मनुष्य क्षेत्रीय स्तर पर परस्पर इतने घनिष्ठ और विशिष्ट
सम्बंध में संयुक्त हो गये हैं कि उनसे सम्पूर्ण की विलग तथा अनूठी पहचान बन गयी है।

3. अमेरिकी भूगोलवेत्ता फेनेमैन (N.M.Phenemann) के अनुसार, प्रदेश वह भौगोलिक इकाई है जिसमें सर्वत्र स्थलाकृतिक समांगता पायी जाती है और जो आस-पास के क्षेत्रों से इस दृष्टि से सर्वथा भिन्न है।

4. अमेरिकी भूगोलवेत्ता रिचर्ड हार्टशोर्न (Richard hartshorne) के अनुसार, “प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र होता है जिसकी विशिष्ट स्थिति होती है जो किसी प्रकार से अन्य क्षेत्रों से भिन्न होता है और जो उतनी ही दूरी तक फैला होता है जितनी दूरी तक वह भिन्नता पायी जाती है।"

5. प्रादेशिक भूगोल की प्रकृति, स्वरूप तथा उसकी प्रगति की समीक्षा करते हुए अमेरिकी भूगोलवेत्ता डी0 हीटलसी ने प्रदेश को इस प्रकार परिभाषित किया है, "क्षेत्रीय समानता के आधार पर परिभाषित पृथ्वी की सतह (भूजल) के किसी भी प्रखण्ड को प्रदेश की संज्ञा दी जा सकती है। उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि एक प्रदेश भूतल (earth's surface) का एक प्रखण्ड या इकाई होता है जिसके अन्तर्गत विशिष्ट अथवा समान अभिलक्षण पाये जाते हैं। अपने विशिष्ट अभिलक्षणों के कारण एक प्रदेश अपने समीपवर्ती, संलग्न या अन्य क्षेत्रों से भिन्नता रखता है। ब्रिटिश भौगोलिक संघ (British Geographical Association) ने विश्व के प्रादेशीकरण की व्याख्या करने के लिए एक समिति नियुक्त किया था जिसके सदस्य थे राक्सबी, स्टाम्प,अन्स्टेड और मायर्स। इस समिति ने 1937 में एक लेख प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था। *विश्व के प्रदेशों का वर्गीकरण" (Classification of Regions of the World)। इस समिति ने प्रदेशों को दो वर्गों में विभक्त किया- (1) जननिक प्रदेश (genric region), और (2) विशिष्ट प्रदेश (specific region)| जननिक प्रदेश किसी वर्ग अथवा प्रकार का प्रतिनिधित्व करते हैं और भूतल के अनेक भागों में पाये जा सकते हैं। जननिक प्रदेश सामान्य विशेषता वाले होते हैं और एक से अधिक क्षेत्रों में पाये जाते हैं। इसके विपरीत विशिष्ट प्रदेश अपने प्रकार का अनूठा (अकेला) प्रदेश होता है जिसके अन्य उदाहरण नहीं पाये जाते हैं। इनकी भौगोलिक विशेषताएं बिल्कुल अलग प्रकार की होती हैं। विशिष्ट प्रदेश सर्वपक्षीय (total topics) या सर्व तत्व (total features) क्षेत्रीय इकाई होता है जो एक ही स्थान या क्षेत्र में विद्यमान समस्त प्रकार के भौगोलिक (प्राकृतिक तथा मानवीय) तत्वों के पारस्परिक सह-अस्तित्व पर आधारित होता है। स्वभाव से अनूठी क्षेत्रीय इकाई होने के कारण विशिष्ट प्रदेशों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया जा सकता।

जननिक प्रदेशों के प्रकार (Types of Generic Regions) जननिक या सामान्य प्रदेश किसी एक तत्व या विशिष्ट सम्बंध के आधार पर सीमांकित क्षेत्रीय इकाइयां होते हैं। इसके लिए भूतल के विभिन्न भागों में एक ही आधार पर निर्धारित विभिन्न प्रकार के मिलते-जुलते क्षेत्रों की पहचान की जाती है। इस प्रकार जननिक प्रदेश तत्वगत समानता पर आधारित होते हैं और भूतल पर एक से अधिक क्षेत्रों में पाये जाते हैं। अतः सही अर्थ में जननिक प्रदेश ही प्रादेशिक भूगोल की विषय-सूची प्रस्तुत करते हैं। जननिक प्रदेश को दो क्षेणियों में विभक्त किया जाता है: 
(1) समरूप या लाक्षणिक प्रदेश (Formal or Uniform region), और (2) कार्यात्मक या नाभिक प्रदेश (Functional or Nodal region)| समरूप या लाक्षणिक प्रदेश (Formal or Uniform Regions) समरूप प्रदेश की सीमाओं का निर्धारण कछ चने गये तत्वों या सम्बंधों की समानता या समरूपता (uniformity) के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार के प्रदेशों में सामान्यतः सीमित प्रकार की क्षेत्रीय समरूपता विद्यमान होती है। आवश्यकता एवं उद्देश्य के अनुसार इसका सीमांकन एक तत्व, अनेक तत्वों अथवा सम्पूर्ण तत्वों की समानता के आधार पर किया जा सकता है। भौतिक प्रदेश, प्राकृतिक प्रदेश, भौगोलिक प्रदेश, आर्थिक प्रदेश सांस्कृतिक प्रदेश आदि समरूप प्रदेश के उदाहरण हैं जिनका निर्धारण कई तत्वों या उपादानों (multiple topics) के आधार पर किया जाता है। प्रादेशिक भूगोल में अधिकांश आरंभिक अध्ययन समरूप प्रदेश से ही सम्बंधित थे 1950 तक इसी प्रकार के प्रादेशिक अध्ययन अधिक प्रचलित थे। एकल तत्व की समानता के आधार निर्धारित प्रदेशों में जलवायु प्रदेश, मृदा प्रदेश, भाषा प्रदेश, कृषि प्रदेश, औद्योगिक प्रदेश आदि उल्लेखनीय है। जिन समरूप प्रदेशों में एक से अधिक तत्वों की समानता या समरूपता पायी जाती है वे बहुत विषय प्रदेश (multiple topics regions)होते हैं। प्रदेश के सीमांकन में जितने तत्वों को आधार बनाया जाता है वे सभी विभिन्न समरूप प्रदेशों में लगभग (स्थूल) समानता रखते हैं। प्रमुख समरूप प्रदेश निम्नलिखित हैं:

भौतिक प्रदेश (Physiographic Region)- भौतिक प्रदेश का सीमांकन सामान्यतः उच्चावच (relief) या स्थलाकृति (topography) की समानता के आधार पर किया जाता है। भौतिक प्रदेशों के निर्धारण में उच्चावच को सर्वाधिक महत्व दिया जाता रहा है। वर्तमान समय में अधिकांश भूगोलवेत्ताओं का मत है कि भौकित प्रदेशों के निर्धारण में उच्चावच (relief) के साथ भूगाभिक सरचना (geological structure) तथा अपवाह (drainage) को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। अतः अब भौतिक प्रदेशों का सीमांकन उच्चावच, संरचना तथा अपवाह के संयुक्त आधार पर किया जाता है। पर्वतीय प्रदेश, पठारी प्रदेश,अन्तपर्वतीय प्रदेश,गिरिपद प्रदेश.मैदानी प्रदेश आदि भौतिक प्रदेश के उदाहरण हैं। स्थलाकृति के आधार पर भारत को चार बहत भौतिक प्रदेशों (भागों) में विभक्त किया जाता है - (1) हिमालय का पर्वतीय प्रदेश का उत्तरमा दक्षिण का पठारी प्रदेश और (4) समुद्र तटीय मैदानी प्रदेश। सक्ष्म स्थानीय बहुत प्रदेशों के अनेक मध्यम एवं लघु प्रदेशो में भी विभाजित किया जाता है। प्राकृतिक प्रदेश (Natural Region).

पाठक प्रदेश का निधोरण प्राकृतिक तत्वों की समरूपता, समानता (homogeneity) या एकरूपता (uniformity) के आधार पर किया जाता है। एक प्राकृतिक प्रदेश के भीतर उच्चावच, जलवायु, मिट्टी, प्राकृतिक वनस्पति आदि प्राकृतिक तत्वों की स्थूल समरूपता या एकरूपता पायी जाती है। इस प्रकृति समरूपता के परिणामस्वरूप प्रायः मानव जीवन तथा मानवीय क्रियाओं में भी लगभग समरूपता देखने को मिलती है। प्राकृतिक प्रदेशों के निर्धारण में जलवायु सर्वाधिक प्रभावशाली कारक है। यही कारण
 है कि अधिकांश प्राकृतिक प्रदेश सामान्यतः जलवायु प्रदेशों का ही अनुसरण करते हैं। प्राकृतिक प्रदेशों के निर्धारण की दिशा में ब्रिटिश भूगोलवेत्ता  ए 0 जे0 हरबर्टसन (A.Herbertson) ने 1905 में प्रथम महत्वपूर्ण प्रयास किया था हरबर्टसन ने 1904 में ब्रिटिश भूगोलवेता संघ की बैठक में अपने प्राकृतिक प्रदेशों की योजना को प्रस्तुत किया जिसका प्रकाशन 1905 में 'भौगोलिक पत्रिका' (Geographical Review) "Major Natural Regions of the world (विश्व के वृहद प्राकृतिक प्रदेश) शीर्षक से हुआ। उन्होंने प्राकृतिक प्रदेशों के निर्धारण हेतु मूलतः प्राकृतिक वनस्पति को आधार बनाया जो जलवायु और मिट्टी पर निर्भर होती है। इस प्रकार हरबर्टसन के प्राकृतिक प्रदेश जलवायु प्रदेश के लगभग अनुकूल हैं हरबर्टसन ने सम्पूर्ण भूमण्ल (विश्व) को 15 बृहत प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त किया। उन्होंने इन प्राकृतिक में सभी प्रकार के भौगोलिक तत्वों प्राकृतिक तथा मानवीय दोनों) में भी समरूपता सिद्ध करने का प्रयास किया। उनके अनुसार एक प्राकृतिक प्रदेश में प्राकृतिक विशेषताओं के साथ ही मानव जीवन तथा अन्य मानवीय लक्षणों में भी लगभग समानता पायी जाती है। हरबर्टसन ने यह प्रतिपादित करने का प्रयास किया कि भिन्न जलवायु वाले प्रदेशों में निवास करने वाले मनुष्यों की क्रिया,जीवन पद्धति तथा सभ्यताष्टं बिल्कुल भिन्न होंगी। किन्तु उनका यह मत सही नहीं है। हरबर्टसन के विचार से प्राकृतिक प्रदेशों को पृथ्वी की मानद भौगोलिक व्याख्या में मौलिक इकाइयों के रूप में प्रयोग किया सकता है। उनके समकालीन ब्रिटिश भूगोलवेत्ता अन्स्टेड (J.F.Unstead, 1916) ने इस संकल्पना को और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने सूझाव दिया कि क्षेत्रीय वर्गीकरण की किसी भी योजना के लिए आवश्यक है कि उसे प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों के सम्मिलित आधार पर बनाया जाया हरबर्टसन तथा अन्स्टेड के वर्गीकरण प्रणाली मौलिक अंतर था। हरबर्टसन का वर्गीकरण विश्लेषणात्मक (analytical) था जिसमें बृहत्तम क्षेत्रीय इकाई (सम्पूर्ण भूमण्डल) से प्रारम्भ करके उसे क्रमशः लघुतर प्रादेशिक इकाइयों में वर्गीकरण किया जाता है। इसके विपरीत अन्स्टेड द्वारा प्रतिपादित क्षेत्रीय वर्गीकरण संश्लेषणात्मक (syn thetic) था। इसमें प्रादेशीकरण का आरंभ लघुतम क्षेत्रीय इकाइयों के आधार पर किया जाता है और उत्तरोत्तर बृहत्तर क्षेत्रीय इकाइयों का निर्धारण किया जाता है। उन्होंने लघुतम क्षेत्रीय इकाई को स्टो (Stow) नाम दिया जिसमें बृहत्तर प्रादेशिक इकाइयाँ क्रमशः इस प्रकार है-ट्रैक्ट (tactis). लघु प्रदेश (minor regions) तथा बृहत प्रदेश (major regions अमेरिकी भूगोलवेत्ता ओडम एवं मूरी (W.H.Odum and H.E. Moore, 1938) ने प्राकृतिक प्रदेश (natural region) को physical region का समानार्थी माना है। अधिकांश भूगोलवेत्ता natural region' और 'phyical region' को समान अर्थ में ही प्रयोग करते हैं। कहीं-कहीं इन दोनों शब्दों का प्रयोग भिन्न अर्थ में भी किया गया है। भौतिक प्रदेशों (physical regions) का निर्धारण उच्चावच, संरचना तथा अपवाह (ढाल) के सम्मिलित आधार पर किया जाता है जबकि प्राकृतिक प्रदेशों (natural regions) के निर्धारण में उपर्युक्त भौतिक तत्वों के साथ ही जलवायु और जैविक तत्वों जैसे प्राकृतिक वनस्पति तथा जन्तुओं को भी सम्मिलित किया जाता है। उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक प्रदेशों के निर्धारण में मानवीय तत्वों को आधार नहीं बनाया जा सकता। मानवीय तत्वों पर आधारित प्रदेश को कृत्रिम प्रदेश (artificial region) कहा जा सकता है। हरबर्टसन के अनुसार एक प्राकृतिक प्रदेश में जिस पर्यावरण का विकास होगा वह समान प्रकार के अन्य प्रदेशों में भी उसी प्रकार का होगा। हरबर्टसन के समर्थकों का तर्क है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक (1905) में सम्मिलित किये गये तत्वों के आधार पर निकाले गये निष्कर्ष वर्तमान समय में कुछ संगीत हो सकते हैं। उस समय भी जावा अन्य भूमध्यरेखीय प्रदेश से अधिक विकसित था।
 भूमध्यरेखीय प्रदेश मानसूनी प्रदेश, उष्ण स्थल परदेश, भूमध्यसागरीय प्रदेश, प्रैयरी पास (शीतोष्ण घास) प्रदेश, टैगा प्रदेश, टुण्ड्रा प्रदेश आदि वृहद प्राकृतिक प्रदेश के उदाहरण हैं। सांस्कृतिक प्रदेश (Cultural Region)- सांस्कृतिक प्रदेश के विचार की उत्पत्ति मूलतः सांस्कृतिक भूदृश्य की संकल्पना से हुई है जिसमें वे सभी भौगोलिक तत्व या कारक सम्मिलित होते हैं जिनकी उत्पत्ति या तो मनुष्य द्वारा हुई है अथवा जो मानवीय क्रियाओं द्वारा संशोधित, परिमार्जित या प्रभावित है अत: जितने भूक्षेत्र में समान प्रकार के सांस्कृतिक भूदृश्य पाये जाते हैं उसे एक सांस्कृतिक प्रदेश मान लिया जाता है। सांस्कृतिक प्रदेशों का निर्धारण सांस्कृतिक तत्वों (Cultural elements) की समरूपता के आधार पर किया जाता है। 'सांस्कृतिक या मानवीय (cultural or human) शब्दावली का प्रयोग प्राकृतिक (natural) के विपरीत अर्थ में किया जाता है। यह कृत्रिम (artificial)के संदर्भ में प्रयुक्त होता है। इसके अन्तर्गत आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक सभी तत्वों को सम्मिलित किया जाता है (2) सांस्कृतिक तत्व के अन्तर्गत केवल मानव संस्कृति से सम्बद्ध तत्वों जैसे प्रजाति, धर्म, भाषा, जीवन पद्धति, प्रथा, दर्शन आदि को सम्मिलित किया जाता है। सांस्कृतिक प्रदेश का आशय दूसरी संदर्भ से है अतः सांस्कृतिक प्रदेशों का निर्धारण सामान्यतः दृश्य तथा अनुभव सांस्कृतिक तत्वों की समरूपता के आधार पर किया जाता है। ऐसे प्रदेशों की सीमाएँ कृत्रिम होती हैं जो कालानुसार परिवर्तनीय होती ह और प्राकृतिक सीमाओं (जैसे पर्वत, नदी, समुद्र आदि) को भी लांघ जाती है। एक सांस्कृतिक प्रदेश के अन्य संस्कृति या सांस्कृतिक तत्वों की समानता (समरूपता) पायी जाती है। सांस्कृतिक परिष्कृत तथा आदर्श उस जीवन शैली को कहते हैं जो कालान्तर से संचित होकर समाज में व्याप्त रहती है और समाज को संतुलन तथा दृढ़ता प्रदान करती है। इसके अन्तर्गत ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य, धर्म, भाषा, जीवन पद्धति, जीवन दर्शन विचार, व्यवहार, नीति, नियम.प्रथाएं आदि सम्मिलित होते हैं। संस्कृति आदर्शोन्मुख सामाजिक प्रक्रिया है जो निरन्तर चलती रहती है संस्कृति के मूर्त (visible) और अमूर्त (non-visible) दोनों लक्षण होते हैं किन्तु भूगोल में मूर्त तथा दृश्य लक्षणों पर ही अधिक बल दिया जाता है। विश्व स्तर पर सांस्कृतिक प्रदेशों को निम्नलिखित तीन पदानुक्रम वर्गों में विभक्त किया जाता है पदानुक्रम

1. वृहत प्रदेश (Macro region)

2. मध्य प्रदेश (Meso region)

सांस्कृतिक प्रदेश की श्रेणा सांस्कृतिक मंडल (Cultural world) सांस्कृतिक परिमंडल (Cultural realm) सांस्कृतिक क्षेत्र प्रदेश (Cultural area/region) 3 लघु प्रदेश (Micro region) विश्व के बृहत सांस्कृतिक प्रदेशों को सांस्कृतिक मण्डल (cultural world) कहा जाता है जिसका विस्तार एक महाद्वीप या कई महाद्वीपों पर हो सकता है। एक सांस्कृतिक मंडल के अन्तर्गत कर्ड सांस्कृतिक क्षेत्र या प्रदेश सम्मिलित होते हैं बृहत सांस्कृतिक प्रदेशों का निर्धारण सांस्कृति तत्वों की स्थल समरूपता के आधार पर किया जाता है। सांस्कृतिक प्रमंडल में सांस्कृति तत्वों की मध्यम समरूपता पायी जाती है। सांस्कृतिक परिमंडल के भीतर सांस्कृतिक क्षेत्री (या प्रदेशों) का निर्धारण स्थानीय सांस्कृतिक भिन्नता के आधार पर किया जाता है। स्पेन्सर एवं थामस (1969), रसेल एवं निफेन (1971) ब्रोयक (1973) आदि ने विश्व के सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन का महत्वपूर्ण प्रयास किया है। भौगोलिक प्रदेश (Geographical Region)- भूमंडल का वह भाग जिसके अन्तर्गत सम्पूर्ण या अधिकांश भौगोलिक तत्वों (दशाओं) में सभ्यता एकरूपता पाई जाती है उसे एक भौगोलिक प्रदेश कहते हैं। इसका प्रयोग प्राकृतिक प्रदेश के समानार्थी के रूप में भी किया जाता है। वास्तव में प्रदेश की उत्पत्ति ही भौगोलिक होती है विभिन्न
भौगोलिक तत्वों के आधार पर सीमांकित प्रदेशों की अपनी-अपनी विशेषताएं होती है किन्तु समझ भौगोलिक तत्वों में एकरूपता का मिलना कल्पना मात्र है कुछ भूगोलवेत्ता मानते है कि भूगोल के कि तत्व या उपादान (topic) की समरूपता के आधार पर निर्मित प्रदेश को भौगोलिक प्रदेश कहा जा सकता है जैसे जलवायु प्रदेश, मृदा प्रदेश, वनस्पति प्रदेश, संसाधन प्रदेश आदि। कुछ अन्य भूगोलवेत्ताओंडे विचार से सांस्कृति भूदृश्य (मानव निर्मित भू दृश्य) के आधार पर सीमांकित प्रदेश को भौगोलिक प्रदेश माना जाना चाहिए जैसे कृषि प्रदेश, औद्योगिक प्रदेश, भाषा प्रदेश आदि। सर्वाधिक मान्य विचार के अनुसार भौगोलिक प्रदेश का प्रयोग ऐसे प्राकृतिक प्रदेश के लिए किया जा सकता है जिसके अन्तर्गत प्राकृतिक (उच्चावच, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति आदि) तथा मानवीय (अधिवास, मानव व्यवसाय, आर्थिक विकास, प्रौद्योगिकी, भाषा, धर्म आदि) सभी प्रकार की भौगोलिक दशाओं की समरूपता पायी जाती है। भौगोलिक प्रदेश के अस्तित्व का विचार अन्स्टेड (.E.Unstead, 1916) के मस्तिष्क की उपज है। अन्स्टेड ने हरबर्टसन के विचारों का समर्थन करते हुए बताया कि यदि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों को एक साथ लिया जाय तो उनकी समरूपता के आधार पर प्राकृतिक-भौगोलिक प्रदेश (Natural Geographic region) का निर्धारण होगा। उन्होंने प्राकृतिक दशाओं तथा तज्जनित मानव क्रियाओं को व्यक्त करने के लिए जलवायु को मुख्य आधार बनाने पर बल दिया। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार भूगोल के कुछ निश्चित तत्व जिनका परस्पर अन्तर्सबंध है, उनकी समरूपता के आधार पर निर्धारित प्रदेश को भौगोलिक प्रदेश कहा जायेगा पारिस्थितिक सम्प्रदाय के समर्थक के अनुसार भूगोल केवल मनुष्य और पर्यावरण के अंतसंबंधों का अध्ययन है अतः मनुष्य और पर्यावरण के पारस्परिक अंतर्संबंध के परिणामस्वरूप उत्पन्न तत्व (सांस्कृतिक भूदृश्य) के आधार पर भौगोलिक प्रदेश का निर्धारण किया जा सकता है। रेनर के अनुसार सांस्क्रतिक तत्वों के आधार पर वर्गीकृत प्रदेशों को भौगोलिक प्रदेश कहा जाता है। आर्थिक प्रदेश (Economic Region) आर्थिक प्रदेश का निर्माण आर्थिक तत्वों की समरूपता के आधार पर किया जाता है। आर्थिक तत्वों के अन्तर्गत संसाधन, आर्थिक क्रियाएं (कृषि, पशुपालन, उद्योग, व्यापार, सेवाएं आदि), आर्थिक उत्पादन, आर्थिक विकास का स्तर. प्रौद्यगिकीय विकास, आर्थिक नीति, आर्थिक नियोजन,
मानव के आर्थिक व्यवहार आदि सम्मिलित किये जाते हैं। भूगोल में अधिकांशतः आर्थिक क्रियाओं, आर्थिक उत्पादों तथा विकास स्तर को प्रादेशीकरण के मापदण्ड के रूप में प्रयोग किया जाता है। संसाधन प्रदेश, कृषि प्रदेश. औद्योगिक प्रदेश, भूमि उपयोग प्रदेश, नियोजन प्रदेश, शस्य संयोजन प्रदेश आदि आर्थिक प्रदेश के ही विविध रूप हैं। अधिकांश भूगोलवेत्ताओं का मत है कि आर्थिक प्रदेश के अन्तर्गत समस्त महत्वपूर्ण पसख आर्थिक तत्वों के समिश्र समन्वय (complex integration) की क्षेत्रीय अभिव्यक्ति होनी चाहिए। अतः एक आर्थिक प्रदेश के अन्तर्गत समस्त आर्थिक तत्वों की समरूपता या अपेक्षित होती है। प्रकार्यात्मक/कर्मोपलक्षी प्रदेश (Functional Region) पता सेकेन्दीकत प्रदेश (nodal region)भी कहा जाता है। एक प्रकार्यात्मक प्रदेश के अन्तर्गत कार्यात्मक संगठन की एकरूपता पाई जाती है और इसके सम्पूर्ण भाव जाती है। इस प्रकार के प्रदेशों में केन्द्रीयता (centrality) की उपस्थिति अनिवार्य होती तार प्रायः एक केंद्रीय स्थिति के चारों ओर पाया जाता है। इसे केंद्रीकृत या केन्द्र आधारित (nodal region) या सगठनात्मक प्रदेश(organization region)के नाम से भी जाना
जाता है। नगर प्रदेश (city region) या नगरीय प्रभाव क्षेत्र (umland), बाजार क्षेत्र (market area), बन्दरगाहों के पृष्ठप्रदेश (hinterland) आदि प्रकार्यात्मक प्रदेश के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। सामान्यतः किसी केन्द्रस्थल, नगर, समुद्रपत्न और उनके आस-पास के क्षेत्रों के मध्य घनिष्ठ कार्यात्मक सम्बंध पाये जाते हैं और पूरा प्रदेश प्रकार्यात्मक रूप से परस्पर निर्भर और अन्तर्संबंधित होता है। किसी नगर (या केन्द्र स्थल) के चारों ओर स्थित क्षेत्र जो उससे कार्यात्मक रूप से संबंधित होता है उसे नगर का प्रभाव क्षेत्र या अमलैण्ड (Umland) कहते हैं। कोई भी नगर अपनी प्रशासनिक सीमा के भीतर आत्मनिर्भर प्रकार की क्षेत्रीय इकाई नहीं है बल्कि इसका अपने चारों स्थित ग्रामीण क्षेत्रों से विविध प्रकार के कार्यात्मक सम्बंध होते हैं। किसी विस्तृत क्षेत्र में नगर की केन्द्रीय स्थिति होती है और उसके चतुर्दिक फैले हुए क्षेत्रों पर नगर की विविध आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलापों का प्रभाव पाया जाता है। नगर अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अपने चारों ओर व्याप्त समीपवर्ती क्षेत्रों पर निर्भर होता है। इन बाह्य क्षेत्रों से नगर को खाद्य-सामग्रियों जैसे अन्न, दूध, शाक-सब्जी, फूल, फल आदि तथा अनेक औद्योगिक कच्चे माल प्राप्त होते हैं। नगर में काम करने वाले श्रमिकों की आपूर्ति भी इन्हीं क्षेत्रों प्रभाव क्षेत्रों स होती है। इस प्रकार नगर अपने समीपवर्ती क्षेत्रो से विविध प्रकार की वस्तुएँ एवं सेवाएं प्राप्त करता है और उनके बदले में अनेक प्रकार की विनिर्मित वस्तुष्टं तथा सेवाएं अर्पित करता है। नगर विविध प्रकार की सेवाओं के केन्द्र होते हैं। समीपवर्ती नगरीय प्रभाव क्षेत्र के लोग चिकित्सा, शिक्षा, व्यापार, प्रशासन,मनोरंजन आदि आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उस नगर पर ही निर्भर करते हैं। किसी नगर का प्रभाव क्षेत्र भौतिक रूप से उससे जुड़ा हुआ होता है। इस प्रकार नगर या केन्द्रस्थल तथा उसके प्रभाव क्षेत्र (परिक्षेत्र) के मध्य परस्पर निर्भरता पायी जाती है और सम्पूर्ण प्रदेश कार्यात्मक रूप से अंतर संबंध होता है।

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