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सोमवार, 6 जुलाई 2020

1917 की रूस की क्रांति के कारण और महत्त्व

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1917 की रूस की क्रांति के कारण और महत्त्व 

1917 को रूसी क्रांति के कारण प्रत्येक क्रान्ति के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। 1917 में हुई रूसी क्रान्ति के पीछे कई कारण थे। यह ठीक है कि यह क्रान्ति प्रथम विश्वयुद्ध के काल में ऐसी परिस्थितियों में हुई थी जबकि रूस की सेनायें निरंतर पराजित होती जा रही थीं तथापि इसे रूस की मात्र सैनिक पराजय का परिणाम कहना भूल होगी। युद्ध ने क्रान्ति की प्रक्रिया को केवल तीव्र अवश्य बना दिया था जो विगत कई दशकों से रूस की निरंकुश जारशाही को खोखला कर रही थी। क्रांति के स्पष्ट लक्षण 1905 में ही प्रकट हो गए थे किन्तु जारशाही उस क्रान्ति का दमन करने में कुछ समय तक सफल रही। जनता में क्रान्ति की ज्याला भीतर ही भीतर काफी दिनों से सुलगती आ रही थी और इसी ज्याला का परिणाम 1917 की वह महान् बोल्शेविक क्रान्ति थी, जिसने रूसी शासन में आमूल चूल परिवर्तन किया और रूस की काया पलट दी और जारशाही को सदा के लिए दफनाकर रूस को एक साम्यवादी देश के रूप में परिवर्तित कर दिया। 1917 की रूस क्रान्ति के कारण कुछ तो पिछले इतिहास के गर्भ में छिपे थे और तात्कालिक थे जो अग्रलिखित हैं (1) रूस पर पश्चिमी विचारों का प्रभाव-लिप्सन ने लिखा है कि "रूसी क्रान्ति की जड़ें रूस के इतिहास में गहरी गई हुई थी।" रूस एक पिछड़ा हुआ देश था, जहाँ सामाजिक तथा आर्थिक विषमता विद्यमान थी। वहाँ निरंकुश राजतंत्र था। पश्चिमी विचारों के प्रसार के फलस्वरूप जनता में स्वतन्त्रता और समानता की भावना पनपने लगी थी। इन्हीं का परिणाम क्रान्ति के रूप में प्रकट हुआ। (2) औद्योगीकरण का प्रभाव-डॉ सत्यकेतु विद्यालंकार ने औद्योगीकरण पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि "व्यावसायिक क्रान्ति के कारण रूस बहुत से कल कारखाने स्थापित हो गये थे। इनमें काम करने के लिए लाखों मजदूर देहातों से शहरों में आ बसे थे।" इन मजदूरों में राजनीतिक चेतना जाग उठी थी। जर्मनी में कार्ल मार्क्स ने जिसः समाजवादी सिद्धान्त का प्रतिपादिन किया था, उसकी चर्चा इन मजदूरों को भली लगती थी, क्योंकि वे समझते थे कि इससे कारखानों पर आपका स्वामित्व स्थापित हो जाएगा। (3) युद्ध में सहबद्ध राष्ट्रों का प्रभाव-सन् 1914 में जो विश्वयुद्ध शुरू आ उसमें रूस और इंग्लैण्ड का साथी था। फ्रांस और इंग्लैण्ड जर्मनी, आस्ट्रिया और ट्की के विरुद्ध प्रचार में यह बात बार-बार कहते थे कि वे जनता की स्वतन्त्रता के लिए लोकतंत्र के लिए लोकतंत्र की रक्षा के लिए और निरंकुश राजतंत्र की समाप्ति के लिए युद्ध कर रहे हैं। इस प्रचार से रूसी जनता को भी जार के अत्याचारी निरंकुश शासन से छुटकारा पाने की प्रेरणा मिलती थी। (4) यौद्धिक क्रान्ति-"रूस में पश्चिमी विचारों का आना प्रारम्भ हो गया था। रूस के मध्यम वर्ग के लोग इन विचारों से बहुत प्रभावित हुए। ताल्सताय, तुनिव, दोस्तोवस्की के उपन्यासों ने रूस की शिक्षित जनता को बहुत प्रभावित किया। इसी प्रकार मार्क्स, मैक्सिम गोर्की तथा बाकुनिन के समाजवादी तथा अराजकतावादी ने रूसी समाज में भारी क्रान्ति पैदा कर दी। शून्यवादी तो रूस की उस समय विद्यमान व्यवस्था का पूर्ण विनाश करना चाहते थे।"

(5) युद्ध के मोर्चे पर रूसी सेना की विफलता-रूस जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में बड़े उत्साह से उतरा था। शुरू में उसने आस्ट्रिया के विरुद्ध कुछ सफलता भी प्राप्त की थी, किन्तु सितम्बर 1914 में टैनिन वर्ग की लड़ाई में और फरवरी 1915 में मजरियन झीलों पर हुई लड़ाई में रूसी सेना को भारी पराजयों का मुंह देखना पड़ा। उसके लाखों सैनिक हताहत हुए और एक लाख से अधिक शत्रु के हाथों बन्दी बना लिए गये। यह पराजय रूसी सेना में वीरता की कमी के कारण नहीं, अपितु सामग्री की कमी और कुप्रबन्ध के कारण हुई थी। इससे देश में जार के शासन के विरुद्ध असन्तोष भड़क टठा। (6) भ्रष्ट और अयोग्य शासन-रूसी सेना की मोर्चे पर पराजय का कारण अंशत:

भ्रष्ट और अयोग्य शासन था। शासन के कर्मचारी देश के हित का ध्यान उतना नहीं रखते थे, जितना कि जिस किसी भी तरह जार को खुश करके अपनी पदोन्नति करने का इंग्लैण्ड और फ्रांस से जो युद्ध सामग्री रूस के बन्दरगाहों तक पहुँच भी गई थी, वह भी कर्मचारियों की अयोग्यता के कारण समय पर मोर्चा तक नहीं पहुंचा जा सकी। इतना ही नहीं, इंग्लैण्ड ने जो मशीन गन्ने जर्मनों से लड़ने के लिए भिजवाई थी, उन्हें जार के मोर्चे से हटा कर राजधानी में मंगवा लिया, जिससे संभावित विद्रोह का दमन किया जा सके। इन कारणों से प्रजा में असंतोष और बढ़ गया। (7) निकोलस द्वितीय का योग्य शासक न होना-प्रो० फिशर ने लिखा है कि

"निकोलस द्वितीय दुर्बल और हठी स्वभाव का मन्दबुद्धि व्यक्ति था जिसमें घटनाओं के महत्त्व और व्यक्तियों के चरित्र को समझाने की शक्ति नहीं थी।" वह अन्धविश्वासी था। वह व्यक्ति के रूप में बहुत बड़ा,शासक के रूप में योग्य था। (8) रूसी सन्त का राजनीति में हस्तक्षेप-रास्पुतिन एक रूसी सन्त था। उसका जार और जार की रानी पर गहरा प्रभाव था। वे उसे पहुँचा हुआ, अलौकिक शक्तिसम्पत्र सन्त मानते थे। वे हर मामले में उसकी सलाह लेते थे। वह राजनीति और प्रशासन में अत्यधिक हस्तक्षेप करने लगा था। ऊँचे पदों पर नियुक्ति करवाना स्थानान्तरण करवाना या पद से हटवाना उसके बायें हाथ का खेल था। रास्पुतिन युद्ध का विरोधी था। उसके प्रभाव के विरुद्ध असन्तोष भी रूसी क्रांति का एक कारण था। (9)जार की रूसीकरण की नीति का परिणाम-रूस में रूसियों के अतिरिक्त अन्य कई जातियाँ रहती थीं। वे धर्म, शिक्षा तथा भाषा के मामलों में स्वतंत्रता चाहती थीं परन्तु जार की नीति उन्हें इन मामलों में स्वतंत्रता देने के बजाय उन पर रूसी धर्म तथा भाषा थोपने की थी। इससे इन अल्पसंख्यक जातियों में भारी असंतोष था, जो क्रान्ति का एक कारण बना। (10) जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुओं की कमी-युद्ध के कारण जीवनोपयोगी वस्तुओं की कमी हो गई। चीजों के दाम बहुत ऊंचे चले गये गरीबों के लिए अनाज, कपड़ा और ईंधन प्राप्त करना कठिन हो गया। लोगों का ख्याल था कि देश में इन चीजों की कमी नहीं है. अपितु धनी लोगों ने इन्हें अपने गोदामों में कर लिया है और चोरबाजारी द्वारा कीमतें बढ़ा ही उनका कहना था कि इस चोरबाजारी और मुनाफाखोरी में सरकारी अफसरों की भी मिलीभगत है। इसलिए सरकार के विरुद्ध तात्कालिक कारण बना। जनसाधारण में भारी असंतोष था और यह असन्तोष ही क्रान्ति का (1) रूसी संसद का शक्तिहीन होना-यदि कहने के लिए रूस में एक संसद थी,

किन्तु उसके हाथ में कोई शक्ति न थी। उनका काम जार (सम्राट) को सलाह देना भर या। जार उस सलाह को मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र था। इंग्लैण्ड तथा फ्रांस के राजदूटों नजारा को सलाह दी थी कि वह ऐसे लोगों को अपना मंत्री नियुक्त करे, जिन्हें दुमा (संसद) का विश्वास प्राप्त हो परन्त जार में विरोध हो गया। युमा और जार में विरोष हो गया। मार्च क्रान्ति के आरम्भ में जार ने कट होकर चुमा को भंग कर दिया, परन्तु घुमा ने भंग होने से इन्कार कर दिया। यदि रूस में संसद को शक्ति प्राप्त होती, तो क्रान्ति को रोका जा सकता था। संक्षेप में ये थे सन् 1917 की उस रूसी क्रान्ति के कारण, जिसने न केवल रूस में अपितु अन्य अनेक देशों में भी पूंजीवादी व्यवस्था को पैसा कर दिया। सन् 1917 की रूसी क्रांति का महत्त्व रूसी क्रांति विश्व इतिहास की महान् घटना है। यह प्रथम अवसर था, जब किसी देश में कार्ल मार्क्स के साम्यवादी सिद्धांतों के आधार पर श्रमिक वर्ग की सरकार स्थापित हुई। आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना-जिस प्रकार फ्रांस की सन् 1789 की क्रान्ति ने राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना की थी, उसी प्रकार सन् 1917 की रूसी क्रान्ति ने आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना की। लोगों को भी दी जानी चाहिए। केवल राजनीतिक समानता दे देना पर्याप्त नहीं है, ठन्हें आर्थिक समानता वर्गविहीन समाज की स्थापना-रूसी क्रान्ति इस नई विचारधारा की पक्षपोषक थी कि देश में वर्ग विहीन समाज की स्थापना होना चाहिए। प्रायः सभी देशों में चिरकाल से समाज दो वर्गों में बांटा रहा है: शोषक और शापित। बहुसंख्यक लोग शोषित रहे हैं और कुछ थोड़े से लोग बल, छल और दर्म के सहारे उनका शोषण करके गुलछर्रे ठड़ाते रहे हैं। रूसी क्रान्ति ने इस स्थिति को समाप्त कर दिया। मार्क्स के सिद्धांतों का सत्यता की कसौटी पर खरा उतारना-कार्ल मार्क्स ने इतिहास की एक नई व्याख्या करके ठसे मानव समाज के आर्थिक वर्गों के संघर्ष का इतिहास बताया था और भविष्य के लिए अनेक भविष्यवाणी की थीं। टसका कहना था कि इतिहास के स्वाभाविक क्रम में पूंजीवाद के बाद श्रमिक वर्ग का अधिनायक तंत्र और ठसके बाद वर्गहीन समाज स्थापित होगा। कम-से-कम रूस में श्रमिक वर्ग का अधिनायक तंत्र स्थापित हो गया। इस सीमा तक मार्क्स का सिद्धान्त सही प्रमाणित हुआ। अन्य देशों का चिन्तित होना-रूस की साम्यवादी क्रांति के अन्य पूँजीवादी देशों के लिए एक बड़ी चिन्ता उत्पन्न कर दी। उन देशों में भी अमिक और कृषक वर्ग थे, जिनको शोषण का शिकार बनना पड़ा था। रूसी क्रांति की सफलता से प्रोत्साहित हो कर वह भी आर्थिक समानता के अधिकार की मांग कर सकते थे। इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि देशों ने तो रूसी क्रान्ति को विफल करने के लिए आर्थिक तथा युद्ध सामग्री की सहायता भी क्रान्ति विरोधी रूसियों को भेजी। समाजवादी आन्दोलन को बल मिला-समाजवादी आन्दोलन किसी न किसी रूप में अनेक देशों में चल रहा था। रूसी क्रांति की सफलता से उसे सभी जगह बल मिला। मजदूरों ने अपने आन्दोलन प्रबल कर दिये और अधिकाधिक सुविधाओं की मांग की। पूँजीपतियों को काफी हद तक उनकी माँगे स्वीकार करनी पड़ी। अनेक देशों में तो इस समय तक साम्यवादी व्यवस्था हो अपनाई जा चुकी है। इन देशों में चीन, पूर्वी यूरोप के देश, यूगोस्लाविया और क्यूबा उल्लेखनीय है।

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