सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

1789 की फांसीसी क्रान्ति दार्शनिकों के प्रभाव

  1789 की फांसीसी क्रान्ति दार्शनिकों के प्रभाव 

फ्रांसीसी क्रान्ति न केवल यूरोपीय इतिहास में वरन् विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना है। यह क्रांति 18वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। जिस समय फ्रांस की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दशा बिगड़ गई उस समय फ्रांस में एक बौद्धिक जागृति हुई। अनेक दार्शनिकों तथा विचारों ने सामाजिक त्रुटियों का भण्डाफोड़ करके सामान्य जनमानस (जनता) के हृदयों में कुलीन, सामन्तों तथा पादरियों के विरुद्ध घृणा की भावनायें उत्पन्न कर दी। मान्टेस्क्यू, वाल्टेयर, रूसो, दिदरो, हैलीविशस तथा हलवा आदि दार्शनिकों ने फ्रांसीसी समाज में एक नूतन विचार उत्पन्न किए इस प्रकार इन दार्शनिकों, विचारको लेखकों तथा अर्थशास्त्रियों ने फ्रांस की शासन व्यवस्था की बुराइयों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित किया। फलतः फांसीसी जनता इस शासन व्यवस्था की त्रुटियों को दूर करने के प्रयत्न करने लगी जिससे क्रान्ति की संभावनायें उत्पन्न हो गयी। 1789 ई० में इन बौद्धिक वर्ग के लोगों (दार्शनिकों) की भूमिका अथवा योगदानों को अग्रलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत विश्लेषित किया जा सकता है

(1) मान्टेस्क्यू (1689-1756) मॉन्टेस्क्यू द्वारा नवीन भावना का प्रकटीकरण-फ्रांस के दार्शनिकों में मान्टेस्क्यू को विशेष स्थान दिया जाता है। यह फ्रांस का एक बहुत बड़ा विद्वान् तथा तत्त्ववेत्ता था। एक प्रसिद्ध वकील तथा बोडों के न्यायालय का न्यायधीश था, वह काफी भ्रमण किया हुआ था। मान्टेस्क्यू ने कुछ वर्ष इंगलैण्ड में रहकर वहाँ के विधान को अच्छी तरह समझा था, उसने वैधानिक समस्याओं का गम्भीरता से अध्ययन किया था जिसका निचोड़ उसने अपनी पुस्तक कानून की आत्मा में प्रकाशित किया वह कैथोलिक धर्म का अनुयायी तथा राजसत्ता का पक्षपाती था, वह क्रान्तिकारी विचारों का विरोधी था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का पालक था। उसने स्वार्थी संस्थाओं और राजाओं के दैवी अधिकारों को समाप्त करके सरकार को व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका तीन मुख्य अंगों में बाँटने पर बहुत जोर दिया। ठसका कथन था कि शासन का कार्य इन्ही विभागों को सौंप दिया जाए अर्थात कानून बनाने वाली संस्था और हो और कानून लागू करने वाली कोई और। मान्टेस्क्यू ने फ्रांस की पुरानी व्यवस्था की जड़ों पर कुठाराघात किया और एकतंत्र की निन्दा करके स्वतंत्रता के लिए राजा की शक्तियों पर मर्यादायें लगाना आवश्यक बताया।

(2) वाल्टेयर (1693-1778) चर्च का भय दूर हटाना-वाल्टेयर का जन्म मध्यम वर्ग में हुआ था। उसे बचपन से ही कविता तथा लेख लिखना प्रिय था, उसने शासकों की कटु आलोचना की थी जिसके कारण उसको कई बार जेल जाना पड़ा उसने फ्रांस से भागकर कई वर्ष तक बाहर रहकर अपने जीवन के दिन बिताये थे वाल्टेयर चर्च का पक्का विरोधी था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का पुजारी था। इसी स्वतंत्रता के लिए उसने बहुत से लेख लिखे थे। उसने राज्य में होने वाले अत्याचारों का कठोर विरोध किया और जनता के मन में चर्च तथा राज्य का भय समाप्त किया। 18वीं शताब्दी में वह यूरोप का एक महान व्यक्ति था। उसे 'यूरोपीय साहित्य का सम्राट' के नाम से पुकारा जाता था। उसके विचार प्रभावशाली थे और उसने अपने विचारों का खूब प्रचार किया। वहाँ की सरकार ने उसे देश से निकाल दिया और वह तीन वर्ष तक इंग्लैण्ड में रहा। उंसके बाद वह प्रशा तथा रूस गया। वहाँ के शासकों ने उसका बड़ा आदर किया। इस प्रकार वाल्टेयर जनता की सेवा करते करते सन् 1778 ई० में इस संसार से चला गया।

(3) रूसो (1712-78) रूसो का अद्वितीय प्रभाव-रूसो के महान् विचारों से सभी वर्ग के लोग प्रभावित हये थे। उसने जनता के हृदय में क्रान्ति की भावना उत्पन्न की थी और इसी के विचारों से फ्रांस में राज्य क्रान्ति का विस्फोट हुआ था। रूसो के लिखे हुये ऐमिली तथा सामाजिक समझौता नामक दो ग्रन्थ बहुत प्रसिद्ध है उसने अपनी इन पुस्तकों में शासन की दुर्व्यवस्था तथा राजाओं के अत्याचारों पर पूर्ण रूप से प्रकाश डाला और सिद्ध किया कि यही परिस्थितियों क्रान्ति के लिए उत्तरदायी है। सारे कानून जनता की सुविधाओं के लिए बनाने चाहियें और राजा को उन बनाये हुऐ कानूनों के अनुसार ही चलना चाहिये। वह प्राकृतिक जीवन पर बहुत जोर देता था। इसके अतिरिक्त रूसो ने अपनी पुस्तक में "स्वतंत्रता, समानता तथा बन्धुत्त्व" के महत्त्व को अच्छी तरह समझाया। परिणामस्वरूप सारी जनता उसके विचारों से सहमत हो गई। विशेषत: शिक्षित वर्ग उसके विचारों को मानता था।

 (4) दिदरो (1712-1784)- शासन की बुराइयों को प्रकट किया-दीदार भी अपने शासन काल का एक प्रसिद्ध दार्शनिक था। वह क्रांतिकारी विचारों का समर्थक था। उसने एक विश्वकोष की रचना की और उसमें शासन सम्बन्धी समस्त बुराइयों का अच्छी तरह वर्णन किया था जनता ने दिदरों के लिखे हुए कोष की प्रसंशा की परन्तु सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। अतः राज्य ने कोष के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगा दिये और दिदरो को राजद्रोही घोषित कर दिया। (5) हैलीविशस -इसने सन् 1758 ई० में अपनी एक पुस्तक 'डी ले स्प्रिट' प्रकाशित की थी जिसने राज्य के गुणों तथा अवगुणों पर प्रकाश डाला गया था। इस पुस्तक को सरकार ने अपने लिए हानिकारक समझा, इसीलिए इसको शीघ्र ही नष्ट कर दिया, परन्तु फिर भी जनता तथा विद्वानों पर इस पुस्तक के प्रभाव बने रहे।

(6) हाल बैंक -इसने सन् 1770 ई० में अपनी पुस्तक “सिस्टम डे ला नेचर" प्रकाशित करायी। इसने अपनी पुस्तक में इस प्रकार लिखा था-"मानव एक भौतिक प्राणी है, वह अपने हित से प्रसन्न होता है और अपने अधिकाधिक इच्छाओं की पूर्ति से सन्तुष्ट होता है। अतः उचित सरकार का यही उद्देश्य होना चाहिये। मनुष्य भ्रष्ट है, क्योंकि वह लगभग प्रत्येक स्थान पर भौतिक नियंत्रण पाता है, उस पर अयोग्यता से शासन होता है, क्योंकि धर्म ने उसके प्रभुओं को दैवी बना दिया है।"

आलोचना-यह कहना है कि फ्रांस की राज्य क्रांति का उत्तरदायित्त्व दार्शनिकों पर है, उचित नहीं जान पड़ता है। क्रांति का उत्तरदायित्त्व इन दार्शनिको पर नहीं डाला जा सकता, बल्कि सरकार के दोषों एवं गल्तियों पर डाला जा सकता है। यद्यपि प्रो० हेजन क्रान्ति को "राष्ट्रीय जीवन की परिस्थितियों, बुराइयों, सरकार की गलतियों तथा दुर्बलताओं" की उपज मानता था, फिर भी वह यह मानता था कि "क्रान्ति ने इन लेखकों का बहुत बड़ा योग था। उन्होने शिक्षा देकर कुछ नेता तैयार कर दिये, उनके मस्तिष्क में कुछ स्पष्ट सिद्धान्त भर दिये, उनके नेत्रों के सम्मुख आकर्षक स्वप्न प्रस्तुत कर दिये और एक आशावादी दृष्टिकोण को प्रोत्साहन दिया।" कहने का तात्पर्य यह है कि दार्शनिकों का प्रत्यक्ष तो नहीं वरन् अप्रत्यक्ष प्रभाव अवश्य ही क्रान्ति को सहयोग देने वाला था।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत  राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक विकासवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। परन्तु गंभीर विवेचना से स्पष्ट होता है कि अन्य सभी सिद्धान्त गलत हैं और उन्होंने राज्य की उत्पत्ति की सही व्याख्या नहीं की है। इस सम्बन्ध में गार्नर का कहना ठीक है कि, "राज्य न तो ईश्वर की कृति है, न किसी उच्च शक्ति का परिणाम, न किसी प्रस्ताव या समझौते की सृष्टि है, न परिवार का विस्तारमात्र" अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्य की उत्पत्ति का सबसे अच्छा सिद्धान्त कौन है। इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि राज्य विकास का परिणाम है। इसका निर्माण मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ था और अच्छे जीवन के लिए अब भी चल रहा है। राज्य की उत्पत्ति का सबसे सही और वैज्ञानिक सिद्धान्त विकासवादी या ऐतिहासिक सिद्धान्त को ही कहा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति एक विकास का परिणाम है। यह विकास धीरे-धीरे क्रम: चलता रहता है। इसी विकास के परिणामस्वरूप राज्य ने वर्तमान का रूप धारण किया है। राज्य की उत्पत्ति और व

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और