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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वैदिक संस्कृति की मूलभूत विशेषताए

वैदिक संस्कृति की मूलभूत विशेषताए  ऋग्वेद या पूर्व वैदिक संस्कृति की विशेषताएं- ऋग्वैदिक काल से आशय उस समाज से है जबकि आर्य पंजाब तथा गंगा घाटी के उत्तरी भाग में फैले थे। ऋग्वेद एक उस समय का ऐसा ग्रन्थ है जिससे पूर्व वैदिक कालीन आर्यों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक स्थिति का विवरण मिलता है। जिस काल में ऋग्वेद की रचना हुई उस काल को सभ्यता को हम ऋग्वैदिक सभ्यता अथवा पूर्व वैदिक काल की सभ्यता के नाम से जानते हैं। इससे प्राप्त विवरण इस प्रकार हैं- राज्य का स्वरूप (राजनीतिक दशा) (1) राजतन्त्र-ऋग्वैदिक काल में राजतन्त्र राज्य का मुख्य स्वरूप था। ऋग्वेद में वर्णित कई कबीले राजा के आधीन थे। ऋग्वेद में राजा के लिए राजन शब्द का उपयोग हुआ है। ऐसा लगता है, राजा का पद पैतृक हो गया था और इसमें ज्येष्ठाधिकार का सिद्धान्त लागू होता था। (2) कबीली प्रजातन्त्र-रामशरण शर्मा ने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि ऋग्वैदिक काल में कबीली प्रजातन्त्र था। गणतन्त्र के लिये तकनीकी शब्द 'गण का प्रयोग ऋग्वेद में 46 बार हुआ है। एक जगह गण के प्रधान को 'गणपति कहा गया है। एक स्थान पर राजन भी। लगता

उत्तर वैदिक कालीन का सामाजिक आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन

उत्तर वैदिक कालीन का सामाजिक आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन  उत्तर वैदिक सभ्यता- वैदिक युग के अन्तर्गत उत्तर वैदिक सभ्यता अर्थात् वैदिक काल से हमारा आशय उस काल से है जिसमें तीन वेद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद-ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक तथा उपनिषदों की रचना हुई। इसमें आर्य सभ्यता का विकास एवं विस्तार हुआ। वह पंजाब से आगे शेष उत्तरी भारत और फिर दक्षिण भारत में भी फैलने लगी। इस सभ्यता के अधिकांश सिद्धान्त ऋग्वैदिक सभ्यता के समान हैं तथापि आर्यों के स्वजातीय अनुभव और ज्ञान तथा विजातीय सम्पर्क ने उसे अधिकाधिक समृद्धि करना प्रारंभ किया। सामाजिक स्थिति- अध्ययन की सुविधा के लिए उत्तर वैदिक कालीन सामाजिक दशा को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है (1) पारिवारिक जीवन- उत्तर वैदिक कालीन समाज भी पितृप्रधान था तथा संयुक्त परिवार-प्रथा का प्रचलन था। (2) मनोरंजन- उत्तर वैदिक कालीन लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन नृत्य एवं संगीत था। गायन एवं वादन दोनों ही प्रकार के संगीत का प्रचलन था। प्रमुख वाद्य बांसुरी इत्यादि थे। संगीत के अतिरिक्त रथ-दौड़ भी अत्यन्त लोकप्रिय था। पासों के द्वारा जुआ ख

भारतीय संस्कृति विभिन्न के स्रोतों पर टिप्पणी

भारतीय संस्कृति के विभिन्न स्रोतों पर टिप्पणी  किसी भी देश के समग्र अध्ययन के लिए उस देश से सम्बन्धित साक्ष्य सामग्री अथवा स्रोत की आवश्यकता होती है। ये स्रोत मूलत: दो प्रकार के होते हैं-प्रथम साहित्यिक स्रोत और द्वितीय पुरातात्त्विक स्रोत। जहाँ तक भारतीय संस्कृति के अध्ययन का प्रश्न है, इसके भी कुछ महत्त्वपूर्ण स्रोत अथवा साक्ष्य हैं। इन्हीं स्रोतों के आधार पर हम भारतीय संस्कृति को समझ सकते हैं। भारतीय संस्कृति को जानने हेतु जो महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं उनमें साहित्यिक स्रोतों का विशेष महत्त्व है। अर्थात् भारतीय संस्कृति के साहित्यिक स्रोत के आधार पर जाना एवं समझा जा सकता है। भारतीय संस्कृति को जानने के निम्नलिखित स्रोतों का सहारा लेना पड़ता है जो इस प्रकार है धार्मिक ग्रन्थ व साहित्य-भारत में प्रारम्भ से ही कर्म को प्रधानता दी गई है। यहाँ की सभी विशेषताएँ धर्म से अनुप्राणित है, यहाँ की समस्त अवस्था सामाजिक, नैतिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि धर्म को ही केन्द्र-बिन्दु मानकर आगे बढ़ी थीं। धर्म की विशद् एवं व्यापक परिभाषा के अन्तर्गत धर्म और जीवन अन्योन्याश्रित बन गए थे, उनके बीच की विभेद-रेखा

भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत संस्कृति की परिभाषा

भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत संस्कृति की परिभाषा  संस्कृति का तात्पर्य (अर्थ) संस्कृति का आशय है किसी भी देश अथवा राष्ट्र की वह समस्त गतिविधियाँ जिसके अन्तर्गत उस देश का समग्र मानवीय विकास होता है। संस्कृति शब्द देखने में छोटा लगता है, लेकिन यदि हम इसका विस्तृत अध्ययन करें तो संस्कृति से कोई भी चीज अछूती नहीं है। संस्कृति वह समग्र शब्द है जिसके अन्तर्गत उस देश अथवा राष्ट्र की समग्र मानवीय गति विधियाँ आ जाती हैं। संस्कृति को यदि हम इस उदाहरण द्वारा समझते तो संस्कृति के भावात्मक अर्थ को जाना जा सकता है। मनुष्य और जानवरों में आदि काल से एक महत्वपूर्ण अन्तर दृष्टिगत होता है जिससे मनुष्य जानवरों से पृथक् होता है। मानव एक बौद्धिक चिन्तनशील प्राणी है, जबकि जानवरों में बौद्धिकता का अभाव होता है। मनुष्य में सोचने समझने की शक्ति पशुओं से कई गुना अधिक होती है। इसी कारण मनुष्य को बौद्धिक प्राणी कहा गया है। इसलिए किसी ने ठीक कहा है। "बुद्धि अथवा विवेक के अभाव में मनुष्य पशु है।" विवेकशीलता के कारण मानव तर्क एवं चिन्तन करने में समर्थ हुआ है। अतः इसी विवेक के कारण ही धर्म, दर्शन, कला का उ

अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का सार है

"अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का सार है।"  हमारे देश भारत में सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं ये लोग बहु भाषा-भाषी है। इनकी इन विषमताओं को देखकर कोई भी बाहरी व्यक्ति यह समझ सकता है अथवा ठसे सन्देह हो सकता है कि भारत एक देश न होकर छोटे छोटे खण्डों का विशाल जन समूह है। जहाँ प्रत्येक की अपनी पृथक्-पृथक् संस्कृति अथवा सभ्यता है। किन्तु इन प्राकृतिक एवं सामाजिक स्तर की विभिन्नताओं में एकता की एक कभी न टूटने वाली ऐसी कड़ी है जिसकी हम अपेक्षा नहीं कर सकते। इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध विद्वान् हर्यट रिजले ने ठीक लिखा है, "भारत में विभिन्न प्राकृतिक एवं सामाजिक विविधताओं भाषा प्रथाओं तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बीच हिमालय से कन्याकुमारी तक एक निश्चित आधारभूत समरूपता अब भी देखी जा सकती है। वस्तुतः यहाँ एक समान भारतीय चरित्र एवं व्यक्तित्व है जिसे हम घटकों में विभाजित नहीं कर सकते।" यही कारण है कि तमाम विद्वान् यह कहने को बाध्य हो जाते हैं कि अनेकता में एकता है हिन्द (भारत) को विशेषता। इस परिप्रेक्ष्य में यदि हम भारतीय संस्कृति के लौकिक पक्ष का निरूपण करते हैं तो हमें निम्न

माओ के राजनीतिक विचार

माओ के राजनीतिक विचार माओवादी राजनीतिक चिंतन के सन्दर्भ में विद्वानों में दो मत है। प्रथम मत के अनुसार माओवाद में मार्स, लेनिन और स्टालिन के विचारों का मिश्रण हैं जयकि दूसरे मत के अनुसार माओवाद का का अस्तित्त्व एक स्वतंत्र और मौलिक विचारधारा है राष्ट्रीयता का संवेग ठसके व्यक्तित्व अभिन्न अंग बना रहा। उसके विचारों का निर्माण चीनी संस्कृति के बीच हुआ। माओ के प्रमुख राजनीतिक विचार निम्न हैं- 1. असंगति अथवा अन्तर्विरोध का सिद्धांत- चीन के सामाजिक विकास को स्पष्ट करते हुए माओ ने 'ऑन काण्ट्राडिक्शन' में असंगति के सिद्धान्त का विस्तार से प्रतिपादन किया है। माओ के अनुसार, "असंगतियाँ भित्र-भिन्न प्रकार की हैं और प्रत्येक प्रकार की असंगीत को हल करना साम्यवादी का कार्य है।" माओ के अनुसार, "गुणात्मक रूप से भिन्न असंगतियों का केवल गुणात्मक रूप से भित्र साधनों के द्वारा ही हल किया जा सकता है- पूँजीपति वर्ग और सर्वहारा वर्ग के बीच की संगत को समाजवादी क्रान्ति के तरीके से हल किया जाता है, सामान्ती व्यवस्था और आम जनता के बीच की असंगति राष्ट्रीय क्रान्तिकारी युद्धों से हल हो

साम्राज्यवाद, क्रांति और राज्य के विषय में लेनिन के विचार

साम्राज्यवाद, क्रांति और राज्य के विषय में लेनिन के विचार साम्राज्यवाद सम्बन्धी विचार- मार्क्सवाद पर किये जाने वाले आक्षेपों से मार्क्सवाद की रक्षा करने के लिए लेनिन ने सन् 1916 में "साम्राज्यवाद पूँजीवाद की चरम अवस्था पुस्तक लिखी इस पुस्तक में उसने यह सिद्ध करने का प्रयास किया साम्राज्यवाद पूंजीवाद की उच्चतम व्यवस्था है। लेनिन के इस सिद्धान्त को साम्राज्यवादी पूँजीवाद' के नाम से सम्बोधित किया जाता है। उसने दृढ़ता से यह प्रतिपादित किया कि मार्क्स का पूँजीवाद का सिद्धान्त पूर्णत: सही है और उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन अथवा संशोधन करने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। लेनिन इस स्थिति में चार कदम आगे बढ़कर यह कहता है कि मावर्स के पूँजीवाद के विकास सम्बन्धी जो निष्कर्ष निकाल थ व मूल रूप से सहीं हैं, केवल कुछ नवीन घटनाओं के कारण वे परिणाम ढक से गये हैं 'एकाधिकार वित्त पूँजीवाद' और 'साम्राज्यवाद की उत्पति इस प्रकार की घटनायें हैं। लेनिन का विचार था कि साम्राज्यवाद पूँजीवाद की उच्चतम तथा अंतिम अवस्था है। लेनिन के अनुसार आधुनिक साम्राज्यवाद का आधार आर्थिक है। साम्राज्यवाद प्र

मार्क्स के प्रमुख सिद्धांतों का विवेचना

मार्क्स के प्रमुख सिद्धांतों का विवेचना  मार्क्स तथा एंजेल्स द्वारा प्रतिपादित मार्क्सवाद अथवा साम्यवाद पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध एक मानवीय संवेदनात्मक विद्रोह है। मार्क्स तथा एजेंल्स की अनेक कृतियों में इस सिद्धान्त का प्रणयन हुआ है। इनमें मार्क्स की 'दास कैपिटल मार्क्स तथा एंजेल्स  दोनों के द्वारा प्रणीत 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो' तथा एंजेल्स कृत ओरिजिन ऑफ फैमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एण्ड द स्टेट' मुख्य हैं। इनमें मार्क्स के सिद्धान्तों पर प्रकाश पड़ता है। मार्क्सवाद के निम्न मुख्य तत्त्व हैं- 1. अलगाव का सिद्धान्त 2. द्वंद्वात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धान्त 3. अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त 4. वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त 5. सर्वहारा वर्ग की क्रांति एवं अधिनायकता का सिद्धान्त अलगाव का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्तिगत संपत्ति समस्त मानवीय संबंधों के विकास का कारण है। व्यक्तिगत संपत्ति के कारणवश मानव स्वयं से, समाज से, प्रकृति से अपनी मेहनत से अलग हो जाता है। वह भटक जाता है घन की चकाचौंध में जो संपत्ति मानव की सेवा करने के लिये एक साधन था वह मानव की

हीगल के द्वन्द्वात्मक पद्धति के अर्थ एवं महत्त्व

हीगल के द्वन्द्वात्मक पद्धति के अर्थ एवं महत्त्व प्रसिद्ध दार्शनिक हीगल की द्वंद्वात्मक पद्धति (द्वंद्ववाद) विश्व में होने वाले परिवर्तनों को समझने के लिए एक नया और मौलिक उपकरण है। उसने विकासवादी प्रक्रिया से प्रगति के विचार पर बल देते हुए यह प्रतिपादित किया कि हम किसी वस्तु के यथार्थ रूप को उसी विरोधी रूप में उसकी तुलना करके ही जान सकते हैं। हीगल का विश्वास था द्वन्द्र की यूह प्रक्रिया प्रकृति, सामाजिक जीवन, राजनीतिक संस्थाओं, दर्शन धर्म, कला, साहित्य सभी के विकास में दृष्टिगत होती है। द्वंद्वात्मक पद्धति के रूप में उसने विश्व में होने वाले महान् परिवर्तनों को समझने के लिए एक नवीन दार्शनिक साधन प्रस्तुत किया। द्वंद्वात्मक पद्धति की अवधारणा हेगेल के दर्शन का मूल तत्त्व अवश्य है, किन्तु यह उसका मौलिक चिन्तन नहीं है। वस्तुत: इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सुकरात ने किया था। हीगल ने यूनानियों से द्वन्द्वात्मक पद्धति को आत्मसात् करते हुए उसमें मौलिक परिवर्तन कर दिये और इसे वाद-विवाद के स्तर से उठाकर वाद, प्रतिवाद और संवाद के स्तर पर ले गया। हेगेल के अनुसार यूनानियों के विचार में द्वन्द्व

हीगल के राज्य तथा स्वतंत्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण

हीगल के राज्य तथा स्वतंत्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण  भौति राज्य को एक स्वाभाविक संगठन मानता है और उसका मानना है व्यक्ति का उच्चतम हीगल की राज्य सम्बन्धी अवधारणा यूनानी विचारकों से प्रभावित है। वह अरस्तू की हीगल की राज्य सम्बन्धी अवधारणा (विचार) -विकास राज्य के अन्तर्गत ही संभव है। हीगल राज्य को व्यक्तियों के एक कोरे समूह के स्थान पर वास्तविक व्यक्तित्त्व रखने वाली सत्ता एवं विश्वात्मा की अभिव्यक्ति मानता है। राज्य की उत्पत्ति-हीगल ने द्वंद्वात्मक पद्धति के आधार पर राज्य की उत्पत्ति की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। उसने लिखा है कि इसका निर्माण दो प्रकार के तत्वों से होता है। एक ओर विश्वात्मा अपने लक्ष्य की और बढ़ती हुई इसके विकास से सहयोग देती है और दूसरी ओर मनुष्य इसके द्वारा अपने को पूर्ण बनाने का प्रयत्न करते हुए इसका निर्माण करते हैं। उनका विचार है कि मानवीय जीवन का सार स्वतन्त्रता है और स्वतंत्रता की चेतना की प्रगति ही विश्व का इतिहास है। स्वतन्त्रता की प्राप्ति हेतु अब तक जो मानवीय पूर्ति करता और उसे सुरक्षा प्रदान करता है। परिवार, जो कि पारस्परिक प्रेम के दृढ़ बन्धनों